पाठकों के बीच में प्रबोध कुमार गोविल की लघुकथाएं

      प्रबोध कुमार गोविल

जन्म : 1953, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) जन्म के तुरंत बाद से ही राजस्थान में स्थाई निवास

शिक्षा व अनुभव :

प्रबोध कुमार गोविल पत्रकारिता एवं जनसंचार के प्रोफ़ेसर  तथा ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर में निदेशक के पद पर कार्यरत रहे। वे लंबे समय तक वनस्थली विद्यापीठ में प्रशासन और जनसंपर्क अधिकारी भी रहे। वे एक बहुमुखी और सृजनशील लेखक हैं जिन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन किया है। उनकी अनेक पुस्तकें अंग्रेज़ी, उर्दू, सिंधी,राजस्थानी,मराठी, अरबी ,पंजाबी, संस्कृत, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमिया आदि भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। उनकी कई रचनाएं आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित हुई  हैं।

प्रकाशित कृतियाँ : -

कविता संग्रह :

 रक्कासा-सी नाचे दिल्ली, 

शेयर खाता खोल सजनिया, 

उगती प्यास दिवंगत पानी

उपन्यास : 

देहाश्रम का मनजोगी, 

बेस्वाद मांस का टुकड़ा,

 रेत होते रिश्ते, वंश,

 आखेट महल,

 जल तू जलाल तू, 

अक़ाब,

 हडसन तट का जोड़ा, 

हसद,

 रायसाहब की चौथी बेटी,

 टापुओं पर पिकनिक, 

बीते समय की रेखा,

 बसंती की बसंतपंचमी ( इसमें तीन उपन्यास खाम रात/बसंती की बसंतपंचमी/ सहरा में मैं और तू)

कहानी संग्रह : 

अंत्यास्त, 

सत्ताघर की कंदरायें, 

खाली हाथ वाली अम्मा, 

थोड़ी देर और ठहर, 

धुस-कुटुस, प्रोटोकॉल, 

मेरी कहानियां (कथामाला), वक्त महल।

नाटक :

 मेरी ज़िन्दगी लौटा दे,

 अजब नार्सिस डॉटकॉम, 

बता मेरा मौतनामा,

 मीठा बादल मीठी बरखा, 

ख़ुदा का घर।

लघुकथा संग्रह :

 मेरी सौ लघुकथाएँ, 

दो तितलियां और चुप रहने वाला लड़का।

बाल साहित्य : 

उगते नहीं उजाले, 

मंगल ग्रह के जुगनू (दस भागों में), 

याद रहेंगे देर तक, 

डोर टू डोर कैंपेन, 

जंगल चला शहर होने।

आत्मकथा खंड :

 इज़्तिरार, 

लेडी ऑन द मून, 

तेरे शहर के मेरे लोग, 

44 पिंजरे तोड़ के 

भागा कैदी ( संपूर्ण आत्मकथा )

अन्य पुस्तकें : 

रस्ते में हो गई शाम (संस्मरण), ज़बाने यार मनतुर्की ( जीवनी ) झंझावात में चिड़िया ( जीवनी ) साहेब सायराना (जीवनी), जयपुर प्रीत की बाहों में ( संपादित कहानियां ) हरे कक्ष में दिनभर( संपादित साक्षात्कार ), राही एक मिशन, पत्ते कहीं खड़के, पड़ाव और पड़ताल - 8, लघुकथा ट्रैवल्स ( संपादित लघुकथा संग्रह ) , नींद उड़ाती लोरी, सूरज का पहला घोड़ा

सम्मान/पुरस्कार : - 

-  उपन्यास के सिंधी अनुवाद पर साहित्य अकादमी पुरस्कार , 

- उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सूर  पुरस्कार, 

- राजस्थान बाल साहित्य अकादमी का "बाल साहित्य मनीषी पुरस्कार"

-  राजस्थान साहित्य अकादमी का देवी लाल सामर पुरस्कार, 

-   राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार, 

-   "कथा" जोधपुर का राज्य स्तरीय गुलेरी सम्मान,

-    सृजनगाथा डॉट कॉम का अखिल भारतीय कहानी पुरस्कार, 

-     इंडिया नेटबुक्स का साहित्य भूषण सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है।

अन्य भाव :-

अपने साहित्यिक सरोकारों के लिए गोविल कहते हैं—

“दो संस्कृतियों के बीच की अनिवार्यत: अजेय भिन्नता मानव मन में आदिकाल से ही जिज्ञासा के महल बनाती रही है। वही आज भी महान साहित्य, विशेषकर कथा-साहित्य के सृजन को प्रेरित करती है। और यही मेरी अधिकांश रचनाओं का केन्द्रीय भाव है।”

पता : - 

बी 301, मंगलम जाग्रति रेजिडेंसी 

447 कृपलानी मार्ग, आदर्श नगर 

जयपुर - 302004 ( राजस्थान )

       1.असफलता 

एक शेर जंगल में पानी की तलाश में जा रहा था। रास्ते में एक गड्ढा आया। शेर ने ज़ोर से छलांग लगा कर गड्ढा पार किया और चला गया।

पीछे- पीछे एक और शेर आया। गड्ढा देख कर उसने भी छलांग लगाई। पर संयोग से वह उस पार नहीं जा सका और गड्ढे में गिर गया। बड़ी जद्दोजहद के बाद गड्ढे में से निकल पाया।

सारा माजरा पेड़ पर बैठे एक तोते ने देखा था।

जब पहला शेर पानी पीकर लौटा तो तोता उससे पूछ बैठा - "महाशय, बताइए कि आपने इतने बड़े गड्ढे को कैसे पार किया?"

शेर गर्व से बोला - मैंने पूरी ताक़त से एक छलांग लगाई और गड्ढा पार! कह कर शेर बिना रुके चलता बना।

यही सवाल पेड़ पर बैठे तोते ने दूसरे शेर से भी पूछा - महोदय, इस गड्ढे में ऐसा क्या था कि आप इसे पार न कर सके और इसमें गिर गए?

शेर वहीं ठहर गया और इत्मीनान से बोला - आओ, मैं तुम्हें पूरी कहानी सुनाता हूं। दरअसल आज सुबह मुझे भोजन ठीक से नहीं मिला था। दूसरे, कल शाम को मैं तेज़ बारिश में कुछ भीग भी गया था। पिछले दिनों शिकार करते हुए मेरी आंख में कुछ गिर गया था जिससे आँखें अभी भी दुखती हैं। तुम्हें नहीं लगता कि यहां की ज़मीन भी कुछ ऊबड़- खाबड़ है! झाड़ियों के चलते राह साफ़ नज़र ही नहीं आती। घास - फूस ने इस गड्ढे को कुछ ढक भी तो रखा है। तुम परिंदे क्या जानो कि धरती पर चलना कितना दुष्कर है।

तोता बोला - नमस्ते श्रीमान, आप एक महान कहानीकार हैं। मुझे जीवन की सच्चाइयां बताने के लिए आपका सचमुच शुक्रिया!! ०००

  2. कुत्ता, तोता और मछली 

उमस भरी दोपहर थी।तालाब के किनारे आम के पेड़ पर एक तोता बैठा कच्चे आम को कुतर रहा था। आम का एक छोटा सा टुकड़ा उसकी चोंच से नीचे गिरा। 

पेड़ के नीचे उनींदे से बैठे कुत्ते ने उस टुकङे को लपक लिया। 

कुत्ते को जैसे ही टुकड़े का खट्टा स्वाद आया उसने झट उछाल कर टुकड़ा तालाब की ओर फेंका जंहा उसे एक तैरती हुई मछली ने पकड़ लिया।

मछली उसे ज्यादा देर चूसती न रह सकी। उसके खट्टे-तीखे स्वाद के चलते मछली ने भी उसे झट से पानी में उगल दिया, जहां से वह फिर मिट्टी में जा मिला। 

मिट्टी ने उसे देखते ही डाँटना शुरू किया-"क्यों रे अभागे, मैंने तेरी माँ की महीनों तक देखभाल करके, उसे उगाकर पेड़ बनाया, जिस पर तूने जन्म लिया। और तू किसी के काम न आकर उछलता-कूदता फ़िर मेरे पास चला आया?"

टुकड़ा बोला-"मैं क्या करूँ, मैं तो तोता, कुत्ता,मछली तीनों के मुंह में गया, पर तीनों ने ही मेरा अपमान करके वापस फेंक दिया।"

धरती कुपित होकर बोली-"अच्छा, उन स्वाद के दीवानों की ये मज़ाल, तुझे फेंक दिया? मैं तीनों को सजा दूँगी। आज से इन तीनों को कैद में रहना होगा।"

-"हमेशा?" टुकड़े ने चकित होकर पूछा। 

-"अरे नहीं रे, इतनी सी बात के लिए उम्र-क़ैद थोड़े ही होती है! इन्हें हल्का-फुल्का कारावास मिलेगा।" धरती बोली।

उस दिन से आदमी का जब भी किसी को पालतू बनाने का दिल करता, वह प्राणियों में से कुत्ते के गले में पट्टा डालता, पंछियों में से तोते को पिंजरे में डालता,और जलचरों में से मछली को काँचघर में बंद कर के अपने घर ले आता। 

फिर इन्हें वही खाना मिलता जो आदमी खिलाता। आदमी की क़ैद में सबसे ज्यादा यही तीनों देखे जाते।  ०००       

          3. पड़ौसी 

वे शुरू से ही अपने पड़ोसी पर पैनी निगाह रखते थे। जब पड़ोसी ने रिश्वत देकर अपने मकान का नक्शा पास करवाया तो उन्हें बहुत बुरा लगा था। पर वह चुप रह गए। कुछ दिन बाद जब पड़ोसी ने डोनेशन देकर अपने बच्चे का दाखिला बढ़िया स्कूल में करवाया, तो वे तिलमिला गए। उनका मेहनती और बुद्धिमान बेटा सरकारी स्कूल पढ़ रहा था।

कहते हैं कि बाद में उनके पड़ोसी ने अफसरों के एक रैकेट को लाखों रुपए देकर अपने बेटे को सरकारी नौकरी दिलाई। इतना ही नहीं, बल्कि भारी दहेज लेकर उसका विवाह भी किया था।

उनका मन कहता था कि ये सब बातें अपने दिल में लेकर उन्हें दुनिया से कूच नहीं करना चाहिए। आख़िर दुनिया को पता तो चले कि उनका पड़ोसी कैसे रास्ते पर चला।

उन्हें एक उपाय सूझा, उन्होंने पड़ोसी की एक जीवनी लिख डाली।

पड़ोसी ने गदगद होते हुए मोहल्ले में उनका सम्मान किया। समारोह में लोग उनकी प्रशंसा के पुल बांध रहे थे। सबका कहना था कि उनकी किताब के कारण सब उनके महान पड़ोसी से प्रेरणा लेंगे।

सम्मान समारोह से लौटते हुए फूल मालाओं से लदे वे सोच रहे थे- थैंक गॉड ! अच्छा हुआ, किसी ने उनकी किताब से कुछ पढ़ा नहीं था, नहीं तो अनर्थ हो जाता। ०००

           4. उपाय 

वे महकमे में ऊंचे पद पर थे। देखते-देखते उन पर  भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। एक दिन प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया द्वारा घेर लिए गए-"आपके ख़िलाफ़ शिकायतें बढ़ती क्यों जा रही हैं?"

उन्होंने बचपन में किसी कारण कभी थोड़ी  रामायण पढ़ी थी। उन्हें याद था कि लांछन लगने पर सीता ने धरती माता को पुकारा था और धरती फट गई थी तथा सीता उसमें समा गई थी।

उन्होंने भी धरती मां को पुकारा और शिकायत करने वाले एक - एक कर धरती में समाने लगे। ०००

           5. लाभ 

एक शहर था।शहर में दो तालाब थे, एक बीचों - बीच स्थित था और दूसरा नगर के एक बाहरी किनारे पर। दोनों ही वर्षा पर अवलंबित थे। कभी लबालब भर जाते, कभी रीते रह जाते।

एक दिन शहर के शासक के पास एक व्यक्ति मिलने पहुंचा। वह शासक से बोला - यदि आप शहर में दो की जगह एक ही सरोवर रहने दें तो सबको लाभ ही लाभ हो जाएगा।

- वो कैसे? शासक ने पूछा।

उस व्यक्ति ने समझाया- दोनों तालाब उथले और कम भरे हुए रहने से जल्दी सूख जाते हैं। आप एक तालाब से मिट्टी लेकर दूसरे को समतल करा दें। गहरा होने पर तालाब में खूब पानी भरेगा। दूसरी जगह समतल होने पर वहां प्लॉट्स बनाइए, लाभ ही लाभ। मिट्टी खोद कर दूसरी जगह ले जाने पर मजदूरों- ठेकेदारों को लाभ। पानी को पाइप लाइन से ले जाने पर इंजीनियर से लेकर लेबर तक को लाभ। रोज़गार के प्रचुर साधन होने से चारों तरफ ख़ुशी की लहर दौड़ गई।

काम आरंभ हो गया। सचमुच शहर में विकास की हलचल और राजकोष में धन की आमद दिखाई देने लगी।

शहर के कवि उन्नति का गान करने लगे, बुद्धिजीवी वाह - वाह करने लगे!

लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि कविगण सत्ता को न सराहें,ये पतन और चाटुकारिता की निशानी है।

कवि तत्काल सतर्क हो गए, उन्होंने तुरंत ख़िलाफत का मोर्चा संभाल लिया। वे अब गहरे हुए तालाब के बोझ पर कविता लिखते... समतल हुए तालाब के विलोप पर ग़ज़ल गाते... मिट्टी ढोते श्रमिक के पसीने पर छंद कहते...धनी होते जा रहे इंजीनियर और ठेकेदारों की अमानुषिकता पर गीत रचते...शासक की क्रूरता पर मुक्तक सुनाते... क्रांति से दुनिया बदल डालने का आह्वान करते! ०००

    प्रभावशाली पंचलाइन

      इन पाँचों लघुकथाओं को पढ़ कर स्पष्ट होता है कि प्रबोध कुमार गोविल व्यंग्य, प्रतीक और अप्रत्याशित अंत के माध्यम से समकालीन समाज की विसंगतियों को उजागर करते हैं। प्रत्येक लघुकथा की अलग-अलग समीक्षा प्रस्तुत है :-

1. असफलता

यह लघुकथा मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य करती है जिसमें वह अपनी असफलता का कारण स्वयं में खोजने के बजाय परिस्थितियों पर थोप देता है। पहला शेर सफलता का प्रदर्शन करता है, जबकि दूसरा शेर अपनी विफलता के लिए अनेक तर्क गिनाता है। संवाद स्वाभाविक हैं और अंत पाठक के चेहरे पर मुस्कान के साथ आत्मचिंतन भी छोड़ता है।

पंचलाइन:

"नमस्ते श्रीमान, आप एक महान कहानीकार हैं।"

संदेश:

असफलता का सबसे बड़ा कारण बहाने नहीं, आत्ममूल्यांकन की कमी होती है।

चिंतन:

क्या हम अपनी विफलताओं के लिए परिस्थितियों को दोष देकर स्वयं को धोखा नहीं देते?

लघुकथा का प्रकार:

प्रतीकात्मक-व्यंग्यात्मक लघुकथा।

नवीनता:

जंगल के पात्रों के माध्यम से मानवीय मनोविज्ञान को उभारना कथा को ताजगी प्रदान करता है।

2. कुत्ता, तोता और मछली

यह एक कल्पनाशील फैंटेसी-आधारित लघुकथा है, जिसमें प्रकृति, जीव-जंतु और मनुष्य के संबंधों को व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने मनुष्य की स्वामित्ववादी मानसिकता और जीवों की कैद को रोचक मिथकीय शैली में जोड़ने का प्रयास किया है। अंत चौंकाता है और विचारोत्तेजक भी है।

पंचलाइन:

"आज से इन तीनों को कैद में रहना होगा।"

संदेश:

मनुष्य अक्सर अपने स्वार्थ के लिए स्वतंत्र प्राणियों को बंधन में बाँध देता है।

चिंतन:

क्या किसी जीव को प्रेम के नाम पर कैद करना वास्तव में प्रेम है?

लघुकथा का प्रकार:

फैंटेसी-प्रतीकात्मक व्यंग्य।

नवीनता:

कुत्ता, तोता और मछली के पालतू बनने की कल्पनात्मक व्याख्या अत्यंत मौलिक है।

3. पड़ोसी

यह लघुकथा सामाजिक विडंबना और पाठकीय मानसिकता पर गहरा व्यंग्य करती है। लेखक दिखाते हैं कि लोग किसी पुस्तक का वास्तविक आशय समझे बिना केवल प्रतिष्ठा के आधार पर सम्मान देने लगते हैं। अंतिम वाक्य पूरी कथा का प्रभाव कई गुना बढ़ा देता है।

पंचलाइन:

"अच्छा हुआ, किसी ने उनकी किताब से कुछ पढ़ा नहीं था।"

संदेश:

सतही प्रशंसा और बिना पढ़े राय बना लेना समाज की गंभीर प्रवृत्ति है।

चिंतन:

क्या हम वास्तव में पढ़कर विचार बनाते हैं या केवल छवि देखकर निर्णय लेते हैं?

लघुकथा का प्रकार:

सामाजिक-व्यंग्यात्मक लघुकथा।

नवीनता:

सम्मान समारोह और पुस्तक को व्यंग्य का माध्यम बनाना प्रभावशाली एवं नवीन है।

4. उपाय

यह अत्यंत संक्षिप्त किंतु तीक्ष्ण राजनीतिक व्यंग्य है। लेखक ने पौराणिक प्रसंग का प्रयोग करते हुए सत्ता की उस प्रवृत्ति पर कटाक्ष किया है, जिसमें आरोपों का समाधान खोजने के बजाय शिकायतकर्ता को ही समाप्त कर दिया जाता है। लघुकथा कम शब्दों में बड़ा अर्थ रचती है।

पंचलाइन:

"उन्होंने भी धरती मां को पुकारा और शिकायत करने वाले एक-एक कर धरती में समाने लगे।"

संदेश:

भ्रष्ट व्यवस्था में दोषी से अधिक खतरा सत्य बोलने वाले को होता है।

चिंतन:

क्या व्यवस्था का उद्देश्य शिकायतों का समाधान है या शिकायतकर्ताओं को चुप कराना?

लघुकथा का प्रकार:

राजनीतिक-व्यंग्यात्मक लघुकथा।

नवीनता:

रामायण के प्रसंग का समकालीन सत्ता-व्यवस्था से किया गया प्रतीकात्मक संयोजन कथा को विशिष्ट बनाता है।

5. लाभ

यह संग्रह की सबसे बहुआयामी लघुकथा है। विकास, सत्ता, ठेकेदारी, बुद्धिजीवी वर्ग और साहित्यकारों की बदलती भूमिका—सभी पर समान तीक्ष्णता से व्यंग्य किया गया है। लेखक किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करते, बल्कि अवसरवाद की प्रवृत्ति को केंद्र में रखते हैं। कथा का व्यंग्य क्रमशः विकसित होता है और अंत तक प्रभाव बनाए रखता है।

पंचलाइन:

"वे अब... शासक की क्रूरता पर मुक्तक सुनाते... क्रांति से दुनिया बदल डालने का आह्वान करते!"

संदेश:

विचारधारा से अधिक अवसरवाद हावी हो जाए तो साहित्य और समाज दोनों अपनी निष्पक्षता खो देते हैं।

चिंतन:

क्या बुद्धिजीवी और साहित्यकार सत्ता के पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ रह पाते हैं?

लघुकथा का प्रकार:

सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य।

नवीनता:

विकास, मीडिया, साहित्य और सत्ता को एक ही कथानक में समेटना कथा की विशेष उपलब्धि है।


सारांश


प्रबोध कुमार गोविल की ये पाँचों लघुकथाएँ व्यंग्य को केवल हास्य का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक हस्तक्षेप का सशक्त औजार बनाती हैं। लेखक प्रतीक, फैंटेसी, रूपक और अप्रत्याशित अंत के माध्यम से समकालीन समाज, सत्ता, मानवीय मनोविज्ञान और बौद्धिक प्रवृत्तियों की विसंगतियों को उजागर करते हैं। इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता इनकी संक्षिप्तता में व्यापक अर्थवत्ता, प्रभावशाली पंचलाइन, चिंतनोत्तेजक संदेश तथा कथ्य की नवीन प्रस्तुति है। ये रचनाएँ पाठक को केवल कथा का आनंद नहीं देतीं, बल्कि पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक विचार करने के लिए विवश करती हैं।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

 सरल सहज भाषा रोचक शैली

1. असफलता

प्रथम लघुकथा जन्तु कथा है। दोनों शेर पशु, इंसानों को जीवन में सफलता- असफलता दिलाने की प्रक्रिया का निर्वहन करते हैं। रोचक और प्रभावकारी कथ्य स्पष्ट करता है कि सफलता पाने के लिए कोई बहाना नहीं चलता शिक्षाप्रधान उद्देश्य है।

2.कुत्ता , तोता और मछली

नैतिक मूल्य पर आधारित प्रस्तुत लघु कथा में नीति कथाओं का दर्शन होता है इसमें भी कुत्ता तोता मछली और धरती के माध्यम से मनुष्य जीवन को सबक दिया गया है जो स्वयं पसंद नहीं उसका तिरस्कार ना करें अन्यथा प्रकृति दंडात्मक व्यवहार रूप में शापित जीवन जीने का परिणाम भी देती है।

3. पड़ौसी

आत्मकथात्मक इस लघुकथा  में व्यक्ति अपनी अपेक्षा दूसरे की हर गतिविधि पर नजर गड़ाए रखता है जिसे समाज के सामने प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न उपाय भी विचारता है यथा एक  कथा लेखक के द्वारा पड़ोसी की जीवनी लिखना और फिर किताब छपवा कर सम्मानित होकर के आत्मसंतुष्ट हो जाना व्यक्ति के अंतर मन की व्यथा को सुकून देने का तरीका है। उद्देश्य  हास्य प्रधान है।

4.उपाय 

इसकी थीम अच्छी है पर स्पष्टीकरण अस्पष्ट है यथा शिकायतकर्ता का एक एक करके धरती में समाना। जबकि सीता माता सिदधीकरण के लिए स्वयं समायी थीं।

5. लाभ 

इस लघु कथा में बुद्धिजीवियों एवं कवियों की अवसरवादिता पर वाहवाही लूटने व लाभ कमाने का जीवन दर्शन है कथ्य तीखा व्यंगात्मक है। पंच करती कथा है।

निष्कर्ष -

      मान्यवर प्रबोध कुमार गोविल जी की पांचों कथाएं पात्रों के नाम  से गुमनाम,संक्षिप्त  कलेवर  में सरल सहज भाषा रोचक शैली से पुष्ट उद्देश्यपरक सन्देशात्मक हैं।

- डाॅ.रेखा सक्सेना 

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

मानवीय सोच को अभिव्यक्त

      आदरणीय प्रबोध कुमार गोविल की प्रस्तुत लघुकथाएं आसपास की घटनाओं का तार्किक तरीके से कहने का अनूठा प्रयास है :-

1.असफलता

    आदरणीय गोविल जी की यह लघुकथा "नाच न आवे, आँगन टेढ़ा " कहावत को चरितार्थ करती है। सफलता और असफलता दोनों के आधार को प्रतिबिंबित करती अच्छी लघुकथा।

2.कुत्ते,तोता और मछली

   अपनी सोच को अपने ढंग से तार्किक रूप से सिद्ध करने का सफलतम प्रयास।रुचिकर।पठनीय लघुकथा।

3.पड़ौसी

 पड़ौसी की दिखावा और हकीकत की सोच को प्रगट करती लघुकथा। कथ्य की सुंदर प्रस्तुति।

4.उपाय

अस्पष्ट कथ्य और असंतुलित शिल्प से लघुकथा  अच्छी बनते-बनते बिखर गयी। परिमार्जन की आवश्यकता।

5.लाभ

   यद्यपि  आकाशवाणी के माध्यम  से बात रखने का प्रयोग लघुकथा की सरसता और मौलिकता पाठक को असहज करता  है। फिर भी अच्छी लघुकथा कही जा सकती है। बहुधा ऐसा देखने मिलता है।

        कुल मिलाकर प्रस्तुत लघुकथाएं में लघुकथाकार ने अपने आसपास होने वाली  घटनाओं को सुक्ष्मता से अनुभूत किया है और बेबाकी और तार्किक तरीके से मानवीय सोच को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

  ये लघुकथाएँ विचारों का विस्फोट

    प्रबोध कुमार गोविल की ये पाँचों लघुकथाएँ समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय विडंबनाओं पर तीक्ष्ण दृष्टि डालती हैं। लेखक प्रतीक, रूपक, व्यंग्य और फैंटेसी का प्रभावी प्रयोग करते हुए छोटी-सी कथा में बड़े प्रश्न खड़े करते हैं :-

'असफलता' 

 सफलता और असफलता के मनोविज्ञान को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पहला शेर सफलता का सूत्र नहीं बताता, जबकि दूसरा अपनी असफलता के अनेक कारण गिनाकर स्वयं को उचित ठहराता है। अंतिम पंक्ति—"आप एक महान कहानीकार हैं"—व्यंग्य का प्रभावी पंच है, जो बहाने बनाने की मानवीय प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार करती है।

'कुत्ता, तोता और मछली' 

एक कल्पनाशील फैंटेसी है। प्रकृति, मनुष्य और जीव-जगत के संबंधों को प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हुए लेखक मनुष्य की स्वामित्व-ग्रंथि और प्रकृति पर उसके नियंत्रण की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाते हैं। कथा का विचार मौलिक है।

'पड़ौसी' 

 सबसे सशक्त लघुकथाओं में है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लिखी गई जीवनी का सम्मान होना और लोगों का उसके वास्तविक आशय को न समझ पाना, हमारे समाज की सतही पाठकीय संस्कृति और व्यक्तिपूजा पर करारा व्यंग्य है। अंतिम पंक्ति पूरी कथा को नई ऊँचाई देती है।

'उपाय' 

आकार में अत्यंत लघु होते हुए भी सत्ता और भ्रष्टाचार की भयावह सच्चाई उजागर करती है। यहाँ धरती में भ्रष्ट अधिकारी नहीं अपितु शिकायतकर्ता समा जाते हैं। यह उलटबाँसी आज की व्यवस्था पर तीखा और प्रभावी व्यंग्य है।

'लाभ' 

विकास, राजनीति, ठेकेदारी, बौद्धिक वर्ग और साहित्यकारों की भूमिका पर बहुआयामी टिप्पणी करती है। सत्ता की प्रशंसा और विरोध—दोनों स्थितियों में अवसरवाद कैसे काम करता है, लेखक ने उसे व्यंग्यात्मक शैली में उकेरा है। 

 ‌    इस प्रकार ये लघुकथाएँ विचारों का विस्फोट है। उनकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और व्यंग्य की धार से युक्त है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

 समसामयिक विषयों पर नए ट्रीटमेंट

                 वाह! सभी लघुकथाएँ एक से बढ़ कर एक हैं। प्रबोध कुमार जी ने व्यवस्था पर चोट की जो जरूरी है, साथ ही आदमी के लोभ को भी लताड़ा। कहन का अंदाज़ आकर्षक है, रोचक है। मानवेतर पात्रों के माध्यम से अपनी बात भी रखी। अंत भी प्रभावित करने वाले हैं :-

'असफलता'

 'असफलता' शीर्षक से है जिसके माध्यम से अकर्मण्यता पर करारा व्यंग्य किया है , साथ ही कहानीकारों पर भी कटाक्ष किया है कि वे सिर्फ कहानियां बनाना जानते हैं। मानवेत्तर पात्रों के साथ गढ़ी लघुकथा अच्छी बन पड़ी है।

 'कुत्ता, तोता और मछली' 

 मानवेत्तर पात्रों को लेकर बुनी गई है। एक लोककथा का आभास देती है। स्वाद के दीवानों को अंततः सजा मिलती है।

'पड़ोसी' 

विचित्र लघुकथा है जो एक लेखक की सच्चाई बताती है। लेखक ऐसा ही करते हैं। किसी को भी अपनी रचना का पात्र बना देते हैं।

'उपाय' 

भ्रष्ट लोगों की बदला लेने की लघुकथा है। पौराणिक पात्र सीता माता का संदर्भ लेकर त्रेता और कलयुग की तुलना करते हुए कलयुग में मानवीय मूल्यों का ह्रास दिखलाती है।

'लाभ' 

चारण भाट कवियों पर चोट करती है, साथ ही यह भी शिक्षा देती है कि सही नीतियों का विरोध करने वाले साहित्यकार भी गलत होते हैं।

 ‌‌        कुल मिलाकर समसामयिक विषयों पर नए ट्रीटमेंट के साथ गोविल जी ने पैनी कलम चलाई है।

- डॉ अंजु दुआ जैमिनी 

फरीदाबाद - हरियाणा 

  पाँच लघुकथाओं पर संक्षिप्त समीक्षा

  प्रबोध कुमार गोविल की ये पाँचों लघुकथाएँ व्यंग्य, प्रतीक और यथार्थ का प्रभावी संगम हैं :-

'असफलता' 

बहानों की मनोवृत्ति पर तीखा कटाक्ष करती है,

 'कुत्ता, तोता और मछली' 

कर्मफल और मानवीय स्वार्थ का सांकेतिक चित्र प्रस्तुत करती है।

 'पड़ोसी' 

समाज की विडंबनाओं और पाठकीय सतही दृष्टि को उजागर करती है।

 'उपाय' 

सत्ता और भ्रष्टाचार पर अत्यंत मारक व्यंग्य है, 

 'लाभ'

 विकास, बुद्धिजीवियों और अवसरवादिता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है। संक्षेप में, ये लघुकथाएँ कम शब्दों में बड़े सामाजिक सच को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती हैं।

 - अलका पाण्डेय

 मुम्बई - महाराष्ट्र 

                                 ‌‌   

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