पाठकों के बीच में डॉ. अनिल शूर आज़ाद की लघुकथाएं


    डॉ. अनिल शूर आज़ाद

जन्म : 

26 जून 1965 , रेवाड़ी - हरियाणा

माता जी : श्रीमती पुष्पा शूर 

पिता जी : श्री सुखदेवराज शूर

शिक्षा : 

एम.ए. ( इतिहास , हिन्दी ) , एम.एड , एल एल बी ,  पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर

सम्प्रति : 

दिल्ली शिक्षा निदेशालय के तहत इतिहास के लेक्चरार

विधा :

लघुकथा , कविता , व्यग्य , कहानी आदि लेखन

एंकल प्रकशित पुस्तकें :-

लघुकथा : सरहद के इस ओर , क्रान्ति मर गया , मेरी प्रिय लघुकथाएं
अन्य : मेरी सात कहानियां , मेरे प्रिय हास्य व्यंग्य , पत्थर पर खुदे नाम , रोटी के लिए जिद मत कर , हृदय राग , अपना सौर परिवार , आपदा प्रबंधन एक परिचय , मेरा लेखन तथा जीवन आदि

सम्पादित प्रकाशित पुस्तकें : -

लघुकथा : दूसरी पहल , शिक्षा जगत की लघुकथाएँ , हरियाणा की लघुकथाएँ , दिल्ली की लघुकथाएँ , राजस्थान की लघुकथाएँ , मध्यप्रदेश की लघुकथाएँ , नई सदी की लघुकथाएँ , देश - विदेश से लघुवादी लघुकथाएं आदि

विशेष प्रकाशित पुस्तकें : -

लघुकथाकार अनिल शूर आजाद ( सम्पादक : इन्दु वर्मा )

अनिल शूर आजाद : प्रतिनिधि लघुकथाएं ( सम्पादक : इन्दु वर्मा )
अनिल शूर आजाद की कृतियां : एक अवलोकन ( रेखा पूनिया ' स्नेहल ' )

सम्मान : -

दिल्ली सरकार के सर्वोच्च "राज्य शिक्षक पुरस्कार-2005"

हरियाणा प्रदेश साहित्य सम्मेलन , सिरसा - हरियाणा द्वारा रमेशचंद्र शालिहास स्मृति साहित्य सम्मान

युवा साहित्य मण्डल , गाजियाबाद - उत्तर प्रदेश द्वारा श्रेष्ठ सम्पादक सम्मान

दिल्ली साहित्य समाज द्वारा साहित्य गौरव सम्मान

स्वतंत्र लेखक मंच , दिल्ली द्वारा विशेष रचनाकार सम्मान

सहित देशभर की संस्थाओं द्वारा सौ के लगभग साहित्यिक सम्मान प्राप्त।

पता : -

ए जी - 1 / 33 बी , विकासपुरी , दिल्ली - 110018

                  1. कुलबुलाहट

उसने थाली परे सरका दी। पिछले कई दिन से वह बीमार है। डॉक्टर ने उसे दूध-ब्रेड खाने को बताया है। मगर यह सूखी रोटी और प्याज की चटनी! इन्हें तो देखते ही उसका जी मितलाने लगता है। हां..थोड़ा दूध पीने की इच्छा जरूर होती है। लेकिन ढ़ाई-तीन किलो दूध उनकी बूढ़ी गाय देती है, उसमे से चाय के लिए पाव-भर रखकर बाकी सब तो लाला की हवेली पर चला जाता है..अब भला ऐसे में!  'कुछ भी हो, अब मैं प्याज़ के साथ सूखी-बासी रोटियां खाकर खुद को और ज्यादा समय तक रोगी नही  रखूंगा।' उसने निश्चय किया।

       "क्यों रे, खाता क्यूं नही?" थाली  को ज्यों का त्यों देखकर, आंखें तरेरते हुए मां ने पूछा। "रोटी खाना मुझे नही भाता।" उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और अभी-अभी दोहकर लाए गए दूध के बर्तन पर एक ललचाई दृष्टि डालकर करवट बदल ली।

       मां की अनुभवी आंखों ने सब ताड़ लिया, लेकिन विवशता ने जैसे उसे पत्थर बना दिया था। "रोटी चंगेर में रख दी है, जब इच्छा हो खा लीजो!" कहकर मां अपने काम में लग गई। वह चुप्पी साधे पड़ा रहा। तभी रोज की भांति लाला का नौकर आया एवं दूध लेकर चलता बना। अधखुली आंखों से उसने नौकर को जाते देखा और..भूखी अंतड़ियों की कुलबुलाहट शांत करने के लिए..उसके कंपकपाते हाथ स्वतः चंगेर की ओर बढ़ गए।

      यह दृश्य देखकर मां की आंखों में दो मोटे जल-बिंदु उमड़ आए, जिन्हें छिपाने के लिए उसने मुहं दूसरी ओर फेर लिया। ०००

     ‌‌                  2. मुर्गा


दावत के सिलसिले में मुर्गा खरीदने वह कसाईवाड़ा पहुंचा। कसाई ने उसे मुर्गा दिखाया। उसने मुर्गे को परखा ओर उसे काट देने को कहा।

      कुछ दिनों के बाद घर में मरम्मत-कार्य हेतु उसे एक मजदूर की आवश्यकता पड़ी। सुबह-सवेरे वह, नगर के प्रसिद्ध झंडा लेबर-चौक  पहुंच गया जहां बहुत सवेरे ही मजदूर आ जुटते थे। मजदूरी पर जाने के इच्छुक लोगों के हुजूम में एकपर उसकी आंखें ठहर गईं..बीस-इक्कीस वर्षीय गठे बदन का स्वस्थ और तगड़ा नवयुवक!

      आंखों ही आंखों में उसने, सुगठित देह को परखा और अपने साथ चले आने को कह दिया। ०००

                     3. बड़ी मछली

व्यवसायी पिता ने सरोवर के नीले जल में झांक रहे अपने पुत्र को अर्थपूर्ण शब्दों में टोका - 'देखा! हर बड़ी मछली, छोटी को कैसे खा जाती है..'

      युवा पुत्र ने पिता की भावनाओं का खण्डन करते हुए सरोवर के दूसरे तट पर जल रही चिता दिखाकर कहा - 'उधर देखिए! छोटी हो या बड़ी, हर मछली का यही हश्र होता है।'     

      वातावरण में एक गम्भीर खामोशी पसर गयी। ०००

                         4. तारा

अध्यापक अविनाश  विज्ञान-कक्ष में कुछ प्रायोगिक कार्य करा रहे थे कि अचानक शोर उभरा.. 'रोहित चोर है-रोहित चोर है..' यह शोर क्रमशः बढ़ता ही जा रहा था।

         जरा आगे बढ़कर अविनाश सर ने देखा..छात्रों के घेरे के बीचोबीच रोहित, बेहद डरा-सहमा सा खड़ा था। उसके बैग से बरामद विज्ञान-कक्ष का कीमती बायनोकयूलर सर को सौंप दिया गया।

       अविनाश जानते थे, रोहित ऐसा लड़का नही था। बल्कि उसके जैसा धीर-गम्भीर और पढ़ाई में पूरा ध्यान लगाने वाला छात्र, दूसरा कोई नही था। लेकिन रोहित ने ऐसी हरकत क्यूं की..कुछ भी समझ नही आ रहा था। रोहित को कुछ कहना चाहा..मग़र उसकी  आंखों में भर आए मोटे अश्रुओं को देखकर सर रुक गए। कुछ समय के बाद अलग से रोहित को बुलाया।

       'रोहित..तुम इतने समझदार विद्यार्थी हो, अच्छी तरह जानते हो चोरी करना बहुत बुरी बात है, फिर भी?..'

       'सर, मैंने अपने पास रखने के लिए वह नही लिया था..मेरी मां को मरे हुए आज चार बरस हो गए हैं..नानी कहती हैं, मां मरकर तारा बन गई है.. बायनोक्यूलर से दूर की चीजें भी पास दिखाई देती हैं ना..मैं अपनी मां को सिर्फ एकबार पास से देखना चाहता था..' कहते रोहित फफक पड़ा।

       अविनाश सर को कुछ नही सूझा। उन्होंने बस.. रोहित को अपने नजदीक खींचकर सीने से लगा लिया। ०००

                      5. डण्डा

      'आज फिर गलत लिखा..बेवकूफ कहीं का! चल बीस बार इसे अपनी कापी में लिख।'

      'नही लिखूंगा!' उसके स्वर की कठोरता देखकर मै दंग रह गया।  मैंने पूछा  'क्यों नही लिखोगे?'

      'पिताजी रोज दारू पीकर मारते हैं..कहते थे, अब एक महीना पूरा होने से पहले नई कापी मांगी तो बहुत मारूंगा..' कहते हुए डण्डा खाने के लिए अपने नन्हे हाथ उसने आगे कर दिए।

       मैं उसकी डबडबाई आंखों में झांकता रहा। मेरा उठा हुआ हाथ जाने कब का नीचे ढ़रक गया था। ०००            


    जीवन के प्रति नई दृष्टि

डॉ. अनिल शूर आज़ाद की ये पाँचों लघुकथाएँ आकार में छोटी होते हुए भी भाव, विचार और सामाजिक संवेदना के स्तर पर अत्यंत प्रभावशाली हैं।  लेखक की विशेषता यह है कि वे कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता रखते हैं।इन लघुकथाओं का सबसे बड़ा गुण इनकी सहजता और मार्मिकता है। लेखक ने छोटे-छोटे दृश्यों और संवादों के माध्यम से पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ी है। प्रत्येक कथा एक जीवन-सत्य को उजागर करती है और अंत में ऐसा प्रभाव छोड़ती है जो पाठक को सोचने के लिए विवश कर देता है ;-

1. कुलबुलाहट

यह कथा आर्थिक अभाव और मानवीय विवशता का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। बीमार बच्चे की दूध की इच्छा और घर की मजबूरी के बीच का संघर्ष पाठक के हृदय को छूता है। विशेष रूप से अंत में भूख से विवश होकर उसका सूखी रोटी की ओर हाथ बढ़ाना तथा माँ की आँखों से आँसू उमड़ आना कथा को अत्यंत संवेदनशील बना देता है। यह लघुकथा गरीबी की पीड़ा को बिना किसी शोर-शराबे के गहराई से व्यक्त करती है।

2. मुर्गा

यह लघुकथा मानवीय दृष्टिकोण और उपयोगितावादी मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करती है। मुर्गे को परखने और बाद में मजदूर को उसी दृष्टि से परखने का समानांतर चित्रण अत्यंत प्रभावी है। लेखक ने संकेतों के माध्यम से यह दिखाया है कि कई बार समाज मनुष्य को भी वस्तु की तरह देखता और उसकी उपयोगिता के आधार पर मूल्यांकन करता है। कथा का अंत पाठक को भीतर तक झकझोरता है।

3. बड़ी मछली

यह कथा जीवन-दर्शन और सामाजिक यथार्थ का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। पिता का कथन शक्ति और प्रभुत्व की मानसिकता को दर्शाता है, जबकि पुत्र का उत्तर जीवन की अंतिम सच्चाई की ओर संकेत करता है कि मृत्यु सबको समान बना देती है। चिता का दृश्य कथा को गहरी दार्शनिकता प्रदान करता है। कम शब्दों में इतनी गंभीर बात कहना लेखक की रचनात्मक दक्षता का प्रमाण है।

4. तारा

यह संग्रह की सबसे अधिक भावुक और करुण लघुकथाओं में से एक है।  रोहित का बायनोक्यूलर लेने का कारण,अपनी दिवंगत माँ को तारे के रूप में पास से देखने की इच्छा—पाठक को भावविभोर कर देता है। यहाँ लेखक ने बाल-मन की मासूम संवेदना को अत्यंत प्रभावी ढंग से चित्रित किया है।

5. डण्डा

यह लघुकथा शिक्षा व्यवस्था, पारिवारिक गरीबी और बाल-मन की पीड़ा को अत्यंत सशक्त रूप में सामने लाती है। बच्चे का नई कॉपी माँगने के भय से लिखने से इनकार करना उसकी आर्थिक और मानसिक स्थिति को स्पष्ट कर देता है। शिक्षक का डंडा उठाकर फिर उसे नीचे कर देना कथा में संवेदना का महत्वपूर्ण मोड़ है। यह कहानी बताती है कि अनुशासन से अधिक आवश्यक है बच्चे की परिस्थिति को समझना।

शिल्प और भाषा

भाषा: सरल, सहज और बोलचाल की है।जिससे कथाएँ सीधे पाठक के मन तक पहुँचती हैं।

शिल्प: लघुकथा की मूल विशेषता—संक्षिप्तता, प्रभावी कथानक और तीखा अंत—इन सभी रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

संवेदना

प्रत्येक कथा में मानवीय संवेदनाओं की गहरी पकड़ है। लेखक पाठक को पात्रों की स्थिति से जोड़ने में सफल रहे हैं।

संदेश: कथाएँ उपदेशात्मक नहीं लगतीं, फिर भी इनके अंत में एक स्पष्ट सामाजिक और मानवीय संदेश उभरकर सामने आता है।

         डॉ. अनिल शूर आज़ाद की ये पाँचों लघुकथाएँ समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य की संवेदनशील और प्रभावशाली रचनाएँ हैं। इनमें समाज के वंचित वर्ग, बच्चों की मनोस्थिति, मानवीय संबंधों की गर्माहट और जीवन की गहरी सच्चाइयों को अत्यंत सहजता से अभिव्यक्त किया गया है। लेखक ने कम शब्दों में बड़ा प्रभाव उत्पन्न करने की कला का सफल परिचय दिया है। ये लघुकथाएँ पाठक को न केवल भावुक करती हैं, बल्कि समाज और जीवन के प्रति नई दृष्टि भी प्रदान करती हैं।

- मंजू सक्सेना

लखनऊ - उत्तर प्रदेश 

       इतिहास की अमर रचनाएं

कुलबुलाहट 

सामंती सोच और मानसिकता गरीबों की मजबूरी है और कहीं - न - कहीं आज भी समाज में व्याप्त है, जहां गरीब मजदूर त्रस्त है।अपनी भूख, पीड़ा और मजबूरी की रोटी - प्याज खाने को विवश हैं और दूध सामंती व्यवस्था की भेंट चढ़ जाती।मर्मांतक पीड़ा की अभिव्यक्ति जो दिल को कचोटती है।

मुर्गा 

कटने वाले मुर्गे और खटने वाले मजदूर में कोई अंतर नहीं है।चाहे विकसित और शिक्षित होने के लाख दावे हम करें, हम आज भी गरीब मजदूर को मुर्गा समझ उसका उसी तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। लघुकथा पढ़कर अगर हमारी मानसिकता बदले और हम हर मजदूर को इंसान समझें और उससे इंसानियत से पेश आएं, तो हमारा जीवन सफल हैं और हम सचमुच मानव हैं।

बड़ी मछली 

जीवन के सबसे बड़े सत्य को उद्घाटित करती एक सशक्त लघुकथा, जो कम शब्दों में झटके से हमारी आत्मा तक को झकझोर देती है और हम सन्न रह जाते हैं। शानदार लघुकथा।

तारा

असंवेदनशील होते इस समय में जहां मानवीय संबंध और रिश्ते तार-तार हो रहे हैं,बाल सुलभ हृदय में संवेदना आज भी जिंदा है और हमें इसी भाव के पुष्पन-पल्लवन के संस्कारों का बीजारोपण करना चाहिए।जब अविनाश कहता है कि वह बाईनाक्यूलर (दूरबीन) से तारों में जा मिली अपनी मां को देखना चाहता है, यह मानवीय संवेदना का उत्स है।यहां आकर शब्द मौन हो जाते हैं।

डंडा

जीवन के अनुभवों और अपने परिवेश से जन्मी एक प्रभावशाली लघुकथा।नशे और दारू ने न जाने कितनी जिंदगियां और घर बर्बाद कर दिए, मगर यह समाज का कोढ़ खत्म नहीं हो रहा।बच्चा बीस बार नहीं लिखना चाहता कि कापी जल्दी ख़त्म हो जाएगी और दारूबाज बाप उसे मारेगा।प्रबल गुस्से के साथ दिल से एक हूक सी उठती है और जी करता है कि उसके बाप को जाकर उसी डंडे से उसका नशा उतार दिया जाए।

           डा. आजाद की पांचों लघुकथाएं लघुकथा इतिहास की अमर रचनाएं हैं। 

- डा. विजयानन्द विजय 

         नयी दिल्ली

संवेदना से उपजा जीवन बोध

1- कुलबुलाहट

लघुकथा अपने मानदंडों पर खरी उतरती है। कथ्य ग्रामीण अभाव और आर्थिक विवशता की मार्मिक अभिव्यक्ति है। अंतिम दृश्य में बच्चे का चंगेर की ओर बढ़ता हाथ और माँ की भीगी आँखें प्रभावशाली पंचलाइन बनकर उभरती हैं। कथा पाठक के मन में सामाजिक विषमता और मानवीय संवेदना पर गहन चिंतन छोड़ जाती है।

2- मुर्गा

लघुकथा अत्यंत संक्षिप्त, सघन और सांकेतिक शिल्प का प्रभावी उदाहरण है। कथ्य मनुष्य के वस्तुकरण और श्रम-बाज़ार की विडंबना को तीखे ढंग से सामने लाता है। मुर्गे और मजदूर के समानांतर चयन की पंचलाइन झकझोरती है। कथा मनुष्य की गरिमा और सामाजिक दृष्टिकोण पर विचार करने को विवश करती है।

3- बड़ी मछली

लघुकथा अपने लघु आकार में गहन दार्शनिक कथ्य समेटे हुए है। बड़ी-छोटी मछलियों के माध्यम से जीवन-दृष्टि का सार प्रस्तुत किया गया है। पुत्र का उत्तर ही इसकी प्रभावशाली पंचलाइन है, जो सत्ता और अहंकार को निष्प्रभावी कर देता है। कथा मृत्यु की अनिवार्यता और जीवन-मूल्यों पर गंभीर चिंतन छोड़ती है।

4- तारा

लघुकथा भाव-संवेदना और मानवीय करुणा का सशक्त उदाहरण है। कथ्य बाल-मन की निष्कलुष भावनाओं को अत्यंत प्रभावी ढंग से उभारता है। माँ को तारे के रूप में निकट से देखने की बाल-इच्छा इसकी अत्यंत मार्मिक पंचलाइन है। कथा सहानुभूति, संवेदनशील शिक्षा और बाल-मन की गहराइयों पर चिंतन छोड़ती है।

5- डण्डा

लघुकथा संक्षिप्तता, कसाव और प्रभाव की दृष्टि से सफल है। कथ्य घरेलू हिंसा के दुष्प्रभाव और बाल-मन की विवशता को मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है। शिक्षक का उठा हुआ हाथ स्वतः नीचे आ जाना अत्यंत प्रभावशाली पंचलाइन है। कथा शिक्षा में संवेदना और बच्चों की परिस्थितियों को समझने का संदेश छोड़ती है।

समग्र टिप्पणी

इन पाँचों लघुकथाओं को पढ़ते हुए एक पाठक के रूप में यह अनुभव होता है कि छोटी-सी घटना भी यदि सटीक शिल्प और संवेदनशील दृष्टि से प्रस्तुत की जाए, तो वह गहरा प्रभाव छोड़ सकती है। डॉ. अनिल शूर आज़ाद की ये लघुकथाएँ सहज भाषा, प्रभावी शिल्प और अर्थगर्भित अंत के कारण पाठक को केवल पढ़ने का नहीं, बल्कि देर तक सोचते रहने का अवसर प्रदान करती हैं।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

    पाठक पर गहरा प्रभाव

डॉ. अनिल शूर आज़ाद की पाँच लघुकथाओं पर संक्षिप्त समीक्षा :-

1. कुलबुलाहट —

 गरीबी, भूख और माँ की विवशता का अत्यंत मार्मिक चित्रण। अंतिम दृश्य पाठक के मन में गहरी संवेदना जगा देता है।

2. मुर्गा —

 मनुष्य और श्रम के वस्तुकरण पर तीखा व्यंग्य। बहुत कम शब्दों में सामाजिक मानसिकता पर प्रभावशाली प्रहार करती है।

3. बड़ी मछली — 

जीवन, सत्ता और मृत्यु के शाश्वत सत्य को दार्शनिक दृष्टि से प्रस्तुत करती हुई विचारोत्तेजक लघुकथा। अंत अत्यंत प्रभावी है।

4. तारा — 

बाल-मन की निष्कलुष भावनाओं और मातृ-वियोग की पीड़ा का अत्यंत संवेदनशील चित्रण। भावनात्मक उत्कर्ष इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

5. डण्डा — 

शिक्षा, गरीबी और घरेलू हिंसा के त्रिकोण को मार्मिक ढंग से उजागर करती है। अंत शिक्षक की मानवीय संवेदना को सशक्त रूप में स्थापित करता है।

समग्रत :

 पाँचों लघुकथाएँ अपनी संक्षिप्तता, कथ्य की तीव्रता, मार्मिक अंत और सामाजिक सरोकारों के कारण पाठक पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।

 - अलका पाण्डेय 

मुम्बई - महाराष्ट्र 

   सार्थक कथ्य और बेहतरीन प्रस्तुति

डॉ.अनिल शूर जी की प्रस्तुत लघुकथाएं उनके संवेदनशील ह्दय की छुअन से उपजी पीड़ा और करुणा की मार्मिक प्रस्तुतियां हैं। जिन्हें वे अभिव्यक्त करने में सफल रहे हैं। 

1.कुलबुलाहट

    मार्मिक लघुकथा। वास्तविकता लिए हुए। बेहतरीन प्रस्तुति। अच्छा कथ्य।

2.मुर्गा

अच्छी लघुकथा है। गंभीरता लिए हुए। शिल्प में कुछ कमी महसूस हुई।

3.बड़ी मछली

 अच्छी लघुकथा। अच्छे कथ्य के साथ। 

4.तारा

मार्मिक लघुकथा। कथ्य अच्छा। शिल्प सुंदर।

5.डंडा

   मर्मस्पर्शी। बेहतरीन लघुकथा। बढ़िया प्रस्तुति। अच्छा कथ्य।

डॉ.अनिल शूर जी प्रस्तुत सभी लघुकथाएं सार्थक कथ्य और बेहतरीन प्रस्तुति लिए हुए हैं। गंभीरता भी है और मार्मिक भी हैं। निश्चित ही डॉ.अनिल शूर जी संवेदनशील ह्रदय के धनी है। अपनी पैनी और दिव्य नजर से वे समाज के हर मर्म को समझते हैं और अपनी कलम से अभिव्यक्त भी करते हैं।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

  सभी  लघुकथा पढ़ी बहुत अच्छी लगी

डॉ अनिल जी की सभी  लघुकथा पढ़ी बहुत अच्छी लगी, एक एक लाईन में समीक्षा लिख रही हूँ :-

कुलबुलाहट— 

इस लघुकथा में ग़रीबी की मजबूरी दिखी वरना कौन माँ अपने बेटे को दूध के लिये मना करेगी ।

मुर्ग़ा— 

हटाकटा मुर्ग़ा लिया खाने को और तंदरूसत  हटाकटा मज़दूर  चुना काम कराने को ।

बड़ी मछली—

व्यवसायी पिता की सोच थी कि बड़ी मछली बनकर व्यवसाय करना होगा वरना मुश्किल होगी, बेटे की सोच बड़ी अध्यातमिक सच्चाई बयान करती है, हर किसी का अंत एक है राजा हो या रंक।

तारा—

बेहद मार्मिक, बिन माँ के बच्चे की सोच जो तारा बनी माँ को दूरबीन से निहारना चाहता है, टीचर ने बहुत मनोविज्ञानिक तरीक़ा अपनाया, अलग से बच्चे को बुलाया और सच्चाई को जाना।

डण्डा—

बच्चे की मजबूरी, मार तो खानी ही है, पिता के दारू पीने से किस कदर परेशान है बच्चा ।

- प्रो. सुदेश मोदगिल नूर

           जापान

 प्रभावशाली  संवेदनात्मक कथ्य से युक्त 

      पांचों लघु कथाओं में दूसरे के दुख को महसूस करके उसके प्रति दया, सहानुभूति और जुड़ाव की भावना का साहित्यिक रूप दर्शनीय है जो ज्ञान  के द्वार खोलती हैं :-

1 . कुलबुलाहट

परिस्थिति की वास्तविकता से जुड़ी कुलबुलाहट में मां और बेटे की  विवशता,भावुकता के संवाद और सोच शीर्षक को चरितार्थ करते हैं। पर समाधान के लिए सुझाव लुप्त है।

2 .  मुर्गा  

यथा भोजन में अच्छे मुर्गे  की परख बैसे ही एक मकान की मरम्मत में हष्ट-पुष्ट नौजवान मजदूर के चयन की उपयोगिता की अनिवार्यता को महत्व देती  कथा संक्षिप्त कलेवर में शिक्षाप्रद उद्देश्य से युक्त है।

3 .  बड़ी मछली

आकर्षक एवम रोचक शीर्षक से युक्त लघुकथा में पूर्णता मूल संवेदना से जुड़े पुत्र के संवाद वास्तविक सत्य  को उजागर करने में सफल हैं। शब्दों का मितव्ययी सटीक उपयोग है।

4 .  तारा  

इस लघुकथा में पात्र अविनाश सर की सच्ची अनुभूतियां तथा शिष्य रोहित की चोरी के संवेग पूर्ण वास्तविक  मनोदशा  का सनसनीपूर्ण कारूणिक स्पष्ट  संवादात्मक सफल चित्रण है शीर्षक  जिज्ञासा प्रधान सुन्दर कलेवर युकत है।

5 . डण्डा 

इसमें पुत्र का पिता द्वारा मारपीट के व्यवहार से क्षुब्ध होकर स्वयं को मानसिक रूप से भविष्य के लिए तैयार कर लेना पर अन्यत्र घटना में पूर्व घटना का स्मरण करके आंसू देखकर दूसरे की भावपूर्ण संवेदना ने गलती पर भी  डंडे को ढरका देना  बालमन की भावना को समझने सुधारने का मनोवैज्ञानिक चित्रण से युक्त है।

निष्कर्ष :-

पांचों लघु कथाओं में सीमित घटना का जीवंत चित्रण है भाषा चुस्त और पत्र अनुकूल है सभी का प्राण तत्व संदेशात्मक है। 

- डाॅ.  रेखा सक्सेना 

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश

संवेदना, संकेत और सामाजिक यथार्थ

डॉ. अनिल शूर आज़ाद की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ आकार में लघु होते हुए भी अपने कथ्य, शिल्प और प्रभाव में अत्यंत सशक्त हैं। इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक बिना किसी अनावश्यक विस्तार या लेखकीय हस्तक्षेप के जीवन की एक तीखी सच्चाई को पाठक के सामने रख देता है। प्रत्येक लघुकथा का अंत पाठक को सोचने के लिए विवश करता है जो सफल लघुकथा का प्रमुख गुण है :-

'कुलबुलाहट' 

आर्थिक विषमता और ग्रामीण निर्धनता का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। घर में दूध होते हुए भी बीमार बच्चे का उससे वंचित रह जाना और अंततः भूख के आगे उसका झुक जाना व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है। माँ की विवशता और अंत में छलकते आँसू पूरी कथा को गहरी संवेदना से भर देते हैं।

'मुर्गा' 

आकार में अत्यंत संक्षिप्त होते हुए भी श्रम-बाज़ार की अमानवीय मानसिकता पर तीखा व्यंग्य है। जिस प्रकार कसाई मुर्गे को परखता है, उसी प्रकार श्रमिक को उसके शरीर के आधार पर चुन लिया जाता है। यह समानांतर बिंब अत्यंत प्रभावशाली है और मनुष्य के वस्तुकरण पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

'बड़ी मछली' 

जीवन-दर्शन और व्यवसायिक मानसिकता के बीच संवाद के माध्यम से एक गहन सत्य उद्घाटित करती है। पुत्र का उत्तर जीवन की अंतिम समानता—मृत्यु—की ओर संकेत करता है। लघुकथा का मौन ही उसका सबसे प्रभावी कथन बन जाता है।

'तारा'

 सर्वाधिक भावुक और हृदयस्पर्शी लघुकथा है। चोरी के आरोप के पीछे छिपी एक मासूम बाल-मन की आकांक्षामाँ को एक बार देखने की इच्छा—कथा को अत्यंत ऊँचाई प्रदान करती है। शिक्षक का दंड के स्थान पर संवेदना का चयन शिक्षा के मानवीय पक्ष को रेखांकित करता है। यह लघुकथा पाठक के मन में देर तक बनी रहती है।

'डण्डा' 

शिक्षा, गरीबी और घरेलू हिंसा के त्रिकोण को अत्यंत कम शब्दों में व्यक्त करती है। बच्चे का भय, उसकी विवशता और शिक्षक के भीतर आया परिवर्तन इस कथा को प्रभावशाली बना देता है। अंतिम पंक्ति में शिक्षक का झुकता हुआ हाथ करुणा की विजय का प्रतीक बन जाता है।

      शिल्प की दृष्टि से इन लघुकथाओं की भाषा सरल, संवाद स्वाभाविक और कथानक अत्यंत सघन हैं। लेखक संकेतों के माध्यम से अधिक कहने की क्षमता रखते हैं। कहीं भी उपदेशात्मकता नहीं है अपितु घटनाएँ स्वयं अपना संदेश देती हैं। यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी शक्ति है।

        डॉ. अनिल शूर आज़ाद की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ, मानवीय करुणा, आर्थिक विषमता, बाल-मन की कोमलता तथा जीवन-दर्शन का प्रभावशाली दस्तावेज हैं।  यह समकालीन हिंदी लघुकथा-साहित्य में  अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराती हैं। डॉ. अनिल शूर आज़ाद को इन उत्कृष्ट, विचारोत्तेजक और संवेदनापूर्ण लघुकथाओं के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

Comments

  1. आदरणीय डाक्टर अनिल शूर आज़ाद जी की पाँचों लघुकथाओं में कथ्य, शिल्प, भाषा, संवेदना, सांकेतिकता, संप्रेषणीयता और प्रभावी अंत सशक्त रूप से उपस्थित हैं। कथानक अनावश्यक विस्तार से मुक्त है और प्रत्येक कथा एक ही घटना के माध्यम से व्यापक सामाजिक यथार्थ को उद्घाटित करती है। भाषा सहज, पात्रानुकूल और संक्षिप्त है। लेखक कहीं भी उपदेशक नहीं बनता; कथ्य स्वयं अपना अर्थ खोलता है। विशेष रूप से 'तारा' और 'कुलबुलाहट' गहरी मानवीय संवेदना के कारण लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती हैं, जबकि 'मुर्गा' और 'बड़ी मछली' तीखे सांकेतिक व्यंग्य से विचारोत्तेजक बनती हैं। 'डण्डा' शिक्षा, गरीबी और पारिवारिक हिंसा की त्रासदी को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
    इनकी लघुकथा में कथ्य और शिल्प का संतुलन इन्हें अनुकरणीय बनाता है।
    - चंद्रिका व्यास
    खारघर, नवी मुंबई
    ( (WhatsApp से साभार)

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  2. 👌👌🌳🌷🇮🇳 डॉ अनिल शूर आजाद की सभी लघु कथाएं समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त विषमताओं पर कुठाराघात करती हुई, हृदय को झकझोर देने वाली हैं। सभी पात्र और उनका संवाद भाव, कथानक को रोचक एवं हृदयस्पर्शी बनाने वाले हैं। तात्विक दृष्टि से सभी लघुकथाएं संदेशपरक हैं।
    - डॉ रवीन्द्र कुमार ठाकुर , बिलासपुर हिमाचल प्रदेश
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  3. सामयिक विषयों पर आधारित
    वासविकस्ता का दर्पण दिखाते
    उदेश्य पूर्ण रचना जो पाठकों को सोचने केलिए अपनी अपनी विधाओं में मजबूर ,आकर्षण बनाए हुए हैं !
    कुलबुलाहट कथा के ऐसी कलम चलाई है पाठक स्वयं स्तिथि को भाप कर द्रवित हो जाता हूँ क्या? आज भी यही रवैया है मजबूर है इंसान ?
    मुर्गा भी इसी तरह वाक़यों से जूझ रहा है ?
    बड़ी मछली - सच है बड़ी मछली छोटी मछली खा सकती है सच की लाठी में जोर होता है !
    डंडा -वास्तव में मद्य निषेध साकार रूप दिखाया
    आपकी सभी लघुकथाएं
    लघुकथा के मर्म को छू गई हार्दिक शुभकामनाएँ 💐🙏
    - अनिता शरद झा
    रायपुर - छत्तीसगढ़
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