पाठकों के बीच में नेतराम भारती की लघुकथाएं

       1. वेबसीरीज 

'सिड! देख उधर कुछ चल रहा है वहाँ? चल देखें?' 

'सिया! यार रोज़ देखता हूँ मैं इनके तमाशे l रोज़ साले कुछ न कुछ बहस करते रहते हैं l' 

'एनीवे, लेट्स सी यार!' सिया ने कहा l

'उफ्फ! यार तुम भी न..... . I' 

सिड बेमन- से उनकी बातें सुनने लगा l

प्रतिदिन की भांति मॉर्निंग वॉक और प्राणायाम का सत्र निपटाकर पार्क की मखमली हरी घास पर अपने-अपने आसनों पर बैठे दो अधेड़ व्यक्ति बहस में निमग्न थे l

'तुम्हें क्या लगता है शर्मा! ये जो आजकल ओटीटी नाम का सांस्कृतिक हमला युवापीढ़ी पर हो रहा है, उस पर सेंसरशिप लगनी चाहिए या नहीं?' 

'देख दिवाकर! परिवर्तन प्रकृति का नियम है l और समय की मांँग भी l आज इक्कीसवीं सदी में हम अठारहवीं शताब्दी के रहन-सहन, भाषा- बोली खानपान और मनोरंजन के साथ नहीं चल सकते l'

'लेकिन हम मलिन भाषा और मलिन दर्शन के साथ भी तो आगे नहीं बढ़ सकते न?' 

दिवाकर ने कहा l

'भाई! मेरा तो सीधा- सा मत है कि जिस प्रकार और जिस तेजी से युवा पीढ़ी पतन के गर्त में धंँसती जा रही है उसके लिए यही ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और  उनकी बेलगाम वेबसीरीज जिम्मेदार है l' 

शर्मा ने कहा l

'मतलब आप इन पर सेंसरशिप चाहते हैं?' 

'बिल्कुल, शत-प्रतिशत l' 

शर्मा ने कहा l 

'मैंने सुना है कि सरकार वेबसीरीज और ओटीटी पर सेंसरशिप ला रही है l' 

दिवाकर ने कहा l

'अगर ला रही है, तो अच्छी बात है l पर जल्दी लाए, कहीं ऐसा न हो कि टैक्स के लोभ में पानी सिर के ऊपर से बहने लगे l मत भूलो, आज हर युवा की जेब में स्मार्टफोन है l' 

'सही कह रहे हो शर्मा ! परिवार के साथ तो देख ही नहीं सकते इन वेबसीरीज को l' 

'पहली बात तो ध्यान से समझ लो दिवाकर! कि यह कोई सामुदायिक व्यूविंग का माध्यम नहीं है l मतलब पूरे परिवार के साथ आप नहीं देख सकते l इसे ज्यादातर अकेले में देखा जाता है l क्योंकि आप अनुमान नहीं लगा सकते कि कब कोई पात्र भद्दी गाली-गलौच करने लगेगा कब कोई नायिका या स्त्री पात्र निर्वस्त्र हो जाएगा l ' 

'मुझे लगता है आप एक ही आंँख से सभी को देख रहे हो दिवाकर! सारे प्रोग्राम सेक्स, गाली- गलौज, धर्म विशेष पर टिप्पणीमूलक ही नहीं होते बल्कि कुछ अच्छे भी होते हैं l' 

"हाँ हाँ मैंने कब कहा कि नहीं होते हैं l पर कितने प्रतिशत? 

'कहना क्या चाहते हो दिवाकर! '

मैं कहना चाहता हूँ कि जो भी भौंडापन है , अशिष्टता और असांस्कृतिक है, सब वहाँ परोसा जाता है l इसलिए सेंसरशिप बहुत जरूरी है l' 

'क्या एक लेखक- निर्देशक अपना कोई मत नहीं रख सकता है?' शर्मा ने कहा l

'क्यों नहीं? जरूर रख सकता है l पर क्या यही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाजायज फायदा नहीं उठा रहे हैं? ' दिवाकर ने कहा l

धीरे-धीरे आसपास के अन्य लोग भी इकट्ठा होने लगे उन्हें भी इस बहस में आनंद आने लगा था l

'सिया चल यार यहांँ से। दोनों साले सठियाए हुए बकवास कर रहे हैं l कह रहे हैं कि वेबसीरीज पर सेंसरशिप लगनी चाहिए l ऊहूँ साले ओल्ड पिग्स। '

कहकर सिड ने मुँह बिचका दिया l

'गॉड! व्आट द हैल! ये लोग क्या कह रहे हैं? अगर वेबसीरीज पर सेंसरशिप लग गई तो इन्हें देखने का मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा l ओपन कहने और देखने का जो मज़ा है, वो तो जाता रहेगा फिर l ये अंकल लोग, खाली- पीली में ओटीटी को भी दूरदर्शन बनाना चाहते हैं क्या? आई थिंक, इनका कुछ नहीं हो सकता सिड! ये तो खुद चलते - फिरते सेंसरशिप हैं l' 

सिया ने चिड़चिड़ाते हुए कहा l

'ओ कमऑन सिया! छोड़ इनको, चल आज तुझे एक ऐसी सीक्रेट जगह दिखाता हूँ जहांँ कोई नहीं आता-जाता एकदम सेफ़।' 

सिया के कान में फुसफुसाते हुए सिड ने उसकी कमर में हाथ डाला और उसे खींचते हुए दूर ले गया l ०००

   2. एक यूनिट इंसानिय

दोपहर का वक्त था। सड़क पर एक जोरदार टक्कर हुई। दिवाकर की कार एक अधेड़ व्यक्ति की कार से भिड़ गई। गाड़ी को हल्का नुकसान हुआ, लेकिन दिवाकर का गुस्सा बेकाबू हो गया।

"देख नहीं रहा था क्या? मेरी गाड़ी ठोक दी! पैसे निकालो — हर्जाना चाहिए!" दिवाकर चीखा।

" भाईसाहब! गलती मेरी नहीं है। आप मोबाइल पर थे… और आपने ही अचानक ब्रेक मारे। जिस कारण ...."

अधेड़ व्यक्ति ने शांत स्वर में कहा।

"बकवास बंद करो! पैसे दो वरना यहीं तमाशा कर दूंगा!" दिवाकर दांत पीसते हुए गरजा।

"मुझे कहीं अर्जेन्ट पहुँचना है। इसलिए ये पैसे दे रहा हूँ। वरना,

अगर मैं चाहूंँ तो तुम्हारी रैश ड्राइविंग की रिपोर्ट लिखवाकर अंदर करवा सकता हूँ।"

अधेड़ व्यक्ति ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

"बहुत देखे अंदर करवाने वाले। जल्दी से पैसे दो, मूड मत खराब करो।"

अधेड़ व्यक्ति को भी कहीं शीघ्र पहुँचना था, सो उसने लड़ने या पुलिस-वुलिस में वक़्त ज़ाया करने की अपेक्षा पैसे देना अधिक तर्कसंगत समझा और पैसे दे चला गया। पैसे लेकर दिवाकर भी अस्पताल भागा। माँ गंभीर हालत में भर्ती थीं। डॉक्टर ने कहा,

"सर्जरी जरूरी है, लेकिन पहले एक यूनिट खून चढ़ाना होगा।"

दिवाकर घबरा गया। खुद डोनेट नहीं कर सकता था — क्योंकि डायबिटिक था।

ब्लड बैंक ने तो स्पष्ट कह दिया था कि  "ब्लड रिप्लेसमेंट जरूरी है।"

वह दौड़ा दोस्तों, रिश्तेदारों के पास। कभी इसको फ़ोन मिलाया तो कभी उसको पर सभी व्यस्त, कोई समय पर नहीं मिल सका।

थक-हारकर वह अस्पताल की बेंच पर सिर थामकर बैठ गया।

तभी पीछे से आवाज आई 

"अगर खून की जरूरत है… तो मैं दिए देता हूँ।"

दिवाकर ने सिर उठाया वही अधेड़ व्यक्ति सामने खड़ा था।

दिवाकर (हैरान होकर):

"त…तुम?"

अधेड़ (धीरे से मुस्कुराकर):

"हाँ। मैं भी अपने भांजे के इलाज के लिए यहीं आया था। लेकिन जब तुम्हारी हालत देखी तो लगा इंसानियत की जरूरत ज़्यादा है।"

वो आगे बढ़ा और खून डोनेट किया।

सर्जरी सफल रही।

अस्पताल के गलियारे में दिवाकर की आँखें भर आईं।

"आपसे माफी माँगने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं… हो सके तो मुझे माफ कर दीजिए, मैं बहुत गलत था।" 

दिवाकर की आवाज़ भर्रा उठी।

"बेटा… जब एक यूनिट खून किसी की जान बचा सकता है,तो एक छोटी-सी माफ़ी एक इंसान को बड़ा बना सकती है।" 

अधेड़ व्यक्ति ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा 

दिवाकर अब जान गया था कुछ रिश्ते खून से नहीं, "इंसानियत से बनते हैं।" ०००

    3. पुरुषत्व पर प्रश्नचिह्न

"श्रीवास्तव जी बड़ी अजीब बात है, आदमी चेहरे पर कितने मुखोटे लगाता है l जिसे देखो वही एक मुखौटा लगाए घूम रहा है l" 

"क्या बात है पांडे जी! किसकी बात कर रहे हो?" 

"अरे अपने त्रिपाठी जी की l" 

"क्यों क्या हुआ त्रिपाठी जी को? भले आदमी हैं, प्रबुद्ध हैं, और जहांँ तक मैं समझता हूँ सबको उचित और सही ही सलाह देते हैं l" 

श्रीवास्तव ने कहा l

"अरे कल मैं इनके मोहल्ले की तरफ से गुजर रहा था तो सोचा, दुआ- सलाम ही करता चलूं l तो इनके घर पहुंँच गया l दरवाजा खुला देखा तो मै सीधे ही अंदर चला गया l अब क्या देखता हूंँ, कि त्रिपाठी साहब… भाभी जी के चरण दबा रहे हैं l मैं तो देखकर ही अचकचा गया l मुझे लगा कि वे भी मुझे देखकर सकपका जाएंगे परंतु असहज होना तो दूर, वे तो निर्लज्जों की भांति बस चरण दबाए जा रहे थे।"

" मतलब पैर दबा रहे थे! त्रिपाठी जी पत्नी के पैर दबा रहे थे?"

श्रीवास्तव ने 'पत्नी' शब्द पर जोर देते हुए पूछा। 

"जी हांँ! वह तो भाभी जी को ही लाज आ गयी वे ही जब उठने को हुईं, तो महाशय कहने लगे कि लेटे रहिए, अपना पांडे ही तो है l कोई गैर थोड़े ही है l ज्यादा सोच- विचार मत कीजिए l"

"क्या बात कर रहे हो पांडे जी!... त्रिपाठी जी पत्नी के पैर दबा रहे थे!" 

"चुप हो जाओ श्रीवास्तव! त्रिपाठी जी इधर ही आ रहे हैं। पांडेजी ने फुसफुसाते हुए कहा। 

"कहो भाई क्या विमर्श हो रहा है दोनों विद्वानों में? " त्रिपाठी जी ने बैठते हुए कहा। 

"कोई विशेष नहीं, बस आपकी ही चर्चा हो रही थी।" श्रीवास्तव ने सीधे-सीधे कहा। 

"मेरी! भई वाह! रिटायरमेंट के कगार पर पहुंँचने पर भी हमारे चर्चे हैं!" 

त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए कहा। 

"यह पांडे कह रहा है कि आप कल भाभीजी के चरण दबा रहे थे?" 

"अच्छा तो यह चर्चा है। हांँ यह बात तो सही है। क्यों कोई आपत्ति है क्या तुम्हें?" 

"आपत्ति तो कुछ नहीं पर आदमी को आदमी जैसे ही काम करना चाहिए त्रिपाठी जी! मतलब यह पैर-वैर दबाना… यह पुरुषों को शोभा नहीं देता l फिर मत भूलो, ज्यादा चरण दबाओगे तो एक दिन यही चरण वज्र बनकर सीने पर आघात कर देंगे l क्यों पांडेजी सही कहा ना? "

श्रीवास्तव ने पांडे जी की ओर प्रश्नसूचक मुद्रा में पूछा l

"हाँ, हाँ, और नहीं तो क्या !"

"अच्छा श्रीवास्तव! एक काम करो, एक सूची बनाकर दो मुझे कि फलां काम पुरुष का है और फलां काम स्त्री का है।" 

त्रिपाठी ने कहा। 

"हम कहां से बनाएं सूची? और हमें क्या पड़ी है? और फिर हमें क्या पता कि कौन-से काम स्त्री के हैं और कौन-से पुरुष के हैं l"

पांडेजी ने कहा l

"इंटरनेट, गूगल की सहायता ले लो, आजकल तो सबकुछ उपलब्ध है वहां l" 

"अरे हमें क्या जरूरत है लिस्ट-विस्ट बनाने की। हम क्यों बनाएं?" 

भाई श्रीवास्तव! तुम ही तो बता रहे थे अभी कि यह काम आदमी का है यह औरत का है l अच्छा एक बात बता श्रीवास्तव! , तूने कभी अपनी मांँ के पैर दबाए हैं?"

" हांँ बिल्कुल! बल्कि मैं तो अपने बेटे को भी यही शिक्षा देता हूंँ।" 

श्रीवास्तव ने गर्व से कहा l

"कभी अपनी बेटी के या बहन के पैर दबाए हैं? 

"हांँ हांँ, क्यों नहीं, जब वे छोटी थीं, बीमार थीं, तो कई दफा मैंने दोनों के पैर दबाए हैं l और वह इसलिए ताकि उनको आराम पहुंँचे।" 

"तो ऐसा करके कभी अपराधबोध या हीनता की भावना तुम्हारे भीतर आई?"

त्रिपाठी जी ने पूछा। 

"नहीं, ऐसा क्यों महसूस होगा?" 

"अच्छा, एक बात और बताओ श्रीवास्तव! त्तुम दुनिया में सबसे ज्यादा प्रेम किससे करते हो? " 

"अपनी मांँ से, अपने बच्चों से, पिता से, परिवार से…" 

"और पत्नी से?"

त्रिपाठी जी ने बात काटते हुए पूछा l

"हांँ पत्नी से भी प्रेम करता हूँ।" 

"तो इन सबके लिए तुम क्या कर सकते हो?"

"क्या कर सकता हूँ? कुछ भी कर सकता हूंँ मतलब सबकुछ कर सकता हूँ।"

"तो फिर भेद कहांँ है श्रीवास्तव! फिर ये आश्चर्य क्यों?"मत भूलना, एक माँ तुम्हारे जीवन में सारी भूमिका निभा सकती है परंतु वो तुम्हारी पत्नी नहीं बन सकती l परंतु एक पत्नी वक़्त पड़ने पर तुम्हारे लिए माँ-सदृश वात्सल्य भी लुटा सकती है l 

त्रिपाठी जी ने हंँसते हुए पूछा। ०००

       4. संघर्ष का अंत 

आईसीयू के बाहर खड़े दिवाकर के चेहरे पर मुर्दिनी-सी छाई हुई थी ।  दिल जोरो से धड़क रहा था और आंँखें रह-रह कर आईसीयू के मुख्य द्वार की ओर जा उठती थी ।  दिवाकर की आंँखों के कोनों से आंँसू की बूँदें ढुलक रही थी । उसके कानों में मांँ के स्वर गूंँजने लगे.. 'किस्मत में जो बदा है, वह तो होकर ही रहेगा बेटा! पर तू सोच- समझकर और इन बच्चों की ओर देखकर ही कोई फैसला लेना ।'

'मैं क्या करूंँ, माँ ! दर-दर का मोहताज हो गया हूंँ आज मैं, दाने-दाने को तरसने की नौबत आ गई है…।'

उसके होंठ बुदबुदा उठे ।

तभी आईसीयू का मुख्य द्वार खुला । डॉक्टर बक्शी बाहर निकले । 

'मैं फिर कहता हूंँ एक बार फिर सोच लो… उम्मीद पर ही यह दुनिया टिकी है । मेरा अनुभव कहता है कि कुछ चमत्कार हो सकता है और चमत्कार हुए भी हैं ।'

'चमत्कार!...(रूखे चेहरे पर व्यंगात्मक रूखी मुस्कान के साथ ) पिछले एक महीने से इसी 'चमत्कार' की आस में हमारी कार चली गई डॉक्टर साहब!  हमारे गांँव की जमीन चली गई इसी चमत्कार की आस में, सारी जमा पूंँजी, माँ-पत्नी के जेवर- जट्टे सब लील गया यह चमत्कार,  अब और किसी 'चमत्कार' को देखने की हिम्मत नहीं बची है मुझमें ।'

'मैं फिर कहूंँगा कि पैसा तो फिर भी आ जाएगा पर यदि इंसान एक बार…..

दिवाकर की आंँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी । उसने हाथ से न का इशारा किया ।

'................ओके, सिस्टर!  इनसे फॉर्म्स पर सिग्नेचर ले लो और बेड नंबर 118 का सपोर्ट सिस्टम हटा दो ।'

डॉक्टर के वाक्य के साथ ही दिवाकर की धड़कनें असामान्य हो गई । चेहरा पसीने से तर हो उठा । सिस्टर ने एक नजर उसकी और देखा फिर सिर झुकाए हुए ही उससे सिग्नेचर लिए और वेंटिलेटर से सपोर्ट सिस्टम को बंद करने चली गई । आईसीयू के ऑटोमेटिक गेट के बंद होने की 'खट' की आवाज़ दिवाकर को यूँ प्रतिध्वनित हुई मानो किसी ने पूरी ताकत से उसके सीने में हथोड़ा दे मारा हो l उसका हलक सूखने लगा । उसकी निर्निमेश नज़रें गेट पर जाके टिक गयीं । गला थूक सटकने लगा और जिसकी आशा थी वही हुआ I कुछ देर बाद नर्स ने आकर उससे कहा ।

'.सॉरी !.... आपके पिता…. 

दिवाकर ने एक दीर्घ निःश्वास भरी और वहीं दीवार से सटकर बैठ गया । उसकी आंँखें मुँद गई । उसे दिखाई दिया कि वह जिस डूबती- डगमगाती नाव में बैठा था उसमें पल-पल बड़े होते जा रहे छिद्र अब रुकने लगे हैं l ०००

5. वह अब भी हमारे साथ है

रसोई में चूल्हा जल रहा था, लेकिन घर का माहौल बुझा-बुझा सा था।

दीवारों पर जैसे सन्नाटा पसरा था, जैसे कोई अपना चुपचाप विदा लेने की तैयारी में हो।

मांँ चुप थीं। पापा खिड़की से बाहर एकटक देख रहे थे। दादी की आँखों में हल्का-सा सूजन था और आर्यन की किताबें खुली थीं, लेकिन उसके पन्ने हवा में उलट-पुलट रहे थे बिना पढ़े।

“तुम बताओ अब क्या करें?” दिवाकर ने अंततः चुप्पी तोड़ी।

“फिर वही बात”  रश्मि का स्वर धीमा था, मगर भीगा हुआ। उसकी नज़रें उसी पुराने फाइबर शेड पर जा टिकीं, जहां वह बरसों से ठहरी हुई थी। धूप-बरसात से बेखबर, हर सुबह अपने ढंग से आवाज़ देती थी, जैसे घर की नींद तोड़ रही हो।

“पर क्या यह फैसला ठीक रहेगा?” दादी ने पूछा। “इतने साल हमारे साथ बिताए हैं उसने सर्दी, गर्मी, बरसात, आंधी, ओले सब हमारे साथ ही तो झेले हैं उसने।”

“जानता हूंँ माँ,” दिवाकर ने ठंडी सांँस ली, “उसके बिना बहुत कुछ अधूरा-अधूरा सा लगेगा लेकिन अब उसकी उम्र हो चुकी है। कब तक टालते रहेंगे? कानून आखिर कानून है। उसे जाना ही होगा माँ।”

दादी की आँखों में कुछ धुंधलाया।

“बेटा, यह कौन तय करता है कि किसी का साथ कितने दिन चलेगा? क्या रिश्ता किसी गिनती या समय सीमा का मोहताज होता है? सरकार किसी की उम्र तय करने वाली होती कौन है? चार दिन की पहचान से तो जानवर भी अपने लगने लगते हैं फिर यह तो बरसों से हमारे साथ है। पंद्रह साल कोई कम वक्त नहीं होता!”

“याद है, जब मुझे पहली बार दिल का दौरा पड़ा था?” दादी की आँखें चमक उठीं, “कैसे मुझे लेकर अंधाधुंध अस्पताल दौड़ पड़ी थी यह! वह न होती तो शायद मैं भी न होती”

“हांँ माँ, सच कहती हो। बहुत एहसान हैं इसके हम पर।” दिवाकर की आवाज़ भर्राई।

आर्यन चुपचाप बाहर आ गया।

उसकी नजरें फाइबर शेड के नीचे टिकीं। वहीं, जहाँ वह अब भी वैसी ही खड़ी थी, जैसे बरसों से कुछ नहीं बदला।

शरीर पर धूल की परत थी, लेकिन उसकी ‘आँखों’ में आज भी वही चमक थी,  एक जानी-पहचानी सी चमक, जो हर सुबह आर्यन को स्कूल छोड़ने निकलती थी।

आर्यन पास आ गया। हाथ बढ़ाकर उसने उसे छुआ—

 "तू मत जा न यार! मेरे बचपन की सबसे पक्की दोस्त है तू।

पापा का सपना है तू, मांँ की गोदी और दादी का दुलार है तू।

जब पहली बार मैं साइकिल से गिरा था तो तेरी गोद में ही रोते हुए छिप गया था।

याद है? जब मैं पहली बार तेरे साथ चलना सीख रहा था, पापा ने तेरा वीडियो बनाया था।"

उसने उसके सामने झुककर माथा टिका दिया।

वह अब भी खामोश थी। हमेशा की तरह।

तभी एक हल्की हवा की लहर चली और आर्यन को उसमें से कोई पुराना संगीत बजने जैसा आभास हुआ।

आर्यन की आँखों में अचानक चमक लौट आई।

उसे एक आइडिया सूझा।

 "क्यों न ऐसा कुछ करें कि तू हमारे साथ भी रहे और सरकारी नियम भी न टूटे?"

वह दौड़ते हुए भीतर भागा

अगले कुछ हफ्तों में घर की छत पर एक नया कोना तैयार हो गया।

जहाँ उसकी हर चीज़ को सम्मान और सहेज कर रखा गया।

उसके बोनट से बना वर्क टेबल, पापा अब वहीं बैठते हैं।

पिछली सीट से बना दादी का झूला। वे वहीं बैठकर अपनी चाय पीती हैं।

स्टीयरिंग को आर्यन ने अपनी स्टडी टेबल के ठीक सामने दीवार पर टांँग दिया जैसे हर दिन उसकी दिशा तय करती हो।

माँ के पौधे अब उसके पुराने दरवाजों में लटकते हैं जैसे वह अब भी जीवन दे रही हो।

अब वह सड़कों पर नहीं दौड़ती,

लेकिन इस घर की धड़कनों में उसकी गूंँज है,

हर कोने में उसकी मौजूदगी है, बिना किसी शोर के, एक नई भूमिका में।

बाहर फाइबर शेड पर एक तख्ती टंगी थी

"वह अब भी हमारे साथ है।" ०००

 बदलते समय की चुनौतियाँ

1. वेबसीरीज 

यह लघुकथा पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक दृष्टिकोण के टकराव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। एक ओर वरिष्ठ वर्ग ओटीटी की बेलगाम सामग्री पर चिंता व्यक्त करता है, वहीं युवा वर्ग उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मनोरंजन के रूप में देखता है। अंतिम दृश्य कथा को व्यंग्यात्मक धार देता है और पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। विषय समसामयिक और प्रासंगिक है।

2. एक यूनिट इंसानियत

मानवीय करुणा और क्षमा का सुंदर संदेश देने वाली लघुकथा। सड़क दुर्घटना से शुरू होकर रक्तदान और आत्मबोध तक पहुँचने वाली कथा पाठक के हृदय को छूती है। "एक यूनिट खून" को "एक यूनिट इंसानियत" में बदल देने वाला कथ्य प्रभावशाली है। कथा का संदेश सीधा, सरल और प्रेरणादायी है।

3. पुरुषत्व पर प्रश्नचिह्न

यह लघुकथा समाज में प्रचलित लैंगिक रूढ़ियों पर सशक्त प्रहार करती है। पत्नी के पैर दबाने को पुरुषत्व से जोड़कर देखने वाली मानसिकता का तार्किक और संवेदनशील उत्तर त्रिपाठी जी के माध्यम से दिया गया है। संवाद प्रधान शैली कथा को रोचक बनाती है और अंत विचारोत्तेजक है।

4. संघर्ष का अंत

आर्थिक विवशता, चिकित्सा व्यवस्था की कठोर वास्तविकता और जीवन-मृत्यु के बीच झूलते एक परिवार की पीड़ा को मार्मिक ढंग से चित्रित करती है। कथा का सबसे सशक्त पक्ष उसका भावनात्मक तनाव है। अंतिम पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं और जीवन की कठोर सच्चाई से सामना कराती हैं।

5. वह अब भी हमारे साथ है

पाँचों लघुकथाओं में यह सबसे भावुक और रचनात्मक कथा प्रतीत होती है। एक पुरानी गाड़ी को परिवार के सदस्य की तरह प्रस्तुत कर लेखक ने वस्तुओं से जुड़ी मानवीय संवेदनाओं को सुंदर रूप दिया है। अंत में गाड़ी के हिस्सों को घर की स्मृतियों में बदल देना अत्यंत प्रभावशाली और प्रतीकात्मक है। कथा पाठक के मन में लंबे समय तक बनी रहती है।

समग्र टिप्पणी

नेतराम भारती जी की इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे साधारण जीवन की घटनाओं से असाधारण भाव और संदेश निकाल लेते हैं। संवाद शैली स्वाभाविक है, कथानक सहज हैं और अधिकांश कथाओं का अंत पाठक को चिंतन की ओर ले जाता है। सामाजिक सरोकार, मानवीय मूल्य, पारिवारिक संबंध और बदलते समय की चुनौतियाँ इन रचनाओं का प्रमुख आधार हैं।

- अलका पाण्डेय

 मुम्बई - महाराष्ट्र 

 संघर्ष  की व्यथा का यथार्थ

     आदरणीय नेतराम भारती जी की प्रस्तुत लघुकथाएं  समाज के  आम जीवन से जुड़ी घटनाओं मैं व्यथित लोगों की सोच और संघर्ष को बहुत ही सजीवता और संजीदगी से उकेरा गया है:-

1.वेबसीरीज

  नव परिवेश में नये विषय को लेकर नव पीढ़ी के अंतद्वंद्व एवं सामाजिक सोच के बीच की टकराहट को लघुकथा के माध्यम से चित्रित करने का अच्छा प्रयास तो किया गया है,लेकिन लघुकथा के स्वरूप में समाहित नहीं हो पाया है।

2.एक यूनिट इंसानियत

    कथ्य अच्छा है। सीख भी है।

3.पुरुषत्व पर प्रश्नचिह्न

     अच्छा कथ्य। अच्छी लघुकथा। शीर्षक ठीक नहीं।

4. संघर्ष का अंत

अस्पतालों में मरीज  के इलाज की आड़ में परिजनों को निर्दयता से लूटने की आमक घटनाओं का बहुत ही मार्मिक और यथार्थ चित्रण इस लघुकथा में किया गया है। अच्छी लघुकथा।

5. वह अब भी हमारे साथ है

     अस्पष्ट कथ्य और कथानक से पूरी लघुकथा बिखर गई है। संवाद ठीक हैं। लेकिन विषयाभाव के कारण पाठक उलझता जाता है। परिमार्जन आवश्यक है। 

   संक्षेप में कहा जावे तो आदरणीय नेतराम भारती जी की प्रस्तुत लघुकथाएं समाज के लिए नव परिवेश में आम लोगों की सोच और संघर्ष  की व्यथा का यथार्थ चित्रण है। 

 -  नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 


  लीक से हटकर नवीनतम 

1.   वेबसीरीज 

प्रथमतः शीर्षक कथ्य के साथ सार्थक है। आधुनिक नई पीढ़ी की पसंद से युक्त है। जो की OTT ( ओवर द  टॉप ) है सांस्कृतिक अवमूल्यन के लिए सेंसरशिप को पुरानी पीढी आवश्यक मानती है पर दिवाकर जैसे नवयुवक अपशब्दों की स्वतंत्रता में बोल्ड होकर जीवन जीने के इच्छुक हैं ।सोचना होगा अति सर्वत्र वर्जियेत। विस्तार  इतना है कि लघु कथा सीमा को लांघ गई है। 

2 . एक यूनिट इंसानियत 

संवाद कथ्य  के साथ बात स्पष्ट करने में सहायक और बहुत अच्छी एवं शिक्षाप्रद कहानी है लेखक को दिवाकर नाम से अधिक लगाव है। संदेश सुखानुभूति दायक है । पुरानी पीढ़ी की अधेड़ता  की दया से नई पीढ़ी की क्रूरता का परिमार्जन बहुत अच्छे ढंग से किया गया है जो कि रोचक प्रभावकारी है। 

3 . पुरुषत्व पर प्रश्नचिन्ह

इस लघुकथा में नर- नारी समानता का सुंदर चित्रण है।स्त्री-पुरुष, पति- पत्नी के संबंध तथा अन्य रिश्तो में आत्मीयता, संतुलन, अहमियत का एक दूसरे के प्रति रोचक, प्रभावकारी चित्रण किया गया है ।इस लघुकथा का शीर्षक केवल 'प्रश्नचिन्ह' भी हो सकता था । 

4. संघर्ष का अन्त 

इसमें करुणापूर्ण कथ्य से जुड़े दिवाकर का संघर्ष बीमारी से जीवन या मृत्यु की वास्तविकता या पैसे का खेल चमत्कारी आश्वासन के रूप में दर्शाया गया है।  अस्पतालों की सत्यता को प्रकट करती स्थिति है।

5.  वह अब भी हमारे साथ है

यहां भी दिवाकर पात्र हृदय से मुख्य गुमनाम रिश्ते की स्मृतियों में डूबा हुआ है। वस्तुओं को स्मृति से जोड़ती कहानी भावात्मक, विस्तृत पर जिज्ञासा प्रधान अंत से युक्त है।

निष्कर्ष 

मान्यवर नेतराम भारती की पांचो लघुकथाओं को मनोयोग से पढ़ा। पांचो लघुकथाएं स्वयं किसी वेबसीरीज के एपिसोड हैं ;जहां पूर्णत: मौलिक चिंतन, कहीं- कहीं समाज की नई पीढ़ी की सोच के संवाद, भाषा की मर्यादा को लांघ  गए हैं। कुल मिलाकर नई सोच की कथातत्व के प्रवाह और विस्तार में शब्दों का चयन ऊर्जात्मक है। आपकी नवीनतमता को नमन

- डाॅ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     कथ्य से चिंतन तक 

1. वेबसीरीज

यह लघुकथा पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक दृष्टिकोण के टकराव को उभारती है। संवाद प्रभावी हैं, किंतु आकार अपेक्षाकृत विस्तृत हो गया है। अंत में युवाओं की प्रतिक्रिया एक तीखा व्यंग्य रचती है और यह प्रश्न छोड़ जाती है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन कहाँ स्थापित हो?

2. एक यूनिट इंसानियत

मानवीय संवेदना और क्षमा का सुंदर चित्रण। सीमित पात्रों और एक घटना के माध्यम से कथा प्रभाव उत्पन्न करती है। अंतिम संवाद कथा की शक्ति है। पाठक के मन में यह प्रश्न उभरता है कि क्या हम अपने अहंकार से ऊपर उठकर परिस्थितियों में भी इंसानियत को जीवित रख पाते हैं?

3. पुरुषत्व पर प्रश्नचिह्न

सामाजिक रूढ़ियों पर सार्थक प्रहार करती यह लघुकथा सेवा, प्रेम और सम्मान को पुरुषत्व की नई परिभाषा से जोड़ती है। संवाद कथा की मुख्य शक्ति हैं। अंत पाठक को सोचने पर विवश करता है कि क्या संवेदनशीलता को आज भी हम स्त्री और पुरुष के खाँचों में बाँटकर देखते हैं?

4. संघर्ष का अंत

आर्थिक विवशता और भावनात्मक टूटन का मार्मिक चित्रण। कथा एक कठिन निर्णय के मनोवैज्ञानिक पक्ष को सामने लाती है। अंतिम दृश्य गहरी करुणा उत्पन्न करता है और पाठक के भीतर यह प्रश्न छोड़ जाता है कि जीवन और संसाधनों के बीच अंतिम निर्णय की कीमत वास्तव में कौन चुकाता है?

5. वह अब भी हमारे साथ है

स्मृतियों, पारिवारिक लगाव और पुनर्चक्रण की सुंदर अवधारणा पर आधारित भावपूर्ण रचना। पुरानी गाड़ी को परिवार के सदस्य की तरह प्रस्तुत करना कथा की विशेषता है। अंत केवल भावुक नहीं करता, बल्कि यह सोचने को प्रेरित करता है कि क्या वस्तुएँ वास्तव में पुरानी होती हैं, या वे स्मृतियों में नया जीवन पा लेती हैं?

         नेतराम भारती की लघुकथाएँ समकालीन जीवन के विविध पक्षों को स्पर्श करती हैं। कथ्य प्रभावशाली हैं और चिंतन के द्वार खोलते हैं। यदि संक्षिप्तता, सीमित पात्र, एक घटना-केंद्रित संरचना तथा अधिक तीक्ष्ण पंचलाइन पर और ध्यान दिया जाए, तो ये रचनाएँ लघुकथा-विधा की कसौटी पर और अधिक सशक्त रूप में उभर सकती हैं। लघुकथा की सफलता वहीं है जहाँ कथा समाप्त होकर पाठकों के चिंतन- मनन का केंद्र बिंदु बन जाती है।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

     सहज भाषा में प्रस्तुत

    नेतराम भारती की प्रस्तुत लघुकथाएँ समकालीन समाज, मानवीय मूल्यों और बदलते पारिवारिक-सांस्कृतिक सरोकारों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती हैं :-

"वेबसीरीज" 

ओटीटी और सेंसरशिप के बहाने दो पीढ़ियों के दृष्टिकोण का टकराव उभरता है। संवाद सशक्त हैं और अंत लेखक की सांस्कृतिक चिंता को मुखर करता है।

"एक यूनिट इंसानियत" 

मानवता और क्षमा का सुंदर संदेश देती है। कथानक सरल होते हुए भी भावनात्मक रूप से अत्यंत प्रभावशाली है।

"पुरुषत्व पर प्रश्नचिह्न" 

रूढ़ पुरुषवादी सोच पर सार्थक प्रहार करती है। प्रेम और सेवा को स्त्री-पुरुष के दायरे से ऊपर उठाकर देखने का संदेश इसकी विशेषता है।

"संघर्ष का अंत" 

आर्थिक विवशताओं से जूझते मध्यमवर्गीय जीवन की मार्मिक त्रासदी को संवेदनापूर्वक चित्रित करती है। इसका अंत पाठक को भीतर तक झकझोर देता है।

"वह अब भी हमारे साथ है" 

स्मृतियों और भावनात्मक लगाव की अत्यंत सुंदर कथा है। पुरानी कार को परिवार के सदस्य की तरह प्रस्तुत करना लेखक की रचनात्मकता का परिचायक है।

         इस प्रकार नेतराम भारती की ये लघुकथाएँ जीवन के विविध पक्षों को संवेदनशीलता, विचारशीलता और सहज भाषा में प्रस्तुत करती हैं। ये रचनाएँ पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं अपितु सोचने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान



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