यह प्रकृति का सरल नियम होते हुए भी गहन जीवन-दर्शन समेटे हुए है। एक छोटा सा बीज अपने भीतर विशाल वृक्ष बनने की संभावना छिपाए रहता है। उचित भूमि, जल, प्रकाश और समय मिलने पर वही बीज छाया देने वाला, फल देने वाला और जीवन को पोषित करने वाला वृक्ष बन जाता है। इसी प्रकार फूल अपनी सुगंध और सौंदर्य से आकर्षित करता है, पर उसका अंतिम उद्देश्य फल में परिवर्तित होना है, जो पोषण और निरंतरता का प्रतीक है। यह क्रम हमें सिखाता है कि हर आरंभ छोटा होता है, पर निरंतर परिश्रम, धैर्य और सही दिशा से वह महान परिणाम में बदल सकता है। मनुष्य के भीतर भी संस्कार रूपी बीज होते हैं, जो सही वातावरण में विकसित होकर चरित्र रूपी वृक्ष बनते हैं और कर्म रूपी फल के रूप में समाज को सुख व उपयोगिता प्रदान करते हैं। अतः प्रकृति का यह संदेश हमें धैर्य, साधना और सार्थकता का महत्व समझाता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
बीज में ही सारा झाड़ छिपा है. एक छोटे से बीज में ही पेड़ पौधा फल फूल सब कुछ छिपा है. बीज से वृक्ष बनता है फिर उसमें फूल आता है और तब उसमें फल लगता है. वट वृक्ष कितना बड़ा होता है पर उसका बीज सबसे छोटा होता है. उसी तरह आत्मा भी अदृश्य होती है पर उसके अंदर पूरा जीवन छुपा हुआ है. सारे कर्म अकर्म पाप पुण्य सभी उसी के अनुसार होता है. और जबतक ये सृष्टि रहेगी तबतक ये क्रम चलता रहेगा. बीज से वृक्ष और फूल से फल बनता रहेगा.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
प्रकृति का अनोखा चक्र है कि एक छोटे-से बीज से वृक्ष बनता है, ठीक उसी तरह जैसे एक बूंद से मनुष्य बनता है. वृक्ष बनने के लिए बीज को टूटना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है. एक बार पौधा बन गया तो वह बढ़ता-बढ़ता वृक्ष बन जाता है और फिर फिर फलता-फूलता है. पहले फूल बनता है, फिर फूल से फल बनता है. फिर फल के बीजों से वृक्ष बनता है. प्रकृति का यह अनूठा चक्र चलता ही रहता है इसलिए सृष्टि में प्राणी और वृक्ष बनते रहने से सृष्टि फलती-फूलती रहती है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
“बीज से वृक्ष बनता है, फूल से फल बनता है” उक्त कथन मात्र प्रकृति की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि जीवन और चिन्तन का गहन दर्शन है, जो यह सिखाता है कि प्रत्येक महान उपलब्धि की शुरुआत एक छोटे, सच्चे और सकारात्मक संकल्प से होती है। बीज जब धरती में डाला जाता है तो वह तुरन्त फल नहीं देता, उसे अन्धकार, नमी, धूप और समय की परीक्षा से गुजरना पड़ता है, तभी वह एक सशक्त वृक्ष बनकर समाज को छाया, प्राणवायु और फल प्रदान करता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य के विचार जब संघर्ष, अनुशासन और धैर्य के साथ कर्म में ढलते हैं, तब उसका व्यक्तित्व स्थिर, परिपक्व और उपयोगी बनता है। फूल केवल सौंदर्य या सुगन्ध तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि वह त्याग और उद्देश्य का प्रतीक बन जाता है। क्योंकि वही आगे चलकर फल के निर्माण का आधार बनता है। इसी प्रकार उच्च आदर्श, नैतिक मूल्य और सकारात्मक सोच तभी सार्थक होते हैं जब वे समाज और राष्ट्र के हित में परिणाम देने वाले कर्मों में परिवर्तित हों। अतः जीवन का संदेश स्पष्ट है कि हमें निराशा के स्थान पर आशा का बीज बोना चाहिए, कर्तव्य और सत्य से उसे सींचना चाहिए तथा संघर्ष को बोझ नहीं बल्कि विकास की प्रक्रिया मानकर स्वीकार करना चाहिए, ताकि हमारे विचार और कर्म अन्ततः लोककल्याण, न्याय और राष्ट्रहित के फल के रूप में प्रकट हों।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
प्रकृति का यह शाश्वत नियम है और यह सत्य है। यह नियम हम मनुष्यों पर भी लागू होता है इसका अर्थ हमें इस तरह भी समझ सकते हैं कि हमें मेहनत करनी रहना चाहिए। हम जीवन के हर मोड़ पर परीक्षा देते हैं हम सदियों से यह सुनते आ रहे हैं कि मेहनत का फल मीठा होता है पर जब हम किसी कार्य को करने के लिए दिन रात एक करते हैं और उसका फल मिलता है तब हमें यह कहावत समझ में आती है। एक बच्चा को परीक्षा में सफल होने के लिए इतनी मेहनत करनी चाहिए जितनी कि एक व्यक्ति जब समुद्र में डूबता है तो अपने बचने के लिए वह हाथ पैर चारों तरफ मारता है कि किसी तरह मेरा जीवन बच जाए ,यदि वह इतनी मेहनत करेगा तो उसे जरुर सफलता मिलेगी। वह जो चाहेगा उस मुकाम को हासिल कर सकेगा। कार्य व उसका परिणाम परस्पर रूप से जुड़े होते हैं उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि एक ही वस्तु के दो पहलू होते हैं कोई भी व्यक्ति अपने कार्य उत्तरदायित्व से पलायन नहीं कर सकता। जैसा बीज बोएगा वैसा ही उसे फल प्राप्त होगा यह जीवन का एक शाश्वत सच है ।दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि" जैसी करनी वैसी भरनी।" उदाहरण के लिए रावण ने सीता का अपहरण किया तथा उसे अपमानित भी किया परिणाम स्वरूप उसका सर्वनाश हो गया उसकी सारी धन-संपत्ति ,ज्ञान ,पराक्रम, विशाल परिवार, सेना धरी की धरी रह गई। अच्छे कार्य के अच्छे परिणाम होते हैं तथा बुरे कार्य का पूरा परिणाम होता है यह प्रकृति का नियम है। इसका कोई अपवाद नहीं हो सकता अतः हमेशा अच्छे शुभ और कल्याण कार्यों में लगना चाहिए बुरे कार्यों से बचना चाहिए। हमारे कर्मों का फल हमें जरूर मिलता है अतः एकाधिक बार किसी दुष्ट व्यक्ति को फलते फूलते देख कर कोई गलत धारणा तो बना सकता है, परंतु यह ज्यादा समय के लिए नहीं टिकती है। आम में बौर उगने के तुरंत बाद फल नहीं लगते।
जो तोही कांटा बोए,
ताही वोय तू फूल।
तोको फूल के फूल हैं,
वाको है तिरसूल।।
- उमा मिश्रा प्रीति
जबलपुर - मध्य प्रदेश
बीज से वृक्ष बनता है और फूल से फल बनता है। फिर फल से बीज बनता है। यही है जीवन चक्र और सृष्टि के विकास का क्रम। छोटा सा बीज जिसमें छिपा होता है पूरा जीवन चक्र और अगली पीढ़ी के निर्माण का बीज। यह बीज मात्र किसी पौधे का ही नहीं, यहां बीज शब्द का व्यापक अर्थ है जिसके अंतर्गत शब्द,भाव,विचार,भाषा,आदत,जीवन शैली, संस्कृति,धर्म, साहित्य आदि सबकुछ समाहित है। यह बीज समयानुसार अनुकूल परिस्थितियां पाकर अंकुरित होते, पौधा बनते,वृक्ष बनते,उन पर कली,फूल,फल बनते और फल से फिर बीज बनते हैं। जीवन के साथ साथ मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विकास का यही क्रम है। बीज का सरंक्षण और शुद्धता आगामी पीढ़ी के निर्माण और सुखद भविष्य लिए बहुत ही आवश्यक होती है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
जैसे बीज से वृक्ष और फूल से फल बनता है, वैसे ही अच्छे विचार और सत्कर्म से व्यक्तित्व और जीवन का विकास होता है। हर बड़ी उपलब्धि की शुरुआत एक छोटे कारण से होती है। जैसे बीज में विशाल वृक्ष बनने की संभावना छिपी होती है और फूल ही आगे चलकर फल का रूप लेता है, उसी प्रकार मनुष्य के छोटे-छोटे प्रयास, अच्छे विचार और सत्कर्म ही उसके व्यक्तित्व और जीवन को महान बनाते हैं। यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि किसी भी कार्य का परिणाम पाने के लिए धैर्य, निरंतर प्रयास और सही दिशा में किए गए कर्म आवश्यक हैं। जीवन में सफलता और विकास भी धीरे-धीरे ही प्राप्त होते हैं।
- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'
मुंबई - महाराष्ट्र
जीवन के परिदृश्य में बीज का अत्यधिक महत्व है। जब तक बीज और बीच न हो उत्पत्ति सम्भव नहीं है। प्रकृति और प्राकृतिक से ही संसार है। बीज से वृक्ष बनता है, फूल से फल बनता है। वास्तविक रूप से अलौकिक कृतित्व है। जिस तरह से मानवीय जीवन प्रसंग है, उसी तरह से फूल से अलंकृत होते.है, सुन्दरता का अवलोकन करना, वृक्ष पर बैठकर अपने मूल तत्व का महत्व बताना है.....।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
बीज से वृक्ष बनता है --जीवन में सुख -सौभाग्य, धन-वैभव, समृद्धि ,शक्ति, सफलता पाने की शुरुआत एक छोटे से प्रयास से भी सही दिशा की ओर अग्रसर होकर नियत उदेश्य को हासिल किया जा सकता है। यही प्रयास भविष्य में कामयाबियों का वृहद आकार धारण करके व्यक्ति को विश्व मानचित्र पर प्रसिद्धि प्रदान कर सभी के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन जाता है। इस वाक्य का मूल भाव भी यही है कि छोटा सा बीज रुपि प्रयास बड़ी सफल उम्मीदों का वृक्ष है। यह वृक्ष हमारी कड़ी मेहनत,लगातार कर्म, लगन,अथक श्रम का द्योतक है। 'फूल से फल बनता है '-मानव जीवन में फूल एक सुन्दर शुरुआत को दर्शाता है और फल उस शुरुआत के सफल, सोदेश्यपूर्ण तथा उपयोगी कर्म का परिणाम है। बिना(बीज) कर्म, बिना प्रयास ,बिना त्याग सफलता रुपि फल की आशा कैसे की जा सकती है। प्रकृति का नियम भी यही है मिट्टी के सानिध्य में आकर पानी, खाद, हवा और उचित देखभाल से बीज अंकुरित होता है। धीरे- धीरे वह बड़ा होकर पौधा या वृक्ष बनता है। शाखाओं पर सरसराती झूमती पत्तियों से असीम सौंदर्य झलकता है। नियत समय पर कलियाँ फिर फूल खिलते हैं और फिर फल लगते हैं। यही प्रक्रिया सफल मानव जीवन की है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
यह बात बिल्कुल सत्य है।हर प्राणी माँ के पेट के बाद शिशु ओर फिर युवा सब कुछ सिखता बढ़ता एक दिन मर्द बन जाता है । क्योंकि धैर्य रखने का फल ही मीठा होता है।समय से पहले जिस चीज को भी प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा या तो वह स्वादहीन होगा,या तो उसमें पूर्णता की आवश्यकता होगी। ऐसे विचारें कि बीज से वृक्ष बनता , पर उसे कोपल ,नन्हे पौधे के बाद वह वृक्ष रुप मे:प्रकट हो जाता, हमें तो उसका बीज धरती में बोना ही पड़ेगा,और निश्चित समय की प्रतीक्षा भी करनी ही पड़ेगी।हमे धैर्य से पालना होगा | जल देना खाद का ध्यान रखना | मौसम और सफाई का पूर्ण जानना जरुरी होता है |समय आने पर धैर्य वह कुंजी है जो मनुष्य को सफलता तो दिलाती ही है ,साथ ही सुखदायक जीवन बनाती है। बिना ध्यान लापरवाही से अक्सर जल्दबाजी मे सब खराब हो जाता है। कबीरदास जी लिखते--
धीरे धीरे रे मना, धीरे सबकुछ होय,
माली सीचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय !
हर फल समय आने पर ही होता है|
मेहनत का प़तीक्षा में मिला फल .मीठा होता है |
- रेखा मोहन
पटियाला - पंजाब
। यह बात बिल्कुल सत्य है।हर किसी प्राणी को धैर्यवान होना चाहिए। क्योंकि धैर्य रखने का फल ही मीठा होता है।समय से पहले जिस चीज को भी प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा या तो वह स्वादहीन होगा,या तो उसमें पूर्णता की आवश्यकता होगी। यदि हम विचारें कि यह वृक्ष हमारे पास होना चाहिए तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि वह वृक्ष स्वत:प्रकट हो जाएगा, हमें तो उसका बीज धरती में बोना ही पड़ेगा,और निश्चित समय की प्रतीक्षा भी करनी ही पड़ेगी।भगवान श्रीराम ने हर कदम पर हर मोड़ पर अपने धैर्य का परिचय दिया।धैर्य वह कुंजी है जो मनुष्य को सफलता तो दिलाती ही है ,साथ ही सुखदायक भी होती है। धैर्यपूर्वक किये गये कार्य कभी गलत नहीं हो सकते। जो गलत है वो अक्सर जल्दबाजी में ही होता है।चाहे वो निर्णय ही क्यों न हो। कबीरदास जी कहते हैं :-
धीरे धीरे रे मना, धीरे सबकुछ होय,
माली सीचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय !
बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते हैं:-
"जो धैर्य रख सकता है,वह अपनी मनचाही चीज़ पा सकता है।"
अंत में हम यह कह सकते हैं कि धैर्य आपको असफलताओं को स्वीकार करने और जीवन का अधिक आनंद लेने की क्षमता प्रदान करता है । एक कहावत है, "सब्र करने वालों को ही सफलता मिलती है।" धैर्य आपको दृढ़ रहने और अधिक सार्थक निर्णय लेने में सक्षम बनाता है, जिससे अक्सर बड़ी सफलता प्राप्त होती है।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
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