जिस तरह से बिना आत्मा के यह शरीर पूर्ण नहीं है।मात्र माटी का पुतला है।ठीक उसी तरह से बिना शरीर के ईश्वर भी नहीं हैं अर्थात् ईश्वर की वंदना यह पवित्र शरीर करता है।यह शरीर ईश्वर का मंदिर है और अंतर्मन में ईश्वर का ही वास होता है। मानव के अपने पावन कर्म और लक्ष्य ही जो मानव या प्राणी के हित के लिए होते हैं,जिनका जीवन ही जन कल्याण को समर्पित होता है आगे चलकर अवतार के रूप में परिभाषित हो जाते हैं।
- वर्तिक अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
अगर हम आत्मा के बिषय पर बात करें तो आत्मा को ईश्वर का अमर अंश माना जाता है जो शरीर में प्रवेश कर उसे चेतन बनाती है और शरीर में प्रवेश करने के बाद वह जीवित आत्मा शरीर बनता है और अपनी अंतरात्मा को जान कर मनुष्य ईश्वर की प्राप्ति करता है तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि आत्मा से शरीर बनता है और शरीर से ईश्वर, मेरा मानना है कि आत्मा चेतन है और शरीर उस चेतना का भौतिक अधार है जबकि आत्मा शरीर के माध्यम से अनुभव प्राप्त करती है लेकिन अंत में वह ईश्वर को ही प्राप्त करती है क्योंकि आत्मा तो परमात्मा का ही एक अंश है, बैसे भी आत्मा को ईश्वर का अमर अंश कहा जाता है जो शरीर में प्रवेश कर उसे चेतन बनाती है, अगर धार्मिक ग्रन्थों की बात करें तो शरीर को नश्वर कहा गया है लेकिन आत्मा को अमर, जब आत्मा किसी शरीर में प्रवेश करती है तो उसे जीवन मिलता है, शरीर बिना आत्मा निष्क्रिय है और आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व नहीं, अगर शरीर एक गाड़ी है तो आत्मा उसका मालिक है जो इसे जीवन भर नियंत्रण करती है, जबकि शरीर नाशवान है लेकिन आत्मा निराकार, शाश्वत और अमर ऊर्जा है जो शरीर के माध्यम से ही सुख दुख और कर्मों का अनुभव करती है, वास्तव में आत्मा, शरीर और ईश्वर भारतीय दर्शन के मूल स्तंभ है जबकि शरीर एक नश्वर भौतिक साधन है और आत्मा उसमें वास करने वाली अमर चेतना है और ईश्वर परम चेतना परमात्मा है, अन्त में यही कहुंगा कि आत्मा , शरीर और ईश्वर मनुष्य के मूल स्तंभ हैं जबकि शरीर नश्वर साधन है और आत्मा उसमें वास करने वाली अमर चेतना है और ईश्वर परम चेतना परमात्मा है, शरीर नष्ट होता है मगर आत्मा ईश्वर का अंश होकर भी नित्य बनी रहती है जो आत्म ज्ञान द्वारा ईश्वर से मिल जाती है और यह शरीर के भीतर स्थित एक अमर चेतन शक्ति है जो शरीर के माध्यम से संसार का अनुभव करती है और पुनर्जन्म लेती रहती है जबकि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमानऔर सृष्टिकर्ता है जो शरीर आत्मा से परे परम तत्व है, लेकिन यह सत्य है कि आत्मा शरीर में प्रवेश करती है और वोही आत्मा, परम आत्मा के साथ मिलकर परमात्मा यानि ईश्वर रूप धारण कर लेती है जिससे जाहिर होता है कि आत्मा सेसे शरीर और शरीर से ईश्वर बनता है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
आत्मा से शरीर बनता है, शरीर से ईश्वर बनता है।”यह कथन गहन दार्शनिक संकेत लिए हुए है।भारतीय दर्शन में आत्मा को मूल तत्त्व माना गया है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”
अर्थात आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; वह शाश्वत है। शरीर परिवर्तनशील है—मिट्टी, जल, अग्नि, वायु, आकाश से बना हुआ। आत्मा चेतना का स्रोत है; वही शरीर को प्राण, अनुभूति और गति देती है। यदि आत्मा न हो, तो शरीर केवल जड़ पदार्थ है। इस प्रकार पहला सूत्र बताता है कि चेतना (आत्मा) ही जीवन का आधार है। शरीर से ईश्वर बनता है ,यह कथन साधना का संकेत देता है। मानव शरीर कर्म का क्षेत्र है— यहीं सेवा, त्याग, प्रेम, तप, साधना संभव है। जब शरीर द्वारा किए गए कर्म। धर्म, करुणा और लोकमंगल की दिशा में प्रवाहित होते हैं,तो मनुष्य “मानव” से “महामानव” बनता है।इसी भाव को संत परंपरा ने कहा— “नर से नारायण”। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि प्रत्येक आत्मा संभावित रूप से दिव्य है। अर्थात शरीर साधन है, जिससे हम अपने भीतर की दिव्यता को प्रकट कर सकते हैं। यदि आत्मा मूल है और शरीर साधन—तो ईश्वरत्व लक्ष्य है। यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं,बल्कि आत्मा और कर्म की शुद्धता से भीतर प्रकट होता है। “आत्मा से शरीर बनता है” — यह आध्यात्मिक सत्य है। “शरीर से ईश्वर बनता है” — यह साधना और कर्मयोग का मार्ग है।जब आत्मा की शुद्धता और शरीर के श्रेष्ठ कर्म मिलते हैं,तब मनुष्य में ईश्वरत्व का उदय होता है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
आत्मा से शरीर बनता है या शरीर में आत्मा का वास होता है. ये प्रश्न थोड़ा विचारणीय है. माँ के गर्भ में जब भ्रुण का निर्माण होता है तब उसमें आत्मा का प्रवेश होता है. तब धीरे-धीरे शरीर का निमार्ण होता है तब हम कह सकते हैं कि आत्मा से शरीर का निर्माण होता है.शरीर से ईश्वर बनता है ये बात से परे है. क्योंकि ईश्वर को शरीर कैसे बना सकता है. ईश्वर तो अजन्मा,अभोक्ता,अशरीरी,अदृश्य, ज्योति बिंदु स्वरुप होता है तो शरीर से ईश्वर कैसे बन सकता है. हाँ यह कहा जा सकता है कि आत्मा के शरीर में आने पर ईश्वर का ज्ञान होता है. या हम उसे जान व समझ सकते हैं. लेकिन उसे देखने के लिए दिव्य चक्षु की जरूरत होती है. हम उसकी उपस्थिति महसूस कर सकते हैं. पर शरीर से ईश्वर बनता है यह नहीं कह सकते हैं.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश"
कलकत्ता - प. बंगाल
मनुष्य के शरीर मैं और एक माटी के पुतले में मुख्य अंतर यह है कि मनुष्य के शरीर मे आत्मा होती है , जो उसे जीवंत बनाती है , और माटी का पुतला आत्मा विहीन व निर्जीव होता है ! जब कोई प्राणी धरती पर जन्म लेता है तो शरीर मे आत्मा सहित जन्म होता है ! शरीर जब प्राप्त होता है , तो ईश्वर मैं स्वतः ध्यान होता है , व उस शरीर मैं ईश्वर का वास होता है !! परमात्मा या ईश्वर का वास हर शरीर मे होता है , अतः हर शरीर में ईश्वर होते है, कोई माने या न माने !! मृत्यु के पश्चात आत्मा शरीर से चली जाती है , वो शरीर एक निर्जीव पुतले की तरह , रह जाता है !! शरीर , आत्मा , सब ईश्वर की रचना है व इसका अंश हर जीवित प्राणी में होता है !! ईश्वर भी शरीर सहित अवतार लेते है , व ईश्वर का अस्तित्व भी मानव जीवन से परिपूर्ण होता है , क्योंकि मनुष्य ईश्वर को मानता है !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
मानव शरीर में आत्मा न हो तो जीवन ही नहीं है। आत्मा से शरीर बनता है, शरीर से ईश्वर बनता है। वास्तव में यही जीवन का परिदृश्य है। आत्मा से आयु का 1 से 100 का विभाजन होता है। कोई दिर्घायु होता है, कोई अल्पायु होता है। शरीर का नियंत्रण अपने ऊपर निर्भर करता है। प्राणवायु न मिले, खानपान स्वच्छ न हो, आलस्य, जो प्रकृति के विपरीत गया, वह तरीके से गया......
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
आत्मा चेतन तत्व है, शरीर जड़ है. आत्मा के बिना शरीर होता ही नहीं. आत्मा द्वारा शरीर के साधन को धारण किया जाता है, तभी शरीर में चेतनता आती है. आत्मा निकल गई तो शरीर शव बन जाता है. मानव शरीर के माध्यम से ही कर्म करके आत्मा स्वयं 'ईश्वर' या 'ब्रह्म', जो कि सर्वोच्च अवस्था है, को प्राप्त कर सकती है. आत्मा अजर-अमर है, शरीर साधन है, और ईश्वर साध्य है; मनुष्य रूप में ही जीव इस सर्वोच्च लक्ष्य को पाने में समर्थ है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
आत्मा और शरीर दोनों के जीवंत होने पर ही जीव का अस्तित्व होता है। ईश्वर के द्वारा देय उनके इस अनुपम उपहार को नमन है। इसके बाद की जो हमारी जीवन यात्रा है, वह कर्म और भाग्य के पहिये से चलती है। ये दो पहिये अलग-अलग जरूर हैं परंतु एक,दूसरे पर आश्रित हैं। इन दोनों के बीच एक चक्र का समन्वय है। कर्म से भाग्य प्रभावित होता है और भाग्य से कर्म।वैसे इसका मूल आधार कर्म है। जिसके अनुसार भाग्य का स्वरूप तय होता है। अत: जीवन में कर्म पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। भाग्य को कर्म से संवारा जा सकता और बिगड़ा भी जा सकता है। इसमें भूल या पश्चाताप का कोई स्थान नहीं है। जो भी है, केवल कर्म और उसके अनुसार भाग्य के रूप में प्रतिफल और ये आत्मा, शरीर, कर्म,भाग्य यानी सब कुछ का नियंत्रण और निर्णय ईश्वर के अधीन है।हमें तो बस कर्म करना है। इसलिए सत्कर्म करना ही सन्मार्ग है, सौभाग्य की प्राप्ति है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
आत्मा शरीर धारण करती है हमारा शरीर पांच तत्वों से बना है जो की नाशवान है । आत्मा के बिना यह मानव देह निष्क्रिय है। आत्मा ही शरीर को चैतन्यता प्रदान करती है। जिससे व्यक्ति मन बुद्धि और इंद्रियों की सक्रियता से कर्म करता है और इससे ही पता चलता है कि वह देव है या राक्षस। आत्मा की उपस्थिति होने से ही हमारा शरीर जीता जागता और कर्म करता दिखता है और यह भी सत्य है कि आत्मा का महत्व शरीर से है।शरीर से मनुष्य अपने अज्ञान, अभिमान ,अहंकार को छोड़कर उदार होकर जन-जन के कल्याण के लिए परोपकारी होकर विश्वबंधुत्व की दृष्टि से करूणा और प्रेम का मूर्त साकार करने लगता है साथ ही दृढ़ अनुशासन के साथ सत्य पर अडिग रहकर ईश्वरीय गुणों से विभूषित हो जाता है। तब वह राम-कृष्ण और बुद्ध बन जाता है जो जगत में साक्षात ईश्वरीय दर्शन है।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
आत्मा से शरीर बनता है, शरीर से ईश्वर बनता है। उक्त कथन मानव अस्तित्व की उस गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक वास्तविकता को प्रकट करता है, जिसमें आत्मा को जीवन का मूल तत्व माना गया है। आत्मा ही चेतना, सत्य, और अस्तित्व की वास्तविक शक्ति है, और शरीर उसी आत्मा का दृश्य और कर्मशील स्वरूप है। बिना आत्मा के शरीर केवल एक निर्जीव संरचना है, परंतु आत्मा के कारण ही शरीर में विचार, विवेक, संवेदना और कर्म की क्षमता उत्पन्न होती है। जब यही शरीर आत्मा की पवित्र प्रेरणा से सत्य, न्याय, करुणा और धर्म के मार्ग पर कार्य करता है, तब उसके कर्म साधारण नहीं रहते हैं, बल्कि दिव्य बन जाते हैं। यही दिव्यता मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाती है, क्योंकि ईश्वरत्व कोई बाहरी उपाधि नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धता और शरीर के श्रेष्ठ कर्मों का परिणाम है। इस प्रकार मनुष्य जब अपनी आत्मा की वाणी को पहचानकर अपने शरीर को धर्म, सत्य और न्याय के लिए समर्पित करता है, तब वही शरीर ईश्वर के गुणों का माध्यम बन जाता है। अतः यह कथन हमें यह संदेश देता है कि आत्मा की पवित्रता और शरीर के धर्मपूर्ण कर्म ही मनुष्य को ईश्वरत्व की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँचाते हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
आत्मा अमर है, आत्मा शाश्वत है एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करती है। इसे शरीर का निर्माण अथवा दुबारा से जन्म कहा जाता है। क्योंकि आत्मा कारण और सूक्ष्म शरीर के साथ नया भौतिक शरीर चुनती है। यह एक अदृश्य प्रक्रिया है, जहाँ शरीर आत्मा का माध्यम बनता है। अतः हमारा शरीर भौतिक है लेकिन इसे जीवन और क्रियाशीलता आत्मा के द्वारा मिलती है जो केवल हड्डियों --माँस का ढाचा न बनाकर एक जीवित व्यक्तित्व प्रदान करती है,जिसमें हम ईश्वर का निवास,देवालय मानते हैं। पावनता और पवित्रता ही आत्मा -परमात्मा का मेल है। जिस शरीर में ईश्वर का वास हो उसमें मोह लोभ काम क्रोध और अहंकार जैसे दुर्गुण नही आने चाहिए। इन सभी से दूर रहकर ही आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। मनुष्य दया, सेवा भाव, परोपकार की भावना से परहित कर्म करके उत्तम जीवन जीता है,तभी हमारा शरीर ईश्वर -मय दिव्य स्वरुप बन जाता है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
“आत्मा से शरीर बनता है” — यह बात भारतीय दर्शन, खासकर भगवद्गीता और उपनिषदों की दृष्टि से आंशिक रूप से सही मानी जा सकती है। वहाँ आत्मा (आत्मन्) को मूल चेतना माना गया है, जो शरीर को जीवंत बनाती है। शरीर बिना आत्मा के सिर्फ एक भौतिक ढांचा है।लेकिन “शरीर से ईश्वर बनता है” — यह कथन दार्शनिक रूप से थोड़ा विवादित है। अधिकांश दर्शनों में, जैसे वेदांत या भक्ति परंपरा, ईश्वर को सृष्टि का कारण माना जाता है, न कि शरीर से उत्पन्न होने वाला। हालांकि, एक दृष्टिकोण ऐसा भी है कि जब मनुष्य अपने भीतर की चेतना को पहचानता है, तो वह ईश्वरत्व का अनुभव करता है। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि “शरीर (या जीवन अनुभव) के माध्यम से ईश्वर की अनुभूति होती है”, न कि ईश्वर का निर्माण होता है।
- डॉ अशोक जाटव व्याख्याता
भोपाल - मध्यप्रदेश
आत्मा से शरीर बनता है इसका अर्थ है कि आत्मा ही जीवन का मूल तत्व है। आत्मा के बिना शरीर केवल एक निर्जीव वस्तु है। आत्मा ही शरीर को चेतना, शक्ति और अस्तित्व देती है। शरीर से ईश्वर बनता है यहाँ संकेत है कि मनुष्य अपने शरीर और कर्मों के माध्यम से ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकता है। जब शरीर से अच्छे कर्म, सेवा, प्रेम और सत्य का आचरण होता है, तब मनुष्य ईश्वर के गुणों को धारण करता है।आत्मा जीवन का आधार है, और शरीर उस आत्मा के श्रेष्ठ कर्मों का माध्यम है। जब मनुष्य अपने शरीर से दिव्य कर्म करता है, तो वह ईश्वर के समान महान बन सकता है।
- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'
मुंबई - महाराष्ट्र
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