मृणाल सेन की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
यह सच है कि बिना बात के या कुछ बातें नापसंद भी हों, तो दूसरे व्यक्ति को तन- मन से दुखी करना, हिंसा करना पाप माना जाता है। पाप ही क्या ; महापाप माना जाता है। हमारा भारतीय दर्शन तो सदैव सेवा, परोपकार दयालुता जैसे मानवीय देवत्व गुणों से परिपूरित है; ऐसे व्यवहार को ही जीवन में महत्व देता है। हां दूसरे को गलती से रोकने के लिए सचेत करना तथा सही दिशा देना जरूरी है। यह भी हो सकता है उसकी ओर से आपको दुख देना आपके प्रेम पूर्ण व्यवहार से बदल जाए; तब तो उसमें सकारात्मक परिवर्तन करदेना ,उसकी असहाय , जरूरतमंद स्थिति में आपकी दी हुई खुशियां आपको भी क्या, समाज में परिवर्तन की बयार बहने लगे तो आपका दूसरे के प्रति सहायतार्थ प्रसन्नता बांटना सर्वोत्तम दान की श्रेणी में गिना जाता है क्योंकि निस्वार्थ भाव से तो दूजे की मदद करना रोते को हंसा देना, किसी के जीने का सहारा बन जाना सच्चा पुण्यात्मक दान है। हमारे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी तो दूसरों के लिए निस्वार्थ, त्यागपूर्ण जीवन को सच्ची मानवता मानते थे। उनकी पंक्ति सदैव सदैव प्रेरणास्पद रहेगी- "मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे"।
- डाॅ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
*दूसरों को दुखी करना महा पाप है* यह कथन हमारी भारतीय संस्कृति नैतिकता और मानवता का मूल आधार है। अपने स्वार्थवश, क्रोध या मनोरंजन के लिए किसी अन्य जीव (मनुष्य, पशु- पक्षी, जीव- जंतु) को मानसिक शारीरिक या भावनात्मक कष्ट पहुंचाना, पीड़ा देना, मन दुखाना या इस प्रकार के विचार लाना सबसे बड़ा पाप कहलाता है। दूसरों को दुखी करने की प्रवृत्ति घृणा एवं अहंकार से उपजती है, इसीलिए अहंकार को वश में रखकर प्रेम की प्रवृत्ति की ओर सदा अग्रसर रहना चाहिए। सभी जीवो में परमात्मा का अंश है, दूसरों को दूख देने का अर्थ स्वयं के भीतर बैठे ईश्वर को दुख पहुंचाने के समान है। इसीलिए कहा गया है कि दूसरों को दुखी करना महा पाप है, यह न केवल पीड़ित को आहत करता है बल्कि करने वाले की आत्मा को भी मलिन करता है।जिसने जीवन में दुख झेला है वह इस बात को जल्दी समझ सकता है। इसलिए जीवन में परोपकार और प्रेम को स्थान दें जीवन को बेहतर बनाएं। *दूसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान है*किसी भी जीव के दुखों को दूर करना, उनकी सहायता करना, उन्हें सुख पहुंचाना पुण्य का कार्य कहा गया है। यह कार्य निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म है, जो अहंकार मिटाकर मानसिक शांति, जीवन का सच्चा आनंद और सकारात्मकता लाता है। खुशी देना सर्वोत्तम दान है यह दान धन और वस्तुओं के दान से बढ़कर है क्योंकि मुस्कान और प्रेम बांटने से आत्मा तृप्त होती है।
- रविंद्र जैन रूपम
जिला धार - मध्य प्रदेश
दूसरों को दुखी करना केवल एक व्यवहार नहीं अपितु मानवता के विरुद्ध किया गया आघात है। जब हम किसी को कटु वचन, अपमान, छल या उपेक्षा से पीड़ा पहुँचाते हैं तब उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि हमारे शास्त्रों और संतों ने दूसरों को कष्ट देना “महापाप” कहा है। इसके विपरीत किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना, दुख में सहारा बनना, मधुर वचन बोलना, सहायता करना या किसी निराश व्यक्ति में आशा जगाना यह सबसे बड़ा दान माना गया है। धन का दान हर कोई नहीं कर सकता परंतु प्रेम, सम्मान, संवेदना और खुशी बाँटना हर व्यक्ति के वश में है। सच्चा मनुष्य वही है जो अपने व्यवहार से दूसरों के जीवन में प्रकाश भर दे। एक मधुर शब्द टूटे मन को जोड़ सकता है, एक छोटी सहायता किसी का जीवन बदल सकती है और एक सच्ची मुस्कान किसी के अंधकार को दूर कर सकती है। इसलिए हमें सदैव यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे कारण किसी की आँखों में आँसू नहीं, बल्कि मुस्कान आए। मानवता का सबसे सुंदर रूप यही है- “दूसरों के दुःख को कम करना और खुशियों को बढ़ाना।”
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ अर्थात महर्षि व्यासजी ने अठारह पुराणों में दो ही बातें प्रमुखता से कही हैं।परोपकार,दूसरों की भलाई करना, पुण्य है और परपीडनम्,दूसरों को पीड़ा या दुःख देना,पाप है। बहुत प्रसिद्ध दोहा है कबीरदास का - दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।मुई खाल की सांस से, लोह भसम हो जाय॥ अर्थात कबीर दास जी कहते हैं कि किसी कमजोर को कष्ट मत दो, क्योंकि उनकी आह बहुत घातक होती है। जैसे मरे हुए जानवर की खाल से बनी धौंकनी से निर्जीव हवा निकलने पर भी कठोर लोहा जलकर भस्म हो जाता है, वैसे ही एक बेबस व्यक्ति की आह शक्तिशाली इंसान को नष्ट कर सकती है। इसलिए किसी को सताना महापाप ही माना गया है।यह मनसा,वाचा,कर्मणा कैसे भी हो सकता है। अब बात करते हैं खुशियां देने की,यानि सर्वोत्तम दान की,तो खुशियां देने के लिए धन आदि से अधिक आवश्यकता है स्वयं को यह देने के लिए तैयार करना। इसके लिए अहं का त्याग करना ही चाहिए। मन,कर्म,वचन से खुशी देना ही चाहिए। इसके लिए हम किसी की मदद करके,किसी की समस्या का समाधान करके,किसी की बात सुनकर,किसी को शाबाशी देकर, प्रोत्साहित करके,किसी की पोस्ट पर सकारात्मक आशीर्वाद देकर खुशियां दान कर सकते हैं। कहा जाता है कि दान हजार गुना बढ़कर मिलता है।तो छोड़िए दिल दुखाना और बटिए खुशियां।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
मनुष्य का जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। यदि हमारे शब्द, व्यवहार और कर्म किसी के हृदय को पीड़ा पहुँचाते हैं, तो वह केवल एक भूल नहीं बल्कि एक प्रकार का महापाप बन जाता है। उसी प्रकार यदि हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाए, किसी निराश व्यक्ति को आशा मिल जाए, किसी दुखी मन को सहारा मिल जाए, तो उससे बड़ा दान संसार में कोई नहीं। धन का दान हर व्यक्ति नहीं कर सकता, परंतु मधुर वचन, संवेदना, सम्मान और प्रेम का दान हर कोई दे सकता है। कई बार एक कठोर शब्द मनुष्य को भीतर तक तोड़ देता है। अपमान, तिरस्कार और कटु व्यवहार ऐसे घाव देते हैं जो वर्षों तक नहीं भरते। इसलिए कहा गया है कि वाणी में मिठास और व्यवहार में करुणा होनी चाहिए। आज का समय भौतिकता और प्रतिस्पर्धा का समय है। लोग सफलता पाने की दौड़ में अनजाने में दूसरों को चोट पहुँचा देते हैं। कोई अपने अहंकार से किसी को छोटा दिखाता है, कोई ईर्ष्या में किसी का मन दुखाता है, तो कोई क्रोध में संबंधों को तोड़ देता है। लेकिन यह भूल जाते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका चरित्र और उसका व्यवहार होता है। दूसरों को खुशी देना केवल वस्तुएँ बाँटना नहीं है। एक थके हुए व्यक्ति को सहानुभूति देना, निराश व्यक्ति को उत्साह देना, अकेले व्यक्ति को साथ देना, रोते हुए को सांत्वना देना—यही सच्चा दान है। यह दान जितना दूसरे को सुख देता है, उतनी ही शांति हमारे अपने मन को भी देता है।महापुरुषों ने हमेशा प्रेम, दया और करुणा का संदेश दिया। महात्मा गांधी ने कहा था कि मनुष्य की महानता उसके सेवा भाव में होती है। वहीं गौतम बुद्ध ने करुणा को जीवन का सबसे बड़ा धर्म माना। वास्तव में, जिस हृदय में दूसरों के लिए संवेदना होती है, वही सच्चे अर्थों में मानव कहलाने योग्य होता है।हमें यह समझना चाहिए कि संसार में दुख पहले ही बहुत हैं। यदि हम किसी के जीवन में थोड़ा सा प्रकाश भर सकें, तो यही सबसे बड़ी मानवता होगी। एक मुस्कान, एक स्नेहिल शब्द, एक छोटा सा सहयोग किसी के अंधकारमय जीवन में दीपक बन सकता है।अतः हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए जिसमें हमारे कारण किसी की आँखों में आँसू नहीं, बल्कि मुस्कान आए। क्योंकि दूसरों को दुख देना वास्तव में महापाप है और दूसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान। यही मानव जीवन की सच्ची साधना और सबसे बड़ा धर्म है।
- डॉ. अलका पांडेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
यह परखी हुई बात है कि दुसरों के चेहरों पर मुस्कान लाना, किसी की सहायता करना या अपने व्यवहार से किसी को शांति पहुँचाना और खुशी प्रदान करना महापुण्य समझा जाता है इसलिए सेवा, करूणा, सहानुभुति ही मानवता का सर्वोच्च धर्म है क्योंकि जैसा हम अपने लिए सुख और सम्मान चाहते हैं वैसा ही दुसरों के लिए सोचना चाहिए, यही अहिंसा, दया और परोपकार का मार्ग है और यही सर्वोत्तम दान भी जबकि दुसरों को दुखी करना महापाप में आता है, तो आईये आज की चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि दुसरों को दुखी करना महापाप है और दुसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान है, मेरा मानना है कि यह कथन भारतीय संस्कृति में मानवता और नैतिकता का मूल अधार है, देखा जाए जब हम अपने स्वार्थ, क्रोध और ईर्ष्या के कारण किसी को मानसिक,शारीरिक या भावनात्मक कष्ट देते हैं तो इसे महापाप कहा जाता है, किसी की आत्मा को दुखाना सबसे बड़ा अपराध माना जाता है, क्योंकि आत्मा ही परमात्मा है कहने का भाव ईश्वर हरेक की आत्मा के भीतर बैठा है वो हरेक जीव के भीतर निवास करते हैं इसलिए दुसरों को दुखी करना महापाप में आता है लेकिन जब हम निस्वार्थ भाव से किसी की मदद करते हैं किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं या किसी के काम आते हैं तो वो महादान कहलाता है क्योंकि जब दुसरों को खुशी मिलती तो हमारी अंतरआत्मा को भी महान शांति अनुभव होती है जिससे हमारी आत्मा ही नहीं बल्कि परम+आत्मा यानि परमात्मा को भी संतुष्टि मिलती है इसलिए किसी को सुखी रखना महादान गिना जाता है, मेरे ख्याल में यह एक बहुत नेक और साकारात्मक विचार है कि दुसरों को दुख न देना और उन्हें खुशी देना यह न केवल मानवीय धर्म है बल्कि खुद को भी मानसिक शांति और आत्मसंतुष्टि प्रदान करना है इसलिए इंसान को दुसरों की भावनाओं, विचारों व अधिकारों का सम्मान करना चाहिए ताकि किसी के मन में किसी भी भांति की ठेस न पहुंचे, आखिरकार यही कहुँगा कि किसी को दुखी करना या खुशी देना मनुष्य के कर्मों, व्यवहार और विचारों का प्रतिफल है जबकि सुख देना दुसरों के प्रति प्रेम, सहानुभुति और निस्वार्थ सेवा है जिसका आशिर्वाद व नेक फल अवश्य मिलता है तथा यह महादान की श्रेणी में आता है जबकि दुखी करना या दुख देना क्रूरता, मानसिक कष्ट पहुँचाना, शारीरिक दुख देना इत्यादि पाप कर्म में आता है जिससे बदुआएँ और नकारात्मकता मिलती है तथा अशांति, अकेलापन और कर्मों का नकारात्मक फल मिलता है जिससे व्यक्ति का पतन संभव है इसलिए मनुष्य योनियों में आकर हम सभी को चाहिए कि कम से कम इंसानियत को जिंदा रखें और किसी भी जीव जन्तु को दुख न पहुँचा कर सुखी रखने का प्रयास करें यही मानवता है और इसी में सभी की भलाई है अपितु जैसी करनी होगी वैसा ही फल अवश्य भौगना पड़ेगा, इसलिए किसी को दुख देने से पहले सोच लेना चाहिए कि उसके आँसू आपके लिए सजा बन सकते हैं और ऐसी खुशी को हमेशा त्याग देना चाहिए जो दुसरों के दुख का कारण हो।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
दूसरों को दुखी करना महापाप है, दूसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान है..... यह बहुत ही सच्ची और अच्छी बात कही है। जब हम दूसरे को अथवा किसी व्यक्ति को अपने व्यवहार से, अपने कटु शब्दों के बाण से अथवा अपने स्वार्थ से दुखी करते हैं तो वह मन से बुरी तरह टूट जाता है किंतु साथ ही कहीं ना कहीं हमारी मानवता भी मर जाती है अथवा यूं कहें कमजोर पड़ जाती है। इसलिए किसी को दुख देना बहुत बड़ा पाप होता है। धन की भरपाई तो हम कर सकते हैं किंतु मन का घाव जल्दी नहीं भरता लंबे समय तक पीड़ा देता है। वहीं जब हम दूसरों को खुशी दे उसके चेहरे पर मुस्कान देखते हैं तो आत्मा को एक शांति मिलती है। खुशी केवल कपड़े , अनाज, रूपयों से ही नहीं दी जाती,बल्कि किसी भी तरह से दी जा सकती है जैसे:- किसी की होंठों की मुस्कान बनकर, मीठे बोल बोलके, निराश व्यक्ति में आशा जगाकर, सच्चा साथी बनकर, उसके दुख में साथ खड़े रहकर हम उसे खुशी दे सकते हैं । जिस खुशी को पाकर व्यक्ति दिल से खुश होता है, उसकी आत्मा को तृप्ति मिलती है। वह खुशी क्षणिक नहीं आत्मा को खुशी देने वाली खुशी होती है इससे उत्तम कोई दान नहीं है।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
सुख-दुख जीवन के हिस्से होते हैं और कर्म और भाग्य का प्रतिफल होते हैं। ऐसा मानना आध्यात्म है,जीवन दर्शन है। यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है कि सुख-दुख के कारक क्या है॔? कौन हैं? और क्यों हैं? अनेक बार ऐसा भी होता है कि औरों की नाकामी, लालच,मोह, स्वार्थ, लापरवाही अज्ञानता आदि की वजह से भी हमें सुख-दुख मिल जाते हैं। अनेक बार ऐसा भी होता है कि स्वयं की नाकामी, लालच, स्वार्थ, मोह, लापरवाही अज्ञानता आदि की वजह से भी हमें ही सुख-दुख मिल जाते हैं। कुलमिलाकर यह जीवन का गणित है। जो स्वभावगत तो है ही, स्वभाविक भी है। अत: कारण कोई भी हो। हमें सुख यानी खुशी के आनंद को भी समझना चाहिए और दुख की पीड़ा को भी। दोनों विपरीत मन: स्थितियां हैं। इसमें सुख के पल जितने मखमली होते हैं दुख के पल उतने ही व्यथित और बोझिल होते हैं। इस संदर्भ में सार यही है कि हम दूसरों को खुशी देने वाले कारक बनें। दुखी करने वाले कारक तो कभी न बनें। कदापि न बनें। क्योंकि खुशी में दुआ और दुखी में बद्दुआ निकलती है जो कारक के हिस्से में भाग्य के रूप में मिलती है। यानी परिणाम स्पष्ट है। सुख देने के एवज में दुआ यानी सौभाग्य और दुखी करने के एवज में बद्दुआ यानी दुर्भाग्य।इसीलिए कहा गया है कि " दूसरों को दु:खी करना महा पाप है। दूसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान है। "
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
हमारा जीवन सुख दुःख का मिश्रण है, कभी सुख तो कभी दुख। यदि दुख न हो तो सुख की महत्ता नही उसकी गहरी अनुभूति नही। सुख न हो तो जीवन में निराशा, विपत्ति, कलेश हर समय बना रहता है ,जीवन पाप से भरा लगता है, अर्थहीन और खिन्न लगता है। इसीलिए दूसरों को दुख देना महापाप माना गया है,क्योंकि यदि कोई व्यक्ति हमारी वजह से दुख झेल रहा है तो उसकी अंतरात्मा हमें कोसती है, बददुआ लगती है और फिर हमें भी दुख झेलना पड़ता है। दूसरों को दुख देना, नीचा दिखाना, अपमान करना सबसे बड़ा पाप है। जिसकी सजा भी अवश्य मिलती है। अतः दूसरों को सुख देना ही वास्तव में जीवन जीने का सही आशय है। जीवन की सार्थकता है। जीवन में मानवता का होना विशेष गुण है। मानव होते हुए दूसरों के प्रति प्रेम, आत्मीयता का भाव होना चाहिए। पर उपकारी भावना श्रेष्ठ भावना है। सर्वोत्तम दान की श्रेणी में आता है। क्योंकि दूसरों के मुख पर मुस्कान लाकर हमें आत्म-शान्ति, आत्म-संतुष्टी मिलती है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
जीवन दो नाव पर चलता है, जब हम खुश रहना चाहते है, दूसरों को तकलीफ होने लगती है। दूसरों को दु:ख करना महा पाप है, दूसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान है। वास्तविक पहचान इस तरह से बनती है। किसी-किसी का आदतन रोग रहता है, जब तक दूसरों को दु:खी नहीं करेगें, तब तक उनका खाना हजम नहीं होता है, लेकिन यह कटु सत्य है, जो दूसरों का बुरा करता जाता है, उसका अन्त भी अत्यन्त बुरा होता है। दूसरों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खुशी -सहयोग प्रदान करना उत्कृष्ट महा दान होता है। लेकिन इन्हें समझाये कौन, इनकी मानसिकता दूसरों को दु:ख पहुंचानें के लिए बनी हुई और इनका जन्म भी इसीलिए हुआ है.....।
-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
ये उसी तरह है सेवा ही धर्म है पर इसे मानते कितने लोग है मतलब किसी को जान-बूझकर दुख देना, अपमान करना, धोखा देना या तकलीफ पहुंचाना सबसे बड़ा पाप माना जाता है। इससे न सिर्फ सामने वाले का मन दुखता है, बल्कि आपके अपने मन की शांति भी चली जाती है। कर्म का फल तो लौटकर आता ही है। दूसरों को खुशी देना सर्वोत्तम दान है मतलब: किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना, मदद करना, सहारा बनना - ये सबसे बड़ा और पवित्र दान है। धन का दान तो एक बार का होता है, लेकिन खुशी का दान दिल में हमेशा याद रहता है जीवन का सार बस इतना है - किसी का बुरा मत करो, और जितना हो सके उतना दूसरों के काम आओ। यही सच्चा धर्म और सच्ची इंसानियत है। जिसे दिल से निभाता हूँ ! हो पापी मन क्या तू लेकर आया है क्या लेके जाएगा । डेरा तेरा यू ही रह जाएगा छोटी सी दुनिया तेरी छोटी तेरी ख़ुशियाँ जागते है सब यहाँ तू देखता रह जाएगा बुझते दीये की रोशनी में सारा जीवन अर्पण कर जाएगा भक्ति मय संसार में शक्ति मन की माया। दो पल की खुशियाँ दो पल का ये साथ है दूसरो को खुश देखना ही संबल साहस का काम है ! जगाते सब यहाँ सोता रह जाएगा ! माया मन की छाया है काया मन विश्वास है दूसरों को खुश देख खुश होता है
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
मृणाल सेन की स्मृति में प्रस्तुत यह विचार मानवीय नैतिकता के दो सरल किन्तु गहरे सूत्रों को सामने रखता है क्योंकि दूसरों को दुख पहुँचाना अवांछनीय है और दूसरों के जीवन में सुख जोड़ना एक श्रेष्ठ मानवीय कर्म है। मेरी दृष्टि में इसे और व्यापक रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है कि केवल “दुख न देना” ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के भीतर सक्रिय रूप से करुणा, सहयोग और संवेदनशीलता का वातावरण बनाना ही वास्तविक नैतिकता है। सुख देना केवल भौतिक सहायता तक सीमित नहीं है बल्कि यह विचारों की शुद्धता, व्यवहार की नम्रता और संबंधों की सत्यनिष्ठा में भी प्रकट होता है। इसलिए मनुष्य की श्रेष्ठता किसी एक कर्म से नहीं, बल्कि उसके निरंतर आचरण से तय होती है—जहाँ वह न केवल दूसरों को हानि से बचाए, बल्कि अपने व्यवहार से जीवन को थोड़ा और सहज, मानवीय और न्यायपूर्ण बनाने का प्रयास करे।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
दुनिया का सर्वोत्तम सर्वोत्कृष्ट वाक्य है "दूसरों को दुख देना महापाप है" बचपन से लेकर उम्र के हर पड़ाव पर यही सुनते-सुनते हम बड़े होते हैं और यह वाक्य हृदय पर खुद जाता है। चलिये यह तो हमारे हाथ मे हे कि हम दूसरों को दुख ना दें लेकिन दूसरों को खुशी देना ये सर्वोत्तम दान हमारे हाथ में नहीं होता है। आज का दौर विडंबनाओं और कष्टों का दौर है। हर इंसान जीवन की दौड़ में शामिल है। बच्चों का बचपन "होमवर्क कांपीटिशन ग्रेडिंग रिजल्ट्स" की घुड़ दौड में प्रताड़ित है। फिर तथाकथित दूसरों को खुशी कैसे दें जब हम अपनों को ही खुशी नहीं दे पा रहे हैं। दूसरी एक और अहम् बात यह भी कि खुशी के मायने बदल गये हैं, किसी को खाने-पीने में खुशी मिलती है तो किसी को नाचने गाने में। हर किसी को हर समय खुश और संतुष्ट रखना असंभव है।इसलिये दूसरों को दुख न देकर इस महापाप से बचा जा सकता हैं लेकिन दूसरों को खुशी देना हम सामान्य इंसानों के लिये असंभव नहीं मगर कठिन अवश्य है। आजकल की भागदौड भरी जिंदगी में "क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा" वाली सनक हर इंसान के भीतर मानसिक स्थिति के रूप में पनप रही है। खुद से नाराज़ हर इंसान न जाने किससे क्यों कब नाराज हो जाये पता ही नहीं चलता। बच्चों में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से पनप रही है। उनके मन की थाह पाना कठिन होता जा रहा है। खैर - - इन सब के पार यह पारलौकिक सत्य है कि हमें प्रयत्नशील रहना होगा। मानवता की दिशा में अपनी मानसिकता को रखना होगा तभी हम समाज के सच्चे नागरिक और वसुधैव कुटुम्बकम वाली माँ भारती के सच्चे सेवक सच्चे सपूत कहलायेंगे।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
" मेरी दृष्टि में " दुःख और खुशी। एक ही नदी के दो किनारे है। जो आपस मे कभी नही मिलने है। जो वास्तव में एक ही होते हैं। यही सुख - दुःख का खेल है। जो जीवन की वास्तविकता की स्थिति को प्रकट करता है। यही कर्म है यही भाग्य है। बाकी कुछ नहीं है।
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