डॉ. नीलम नारंग नील की लघुकथाएं
डॉ. नीलम नारंग नील
जन्म तिथि:- 21 जून 1968
जन्म-स्थान:- फतेहाबाद (हरियाणा)
निवास स्थान:- मोहाली (पंजाब)
शिक्षा:- एम.ए. , बी.एड, एल. एल. बी.
विद्या वाचस्पति मानद,(डी. लिट.)
व्यवसाय : एडवोकेट
विधा : कविता, गजल, लघुकथा , कहानी ,गीत , लेख , संस्मरण आदि
भाषा: हिन्दी, पंजाबी, अंग्रेजी
बोली : हरियाणवी, सरायकी
प्रकाशित कृतियाँ:-
1. 'बंधन रिश्तों का 'लघुकथा संग्रह
(हरियाणा साहित्य अकादमी के अनुदान से)
2. 'अनकही दास्तां' कविता संग्रह
3.'फसाने दोस्ती के '
कविता संग्रह (संपादित)
4.' शब्दों से अठखेलियाँ'
लघु कविता संग्रह
5.' प्रकृति तेरे सानिध्य में '
लघु कविता संग्रह
6. ' वेहड़ा बाबुल दा'
पंजाबी काव्य संग्रह
7 ' के कहणा' हरियाणवी काव्य संग्रह
8 'ग्लेशियर पिघल गया' अनुवादित ( पंजाबी से हिंदी)
9. ' अतीत की परछाई' अनुवादित ( पंजाबी से हिंदी)
10. लघुकथा कुछ कहवै सै(हिंदी से हरियाणवी )
अन्य :
साहित्य में उपलब्धियाँ : कई कविताएँ , लघुकथाएं , गजलें , कहानियाँ , लेख विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। बहुत सी कविताएँ सांझा काव्य संग्रह में प्रकाशित हो चुकी है । इन्होंने पंजाबी से हिंदी में बहुत सी पुस्तकों का अनुवाद किया है।
पता:
D 6, शिवालिक टावर, शिवालिक सिटी, सैक्टर 127, खरड़ 140301 जिला : मोहाली - पंजाब
1. भ्रूण हत्या
संजना ने घर आकर स्कूल बैग कंधे से उतारा और अनमनी सी होकर सोफे पर लेट गई । सरला की आवाज़ से वह चौंक गई “आज मेरी बिटिया किन ख़यालों मे गुम है? अभी तक ड्रेस भी नही बदली।“ संजना ने पूछा, “माँ, लोग भ्रूण हत्या क्यों करते है, क्या बेटियाँ सच में बहुत बुरी होती है ।“ अब चौंकने की बारी सरला की थी | मम्मा आज इतिहास की मैम ने एक असाइनमैंट दी थी | हम सब कक्षाओं में गए व लड़के व लड़कियों की संख्या नोट की तो हर कक्षा में लड़के ही ज़्यादा थे । सरला ने कहा ,"कोई बात नही तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो।"
उसका जवाब था," अगर ऐसे ही चलता रहा तो कहीं द्रोपदी की तरह एक लड़की को पाँच पति रखने पड़ गए तो ?" सुनते ही सरला को कंपकंपी सी छूट गई | समझ नही पाई बेटी को क्या कहकर समझाए और क्या जवाब दे? ०००
2. काको
भारती के पिता का सारा परिवार गाँव रहता था | उसके बहुत सारे चाचा-ताऊ थे जो सब मिलकर एक बड़े से घर में रहते थे | जब भी उसके गाँव करंडी ( पंजाब ) में कोई शादी ब्याह होता वह सारे परिवार के साथ गाँव जाती और बहुत दिनों के लिए वहां रहती | उस समय दादी के साथ काम करवा रहे होते एक आदमी को देखती जिसे सब छोटे बड़े काको ही बुलाते | शरीर से वो आदमियों जैसा लगता था लम्बा और मोटा | उसके चेहरे पर दाढ़ी मूंछ का कोई चिन्ह नहीं था | उसने सलवार कमीज पहनी हुई होती थी उसके सिर पर बाल नहीं थे | वही एक ऐसा शख्स था जो आदमियों और औरतों सबके साथ बैठता था सबके साथ मिलकर काम करता था | जितनी शिद्दत के साथ आदमियों वाले काम करता था वैसे ही औरतों वाले काम भी करता था | जब रात को गाने बजाने का समय होता था तो उसको खासतौर पर ढूंढा जाता था | उसके अलग तरह से नाचने पर सब ताली बजाकर हँसते थे | जब वह दिन में बर्तन साफ़ कर रहा होता था तो सब बच्चे उसकी चुन्नी उतार कर ले जाते थे और उसके शोर की आवाज सुनकर तालियाँ बजाते थे | वो बोलता, " मेरा उतला दे दो , बेबे जवाक मेरा उतला ले गए |" सब बच्चे खूब हँसते | बड़े होने पर भारती को उसके जीवन की हकीकत समझ आई | अब कभी कभी भारती को उसकी पीड़ा समझ आती है लेकिन अब तो काको अपने दुखदायी जीवन से मुक्त हो चला है | अभी भी जब कभी कोई किन्नर दिखता है तो वो उसमें काको को देखती है और श्रदा से उसका सिर झुक जाता है | ०००
3.मोटिवेशनल स्पीकर
मोबाइल की ट्रिंग ट्रिंग सुनकर नीरा रसोई से भागी आकर देखा तो शीनू के स्कूल से फ़ोन था | हेलो , उधर से आवाज आई," नीरा जी कल आप स्कूल आ जाईये प्रिंसिपल जी ने आपसे बात करनी है |"
नीरा हैरान कि ऐसी क्या बात हो गई , शीनू ने भी स्कूल से आकर कुछ नहीं बताया | अगले दिन नीरा थोड़ी हैरान और परेशान होती हुई स्कूल पहुँचीं | प्रिंसिपल ने नीरा के सामने क्लास टीचर को बुलवाया | क्लास टीचर की बात तो नीरा को भी हैरान करने वाली थी |उसने कहा ,"व्हाट टाइप ऑफ माम आर यू।" यू आर स्टिल सेइंग, "मेरा बेटा और गाली नाट पासिबल , हमारे घर का तो ऐसा मौहाल ही नहीं है |"
बच्चे शीनू को बुलवाया गया उसने साफ़ मना किया कि, " मैम मैंने किसी को गाली नहीं दी |"
नीरा ऑफिस में सॉरी बोलकर घर आ गई लेकिन बात उसके माइंड से निकली नहीं | तीन चार दिन बाद एक दिन नीरा जब शीनू के कमरे के पास से निकली तो उसे गाली की आवाज सुनाई दी | जैसे ही नीरा कमरे में आई उसने शीनू का मोबाइल जल्दी से लिया तो देखा एक तथाकथित मोटिवेशनल स्पीकर अपनी स्पीच में धड़ल्ले से गालियों का प्रयोग कर रहा है और शीनू वही शब्द अपने दोस्तों के साथ बस दोहराह भर रहा था | नीरा को समझ नहीं आ रहा था कि वह किसे दोषी ठहराए | ०००
4. मंदिर बनाम विद्यालय
नेहा दिल्ली के शिक्षा विभाग की एक बड़ी ऑफिसर है और इसी वजह से वह अलग-अलग राज्यों का दौरा करती रहती है | इस साल उसे हरियाणा राज्य की रिपोर्ट बनानी थी | आफिस के काम से लगातार कई दिन तक हरियाणा के अलग अलग गाँव में से कुछ आँकड़े इकट्ठे करने थे । उसे यह देखकर बहुत हैरत हुई कि हर गाँव में मन्दिर बहुत बड़े और खुबसूरत बने हुए थे, लेकिन सरकारी स्कूल के नाम पर बस टूटी हुई इमारत । नाममात्र से बच्चे और अध्यापक वो भी ज्यादातर स्कूल से नदारद | उसे यह देखकर हैरत हुई कि इक्कीसवीं सदी के लोग आज भी शिक्षा जैसी सुविधा को उतना महत्व नही देते जितना धर्म या पूजा पाठ को । मंदिर में दान देने के लिए गाँव के सब लोग झट से राजी हो जाते है | अगर पूरा गाँव विधालय बनाने की ठान ले तो शायद बच्चों को अपने गाँव में ही बेहतर शिक्षा मिल जाए । लडकियों को भी पढाई बीच में ना छोड़नी पड़े | इस स्थिति ने उसे सोचने पर मजबूर किया कि इसकी वजह क्या हो सकती है और वह अपने आंकड़ों में कुछ बदलाव करने लगी | ०००
5. बुढ़ापा
रीना अपने नए घर की खिड़की पर खड़े होकर इधर उधर देख रही थी | उसने कुछ दिन पहले ही इस मोहल्ले में नया घर लिया है | उसको वहां खड़े देख ऐसा लग रहा था मानो आज ही सबसे जान पहचान कर लेगी | धीरे धीरे यह उसका रोज का नियम बन गया जब भी घर के काम से फुरसत मिलती वह खिड़की पर आकर खड़ी हो जाती | उसके सामने वाले घर मे एक बुजुर्ग रहते हैं जो कभी कभी दिखाई देते हैं खासकर इतवार को | रीना यह देखकर बड़ी हैरान होती है कि वह बुजुर्ग हर रविवार को कुछ कबाड़ बाहर निकालते हैं और हर आने जाने वाले कबाड़ी को रोकते है और कुछ देर मोल भाव करते हैं फिर अंदर चले जाते हैं | कभी-कभी कुछ कबाड़ बेच भी देते हैं | रीना को आस पड़ोस से पता चला कि वो एक रिटायर्ड अधिकारी हैं जिनके बच्चे विदेश में सेटल्ड हैं | पत्नी का देहांत हुए कई बरस हो गए हैं |इतने बड़े घर में अकेले रह रहे हैं | कोई आने जाने वाला नहीं है | एक रविवार रीना को कबाड़ बेचना था उसने कबाड़ी को बुलाया बातों बातों में उसने कबाड़ी से बुजुर्ग के लालच की बात बोली तो कबाड़ी ने बताया कि वो लालची नहीं वो तो टाइम पास करता है और तो कोई है नहीं बोलने के लिए इसलिए वह हम जैसों से ही दिल बहला लेता है | कबाड़ी की बात सुन बुजुर्गों के अकेलेपन के बारे में सोचने पर मजबूर हो गयी | ०००
मानवीय संवेदना प्रमुख रूप
डॉ. नीलम नारंग ‘नील’ की पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ के अलग-अलग पक्षों को सामने लाने वाली रचनाएँ हैं :-
1. भ्रूण हत्या
यह लघुकथा कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक समस्या पर आधारित है। कक्षा में लड़कियों की कम संख्या देखकर संजना का प्रश्न—“अगर ऐसे ही चलता रहा तो कहीं द्रौपदी की तरह एक लड़की को पाँच पति रखने न पड़ जाएँ?”—कथानक का प्रभावशाली और चौंकाने वाला अंत है। बालमन की सहज कल्पना के माध्यम से लेखिका ने लिंगानुपात की भयावह स्थिति को सामने रखा है। बच्ची का प्रश्न वास्तव में पूरे समाज से किया गया प्रश्न है। माँ का निरुत्तर रह जाना इस समस्या की गंभीरता को और गहरा करता है।
2. काको
यह पाँचों रचनाओं में सबसे अधिक मार्मिक और संवेदनशील लघुकथा है। बचपन में बच्चे जिस व्यक्ति को कौतूहल और मनोरंजन का साधन समझते हैं, बड़े होने पर उसी के जीवन की पीड़ा को समझ पाते हैं।‘काको’ के माध्यम से किन्नर समुदाय के जीवन, सामाजिक उपेक्षा और हमारी संवेदनहीनता का चित्रण किया गया है। बचपन में बच्चे उसके कपड़े छीनकर हँसते हैं, उसकी पीड़ा को मनोरंजन समझते है जबकि वह स्वयं समाज की स्वीकृति और सम्मान से वंचित जीवन जी रहा है। अंत में लेखिका का यह भाव कि किसी किन्नर को देखकर उन्हें ‘काको’ दिखाई देता है और श्रद्धा से सिर झुक जाता है—लघुकथा को गहरी मानवीय संवेदना प्रदान करता है।
3. मोटिवेशनल स्पीकर
यह लघुकथा आज के डिजिटल युग और तथाकथित मोटिवेशनल कंटेंट की अनियंत्रित पहुँच पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है। शीनू द्वारा गाली देने की घटना के बाद माँ का यह सोचकर परेशान होना कि बच्चे ने ऐसे शब्द सीखे कहाँ से, कथा को स्वाभाविक गति देता है। अंत में मोबाइल पर मोटिवेशनल स्पीकर के भाषण में गालियों का धड़ल्ले से प्रयोग सामने आता है। बच्चा स्वयं गाली देने वाला नहीं अपितु सुनी हुई भाषा को दोहराने वाला है। इस प्रकार लेखिका ने यह प्रश्न उठाया है कि बच्चों के संस्कारों के लिए केवल माता-पिता को दोषी ठहराना उचित है या डिजिटल माध्यमों की सामग्री और उसके निर्माताओं की भी कोई जिम्मेदारी है? कथा का विषय अत्यंत समसामयिक है। इसका संदेश स्पष्ट है कि बच्चों को केवल मोबाइल देना पर्याप्त नहीं अपितु वे क्या देख और सुन रहे हैं, इस पर भी अभिभावकों को सजग रहना होगा।
4. मंदिर बनाम विद्यालय
यह लघुकथा धार्मिक आस्था का विरोध नहीं करती अपितु आस्था और शिक्षा के बीच असंतुलन पर प्रश्न उठाती है। गाँवों में भव्य मंदिर और जर्जर विद्यालय का विरोधाभास रचना का केंद्रीय बिंदु है। लेखिका ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि यदि समाज धार्मिक स्थलों के निर्माण के लिए सामूहिक रूप से आगे आ सकता है, तो विद्यालय और शिक्षा के लिए भी उसी उत्साह से प्रयास क्यों नहीं कर सकता? विशेषकर ग्रामीण बालिकाओं की शिक्षा का प्रश्न इस कथा को अधिक व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करता है। हालाँकि कथा के अंत में नायिका द्वारा आँकड़ों में बदलाव करने का निर्णय कुछ अस्पष्ट प्रतीत होता है। यहाँ यह स्पष्ट किया जाना अपेक्षित था कि वह आँकड़ों में किस प्रकार और क्यों बदलाव करना चाहती है। यदि वह व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करने के लिए रिपोर्ट को अधिक प्रभावशाली बनाना चाहती है, तो उस भाव को स्पष्ट करने से अंत अधिक सशक्त हो सकता था।
5. बुढ़ापा
यह लघुकथा वृद्धावस्था के अकेलेपन को अत्यंत सरल और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। सामने रहने वाले बुजुर्ग को देखकर रीना उन्हें लालची समझती है, क्योंकि वे कबाड़ बेचने वाले से लंबे समय तक मोलभाव करते हैं।लेकिन कबाड़ी के एक वाक्य से पूरी दृष्टि बदल जाती है—वह बुजुर्ग लालची नहीं, अकेला है। उसके पास बात करने वाला कोई नहीं, इसलिए कबाड़ी से बातचीत ही उसके लिए समय बिताने और मन बहलाने का माध्यम बन गई है। यह लघुकथा बताती है कि हम अक्सर किसी के व्यवहार को देखकर तुरंत निष्कर्ष निकाल लेते हैं, जबकि उसके पीछे छिपी पीड़ा को समझने का प्रयास नहीं करते। वृद्धावस्था में धन से अधिक आवश्यकता साथ, संवाद और अपनत्व की होती है।
डॉ. नीलम नारंग ‘नील’ की इन पाँचों लघुकथाओं में सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। लेखिका ने जटिल समस्याओं को सरल कथानकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। उनकी रचनाओं में प्रश्न उठाने की क्षमता है और यही लघुकथा की महत्वपूर्ण शक्ति है। इन रचनाओं में कहीं बालमन के माध्यम से समाज को आईना दिखाया गया है, कहीं किन्नर जीवन की पीड़ा को स्वर मिला है, कहीं डिजिटल माध्यमों की जिम्मेदारी पर प्रश्न उठाया गया है, कहीं शिक्षा की उपेक्षा और धार्मिक प्राथमिकताओं का विरोधाभास सामने आया है और कहीं वृद्धावस्था के मौन अकेलेपन को अभिव्यक्ति मिली है।भाषा सहज और संवादप्रधान है।
- डॉ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
समस्या से जूझती लघुकथाएँ
डॉ नीलम जी की पाँचों लघुकथाएं पढ़ीं । सभी किसी न किसी समस्या से जूझती लघुकथाएँ हैं । समाज में रहते विसंगतियों पर कथाकार की नज़र का ठिठकना स्वाभाविक है । सवाल इतना भर है कि वह अपनी कथा में उसको प्रस्तुत कैसे करता है । लघुकथा में उस विषय का अंत आते -आते जो पैनापन लाया जाता है , जिसे पंच लाइन कहा जाता है , वही कथा की जान बन पाठक को कचोट जाता है । इन सभी कथाओं में वहीं पंच गुम है :-
भ्रूण हत्या
कथा इसी पंच पर समाप्त हो जानी चाहिए थी - “ पाँच पति रखने पड़ गए तो ?”
काको
लघुकथा न होकर संस्मरण है ।
मोटीवेशनल स्पीकर
एक कमजोर कथानक पर आधारित है , जिसके संवाद भी कच्चे हैं ।
मंदिर बनाम विद्यालय
लघुकथा न होकर एक विचार मात्र बन कर रह गई है ।विचार तो महत्वपूर्ण है कि मंदिर से कहीं अधिक ज़रूरी स्कूल ज़रूरी है , लेकिन कथा ?
बुढ़ापा
लघुकथा , वृद्धों के अकेलेपन की दास्ताँ है । इस समस्या का ज़िक्र अक्सर होता रहा है । इसमें भी पंच नहीं बन पड़ा है ।
कुल मिला कर सभी लघुकथाओं में विषय तो संवेदनशील लिए गए हैं लेकिन यदि उन्हें ठीक से गढ़ा जाए तो वह पाठक मन के भीतर गहरे पैठ और अधिक प्रभावी बन सकते हैं ।
- डॉ आदर्श प्रकाश
ऊधमपुर - जम्मू कश्मीर
गहन अनुभूति से युक्त प्रेरणास्पद कथ्य
डॉ नीलम नारंग जी की पांचो लघुकथाओं का अध्ययन किया लघुकथाओं में शीर्षक सोद्देश्य, संवाद आवश्यकतानुसार ,अंत प्रभावपूर्ण एवं रोचक है :-
1. भ्रूणहत्या
सामाजिक समस्या के ताने-बाने से बुनी यह लघुकथा पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की जन्म दर में कमी से चिन्तित नई पीढी की सोच द्वापर युग के बिम्ब का दृश्यांकन कराती है।अतः पुनरावृत्ति से बचना होगा। एक मां और स्कूली छात्रा उसकी बेटी के वार्तालाप की पंचलाइन से स्पष्ट है "कि कहीं द्रौपदी की तरह एक लड़की को पांच पति रखना पड़ गए तो" यह कथन मानसिकता को झकझोरता है।
2 . काको
इस लघुकथा में एक किन्नर व्यक्ति की मनः स्थिति एवं उसकी स्वयं की दिनचर्या समाज की दृष्टि में उसकी उपहास्यात्मकता एवं विशेष मौकों पर अनिवार्यता का अंकन किया गया है पर पात्र भारती ऐसे दुखदायी लोगों के प्रति पीड़ा का भाव रखती है।
3 .मोटिवेशन स्पीकर
आधुनिक युग में मोटिवेशनल स्पीकर के ऑन रखने से वास्तविक स्थिति को समझने में देर नहीं लगती जैसा की एक स्कूली बच्चा शीनू की मां विद्यालय में अपने बच्चों को निर्दोष कहती है पर एक दिन घर पर ही स्वयं स्पीकर पर बच्चों के अपशब्दों और असहज प्रयोगों के चोरी छिपे व्यवहार को देखकर स्थिति को स्पष्ट करने में उसे तनिक देर न लगी। प्रेरणादायक कथ्य है।
4. मन्दिर बनाम विद्यालय
समसामयिक एवम विचारणीय स्थिति का दर्शन कराती इस लघुकथा में विद्यालय के निर्माण की अपेक्षा मंदिर में दान देने की वरीयता को दर्शाया गया है साथ ही इसमें आयी कमी पर शिक्षा विभाग के अधिकारी द्वारा बदलाव पर भी ध्यान केंद्रित करना स्वागत योग्य है।
5 . बुढापा
यह लघुकथा एक तो वृद्धावस्था की लाचारी दूसरे नितान्त एकाकी होकर भी समझदारी से जीवन को बिताकर खुश रहने की अपनी दिनचर्या का अंकन कराती है।
निष्कर्ष -
सभी लघुकथाएं समाज के व्यवहारिक अनुभवों जुड़ी हुई मानवीय समस्याग्रस्त परिवेश, स्थितियों का सहजता से संयत भाषा में चित्रण कराती हुई समाधान की ओर उन्मुख हैं । बहुत-बहुत साधुवाद।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
आदरणीया डॉ. नीलम नारंग जी की प्रस्तुत लघुकथाओं में समाज के विभिन्न रूप अच्छी परिकल्पना के साथ बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किये गये हैं :-
1. भ्रूण हत्या
मार्मिक लघुकथा। अच्छा कथ्य। अच्छा शिल्प।
2. काको
सुंदर लघुकथा। मार्मिक भी। अच्छी प्रस्तुति।
3.मोटिवेशनल स्पीकर
अच्छा कथ्य। अच्छी लघुकथा। नयापन।
4.मंदिर बनाम विद्यालय
कथ्य अच्छा। शिल्प में कुछ कमी रही।
5. बुढ़ापा
बढ़िया लघुकथा।अच्छा कथ्य। अच्छी प्रस्तुति।
आदरणीया डॉ. नीलम नारंग जी की प्रस्तुत सभी लघुकथाओं में समाज के विभिन्न परिदृश्य हैं। जिनमें पीड़ा भी है,संघर्ष भी है और संदेश भी।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
पांचों लघुकथा की समीक्षा
1.भ्रूण हत्या
विषय समय के अनुकूल है। बेटियों को निकृष्ट नागरिक मानना गलत है।शीर्षक -सटीक है। संवाद अच्छे हैं। कहानी के अनुरूप भाषा शैली ठीक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण है। लेकिन द्रोपदी से तुलना गलत है। द्रोपदी का विवाह, लड़कियों की कमी हो जाने से पांँच भाइयों से नहीं हुआ था।
2.काको
शीर्षक उचित है।किन्नरों का जीवन अत्यधिक कर्मठ होते हुए भी, उपहास का पात्र, उपेक्षित बना रहता है। भाषा पात्रों के अनुरूप है। संवाद अच्छे हैं।
3. मोटिवेशनल स्पीकर
विषय ज्वलंत है। मोबाइल सोशल मीडिया बहुत अधिक प्रभावशाली हैं। माता-पिता जो नहीं सिखाते, वह भी सोशल मीडिया से बच्चे सीख लेते हैं। भाषा शैली वातावरण के अनुकूल, विषय के अनुकूल है। संवाद अच्छे हैं।
4. मंदिर बनाम विद्यालय
मंदिर और विद्यालय एक दूसरे के स्थानापन्न नहीं हैं। मंदिर समाज बनाता है। स्कूल सरकारी है। यह शिकायत सरकार से होनी चाहिए। शिक्षा का महत्व बहुत अधिक है। लेकिन मंदिर से कोई तुलना नहीं हो सकती। 21वीं सदी में क्या धर्म, मंदिर, पूजा पाठ का महत्व, नगण्य हो जाना चाहिए? ईश्वर सदैव ही सर्व व्यापक, सर्वोपरि थे, और रहेंगे। विद्यालय अच्छे से अच्छे बनने चाहिए। परंतु मंदिरों को देखकर, उनको महत्वहीन मानकर तो हम सनातनी कैसे रहेंगे? हम सनातनी भी मंदिरों के विषय में, यदि यह धारणा रखेंगे तो, मुगलों, अंग्रेजों में,हमसे फिर क्या अलग है? गांँव के सरकारी विद्यालय में विद्यार्थी कम है। अध्यापक नदारद रहते हैं, इमारत भी टूटी-फूटी है। क्या इसमें मंदिरों का दोष है? विद्यालय हर गांँव में अच्छी स्थिति में बन जाने चाहिए।यह अच्छी बात है। स्वतंत्रता के पश्चात भी, अंग्रेजों, मुगलों के चले जाने के पश्चात भी, क्या हमें सनातन धर्म से इतनी विरक्ति रखनी चाहिए? कि मंदिरों को देखकर हम यह सोचें कि विद्यालय की तुलना में मंदिर अच्छा क्यों है?हमारी शिकायत सरकार से होनी चाहिए।तभी अच्छे परिणाम निकलेंगे। इस कहानी में कोई संवाद नहीं है। यह कमी अखरती है। पूजा पाठ करने वालों को, शिक्षा का महत्व न समझने वाला समझना, अनुचित है।
5. बुढ़ापा
विषय एकदम ज्वलंत है। सनातनियों में कम संतान होती हैं। वे भी विदेश में जाकर रहने लगते हैं, जो मांँ-बाप को वहांँ बुलाना नहीं चाहते। वृद्धावस्था में माता-पिता का अक्षम शरीर, समय बिताना कठिन, यदि पति पत्नी में से एक ही रह जाए, तो उसका जीवन बिताना मुश्किल। इसमें संवाद नहीं है। केवल एक कथा के रूप में बात कही गई है। भाषा ठीक है। और वरिष्ठ नागरिकों की समस्या को दर्शाया गया है।
- उषा कंसल
बेंगलुरु - कर्नाटक
भिन्न - भिन्न विषयों का चयन
नीलम नारंग नील जी ने भिन्न - भिन्न विषयों का चयन किया है और साथ ही विभिन्न वर्गों की समस्याओं को जगह दी है :-
1. भ्रूण हत्या
यह एक बच्ची के मन में उठने वाले सवाल हैं, जिसका उन्होंने हल नहीं ढूंढा है। बच्ची के मन पर द्रौपदी के 'पाँच पति ' की संरचना घर से ही तो आई होगी। यह विचारणीय बिंदु है।
2. काको
किन्नर पर कम ही चर्चा की गई है। किया भी गया है तो केवल चर्चा ही हुई है। उनके लिए कुछ विशेष नहीं किया गया। यहाँ भी उसके चरित्र का विश्लेषण किया गया है। उसके विभिन्न वर्गों के साथ के व्यवहार को अंकित किया गया है, लेकिन उसे अपने शापित जीवन से बाहर निकालने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। लघुकथा के मानकों के अनुसार इसमें कई मानकों की कमी है। शब्दों का गठन व मारक क्षमता की भी कमी है।
3. मोटिवेशनल स्पीकर
यह बच्चों के बीच मोबाइल के प्रति बढ़ते रुझान की प्रतिक्रिया को केंद्र बिंदु में रख कर लिखी गई है। अच्छी कोशिश है, परंतु कई दिनों में घटना का घटित होना काल - दोष बन जाता है।
इसका उद्देश्य हमारी नई पीढ़ी के लिए विचारणीय विषय है।
4. मंदिर बनाम विद्यालय
यह एक सच्चाई है। मंदिर के लिए गाँव में अभी भी चंदा जमा करना बड़ी बात नहीं है, लेकिन विद्यालय में फीस तक देने के लिए अभिभावक कई बहाने बनाते हैं। यह हमारे समाज की मानसिकता है। यही कारण होता है कि उनका परिचालन नहीं हो पाता है। रख - रखाव व उपयुक्त सुविधा का अभाव इसीलिए नहीं जुट पाता है। यह अभिभावक अपने बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। अच्छी रचना उभर कर आई है। पाठक को भी विचारणीय प्रश्न उपलब्ध होता है।
5. बुढ़ापा
इस रचना में संवाद के द्वारा उसे एक दिन की घटना में समेटा जा सकता था। संवाद से रचना में जीवंतता आती है। कबाड़ वाले की बातों को संवाद के रूप में ढाला जा सकता है।
- संगीता गोविल
पटना - बिहार
संक्षिप्त साहित्यिक समीक्षा
डॉ नीलम नारंग की लघुकथाओं की , संक्षिप्त और साहित्यिक समीक्षा प्रस्तुत है :-
1. भ्रूण हत्या
यह लघुकथा एक मासूम बच्ची के सहज प्रश्न के माध्यम से कन्या भ्रूण हत्या जैसे गंभीर सामाजिक अपराध पर तीखा प्रहार करती है। अंतिम पंक्ति पाठक को झकझोर देती है और कथा का प्रभाव लंबे समय तक मन में बना रहता है।
2. काको
"काको" संवेदना और मानवीय दृष्टि से लिखी गई मार्मिक लघुकथा है। किन्नर समाज के प्रति उपेक्षा के स्थान पर सम्मान और करुणा का भाव जगाना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। सरल भाषा में गहरी मानवीय पीड़ा का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
3. मोटिवेशनल स्पीकर
यह समकालीन विषय पर आधारित सार्थक लघुकथा है, जो सोशल मीडिया और तथाकथित मोटिवेशनल स्पीकर्स के बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव को उजागर करती है। कथा सहज ढंग से अभिभावकों और समाज दोनों को सोचने के लिए विवश करती है।
4. मंदिर बनाम विद्यालय
यह लघुकथा शिक्षा और सामाजिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न उठाती है। धर्म और शिक्षा के बीच संतुलन की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से रेखांकित करते हुए लेखिका ने समाज को आत्ममंथन का संदेश दिया है।
5. बुढ़ापा
"बुढ़ापा" वृद्धावस्था के अकेलेपन और संवाद की मानवीय आवश्यकता को अत्यंत मार्मिकता से प्रस्तुत करती है। अंतिम खुलासा कथा को गहरी संवेदना प्रदान करता है और पाठक के मन में बुज़ुर्गों के प्रति अपनत्व और सहानुभूति का भाव जगाता है।ये समीक्षाएँ संक्षिप्त होने के साथ-साथ प्रत्येक लघुकथा के मूल भाव और साहित्यिक प्रभाव को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती हैं।
बहुत बहुत बधाई नीलम जी, विद्वान समीक्षकों द्वारा समीक्षाएं प्रकाशित हुई। डॉ आदर्श प्रकाश जी को बधाई आदरणीय डॉ जैमिनी जी उत्तम कार्य कर रहे हैं। सादर आभार आपका 🙏😊
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