लीला मजूमदार स्मृति चर्चा परिचर्चा
हमारी पृथ्वी की सम्पूर्ण संरचना पाँच तत्व यथा जल, थल, अग्नि, वायु, आकाश से मिलकर बनी है । इन्हीं तत्वों से मिलकर हमारी देह, मस्तिष्क यहां तक की हमारी सोच भी इन्हीं से बनी है। इस पृथ्वी से कभी कुछ नष्ट नहीं होता,बस रूप परिवर्तित होता है। इसलिए हमारी आवाज, हमारे कर्म और हमारी सोच भी भिन्न-भिन्न रूपों में ब्रह्मांड में स्थायी रूप से मौजूद रहते हैं। गलती की माफी तो मिल सकती है लेकिन जो गलत कर्म हुआ या अपराध हुआ ,उसको जड़ से पूर्णतः साफ तो स्वयं भगवान भी नहीं कर सकते। उस पाप का प्रतिफल भी किसी न किसी रूप में पृथ्वी पर मौजूद है। क्षमा करने से अपराध, जो हो चुका, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी खत्म नहीं कर सकता। इसलिए कह सकते हैं कि क्षमा माँगने से क्षमा मिलती है। परंतु क्षमा से अपराध नहीं मिटता।
- सुखमिला अग्रवाल ' भूमिजा '
मुंबई - महाराष्ट्र
कोई गलती करने पर क्षमा माँगी जाती है. जो देने वाले के ऊपर निर्भर करता है कि क्षमा देगा या नहीं. लेकिन अक्सर देखा जाता है कि क्षमा मिल ही जाता है. या देने वाले को देना पड़ता है. क्षमा न दे तो फिर करेगा क्या. बाध्य होकर देना पड़ता है. न चाहते हुए भी देना पड़ता है. क्षमा देने वाला हमेशा बड़ा होता है. क्षमा माँगना माने अपनी गलती स्वीकार करना. क्षमा देना माने उसकी गलती या अपराध को भूल जाना. क्षमा देने से कभी अपराध नहीं मिटता है. अपराध दंड देने से ही मिटता है. वैसे क्षमा अपराध रोकने की एक हल्की पद्धति हो सकती है लेकिन ये कारगर साबित नहीं हुई है. अपराध रोकने की पद्धति कड़ा से कड़ा दंड ही है. पृथ्वीराज मुहम्मदगोरी को 17 बार क्षमा कर चुके थे क्या उसका अपराध रुका? नहीं. इसलिए ये सत्य है कि क्षमा से अपराध नहीं मिटता.
- दिनेश चन्द्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
आमतौर पर लोगों का यह स्वभाव होता है कि कोई गलती हो जाने पर क्षमा मांग लेते हैं।कई बार क्षमा मिल जाती है और कई बार नहीं भी मिलती। सामाजिक जीवन में हम देखते हैं कि कई बार बहुत बड़े अपराध हो जाते हैं। जब बात उठने लगती है तब इंसान क्षमा मांगने लगते हैं। क्षमा मांगने से किया गया अपराध तो दूर नहीं होता। किसी बहन बेटी की इज्जत लुट जाए और बलात्कारी क्षमा मांग कर अलग हो जाए तो क्या यह उचित होगा? कदापि नहीं। असमर्थ इंसान दबाव वश भले ही क्षमा कर दे लेकिन उससे अपराध न तो कम होगा और न ही मिटेगा। क्षमा मिलना एक अलग बात है और अपराध करना एक अलग बात। दोनों में एक्य भाव संभव नहीं ।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
"क्षमा माँगने पर क्षमा मिलती है, पर क्षमा से अपराध नहीं मिटता” उक्त विचार मानव जीवन की नैतिक संरचना, आत्मिक चेतना और न्याय व्यवस्था के गहरे संबंध को स्पष्ट करता है। क्योंकि क्षमा व्यक्ति के भीतर संचित क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की अग्नि को शान्त कर सकती है, हृदय को हल्का कर सकती है और संबंधों को पुनर्जीवित कर सकती है, किन्तु वह घटित घटना के सत्य को समाप्त नहीं करती और न ही उसके दुष्परिणामों को स्वतः शून्य कर देती है। अपराध एक तथ्यात्मक, सामाजिक और कभी-कभी वैधानिक वास्तविकता है, जिसे केवल शब्दों से नहीं बल्कि स्वीकारोक्ति, सच्चे पश्चाताप, सुधारात्मक प्रयास और आवश्यक होने पर विधिक दायित्व निभाने से ही सन्तुलित किया जा सकता है। सच्ची क्षमा वही है जिसमें पीड़ित का हृदय उदार हो और अपराधी का अंतःकरण जागृत हो, जहाँ एक ओर करुणा हो, वहीं दूसरी ओर उत्तरदायित्व भी हो। यदि मात्र क्षमा हो और उत्तरदायित्व न हो तो व्यवस्था दुर्बल हो जाती है, और यदि केवल दंड हो तथा संवेदना न हो तो समाज कठोर और असंतुलित बन जाता है। अतः करुणा और न्याय का समन्वय ही वास्तविक नैतिकता है। क्योंकि क्षमा आत्मा को शुद्ध करती है, जबकि न्याय व्यवस्था को शुद्ध करता है। क्षमा व्यक्ति को ऊँचा उठाती है, जबकि दायित्व राष्ट्र की संस्थाओं को गरिमा प्रदान करता है। इसी सन्तुलन में आत्मसम्मान सुरक्षित रहता है, सामाजिक विश्वास दृढ़ होता है और संवैधानिक मूल्यों की प्रतिष्ठा बनी रहती है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
इस संसार में विभिन्न प्रवृत्तियों के लोग रहते हैं कुछ अपराध करने वाले हैं तब वहीं कुछ उदार प्रवृत्ति के लोग अपराध करने वालों को क्षमा कर देते हैं । अक्सर देखा जाता है कि कभी-कभी जब हम जानबूझकर गलती करते हैं या कोई अपराध करते हैं तो कभी ऐसा भी होता है कि दूसरा पक्ष रिश्तों को बनाए रखने के लिए या अहंकार से दूर सद्भाव बनाए रखने के निमित्त गलती करने वाले को क्षमा भी कर देता है ।उस पर क्रोध नहीं करता और ना ही उससे बदला लेने की सोचता है । इससे दोनों पक्षों का मानसिक शांति मिलती है और अपराध करने पर विराम भी लग जाता है क्योंकि क्षमा करने वाला अपराधी को सुधारने के लिए एक या दो बार प्रेम और सद्भाव बनाए रखने का अवसर प्रदान करने के लिए क्षमा कर देता है पर अपराधी इतना क्रूर होता है कि वह अपना स्वभाव नहीं छोड़ता और हमेशा एक के बाद दूसरा अपराध करता जाता है। अतः समाज से अपराध नहीं मिटता है। उसकी जन्मजात प्रवृत्ति उसको अपराधी ही बनाए रखती है। अंत होने पर ही वह अपने अपराधिक कर्म को साथ लेकर जाता है जिसे ईश्वर भी अपराधी मानकर उसे कर्मों की सजा अगले जन्म तक देता है। अतः क्षमा से अपराध नहीं मिटता है।
- डॉ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
मानव की पहचान क्षमादान करना सर्वोपरि होता है, जिसने वक्त की हकीकत को पहचान लिया, उसका जीवन सफल हो गया। क्षमा माँगने पर क्षमा मिलती है, क्षमा से अपराध नहीं मिटता है। बिल्कुल सत्य है। हम अपराध करने उपरान्त क्षमा माँगने का कोई औचित्य ही नजर नहीं आता है, जो घटित घटनाचक्र हो गया वापस नहीं आने वाला है, हमें सोच समझकर कदम उठाना चाहिए, ताकि आगे वाले का किसी भी तरह से नुकसान न हो.....।
-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
जब कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसे पता होता ही कि उसने अपराध किया है , और अपराध क्यों किया है ! कोई अपराध अंजाने मैं नहीं होता , अतः अपराध से होनेवाले नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती ! इसलिए जब व्यक्ति को स्वयं के अपराध पर पछतावा होता है , तौ वह आत्मग्लानि से परिपूर्ण होकर क्षमणमंगता है ! क्षमा मांगने से क्षमा तो मिल सकती है पर जान बूझकर किया गया अपराध , उसकी चोट, उसका दर्द , कम नहीं होते , न वह अपराध किसी भी कीट पर कम हो सकता है !! अपराध , अपराध द्वारा की गई हानि, उस तीर की तरह होते हैं जो कमान से निकलकर दोबारा लौटकर नहीं आता !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
क्षमा भी किसी दयालु व्यक्ति से सच्चे मन से मांगने पर मिलती है. हर कोई न तो क्षमा मांग सकता है, न हर कोई क्षमा कर सकता है. इससे रिश्तों में कड़वाहट कम हो सकती है. इसके बावजूद क्षमा से अपराध नहीं मिटता है, क्योंकि अपराध से जो हानि होनी थी, वह तो हो चुकी है. उसे निरस्त नहीं किया जा सकता. माफी मिलने का मतलब यह नहीं है कि जो गलत काम (अपराध/गलती) हुआ था, वह कभी हुआ ही नहीं. गलती के परिणाम भरोसा टूटना, नुकसान होना बने रह सकते हैं, भले ही उसे माफ कर दिया गया हो. इसलिए ही कहा गया है कि-
क्षमा मांगने पर क्षमा मिलती है
क्षमा से अपराध नहीं मिटता है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति -ऑस्ट्रेलिया
क्षमा माँगने पर क्षमा मिलती है मगर अपराध नही मिटता। अपराध अथवा गलती करने पर भले ही हम किसी को अपने अहंकार को त्याग कर और विनम्र स्वभाव को अपनाकर ,रिश्तों को सुधारने के लिए, क्षमा तो कर देते हैं लेकिन अपराध को नहीं मिटा सकते।क्षमा करने से मन को शांति अवश्य मिलती है पर हृदय में उस अपराध अथवा गलती के लिए भविष्य में टीस जरूर उठती रहती है। सही सुधार के लिए क्षमा के साथ साथ हमें अपने व्यवहार में भी बदलाव लाने की आवश्यकता होती है,ताकि उस अपराध के परिणाम स्वरूप पैदा हुए अविश्वास को भी मिटाया जाये। क्षमा से व्यक्ति को पुनः सुधार का अवसर मिलता है परन्तु बीते हुए कल की घटनाओं को मिटाया भी तो नहीं जा सकता। अतः अपराध चाहे कितना भी छोटा या बड़ा हो उसका प्रभाव क्षमा के पश्चात भी अवश्य रहता ही है। इसके अलावा क्षमा का अर्थ यह भी नहीं है कि गलत काम को सही ठहराया जा रहा है बल्कि यह आपसी रिश्तों, सम्बन्धों को दुबारा से सामान्य बनाने के लिए स्वंय के मन की शांति हेतु कोशिश कही जा सकती है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
क्षमा एक ऐसा गुण है जो मनुष्यता और नैतिकता का प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति गलती करता है और क्षमा माँगता है, तो समाज या पीड़ित पक्ष से उसे सहानुभूति और माफी मिलती है। परंतु, यह क्षमा अपराध के निष्कर्ष या परिणाम को नहीं मिटाती। अपराध के प्रभाव, पीड़ा और परिणाम अपनी वास्तविकता में मौजूद रहते हैं। क्षमा: मन की शांति, संबंध सुधार और सामाजिक सामंजस्य का माध्यम। अपराध: किसी की हानि, अन्याय या गलत कार्य, जिसका परिणाम पीड़ित पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है। उदाहरण: यदि कोई चोरी करता है और माफी माँगता है, तो चोरी का अपराध समाप्त नहीं होता; नुकसान और विश्वासघात बना रहता है। क्षमा देना समाज और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है। यह घृणा और बदले की भावना को कम करता है। परंतु अपराध के परिणामों से शिक्षा लेना और सुधार सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। केवल माफी से सकारात्मक परिणाम नहीं मिलते; जिम्मेदारी निभाना भी ज़रूरी है। अतः समाज और व्यक्ति दोनों को समझना चाहिए कि क्षमा देने और लेने से अपराध का प्रभाव समाप्त नहीं होता, पर यह संघर्ष को कम करने और सुधार की राह दिखाने में सहायक है।
सही शिक्षा और जिम्मेदारी निभाना आवश्यक है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
क्षमा करना और क्षमा दिल से करना और इसी तरह क्षमा मांगना और क्षमा दिल से मांगना, ये सभी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं। अलग-अलग मनोभाव हैं। जिनके प्रतिफल भी अलग-अलग होते हैं और होना भी चाहिए। दूसरा यह भी विशेष है कि जिस कारण के लिए क्षमा मांगी जा रही है। वह असल में क्षमा करने योग्य है भी या नहीं। क्योंकि क्षमा माँगना,क्षमा करना ये व्यक्तिगत पहलू हैं, जो ऐच्छिक हैं. ये न तो बाध्य हैं, न ही बाधक। इसका आधार में जो कारण होता है,वह अपराध की श्रेणी में ही आता है।भले ही अनजाने में हुआ हो या जानकर हुआ हो और यह भी सत्य है कि किया गया कृत्य, अपराध तो रहेगा ही, भले ही क्षमा ही क्यों न दे दी जाये। इस विषय में, सभी के अपने-अपने मत हो सकते हैं। मेरा मानना है कि यदि भूलवश हुआ है और अपराध साधारण है तो क्षमा मांगने पर क्षमा करना गलत नहीं होगा किंतु अपराध का स्वरूप असाधारण है, तब तो वह अपराध अक्षम्य ही होना चाहिए।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
"क्षमा बडे़न को चाहिए छोटन को अपराध " बचपन से पढते सुनते आ रहे हैं ये पंक्तियाँ कभी इनकी गहराईयों को जानने की कोशिश नहीं की। क्षमाशीलता ऐसा अद्भुत अद्वितीय अभिनंदनीय गुण है जो आसानी से नहीं मिलता। "मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना"मानवों स्वभाव के सामान्य पहलू होते हैं दो लोगों की राय सदा एक जैसी नहीं होती फिर क्षमाशीलता सब के भीतर कैसे हो सकती है। राम क्षमाशील वान थे लेकिन कृपा ने शिशुपाल को क्षमा नहीं किया--लेकिन वे भगवान थे। उन्हे प्रारब्ध का निर्वहन करना होता है। साधुवाद है ऐसे इंसानों को जिनके पास बदला लेने के अवसर होने के बावजूद वे क्षमा मांगने वाले को क्षमा कर देते हैं। लेकिन आज के दौर में क्षमाशीलता को कायरता मान लिया जाता है। क्षमादान अवगुण माना जाता है। सचमुच क्षमा के दौर में अपराध बढ जाते हैं। क्षमादान पाकर अपराध से तौबा कर लें इतने समझदार लोग आज के दौर में नहीं दिख पडते। आज का सामाजिक वातावरण फिल्म टीवी सीरियल - - - हर ओर अपराध को बढ़ावा देनेवाले तत्व बने हैं। इसलिये मेरे विचार से भी यही न्यायसंगत है कि अपराधी को दंड अवश्य मिलना चाहिए। "हम क्षमा शील हैं इस थोथे घमंड में न रहें बल्कि अपराध को मिटाने के लिए दंग की व्यवस्था का समर्थन करें - - यही आज के दौर की जरूरत है
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
" मेरी दृष्टि में " क्षमा का संबंध सीधे सीधे अपराध से होता है। परन्तु कुछ इंसान क्षमा को फैशन बना लेते हैं। बात - बात पर क्षमा मांगते हुए नज़र आते रहते हैं। यह क्षमा का मज़ाक़ नहीं तो क्या है ? इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए। बाकि तो कोई किसी पर बंदिश नहीं लगा सकता है। फिर भी समय बहुत बलवान होता है। क्या कुछ किस समय हो जाएं।
Comments
Post a Comment