सच्चिदानंद राउतराय की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
जहां चरित्र है वहां प्रभु है, जहां संस्कार है वहां सब कुछ है..... यह जीवन में व्यक्ति के सत्य को दर्शाता है। चूंकि चरित्र मनुष्य को उपर उठाता है वहीं संस्कार उसके जीवन को सुंदर बनाता है। चरित्र व्यक्ति के आचरण, व्यवहार और विचार से जाना जाता है, उसके लिए यह महत्व नहीं रखता कि वह कितना विद्वान,धनी और शक्तिशाली है। उज्जवल व्यक्ति का चरित्र उसकी ईमानदारी, करूणा, धैर्य, नैतिकता एवं सत्यता और विश्वास से भरा होता है ...और यही सत्य है जहां उपर्युक्त गुण होते हैं वहीं प्रभु का वास होता है। वहीं संस्कार वह विशेष गुण है जो हमें हमारे परिवार समाज और संस्कृति से मिलते हैं। बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्यार करना, सेवा, सत्य का पालन करना, त्याग एवं मानवता का भाव अर्थात उनके प्रति सद्भावना यह सभी हमें हमारे संस्कार ही तो सीखाते हैं। जिस व्यक्ति के घर में अच्छे संस्कार होते हैं वहां, शांति, प्रेम और सद्भावना सदा बनी रहती है ...ऐसे व्यक्ति जीवन में हमेशा सफल रहते हैं। संस्कार ही तो व्यक्ति की पहचान है। यदि व्यक्ति का चरित्र सुंदर हो और संस्कार कुट-कुट कर भरा हो तो उसका जीवन स्वयं मंदिर का रूप ले लेता है....।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
जीवन की सबसे बड़ी और सबसे मूल्यवान पूंजी चरित्र ही होती है। कहा भी है ,धन गया तो कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य गया तो कुछ गया लेकिन यदि चरित्र गया तो सब कुछ गया। अत: हमें अपने स्वास्थ्य को बचाने के साथ-साथ चरित्र को भी बचाये रखना चाहिए। हम में चारित्रिक विशेषताएं जितनी अधिक होंगी, हमारे लिए उतना ही मान-सम्मान और सुख-सुकून मिलेगा। इस परिप्रेक्ष्य में एक बात और सम्मिलित की जा सकती है वह यह कि हम में चारित्रिक विशेषताएं भले ही अधिक न हों या कम हों परंतु हमें इस बात का प्रयास सदैव करना चाहिए कि हम में चारित्रिक दोष न हों। ऐसी कोई भी बुरी आदत न हो जो हमें हमारे मान-सम्मान को ठेस पहुंचाये। हमारे सुख-सुकून में बाधित हो। इसके लिए सबसे सहज उपाय है, हम संस्कारवान बनें। अच्छी संगत रखें। बुरी आदतों को त्यागें। अपने स्वभाव और सोच को सकारात्मक बनाएं। क्योंकि जहां संस्कार हैं वहां सब कुछ है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
जहाँ चरित्र होता है वहीं संस्कार होते है क्योंकि ये दोनों ही परस्पर पूरक हैं। संस्कृति के अंग है - - चरित्र और संस्कार। सचमुच जीवन इन्ही के सहारे चलता है। बालक परिवार में जन्म लेता है लेकिन जीवन की दौड़ में परिवार के अलावा विद्यालय महाविद्यालय नौकरी के स्थान सब के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखना होता है। इन स्थानों पर संक्रांति काल जैसे अवसर आते रहते हैं जहां सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है। समय की बढ़ती धारा के साथ चरित्र और संस्कार की प्रवृत्तियाँ बदलती रहतीं हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते करते संस्कार परिवर्तित हो जाते हैं। ईश्वर के प्रति बढता अनुभाव इंसान को भ्रमित कर देता है। संस्कार के नाम पर अंधविश्वास और पाखंड चलने लगता है। उसे ही चरित्र का नाम देकर ठगिया संचालन होने लगते हैं। संस्कार के नाम पर छलना आरंभ हो जाती है। सच कहें तो चरित्र की परिभाषा बहुत विशाल है - - उसे सिर्फ शारीरिक शुचिता से जोड़ कर देखा जाने लगता है जबकि चरित्र की विशालता अपार है। चरित्र के भीतर आपका बोलना चालना, आपका व्यवहार, आपकी स्थिति, आपकी छवि सबकुछ आती है। जरूरत इस बात की है कि हम समझें कि - - संस्कार और चरित्र एक ही तराजू के दो पल्ले हैं। दोनों समतुल्य रहेंगे तब ही जीवन की गरिमा और गुणवत्ता बनी रह सकती है। वैसे भी मानव परिस्थितियों का गुलाम होता है। परिस्थिति उसे चलाती, दौडाती, गिराती है। उठकर खड़े होने वाले संस्कार उसे संचालित करते हैं और कुसंस्कार गिराते हैं। साधुवाद दिया जाता है जो सिर्फ इंसानियत के नाते हर किसी को नहीं मिलता है, अवसर - - छीनना भी पड़ सकता है - - चरित्र और संस्कार के नाम पर तभी जीवन की गाड़ी चलती है दो पटरियों पर।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
यह परखी हुई बात है कि जीवन में केवल धन या विद्या का होना ही काफी नहीं है, यदि चरित्र और संस्कार नहीं हों तो, सब कुछ बेकार है क्योंकि यह दोनों ही जीवन को पूर्ण और सार्थक बनाते हैं तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि यहाँ चरित्र है वहां प्रभु हैं यहाँ संस्कार है वहां सब कुछ है, मेरा मानना है कि यहाँ ईमानदारी, नैतिकता, पवित्रता और उत्तम चरित्र होता है वहाँ ईश्वर का वास स्वंय हो जाता है क्योंकि मंदिर जाने से पहले मन के मंदिर यानि चरित्र का साफ होना बहुत जरूरी है और यहाँ तक संस्कारों की बात है तो अच्छे संस्कार, आदर, अनुशासन, सेवा का भाव प्रेम जैसे संस्कार जिसके जीवन में हैं उसके पास जीवन का हर सुख समृद्धि अपने आप आ जाते हैं, देखा जाए ईश्वर तो घट घट के निवासी हैं वो केवल मंदिर, मस्जिद या गुरूद्वारे में ही नहीं बसते बल्कि चरित्रवान व संस्कारी मनुष्य की आत्मा में हर पल हर जगह विराजमान रहते हैं क्योंकि इंसान की पहचान उसके उँचे पद से या धन से नहीं आँकी जाती बल्कि उसके व्यवहार, ईमानदारी और रहन सहन व बोलचाल से होती है इसलिए यहाँ ईमानदारी और नैतिकता हो वहाँ ही प्रभु का वास होता है इसके साथ साथ दुसरों का सम्मान, नम्रता, दया , बडों का आदर होता है वहाँ पर ही ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है यदि आपका आचरण शुद्ध है आपके संस्कार उत्तम हैं तो आपको प्रभु को खोजने की जरूरत नहीं वो आपके हृदय में ही विराजमान होंगे अन्त में यही कहुँगा कि चरित्र और संस्कार से ही प्रभु का मिलना मुमकिन है, बैसे तो लंकापति रावण भी बहुत पढ़ा लिखा था लेकिन उसके पास अंहकार, धन दौलत बेशुमार थी किन्तु चरित्र और संस्कार की कमी ने उसे कहीं का न छोड़ा जबकि रावण के भाई विभीषण के पास धन दौलत और अंहकार नहीं थे मगर संस्कार और चरित्र था तभी उनको भगवान राम जी को पहचानने में देर नहीं लगी और भगवान राम जी ने उनको तरूंत शरण दे दी, जिससे साबित होता है कि भगवान चरित्रवान और संस्कारी प्राणी के ही हितकारी होते हैं क्योंकि विनम्रता, बड़ों का सम्मान और सेवा भाव ही सच्चे संस्कार हैं जो मनुष्य को ईश्वर के करीब लाते हैं कहने का मतलब प्रभु भाव के भूखे हैं आडंबर के नहीं, चरित्र निर्मल हो और संस्कार उच्च हों तो ईश्वर स्वंय भक्त की और खिंचे चले आते हैं जैसा कि कहा गया है, निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न पावा अथार्त निर्मल मन वाला व्यक्ति ही मुझे(प्रभु) को पा सकता है उन्हें कपट और छल पसंद नहीं अत:प्रभु को पाने के लिए हमें अपने आचरण और संस्कारों को सुधारने की जरूरत है यही प्रभु को पाने का सबसे उत्तम मार्ग है,
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
मनुष्य की आंतरिक विशेषताएं यथा--- आचरण, स्वभाव , ईमानदारी, नैतिक मूल्य, विवेक इत्यादि व्यवहारिक जीवन में परिलक्षित होती हैं । यानी यही सच्चरित्रता है इस प्रकार के आचरण में प्रभु के सगुण साकार रूप की दर्शना होती है यथा त्रेता में राम द्वापर में कृष्ण दोनों ही अपने सच्चरित्र से युक्त रूप और नाम से जाने जाते हैं। उनके चारित्रिक गुणों को अपनाकर प्रभु के साथ आत्मीयता जुड़ जाती है ।यहां तक कि हम इन चरित्रों के आराधक भक्त बनकर अपने कर्मों को भी सुधार लेते हैं पर यह कुछ तो कहीं अर्जित किया जाता है और कहीं यह संस्कार जन्मजात होते हैं। भारतीय सनातन धर्म तो सारे दुर्गुणों को दूर करके सद्गुणों को विकास पर लाने की प्रक्रिया जन्म के पूर्व से लेकर मृत्युपर्यंत 16 संस्कारों से व्यक्तित्व का परिमार्जन करके मानवता का पथ प्रशस्त कराते हैं ।अतः यह पूर्णतः सत्य है ।संस्कारों से चरित्र का निर्माण होता है जिसमें कोई बिरला ही अवतारी प्रभु सिद्ध होता है, जो जीवन में सब कुछ सत्यम, शिवम , सुन्दरम की प्राप्ति करा देता है ।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
चरित्र और संस्कार के अमूल्य रत्न जिनके पास होते हैं उनको हर जगह सब कुछ सुलभ होता है। चरित्र का हीरा,जिसके पास है वह वास्तविक धनवान है। चरित्रवान की सब जगह पूजा होती है।ऐसा कह सकते हैं कि जहां चरित्र है, वहां प्रभु है। चरित्र के संबंध में कहा गया है-वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ अर्थात चरित्र (आचरण) की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। धन तो आता और चला जाता है। धन के नष्ट होने पर कुछ नहीं नष्ट होता, लेकिन चरित्र के नष्ट होने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है। इससे चरित्र की महत्ता को समझा जा सकता है। चरित्र हमें संस्कारवान बनाता है। संस्कार, सद्बुद्धि बनाए रखते हैं। तुलसीदास ने कहा है - जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।"चरित्र के बल पर ही राम,न केवल मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए,वरन प्रभु राम बने। श्री कृष्ण,प्रभु श्री कृष्ण बने। जबकि विद्यावान, धनवान, बलवान होते हुए भी रावण, संस्कारों से भटकने के कारण घृणा का पात्र बन गया।
- डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
इस दुनियां मे दो प्रकार के लोग रहते हैं , उच्च चरित्र वाले व निम्न चरित्र वाले ! अपने चरित्र को निर्मल , साफ , रखकर जीना है तो कठिन , पर सच्चरित्र होकर जीने मैं , एक अलग ही सुकून है ! भौतिक संसार मैं , जीने के लिए , अक्सर लोग अपने चरित्र को गिराकर , अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए , अपने चरित्र से समझौता कर लेते हैं !! जो लोग अपनी समस्त समस्याओं के बावजूद , अपने चरित्र को उच्च रखते हैं , उनमें प्रभु का वास होता है !! संस्कार इस भौतिक दुनिया मे एक आवश्यक वांछित गुण है , जो आम व्यक्ति मैं नहीं !! संस्कार देने के लिए , संस्कारहोने आवश्यक है , जो आमतौर पर नहीं मिलते !! जिसका चरित्र उच्च है , उसमें प्रभु बसते हैं , व उसमें अच्छे संस्कार स्वतः ही आ जाते हैं !! अच्छे संस्कार और चरित्र निर्माण करने के लिए ये दोनों गुण व्यक्ति मैं होने चाहिए , अथवा पतन निश्चित है !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
जहाँ चरित्र है वहां प्रभु हैं, जहाँ संस्कार है वहां सब कुछ है. ये बातें सभी पर लागू होती है. चरित्रवान लोगों के पास ही प्रभु का निवास होता है. जहाँ चरित्र नहीं होता वहाँ प्रभु का वास ही नहीं होता है. जहाँ संस्कार है वहां सब कुछ है. क्योंकि संस्कार से ही सबकी पहचान होती है. संस्कार से ही व्यक्ति अच्छे और बुरे कर्म करता है. संस्कार से ही चरित्र का निर्माण होता है. यदि संस्कार अच्छे होंगे तो चरित्र भी अच्छा होगा. संस्कार गलत होगा तो चरित्र भी गलत होगा. इसलिए कहा जाता है कि जहां संस्कार है वहां सबकुछ है. लेकिन आजकल लोग अपने संस्कार अपनी संस्कृति छोड़ कर पाश्चात्य शैली अपना कर अपनी संस्कृति अपना चरित्र बिगाड़ रहें हैं और उसका गलत परिणाम भी भुगत रहे हैं.
- दिनेश चंद्र प्रसाद " दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
चरित्र और संस्कार ही सच्ची पूँजी हैं। ईश्वर मंदिर-मूर्ति में नहीं, नेक चरित्र वाले मनुष्य में बसता है। संस्कार यानी सभ्यता, शिष्टाचार, संस्कारवान जीवन ही सच्चा धन है। पैसा, पद सब आ-जा सकते हैं, पर संस्कार रहने पर सब कुछ फिर से कमाया जा सकता है।चरित्र गिरे तो सब गिर जाता है,संस्कार रहे तो जग झुक जाता है। चरित्र की समृद्धि मर्यादा व्यवहार सहयोग नैतिक मूल्यों की पहचान इंसानियत में होती से होती हैं! वैभव विलासिता का दर्पण दिखाने से धन की समृद्धि नही होती हैं ! स्वास्थ की समृद्धि योग से है ! राजा राम भी तभी पुरुषोत्तम कहलाए ! जहाँ संस्कार की परीक्षा सीता का मिला! रामायण ऐसा ग्रंथ है जिसमे सभी तत्वों शंका समाधानों का सार संस्कार व्यवहार रामायण के हर पात्रों से सीखने सिखाने मिलता है हम अपनी समस्याओं का समाधान निवारण करते हैं !
जहाँ जीवन है वहीं संस्कार होंगे
वंही प्रभु चरित्र का निर्माण होगा
यही जन मानस की पहचान है
जहाँ सभ्यता संस्कृति बेमिसाल होगी
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
सच्चिदानंद राउतराय (Sachidananda Routray) जी की स्मृति में प्रस्तुत पंक्तियाँ मानव जीवन के दो अमूल्य एवं शाश्वत स्तंभों “चरित्र” और “संस्कार” का अत्यंत गहन, प्रेरणादायक तथा जीवनोपयोगी संदेश प्रदान करती हैं। यह केवल साधारण शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का सार है। वास्तव में चरित्र ही मनुष्य की वास्तविक पहचान, उसकी प्रतिष्ठा और उसके व्यक्तित्व की आत्मा होता है। धन, पद, शक्ति और प्रसिद्धि समय के साथ बदल सकते हैं, किन्तु उत्तम चरित्र मनुष्य को सदैव आदर, विश्वास और सम्मान दिलाता है। जिस व्यक्ति के जीवन में सत्य, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता विद्यमान होती है, वहाँ ईश्वरत्व का प्रकाश स्वतः अनुभव होने लगता है। यही कारण है कि महान संतों, महापुरुषों और राष्ट्रनिर्माताओं ने चरित्र को मानव जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बताया है। इसी प्रकार संस्कार मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाली वह दिव्य शक्ति हैं, जो उसे केवल शिक्षित ही नहीं बल्कि सभ्य, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक भी बनाती हैं। संस्कार परिवार से प्रारम्भ होकर समाज और राष्ट्र तक अपनी सकारात्मक छाप छोड़ते हैं। जहाँ श्रेष्ठ संस्कार होते हैं वहाँ प्रेम, करुणा, अनुशासन, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान का वातावरण स्वतः निर्मित हो जाता है। संस्कारित व्यक्ति अपने आचरण से समाज में सद्भाव और प्रेरणा का संचार करता है। वह केवल अपने हित की नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण की भी सोचता है। संस्कार ही वह आधारशिला हैं जिन पर आदर्श परिवार, सशक्त समाज और महान राष्ट्र का निर्माण होता है।इन पंक्तियों का वास्तविक संदेश यह है कि यदि मनुष्य अपने चरित्र को उच्च बनाए और अपने संस्कारों को जीवित रखे, तो जीवन में किसी भी प्रकार का अंधकार स्थायी नहीं रह सकता। चरित्र मनुष्य को भीतर से सशक्त बनाता है, जबकि संस्कार उसे मानवीय मूल्यों से जोड़कर जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं। आज के भौतिकवादी और प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जब नैतिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है, तब ऐसी प्रेरणादायक पंक्तियाँ समाज को पुनः सत्य, नैतिकता और मानवीय चेतना की ओर अग्रसर करने का कार्य करती हैं। यह विचार केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि मानवता, सामाजिक समरसता और सभ्य समाज निर्माण का सशक्त आधार है, जो प्रत्येक व्यक्ति को आत्ममंथन कर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू)-जम्मू और कश्मीर
यह दोनों वाक्य जीवन-दर्शन को बहुत सरल लेकिन गहरे अर्थ में समझाते हैं।“जहाँ चरित्र है वहाँ प्रभु है” — इसका आशय है कि चरित्र ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। ईश्वर को किसी मूर्ति या स्थान में ही नहीं, बल्कि शुद्ध आचरण, सत्यनिष्ठा और नैतिक जीवन में महसूस किया जा सकता है। जब व्यक्ति का चरित्र पवित्र होता है, तब उसका जीवन स्वयं ही दिव्यता के निकट पहुँच जाता है।“जहाँ संस्कार है वहाँ सबकुछ है” — संस्कार मनुष्य की जड़ें होते हैं। अच्छे संस्कार व्यक्ति को विनम्र, सहनशील, दयालु और जिम्मेदार बनाते हैं। धन, पद या ज्ञान सब कुछ हो सकता है, लेकिन बिना संस्कार के जीवन अधूरा और दिशाहीन हो जाता है। दोनों विचार मिलकर यह संदेश देते हैं कि बाहरी उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि भीतर की शुद्धता ही जीवन की वास्तविक पूँजी है। चरित्र और संस्कार ही व्यक्ति को समाज में सम्मान, स्थिरता और आत्मिक शांति प्रदान करते हैं। अंततः कहा जा सकता है कि जहाँ चरित्र और संस्कार हैं, वहीं वास्तव में मानवता और ईश्वरत्व दोनों का वास है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
चरित्र अच्छा है, प्रभु भी साथ देते है, अब यह कहावत बन कर रह गई है। जहां चरित्र है वहां प्रभु है, जहां संस्कार है वहां सब कुछ है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो अचरित्र बहुमुखी प्रतिभा का धनी बनते जा रहा है, जिन्हें संस्कार की आवश्यकता प्रतीत भी नहीं होती है। एक समय था, जब अच्छा चरित्र, संस्कार बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, फिर प्रभु के दर्शन होते थे, अच्छे संस्कार का लक्ष्य निर्धारित करने से सब कुछ प्राप्त करने के लिए जिज्ञासा मन में रहती थी......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके रूप, धन या पद में नहीं, बल्कि उसके चरित्र और संस्कारों में बसता है। चरित्र वह दीपक है, जो जीवन के अंधकार में भी मार्ग को प्रकाशित करता है। जिस व्यक्ति के भीतर सत्य, करुणा, ईमानदारी और संवेदना जीवित रहती है, वहां स्वयं प्रभु का वास हो जाता है।संस्कार मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी हैं। ये केवल परिवार की देन नहीं, बल्कि जीवन की दिशा हैं। अच्छे संस्कार व्यक्ति को विनम्रता, सम्मान, त्याग और मानवता का पाठ पढ़ाते हैं। धन और वैभव क्षणिक हो सकते हैं, पर संस्कार मनुष्य को हर परिस्थिति में ऊँचा बनाए रखते हैं।आज भौतिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य बहुत कुछ पा रहा है, पर भीतर से रिक्त होता जा रहा है। ऐसे समय में चरित्र और संस्कार ही वे आधार हैं, जो समाज को टूटने से बचाते हैं। जिस घर में संस्कार होते हैं, वहां प्रेम होता है, सम्मान होता है और आत्मीयता का उजास बना रहता है।वास्तव में, चरित्र मनुष्य को महान बनाता है और संस्कार उसके जीवन को पूर्णता प्रदान करते हैं। जहां चरित्र है, वहां ईश्वर की कृपा है; और जहां संस्कार हैं, वहां जीवन का हर सुख और हर समृद्धि स्वयं आ जाती है।
- अलका पांडेय
मुंबई - महाराष्ट्र
" मेरी दृष्टि में " भगवान राम का चरित्र ही भगवान यानी प्रभु का दर्जा दिलाता है। इसलिए जीवन में चरित्र ही सबकुछ होता है। फिलहाल जीवन में चरित्र से मुकाबला किया जाता है। चरित्र और संस्कार एक दूसरे के पूरक होते हैं। इन में बहुत कुछ समानता भी होती है।
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