पाठकों के बीच में बी एल अच्छा की लघुकथाएं
बी एल आच्छा
जन्म- 5 फरवरी 1950
देवगढ़ मदारिया, जि. राजसमंद (राजस्थान)
शिक्षा-एम.ए. हिन्दी - मोहनलाल सुखाड़िया वि. वि., उदयपुर (राजस्थान)
वृत्ति- 1972- 2015 तक मध्यप्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में अध्यापन
संप्रति-सेवानिवृत्त प्राध्यापक-हिन्दी, उच्च शिक्षा विभाग, म.प्र.शासन
प्रकाशन :-
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास : सर्जनात्मक भाषा और आलोचना
"जल टूटता हुआ" की पहचान
सृजन का अंतर्पाठ:रचनात्मक समीक्षा
कृति की राह से(सृजन समीक्षा)
रचना और आलोचना के रिश्ते
आस्था के बैंगन (व्यंग्य)
पिताजी का डैडी संस्करण (व्यंग्य)
मेघदूत का टी. ए. बिल (व्यंग्य)
चुप्पी अर्थ भरी(काव्य संग्रह)
हिन्दी की कालजयी लघुकथाएं
(संकलन में 85 पृष्ठों की भूमिका)
लघुकथाएं: इक्कीसवीं सदी के दो दशक (95पृष्ठों में समीक्षात्मक भूमिका)
संपादन-अतिथि संपादन
'संवाद सृजन 'लघुकथा विशेषांक
प्रेमचंद सृजनपीठ, उज्जैन (संस्कृति
विभाग, म. प्र. शासन)
पुरस्कार/सम्मान :-
- डॉक्टर देवराज उपाध्याय आलोचना पुरस्कार
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर
- पं. नंददुलारे वाजपेयी आलोचना पुरस्कार
मध्यप्रदेश साहित्यअकादमी, भोपाल
- डॉ. संतोष तिवारी समीक्षा सम्मान
मध्यप्रदेश लेखक संघ, भोपाल
- लघुकथा समालोचना सम्मान -
क्षितिज (साहित्य संस्था) इंदौर
- शताब्दी सम्मान-श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर
-साहित्य गरिमा समिति सम्मान
(आचार्य कृष्णदत्त स्मृति व्यंग्य विधा सम्मान) हैदराबाद
-व्यंग्य यात्रा व्यंग्य चिंतक सम्मान
व्यंग्य यात्रा त्रैमासिक पत्रिका का आयोजन
संपर्क :-
बी एल आच्छा
फ्लेट- 701 ,टावर -27 , नॉर्थ टाउन , स्टीफेंशन रोड
पेरंबूर,चेन्नई (टी एन) तामिलनाडु पिन-600012
1. चंदा
चंदे से झंडा फहराती उनकी काया बहुत यशस्वी है। चंदा उगाहने का लहजा । सामाजिक होता व्यक्तित्व। माइक पर छाये उनके तेवर। संस्था में उनका ओहदा। सरकारी महकमों में सम्पर्क महिमा।इस बार किसी आयोजन के लिए चंदा उगाहने निकले तो दो तीन लोगों के साथ मुझे भी उलझा लिया । यो ऐसे व्यक्तित्व के साथ जाना भी सुहाना होता हैऔर पंगा लेना भी खतरे से खाली नहीं। बाजार में दलाल को नाराज करो तो पेढी की साख को बट्टा लगने में देर नहीं लगती।
इस बार वे किसी जाने माने महाशय के पास पहली बार पहुँचे। आयोजन की रूपरेखा रंगीली जबान से दी। जैसे कोई दुकानदार साड़ी के रेशमी महीनपन के साथ कई शेड्स भी दिखा रहा हो। अंत में वे बोले 'जितनी भी आप की श्रद्धा हो, बता दीजिए।' और रसीद सामने कर दी ।
चंदा देने वाले सज्जन के माथे पर रंच भर शिकन नहीं था। बोले- 'जो भी आप चाहें - ।' इतना कहकर वे अलमीरा से अलग अलग संस्थाओं के रसीद कट्टे ले आये। बोले- 'मैं भी हमारी संस्थाओं के आयोजन करता रहता हूँ। गो- सेवा से लेकर वृद्ध-सेवा तक। सत्संग से लेकर भवन निर्माण तक। अच्छा हुआ, आप सभी आ गये। अब आपकी जो भी श्रद्धा हो, इन रसीदों में...। उस सामाजिक व्यक्तित्व वाले चंदेबाज चेहरे पर शिकन पड़ गये। मैं भी पहली पहली बार निकला था और फंदा गले पड़ गया। जेब छाती से चिपकने लगी। अनुभवी चंदेबाज को चंदे की मल्ल- विद्या से साबका पड़ा। चाय तो चलती रही, पर दोनों ओर की रसीदें अनकहे ही फड़फड़ाती रहीं....। 000
2.सेवा
डॉ. याज्ञवल्क्य ने डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। वे अगले बरस प्रोफेसर एण्ड हैड हो गये। विभाग में जगह खाली हुई तो उनके खास शिष्यों के पैर खूंदने लगे। डॉ. मैत्रेय ने पीएच.डी. की उपाधि हासिल कर ही रखी थी और डॉ. कात्यायन भी गुरु कृपा से पीएच.डी. हो गये। दोनों ही गुरु के खास थे। एक मिजाज से एकेडेमिक और तर्कशील ।दूसरे सेवाभावी। एक के अपने फण्डे थे, दूजे का संडे भी गुरूजी का था।
एक दिन मैडम याज्ञवल्क्य ने रात्रि की शयनयान संगोष्ठी में पूछ ही लिया-" सुना है विश्वविद्यालय ने प्राध्यापक पद के लिए विज्ञापन दे दिया है।"डॉ. याज्ञवल्क्य ने हामी भरी। पत्नी ने पूछा-" इस बार किसे चुनोगे ? किसी और को या मैत्रेय और कात्यायन में से किसी एक को डॉ. याज्ञवल्क्य कहा-" पराये का क्या भरोसा होना ।इन्हीं में से है।" मैडम ने फिर पूछा- "आपका पुष्टिमार्ग किसके सिर पर होगा ? याज्ञवल्क्य मुस्कुराए-"अरे !तुम भी बड़ी दार्शनिक अंदाज में पूछने लगी हो ? हाँ, मेरे विचार से सेवाभावी को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐकेडमिक को लिया तो मेरे ही अवसरों में फंदा फँसाएगा। मौका आने पर मुझ पर ही तरकश खाली कर देगा। इससे तो सेवाभावी ही अच्छा है, अकादमिक लक्षण तो इसके पास भी भरे-पूरे हैं। संडे को भी काम पड़ा तो कन्नी - तो नहीं काटेगा।'
मैडम की नजरें डॉ. याज्ञवल्क्य से मिलीं और आश्वस्त होकर झुक गयीं।000
3. रोटी और रुपया
मेले में कई अजूबे से आए थे ।झूलों में युवा और बच्चे मजे ले रहे थे। मौत के कुएँ में भी खासी भीड़ थी। यूँ तो सर्कस लुभा रहा था पर मेरी नजर एक अलग से शो पर पड़ी ।लिखा था-' आपका जीव '।अजब सा लगा ।मैं यहाँ और मेरा जीव वहाँ ।जीव भी कोई फ्रिज में सुरक्षित रखने या परखनली में देखने की चीज तो है नहीं ।पर लोग थे कि आपका जीव देखने जा रहे थे ।मैं और मेरे जीव का अलग होना मुझे दर्शन की ओर धकेल रहा था ।देखने की इच्छा प्रबल हो गई।
मैं भी पहुँचा। दस रुपये का टिकट लिया ।बुरा भी नहीं था अपना जीव दस रुपए में देखना। एक पतली सी गली से एक व्यक्ति भीतर जा रहा था ।बस एक ही और भीतर भी एक ही आदमी था। पर उसके सामने केवल रोटी और पानी रखा था। मैंने उनसे पूछा -कहाँ है आपका जीव?वह बोला-' यह है ना रोटी और पानी'। मैंने कहा -'रोटी पानी तो रोज ही खाते पीते हैं यह कहाँ का जीव !'वह बोला- 'बाबूजी इसके बगैर जीव कहाँ रह पाता है?' अजीब सा लगा। क्या कहता ;ठगा सा रह गया। पर वह बोला -बाबूजी बाहर मत बताइएगा आपको कसम है। यह पेट और रोटी का सवाल है ।मैंने पूछा '-अच्छा बताओ तुम्हारा जीव किसमें है ?'उसने तपाक से दस रुपये का नोट ऊपर किया और बोला-' बाबूजी मेरा जीव इस में।' उसका जीव मेरे नोट में जी रहा था। मैं मुस्कुराया और चल दिया।000
4.श्रद्धांजलि
सफेदी का रंग भी कितना निस्तब्ध होता है। पर आज घर के लोगों के शब्द सफेद स्क्रीन पर काले अक्षरों में उभरकर आकुल कर रहे हैं। " पापा बहुत कम खर्चे में चला लेते हैं।" "हां, पर कभी कभार हम बच्चों को भी पानी- पूरी जरूर खिला देते हैं।"
"पापा के पास कुछ तो होगा ही पर कभी शादी में नए कपड़े खरीदने को नहीं कहते। "
"दादा कभी होटल तो ले जाते ही नहीं "
"अरे, दादा कभी पिक्चर नहीं दिखाते, तो होटल जाएंगे?"
" कुछ नहीं तो दोनों ही कहीं घूम आएँ ताजे हो जाएंगे।"
"हमारी कॉपियोंऔर प्रोजेक्ट के लिए दादा कुछ दे ही देते हैं।"
"पर कभी किसी को जाने- आने, खाने-पहनने के लिए टोका नहीं।"
पापा के दिवंगत हो जाने के बाद की शोक के दो दिन बीत गए। शोक बैठक से लोगों के चले जाने के बाद आज सभी भाइयों के परिवार सहित बच्चे भी एक साथ बैठे थे।फाइलों और कागज़ों को देखते हुए। पापा के बक्से को खोला। शायद कुछ निकले।
"अरे कितने सारे फिक्स डिपाजिट"
"और कितने इन्वेस्टमेंट। रजिस्टर्ड चिट्ठी-पत्री तो आती ही रहती थी।"
"सबके नॉमिनेशन, बाप रे।"
"अरे इस लिफाफे में क्या है?"भाई ने पूछा।
"कोई चिट्ठी लगती है।"
लिफाफा खुला । पिताजी की चिट्ठी में लिखा था- "प्यारे बच्चों, अभाव हर एक के जीवन में आते हैं। उनका रोना मत रोना। मैंने एक ही बाल सोच रखी थी। सर्दी के थपेड़ों से बचाने के लिए परिवार के लिए सुरक्षा की दीवार बन सकूँ। संयत चलो और अपनी पीढ़ी को सँवारते रहो।"
पिताजी की कंजूसी से रुके हुए सबके आँसू आँखों की कोर से टपक कर श्रद्धांजलि दे रहे थे। 000
5.ब्रांडेड
तीन बरस पहले कुंकुम लगे पाँवों से बहू का घर में स्वागत किया था। अब तो नया प्राणी भी घर में आ गया है। यशोदा की तरह पत्नी नंदलाल में डूबी रहती है। पर नन्हें प्राणी की माँ प्रकृति से ही ब्रांडेड है। इसीलिए जनम-घुट्टी से लेकर देशी ईलाज शहर की आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी की तरह कोने की ताक से झाँकते भर रह गये। हल्दी और अजवाईन पेटेंट नहीं बन पाये। बहू की विज्ञापनी नजरों में कंपनियों के डिब्बे ही थिरकते रहते थे। पर इस बार बच्चे को दस्त लगे तो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। तीन चार डॉक्टर बदल लिये। दवाएँ बदली। बच्चे का वजन घटने लगा तो डॉक्टर भी चिंतित होकर बोला-" पानी तो कम नहीं होना चाहिए, वर्ना....।"
थक हारकर पड़ोस की दादी से बात की। दादी ने कहा- "बच्चे को एकदम घुटे हुए चावल ठण्डे करके, दही में मिलाकर दो। आराम हो जाएगा। थक हारकर ब्रांडेड बहू ने सास की देखरेख में वही किया। शाम होते होते बच्चे के दस्त रुक गये। पूरे घर में जान आ गई। बहू ने सास को कनखियों से देखा तो कोने की ताक में रखी देशी दवाएँ मुसकुरा गई। ब्रांडेड बहू की आँखों में पुराना 'दादी ब्रांड' अनुभवी जगह तलाश रहा था। 000
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