कालीप्रसन्ना सिंघा स्मृति सम्मान - 2026

       ये तो स्पष्ट है कि भाग्य से ही कर्म बनता है। कर्म से भाग्य बनता है। ये पृथ्वी की तरह गोल - गोल घुमाता है जिससे भाग्य और कर्म कहते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
       कर्म तो हर इंसान को करना पड़ता है कान किए बिना कुछ नहीं बनता और मनुष्य को अपना जीवन जीने के लिए संघर्ष तो करना पड़ता है। हर व्यक्ति को अपने जीवन में सामंजस्य बनाना पड़ता है मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी सामंजस स्थापित करते हैं और इसी के आधार पर संपूर्ण सृष्टि चलती है। माता-पिता और बुजुर्गों की इज्जत करना हमारा दायित्व है। पर यह बहुत सोचने का विचार है। क्या हम अपने बच्चों को बुजुर्गों की इज्जत कराना सिखाते हैं इस पैसे कमाने की होड़ में? बच्चों को शिक्षा धन कमाने की ना देकर संस्कार दें। क्योंकि अरस्तु ने भी कहा है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला उसकी मां होती है माही एक बच्चे को शिक्षा देती है बच्चा तो गीली मिट्टी होता है यदि मैं स्वार्थी ना होकर उससे सबके आदर भाव और इज्जत करना सिखाए तो उस बच्चे में भी गुणआएंगे।  कठिन परिस्थितियों में ही हम सही ढंग से काम करना सीखते हैं और बुरा वक्त ही मनुष्य को कुछ ना कुछ अच्छी बातें सिखाता है और हम किसी ना किसी बात का सहारा लेते हैं।इस समय हमने ज्यादा नई टेक्नोलॉजी का सहारा हम बड़े बूढ़े सभी लोग ले रहे हैं बच्चे से बहुत कुछ सीख रहे हैं लेकिन बच्चों को हमें बुजुर्गों की इज्जत कराना सिखाना चाहिए बहुत सारे बच्चे  अपने बुजुर्गों दादी नानी आसपास में रहने वाले वृद्धजनों की भी मदद कर रहे हैं। आपको बदली हुई परिस्थितियों के साथ बुद्धिमत्ता  से बिना शिथिल हुए स्वयं को समायोजित करना है ।आप स्वयं को अपने विचारों से नियंत्रित कर सकते हैं बुद्धि का उचित उपयोग आपको आनंद की प्राप्ति के लिए भीतर से ही दिव्य ज्ञान की उन्मुख  कर देता है। इसमें सभी के जीवन में बदलाव हुआ है और हम अपने आपको ज्यादा ध्यान देने लग गए हैं अपने घर परिवार का भी ध्यान देने लग गए जनमानस यह बात को अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि स्वास्थ्य ही सच्चा धन है जो लोग पैसे कमाने की होड़ में लगे थे उनको यह समझ में आ गया कि यदि यदि स्वास्तिक नारा तो सारा पैसा धरा का धरा रह जाएगा लोग योग अध्यात्म और आयुर्वेद ज्ञान को अपनाने लगे हैं।धीमी गति से तो  है पर सही दिशा में सकारात्मक कदम हमारे देशवासी सभी उठा रहे हैं और विदेशों में भी हमारा आयुर्वेद योगाभ्यास खानपान सात्विक रहन-सहन सभी लोग अपना रहे हैं जिससे उन्हें आत्म बल मिल रहा है। जनमानस में बदलाव धीमी गति से हो रहा है पर बदलाव अवश्य हो रहा है आप लोग सुरक्षा को अपनाने लगे हैं।इस बदलाव काल में लोगों ने अपने माता-पिता और बुजुर्गों का बहुत ध्यान रखा हैं। 

- उमा मिश्रा "प्रीति" 

 जबलपुर - मध्य प्रदेश 

          “भाग्य तो कर्म से बदलता है, संघर्ष से तो इंसान बदलता है”  उक्त कथन जीवन का गहन सत्य है, क्योंकि भाग्य कोई पूर्वलिखित स्थिर रेखा नहीं है बल्कि हमारे निरन्तर कर्म, निष्ठा और धैर्य का परिणाम है जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन दृढ़ संकल्प के साथ करता है, वह धीरे-धीरे परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेता है। परन्तु जब जीवन में बाधाएँ, अन्याय, असफलताएँ और अपमान सामने आते हैं, वहीं से वास्तविक संघर्ष प्रारम्भ होता है, और यही संघर्ष मनुष्य के भीतर छिपी शक्ति, आत्मसम्मान, विवेक और साहस को जागृत कर उसे साधारण से असाधारण बना देता है, जैसे सोना अग्नि में तपकर कुन्दन बनता है, वैसे ही मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में तपकर परिपक्व, संयमी और अनुभवी बनता है। इसलिए सकारात्मक और ज्वलंत उत्कृष्ट विचार यही है कि हमें भाग्य की प्रतीक्षा करने के स्थान पर कर्म को अपना धर्म और संघर्ष को अपनी साधना मानकर निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए। क्योंकि कर्म हमारे भविष्य को आकार देता है और संघर्ष हमारे व्यक्तित्व को महानता प्रदान करता है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

      यह सत्य है कि भाग्य कर्म से ही बदलता है क्योंकि कर्म बीज है और भाग्य फल।अच्छा भाग्य पाने के लिए मेहनत और लगन बहुत जरूरी है। हम जैसा कर्म करेंगे हमारा भाग्य भी वैसा ही बनेगा। भाग्य को कर्म की जरुरत है। बिना कर्म भाग्य नही चमकता। भाग्य कर्म के पीछे -पीछे चलता हुआ अपना वर्चस्व निर्माण करता है। बिना कर्म भाग्य के सहारे बैठ कर जीवन सफल नहीं मान सकते। वर्तमान में किये गये कर्म ही हमारा भाग्य बदलते हैं। कर्म बिना संघर्ष की परिभाषा नहीं। संघर्ष के परिणाम स्वरूप हमारा भाग्य संवरता है और इन्सान में बदलाव आता है। इससे व्यक्ति में मानसिक रूप से मजबूती आती है, धैर्य और साहस से व्यक्तित्व विकसित होता है। संघर्ष जितना बड़ा होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी। व्यक्ति हर मुश्किल परिस्थिति का डट कर सामना करके ,अपनी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा के बल आगे बढ़ना सीखता है। 

- शीला सिंह

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

      हम दिनभर जो करते हैं, वह कर्म है और इस कर्म में जो भाव निहित होता है,वह हमारा भाग्य निर्माता होता है। यदि हमारे कर्म में हमारे दायित्व निर्वहन का भाव है तो वह उत्तम भाव है, साथ ही इसके लिए जो कर्म किया जा रहा है, वह विशुद्ध है यानी इसके लिए छल,हिंसा,झूठ, फरेब नहीं किया जा रहा है तो यह कर्म अति उत्तम की श्रेणी का होगा। यह निश्चित ही हमारा सौभाग्य का पथ प्रशस्त करेगा। इसके विपरीत जब हमारे कर्म में झूठ,फरेब, हिंसा,छल जैसे दुर्गुण वाले भाव होंगे तो यह कर्म हमारे लिए दुर्भाग्य का निर्माण करेगा। साथ ही ऐसा भी है कि जब हमें अपने कर्म में परिश्रम करना पड़ता है, जोखिम उठाने पड़ते हैं, तकलीफ झेलने पड़ती है तब हम में संभलने या भटकने का रास्ता भी मिलता है, यानी इन्हीं परिस्थितियों में बदलाव की स्थिति भी तय होती है। यदि इन विषम परिस्थिति में धैर्य रखते हुए विचलित नहीं होते, हिम्मत नहीं हारते, गलत रास्ता नहीं अपनाते तब हमारे इस संघर्ष में हमारा बदलाव सकारात्मक पक्ष वाला होगा और यदि हम इस संघर्ष में धैर्य खो देते हैं, गलत रास्ता अपना लेते हैं, तब यह बदलाव नकारात्मक पक्ष का होता है।सार यही कि भाग्य तो कर्म से बदलता है और इंसान संघर्ष से।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा -  मध्यप्रदेश 

        मनुष्य जीवन सदैव तीन तत्वों के इर्द-गिर्द घूमता है — भाग्य, कर्म और संघर्ष। अक्सर लोग सफलता या असफलता का कारण भाग्य को मान लेते हैं, परंतु यह आधा सत्य है। भाग्य हमारे पूर्व कर्मों का परिणाम माना गया है। भारतीय दर्शन में, विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि मनुष्य को कर्म करने का अधिकार है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। अर्थात् भाग्य स्थिर नहीं है — वह हमारे वर्तमान कर्मों से प्रभावित होता है। यदि कर्म श्रेष्ठ होंगे तो भाग्य भी अनुकूल हो जाएगा। इसलिए कहा — “भाग्य से तो कर्म बदलता है” क्योंकि जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, अवसर मिलते हैं, तब मनुष्य अपने कर्म की दिशा बदल सकता है। संघर्ष वह अग्नि है जिसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व तपकर निखरता है।इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने संघर्ष को स्वीकार किया, वे साधारण से असाधारण बने। उदाहरण के लिए, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अत्यंत साधारण परिस्थितियों से उठकर भारत के राष्ट्रपति पद तक का सफर तय किया। यह केवल भाग्य नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष और परिश्रम का परिणाम था। इसलिए कहा — “संघर्ष से तो इंसान बदलता है” संघर्ष व्यक्ति की सोच, दृष्टिकोण और आत्मबल को बदल देता है।

-भाग्य अवसर देता है।

-कर्म दिशा देता है।

-संघर्ष पहचान देता है। जो व्यक्ति संघर्ष से भागता है, वह परिस्थितियों का दास बन जाता है। जो संघर्ष को स्वीकार करता है, वह परिस्थितियों का निर्माता बन जाता है। भाग्य प्रारंभ हो सकता है, पर परिवर्तन का वास्तविक साधन कर्म और संघर्ष ही हैं। संघर्ष ही वह सीढ़ी है जिस पर चढ़कर मनुष्य अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

भाग्य से कर्म बदलता है, और संघर्ष से इंसान बदलता है. कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है. जैसा कर्म करता है वैसा भाग्य बनता है. अच्छा कर्म करने से ही भाग्य बदलता है, बुरा कर्म करने से भी भाग्य बदलता है.अच्छा से अच्छा भाग्य बुरा से बुरा भाग्य. इसलिए कहते हैं भाग्य तो कर्म से बदलता है.   गरीब आदमी संघर्ष करके बदल सकता है. संघर्ष करते-करते वह एक दिन अमीर बन सकता है. इसीलिए कहा जाता है कि संघर्ष से इंसान बदलता है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश"

कलकत्ता - प. बंगाल 

कर्मों को सर्वोच्च स्थान इसलिए प्राप्त है क्योंकि कर्मों मैं भाग्य बनाने की व भाग्य बदलने की शक्ति होती है !! अपनी मेहनत से , अपने सतत प्रयासों से , अपने कठिन श्रम से , अप्राप्य को भी मनुष्य आसानी से प्राप्त कर लेता है व अपना भाग्य बदल लेता है !! संघर्ष के कारण एक आलसी व्यक्ति परिश्रमी बन जाता है , जीवन के महत्व को समझता है , व उसके जीवन मैं सकारात्मक बदलाव आता है , और वो अपने मूल स्वभाव को बदल लेता है !! संघर्ष मनुष्य के जीवन मैं एक ऐसा पड़ाव है , जिस से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखर आता है , व वह बदल जाता है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

     पृथ्वीराज पर विचरण करने वाले विभूतियों का भाग्य कर्मों से बनता है। भाग्य तो कर्म से बदलता है, संघर्ष से तो इंसान बदलता है। जीवन के परिदृश्य में सब पल-पल में बदता है। जितना आंधी-तूफान आता है, जड़े,पत्तियां,डाले पृथ्वी को हिला देती है, उसी प्रकार का उतना ही मानव जीवन भी होता है। जैसा संस्कार, भाग्य होगा, उतना ही कर्म बनते जाता है, हम भाग्य के भरोसे कर्म भी नहीं कर सकते है.....।

-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

     बालाघाट - मध्यप्रदेश

    यही सच है भाग्य को हम बदल सकते हैं अपने अच्छे कर्मों द्वारा। इसके बारे में हमारे शास्त्रों ने सिद्धांतत: माना है कि हमारे कर्म ही प्रधान है । कहां भी गया है कि "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ।जो जस करे सो तस फल चाखा।" वैसे भाग्य पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का ही परिणाम है। जो कि वर्तमान में सकारात्मक और सही दिशा में किए गए कर्मों से बदला भी जा सकता है । कभी-कभी विपरीत परिस्थितियों आती हैं जिससे व्यक्ति टूटने लगता है पर संघर्ष करते-करते वह धैर्य , लगन और समर्पण के साथ कड़ी मेहनत और संकल्प से सफल  सिद्ध हो जाता है   अतः विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष हमें जागरुक करता है  - उठो, रुको नहीं। "चरैवेति चरैवेति"  क्योंकि जीवन में कठिन रास्तों से तो सबको गुजरना ही पड़ता है । कठिनाइयां हमें बल प्रदान करती हैं कि हममें सामर्थ्य है। अतः भाग्य को हम स्वयं बदल सकते हैं और जीवन को कर्म पथ पर चलते-चलते सफल बना सकते हैं।  कविवर हरिऔध जी ने भी कहा है-

" देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं ।

रह भरोसे से भाग्य के जो भोग पछताते नहीं।

 काम कितना ही कठिन हो किंतु उकताते नहीं ।

हो गए एक आन में उनके बुरे दिन भी भले।

 सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।।"

अत: भाग्य, कर्म, संघर्ष से ही इन्सान का जीवन बदलता है।

 - डाॅ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

।         सकल पदार्थ हैं जग माहीं कर्महीन  नर पावत नाहीं रामचरितमानस की यह चौपाई यही दर्शाती है कि इस संसार में सुख सुविधाओं और सफल होने के सभी साधन मौजूद हैं लेकिन आलसी या कर्महीन व्यक्ति उनको हासिल नहीं कर  सकता  जिसका मतलब है कि कर्म  से ही हम सब कुछ हासिल कर सकते हैं  इसके साथ अगर संघर्ष को भी जोड़ दिया जाए तो सोने पे सुहागे का काम होगा कहने का भाव कर्म  से हम भाग्य को बदल सकते हैं लेकिन संघर्ष से तो इंसान भी बदल जाता है   तो आईये आज इसी पर चर्चा करते हैं कि भाग्य तो कर्म से बदलता है  लेकिन संघर्ष से तो इंसान बदलता है, मेरे ख्याल में मेहनत, लगन और सही दिशा में किये गए  प्रयास ही हमारी किस्मत को आकार देते हैं जिससे भाग्य में चार चांद लग सकते हैं क्योंकि सही दिशा में किया गया कार्य ही आने वाले कल को सफल बनाता है इसलिए अच्छे कर्मों से ही बेहतर फल को पाया जा सकता है, कर्म के मुताबिक ही भाग्य बनता है यही संसार का नियम कहता है  क्योंकि मेहनत से ही किस्मत बदलती है हां भाग्य से  अवसर मिल सकते हैं लेकिन कर्म से उन्हें सफलता में बदला जा सकता है,  दुसरी तरफ अगर संघर्ष की बात करें तो संघर्ष निश्चित रूप से इंसान को बदलता है तथा इंसान को अधिक मजबूत, धैर्यवान व अनुभवी बनाकर उसकी कमजोरियों को दूर  करके सफलता तक पहुँचा देता है, क्योंकि संघर्ष से ही आंतरिक शक्ति का विकास होता है, अन्त में यही कहुंगा कि कर्म से ही भाग्य को बदला जा सकता है और संघर्ष समय के हाथ का हथौड़ा है जो पत्थर को  भी मूर्ति का आकार दे सकता है इसलिए कर्म जारी रखना ही सच्ची सफलता है, कहने का भाव कर्म और संघर्ष का जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, साकारात्मक कर्म समृद्धि लाते हैं और सही दिशा में किए संघर्ष व्यक्ति को निखार कर सफल बनाते हैं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

कर्म करे सो पाएंगे, जोगी भोगी आय। 

बडे भाग्य मानुष तन, इस दुनिया में पाय।।

निःसंदेह अच्छे कर्म से ही मानुष तन मिलता है। कोटि-कोटि कीट मकोडे प्राकृतिक जन्म के बाद इंसानी तन मिलता है। हम इंसान इस धरती के सबसे सौभाग्य शाली तत्व हैं जो पंचतत्वो से निर्मित होते हैं और पंचतत्वो में ही विलीन हो जाते है। "क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच तत्व यहु बनहु सरीरा" सच है "बड़े भाग मानुष तन पाया" इस मानुष तन की पूजा मेहनत और संघर्ष से ही संपन्न होती है। संघर्षों से लडकर ही इंसान अपनी मंज़िलें पाता है। बैठे ठाले रोटी मुंह में नहीं आती। बडे संघर्षों से कमानी पडती है तात्पर्य यही कि भाग्य के भरोसे नहीं बैठे - - - कर्म करें कर्म के संघर्ष से ही भाग्य बदलता है और इंसान बनता है।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र

            लक्ष्य निर्धारित करके सही दिशा में चलकर कर्म के द्वारा भाग्य बदल सकता है और बदलता भी है बशर्ते नियति भी साथ दे। संघर्ष से इंसान बदलता है मगर परिस्थिति अनुरूप। कई बार सफल होता है और कई बार असफल भी।बहुत लोगों का तो जीवन ही संघर्ष करते निकल जाता है और उसी के अनुसार उनके जीवन में परिवर्तन होता है। हां एक बात तो है मगर संघर्षों से लड़ते इंसान कभी तो फौलादी बनता है और कभी विद्रोही भी अर्थात इंसान बदलता है। 

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " संघर्ष ही सबकुछ है। बिना संघर्ष के जीवन की कल्पना नहीं होती है। संघर्ष से ही जीवन शुरू होता है। और संघर्ष पर ही जीवन खत्म होता है। यानि मौत से सामना होता है। संघर्ष की यही कुछ परिभाषा हो सकती है।

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)




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