ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोये, औरन को शीतल करे खुद भी शीतल होये, देखा जाए मनुष्य की वाणी ही रिश्तों में मधुरता लाती है बशर्ते वाणी मधुर हो नहीं तो कटू वचन से तो गहरे गहरे रिश्ते टूट कर चकनाचूर हो जाते हैं तभी तो कहा है, मधुर वचन हैं ओषधि कटुक वचन हैं तीर श्रवण द्वारा सांचरे सारे शक्ल शरीर कहने का भाव जब हम मीठी आबाज से किसी को पुकारते हैं तो सुनने वाला धनी हो जाता है और जो कार्य नहीं भी करना हो उसे भी हंसते हंसते कर देता है वोही कार्य अगर हम डांट कर लेना चाहें तो उल्टा कार्य बिगड़ता हुआ नजर आऐगा तो आईये आज की चर्चा को आगे ले चलते हैं कि मधुरता से रिश्ते मजबूत होते हैं और मधुरता से कटुता दूर होती है मेरा मानना है कि कोमल शब्द क्रोध को शांत कर शत्रु को भी मित्र बना सकते हैं तथा रिश्तों में विश्वास बढाते हैं और नकारात्मकता को दूर कर समाज में एकता लाते हैं कहने का भाव मधुरता प्रेम और आदर जगाती है, और इससे रिश्ते जीवन भर टिकते हैं, इसके साथ साथ सौम्य संवाद एक दुसरे के प्रति समर्पण विश्वास और संबधों को प्रगाढ़ बनाता है, दुसरी तरफ मधुरता से कटुता दूर होती है, क्योंकि मधुर वाणी में अपार शक्ति होती है जो कटुता क्रोध और अंहकार को समाप्त कर रिश्तों में मिठास और शांति लाती है, अन्त में यही कहुंगा की मधुरता एक ऐसा गुण है जिससे रिश्ते ही नहीं बल्कि बैगाने भी अपने बन जाते हैं यह एक ऐसा गुण है जो हर कार्य को आसान बनाने में कामयाबी दिलाता है और क्रोध को शान्ति में तब्दील कर कटुता को दूर करता है इसलिए हमारे मन से भाव से कभी भी कड़वे शब्द नहीं निकलने चाहिए ताकि रिश्ते ही नहीं बैगाने भी अपने लगने लगें और भाईचारा हमेशा के लिए बना रहे जिससे हर घर, मौहल्लै व देश में एकता व अखंडता का भाईचारा बना रहे।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
मधुरता हर रिश्ते की आधारशिला है। यह केवल मीठे शब्द बोलने तक सीमित नहीं, बल्कि हृदय की कोमलता, व्यवहार की विनम्रता और भावों की सच्चाई का समन्वय है। जब संवाद में सौम्यता होती है, तो विश्वास स्वतः पनपता है और संबंध मजबूत बनते हैं। कटु वचन क्षणिक क्रोध में कहे जा सकते हैं, पर वे मन में दूरी और पीड़ा छोड़ जाते हैं; वहीं मधुर व्यवहार मन के घावों पर मरहम का काम करता है। मधुरता से मतभेद भी सहजता से सुलझाए जा सकते हैं, क्योंकि यह अहंकार को शांत कर समझ और संवेदना को आगे बढ़ाती है। परिवार, समाज और कार्यस्थल—हर जगह मधुर वाणी सौहार्द्र का वातावरण बनाती है। अतः कहा जा सकता है कि मधुरता केवल गुण नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो कटुता को पिघलाकर रिश्तों को स्थायित्व और स्नेह से भर देती है। मधुरता संबंधों की रक्षा-कवच है।यह कटु अनुभवों को भी संवाद के माध्यम से हल्का कर देती है।
जहाँ मधुरता है, वहाँ प्रेम है;
जहाँ प्रेम है, वहाँ स्थायित्व है
- डॉ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
मन स्नेहिल हो, मुख से शब्दों में मधुरता हो तो सामने वाला प्रभावित हो ही जाता है। नहीं तो मुख में राम हो, बगल में छूरी हो तो, इसे स्पष्टा वादी नहीं कहा जा सकता है। अवसर वादियों की झलकियाँ स्वयं ही समझ में आ ही जाती है। मधुरता से ही हर रिश्ते मजबूत होते हैं, मधुरता से तो कटूता भी दूर होती है। जीवन प्रसंग का यही रहस्यमय है। वास्तविकता का ही संवाद है। किसी के आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाकर, संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता है। जितना अच्छा शब्दों का बखान होगा। उतना ही दीर्घकालिक संग यथावत ही होगा.....।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
मधुरता एक ऐसी मिश्री की डली है जिसका उपयोग करके हर रिश्ता मजबूत होता है ! मधुर वाणी सबको प्रिय होती है , व इसका उपयोग कर , व्यक्ति वो बात भी आसानी से समझ जाता है , जिसे वह सुनना नहीं चाहता ! मधुरता बिगड़े संबंधों को सुधारने की शक्ति रखती है , व वैमनस्य के भाव को दूर कर सकती है !! मधुर वाणी का श्रवण कर , व्यक्ति वस्तुस्थिति को सुनता है , समझता है , व कई गलतफहमियां दूर होती हैं ! इसीलिए कहा गया है कि.....
ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोए,
ओरन को शीतल करे , आपहु शीतल होय !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
रिश्ता चाहे कोई भी हो, कैसा भी हो वह मधुरता से ही मजबूत होता है. कटुता से कोई भी रिश्ता चलने वाला नहीं. भले स्वयं कोई कटु बोलता हो पर वह भी चाहता है कि लोग उससे मधुरता रखें. रिश्ता चाहे माँ-बेटे का हो या पिता-पुत्र का हो या पति-पत्नी हो सभी रिश्ते मधुरता चाहते हैं या यों कहें रिश्ता तो मधुरता के आधार पर ही निर्भर करता है.मधुरता गैरों को भी अपना बना देती है. अगर किसी से कटुता है तो उसे दूर करने के लिए मधुरता का ही प्रयोग करना पड़ता है. एक छोटी सी उदाहरण से ही इस बात की सत्यता जान सकते हैं. जब हम कोई कड़वी चीज़ खाते हैं या मिर्ची खाते हैं और जब तीता लगता है तो तीतापन दूर करने के लिए कुछ मीठा खाना पड़ता है. इसलिए रिश्ता हो या व्यव्हार अच्छा रखने के लिए मधुरता की आवश्यकता होती है.
- दिनेश चन्द्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
स्वभाव और विचार में मधुरता, एक उत्तम गुण है जो सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। उसमें रिश्ता बनाए रखने की क्षमता होती है, जिससे हर रिश्ता मजबूत होता जाता है। कितना भी कटु स्वभाव का व्यक्ति हो अगर उसके साथ मधुरता से पेश आया जाए तो वह भी झुक जाता है। मन के अंदर की कटुता कम होने लगती है और धीरे-धीरे दूर भी हो जाती है। इसलिए सभी अपने संबंधों को बनाए रखने के लिए मधुरता अवश्य रखें।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
मधुरता से कटुता स्वाभाविक रुप से दूर होती है,और जब कटुता नहीं रहती तो संबंधों में । प्रगाढ़ता होगी ही।मधुर वचनों में पूरी दुनिया को अपना बनाने की शक्ति होती है। इस संबंध में यह दोहा बहुप्रचलित है -
कागा काको धन हरै, कोयल काको देत।
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेत।।
व्यक्ति अपने रूप-रंग, धन या ताकत से नहीं, बल्कि अपनी मधुर वाणी और व्यवहार से ही दूसरों के दिलों में जगह बना पाता है। मधुरता को हमारे यहां औषधि की संज्ञा दी गई है -
मधुर बचन है औषधि, कटुक बचन है तीर।
श्रवण द्वार है संचरै, साले सकल सरीर।।"
अर्थात मधुर वचन मीठी बोली, दवा जैसी होती है है, जो मन के दुखों को शांत करती है,जबकि कड़वे वचन तीर के समान होते हैं, जो चोट पहुँचाते हैं। कड़वे शब्द कानों के रास्ते शरीर में प्रवेश कर भीतर तक आहत करते हैं। इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
तुलसी मीठे वचन से, सुख उपजत चहुँ ओर।
वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर॥
मधुर वाणी से हर जगह सुख फैलता है, कठोर शब्दों से दूरी बढ़ती है, इसलिए कठोर वचनों का त्याग करते हुए,मीठे वचन ,मधुर और सुखकारी वचनों का ही प्रयोग करना चाहिए।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए। अपना शीतल करें, औरन को सुख होए।।
धीरे धीरे रे मन, धीरे सब कुछ होए।
माली सींचे सौ घड़ा ,ऋतु आए फल होए।।
कबीर दास जी के इस दोहे में विनम्रता के गुणों के बारे में कहा गया है कि वाणी ऐसी एक चीज है, जो तलवार से भी ज्यादा तेज है अगर किसी को एक बार गलत शब्द के दिए तो वह हम वापस नहीं ले सकते और संबंधों में हमेशा के लिए गांठ पड़ जाती है विनम्रता तो मनुष्य का कहना है विनम्र स्वभाव से सभी के दिल को जीता जा सकता है प्रेम से हम दुनिया को भी अपने वश में कर सकते हैं। जो सज्जन पुरुष या विनम्र व्यक्ति होते हैं उनका कहना है कि फलों से लदा हुआ वृक्ष विनम्रता के कारण ही झुका रहता है और अपने फल से सबको आनंदित करता है उसका काम सिर्फ देना ही रहता है लेना नहीं आशावादी व्यक्ति हमेशा विनम्र रहता है। थोथा चना धन-धन बसता है जिनके पास ज्ञान से परिपूर्ण नहीं होते वही मनुष्य ज्ञानी होने का ढोंग करते हैं और अपने गुणों के कारण ही समाज में अराजकता को फैलाते हैं अधजल गगरी छलकत जाए आदि मुहावरे हैं इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में विनम्रता लानी चाहिए विनम्रता से ही सज्जनता आती है रहीम दास जी के और कबीर दास जी के अन्य दोहों के माध्यम से समाज में हमें यह बात समझाई गई है कि वाणी को संयमित रखना चाहिए और तोलमोल कर बोलना चाहिए विनम्र व्यक्ति ही सर्वत्र पूजा जाता है।
- उमा मिश्रा प्रीति
जबलपुर - मध्य प्रदेश
मधुरता मात्र शब्दों की कोमलता नहीं, बल्कि आत्मा की परिपक्वता, चरित्र की उच्चता और व्यक्तित्व की आंतरिक गरिमा का सजीव प्रमाण है। यह वह सूक्ष्म शक्ति है जो मनुष्य को परिस्थितियों की कठोरता के बीच भी संतुलित, संयमित और सौम्य बनाए रखती है। जिस व्यक्ति के व्यवहार में मधुरता बसती है, वह विरोध को भी संवाद में परिवर्तित कर देता है, तनाव को समाधान में ढाल देता है और दूरी को निकटता का अवसर बना देता है। क्योंकि मधुरता हृदयों के बीच सेतु का कार्य करती है। कटुता क्षणिक आवेश से जन्म लेती है और सम्बन्धों में दरारें उत्पन्न करती है, जबकि मधुरता धैर्य, विवेक और विनम्रता से प्रस्फुटित होकर टूटे विश्वास को जोड़ती है, बिखरे मन को संबल देती है और आक्रोश की ज्वाला पर शीतलता का अमृत बरसाती है। यह किसी प्रकार की दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मबल की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। क्योंकि जो भीतर से दृढ़, आत्मविश्वासी और सत्यनिष्ठ होता है, वही कठोर परिस्थितियों में भी अपने शब्दों और व्यवहार को संतुलित रख पाता है। मधुर वाणी केवल कानों को प्रिय नहीं लगती, वह हृदय में स्थायी स्थान बना लेती है। वह अहंकार को पिघलाती है, संवाद के द्वार खोलती है और सहयोग की भावना को जन्म देती है। परिवार में मधुरता हो तो पीढ़ियों के बीच विश्वास और स्नेह की निरंतरता बनी रहती है; समाज में मधुरता हो तो मतभेद वैमनस्य में परिवर्तित नहीं होते, बल्कि विचार-विमर्श की स्वस्थ परम्परा विकसित होती है और राष्ट्र के जीवन में मधुरता हो तो विविधता के मध्य एकता का सूत्र और अधिक सुदृढ़ हो जाता है। मधुरता का अर्थ सत्य से समझौता करना नहीं, बल्कि सत्य को इस प्रकार प्रस्तुत करना है कि वह मार्गदर्शन दे, आघात एवं पीड़ा नहीं, प्रेरणा दे। यह मनुष्य को प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि चिंतनशील और न्यायपूर्ण बनाती है, उसे क्षणिक क्रोध से ऊपर उठाकर दीर्घकालिक सद्भाव की दिशा में अग्रसर करती है। जो व्यक्ति मधुरता को अपने विचार, वाणी और व्यवहार का स्थायी संस्कार बना लेता है, वह केवल अपने सम्बन्धों को सशक्त नहीं करता, बल्कि अपने परिवेश में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। क्योंकि मधुरता में समरसता की शक्ति, सहयोग की प्रेरणा, विश्वास की नींव और मानवता की वास्तविक विजय निहित है। अन्ततः वही व्यक्ति, वही समाज और वही राष्ट्र स्थायी रूप से सफल और सम्मानित होते हैं, जिनकी जीवन-दृष्टि में मधुरता, संयम, संवेदनशीलता और सद्भाव का समन्वय होता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर
मधुरता और उसके साथ विनम्रता हो तो सोने पे सुहागा। ये दोनों ही गुण रिश्तों को शक्तिशाली ही नहीं बनाते बल्कि रिश्तों के लिए संजीवनी भी बनते हैं। कैसी भी कितनी भी कड़वाहट हो मधुरता उन्हें समाप्त कर ही देती है। हाँ अपने इस गुण का अहंकार जिसमें आ जाता है या होता है तो बने-बनाये रिश्ते तक समाप्त हो जाते हैं। वाणी में मधुरता हो, विनम्रता हो और अहंकार का दूर-दूर तक कोई स्थान ना हो तभी रिश्ते शक्तिशाली बनते हैं, दीर्घ काल तक चलते हैं और कड़वाहट या कटुता वहाँ अपना स्थान नहीं बना पाती है।
- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून - उत्तराखंड
कहा भी गया है, " ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय। " मीठापन में मधुरता और मधुरता में मीठापन घुला हुआ है। ये ऐसे लुभावन भाव हैं कि इनके पाते ही मन हर्षित और पुलकित हो जाता है। मधुरता में ऐसी विशेषता होती है,इतना आकर्षण होता है कि सामने वाला खिंचा चला आता है। यह विश्वास पैदा ही नहीं करता, दृढ़ता भी प्रदान करता है। यही कारण होता है कि इसके प्रभाव में रिश्ते मजबूत होते हैं। मधुरता से सकारात्मकता का प्रसार होता है, इससे उत्साहवर्धन होता है। निराशा और हताशा दूर होती है। हिम्मत और हौसला जाग्रत होती है। जीने की ललक बढ़ती है। विकारों का क्षरण होता है। कटूता दूर होती है।संबंध प्रगाढ़ होते हैं। आत्मीयता बढ़ती है।सार यही कि जीवन की सरसता और व्यवहार में सौहार्द्रता के लिए मधुरता सबसे पवित्र और उत्तम माध्यम है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
मन की मधुरता से अभिप्राय विचारों की शुद्धता से है। मधुर विचार वाला व्यक्ति हमेशा विनम्र होगा एवं संतुलित विचारधारा रखेगा। कठोर से कठोर व्यक्ति भी उसके आगे झुक जाएगा जिससे रिश्ता प्रगाढ़ और स्थाई बनेगा।
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