पाठकों के बीच में डॉ. मिथिलेश दीक्षित की लघुकथाएं


               1.छोटी कोठरी 

           " कितना होशियार है मेरा बेटू। इसीलिए तो सबसे नामी स्कूल में पढ़ा रहा हूँ अपने बेटू को, जिससे बड़ा होकर बहुत बड़ा इंजीनियर बने अपने पापा की तरह। "  मासिक परीक्षा में अच्छे नंबर आने से विक्रम बहुत खुश थे अपने बेटे अक्षत से। बेटू भी बहुत खुश होकर बोला, "पापा, इंजीनियर बन जाने पर मेरे पास खूब पैसे होंगे!" विक्रम  ने हँसते हुए कहा, "और क्या!"अक्षत  तुरन्त बोला," बड़ी सी गाड़ी होगी और बहुत बड़ा सा घर होगा। "

"बिलकुल होगा मेरे बेटे के पास।"

पापा की बात सुनकर अक्षत की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।विक्रम ने आगे कहा, "फिर सुन्दर -सुन्दर सी बहू आयेगी मेरे बेटू की।" अब अक्षत के चेहरे पर हल्की सी शर्म झलकने लगी, लेकिन जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी, "फिर, पापा!"

"फिर प्यारे -प्यारे दो बेटे होंगे,"यह बात पसन्द नहीं आने पर उसने बात काट दी पापा की,

"नहीं, दोनो बेटे नहीं, एक बेटा और एक बेटी।"

"अच्छा बाबा, एक बेटा और एक बेटी,"कहकर विक्रम ने अक्षत को खुश कर दियाऔर कहने लगा,

"अब तुम बोलो आगे, फिर क्या होगा!"

"फिर दोनो पढ़ने जायेंगे।"

"फिर!"

" फिर मम्मी -पापा बूढ़े हो जायेंगे। "

"फिर!"

"फिर हमलोग बड़े -बड़े कमरों में रहा करेंगे और मम्मी -पापा को पीछे वाली छोटी कोठरी में रहने देंगे, जैसी कि आपने दादू को दी है।" ०००                   

                   2.डुबकी

      "ओ घूरी, तनिक इधर तो आइयो ", दरवाज़े पर खड़ी प्रकासा ने अपनी धोती के छोर से हाथ पोछते हुए गली में जाती हुई घूरी को पुकारा। घूरी पास आकर खड़ी हो गयी।

" सुन, यह कटोरा ले जा। वह कोने पर जो मकान बन रहा है, वहाँ से बहुत छोटी -छोटी कंकडी 

भर कर ला दे मुझे।"  पीछे खड़ी रंन्नो ने माँ को टोक दिया, "अम्मा,

तुम भी क्या हो!पुराने जमाने की 

सासों वाले हथ कंडे अपना रही हो। स्कूल से आने के बाद भाभी को एक ही घंटा मिलता है, उसमें भी तुम चैन नहीं लेने दोगी।"

" तू चुप कर। बड़ी आयी भाभी -भाभी करने वाली। देख, जब तक तेरे हाथ पीले नहीं हो जाते, तब तक उसे पूरे दिन काम पर लगाये रखना है। छोरा के वैसे ही दिमाग खराब हैं। बीबी के बस में होते देर ना लगेगी। तू इतना कर दे, दाल वाला कंटर उतार कर रसोई में नीचे रख दे। उसमें ये 

कंकड़ी मिलानी हैं। रोज दो -दो घंटे बीनेगी। पंद्रह बीस दिन तो बीत ही जायेंगे," कहकर प्रकासा बड़बड़ाने लगी -पुराने जमाने की सासों वाले हथ कंडों की बात करती है। तू क्या जाने, हमारे जमाने में तो पक्के घरों की जमीन भी कच्ची हुआ करती थी। कच्ची मिट्टी के चूल्हे हुआ करते थे लीपने पोतने के लिए।-

फिर हाथ हिलाते हुए जोर से बोली, "बस, तेरे हाथ पीले हो जायें, तो गंगा मैया एक डुबकी लगा कर उऋन हो जाऊँ मैं।"

रंन्नों अपने हाथ दिखाते हुए बोली, "अगर पीले होने वाले ये हाथ भी कंकड बीनते -बीनते लाल हो जायें, तो गंगा मैया में एक डुबकी और लगा 

आना, अम्मा। "

अचानक ही प्रकासा के खुले मुख से निकला -"आँ --!"

रसोई की ओर बढ़ती हुई रंन्नों बोलउठी --"हाँ --!" ०००                  

           3.फ़ाइलों ‌के‌ बीच 

          क्लर्क रामबाबू  आलमारी   से फ़ाइलें निकालते हुए ‌मनोज से ‌बोले," मनोज, लिफ़ाफ़ा लाये !"

" जी, तीन -चार फाइलों के बीच में दबा दिया ‌है।"

रामबाबू ने ऊपर की कुछ फ़ाइलें देख डालीं। लिफ़ाफ़ा नहीं दीखा ‌, तो उन्होंने ‌मनोज से उसे ‌निकाल कर सबसे ऊपर वाली फ़ाइल में रखने ‌को  कहा और चले गये ।

वह ‌लिफाफा किसी फ़ाइल से नीचे ‌गिर गया ‌।   ‌ हैड क्लर्क ‌मोबाइल पर बात करते-करते  आते हैंऔर लिफ़ाफ़ा उठा कर    अपने ‌ बैग में रखने ‌ही वाले थे कि बड़े साहब ‌राउंड पर  आगये ‌और ‌हैड क्लर्क जल्दी से ‌पैड के‌ नीचे ‌ लिफ़ाफ़े को खिसका कर खड़े ‌हो‌गये । ‌   बड़े  साहब ताड़ गये और लिफ़ाफ़ा देख कर बोले,"यह क्या है !"

 हैड क्लर्क ने‌ कांपती आवाज़ में रामबाबू का नाम लिया।

रामबाबू को‌ बुला कर पूछा ‌गया‌।उसने मनोज ‌का नाम लगा दिया।

मनोज ‌ने‌ कांपते हुए हाथ जोड़ कर कहा, "  साहब जी, मुझे पवन ‌सर ने‌ राम बाबू सर को ‌देने

को‌कहा था ।‌ "

पवन को ‌तुरंत‌ बुलाया गया । 

बड़े साहब की त्यौरी देखकर पवन ‌ क़बूल ‌गये," साहब, नमकौरी गांव के  दिनेश ने अपनी शिक्षिका बहन ‌के‌किसी काम के लिए ये पैसे भेजे थे‌।"

 बड़े साहब आग-बबूला हो रहे थे।‌   "  तुम लोगों की‌ शर्म नहीं आयी खुलेआम रिश्वत लेते हुए और वह ‌ भी खुले लिफ़ाफ़े में ।‌

अगर पकड़े ‌गये, तो नानी याद आ जायेगी ।‌ चलो सब मेरे कक्ष में चलो ।अभी‌ ख़बर लेता ‌हूँ तुम सबकी ‌।‌हद हो गयी ।"

 जैसे ही सब‌ निकले बड़े साहब ने ‌मनोज को इशारे से‌ बुलाकर कहा,"  देख, इस लिफ़ाफ़े को फेवीकोल से अच्छी तरह चिपका कर मेरी ‌ गाड़ी ‌की पिछली सीट पर रखीं ‌फाइलों के‌ बीच ‌में रख दे जाकर !" ०००              

                   4.फ़ाइल 

दरवाज़े की ओर सर घुमा कर क्लर्क ‌ने कहा , "   काय कूँ रोज -रोज चक्कर लगाया  करती हो, अम्मा। "

 " बेटा, मेरी   फाइल ।"

अम्मा के काँपते होठों से इतना ही निकला ‌।

" अच्छा, वो।ठीक है,देख लेंगे।

हाँ तो अम्मा ,तुम जे बताओ,

कुछ खेत -टपरिया है तुम्हारे पास,"    क्लर्क खुसपुसा कर बोला ।

" हाँ बेटा,दो बीघा खेत है।"

"उसमें ‌ क्या बोया जाता है।"

"गेहूँ । खाने भर को हो जाता है ।"

" अच्छा ठीक है, मैं बीस किलो तुम्हारे घर से उठवा लूँगा ।"

"लेकिन बेटा फिर हम खायेंगे क्या।दवा दारू भी‌ उसी से चलती है ।"

" अब तुम यह चाहती हो कि काम भी हो जाये, जल्दी भी हो जाये, सही भी हो जाये ,  पैसा भी न लगे, तो यह तो नामुमकिन है‌। सोच ‌लो, अम्मा।"

 मरता क्या ‌न करता। अम्मा ने सोचा कि रोज -रोज दौड़ते दौड़ते यह बूढ़ा जर्जर शरीर थक चुका‌ है। इससे तो अच्छा है कि कुछ दिन भूखे ही रह लेंगे। 

उसने गिड़गिड़ा कर कहा, "अच्छा,बेटा , ले लो, लेकिन काम तो ‌हो जायेगा।"

क्लर्क ने ‌खुश होकर कहा,"क्यों 

नहीं , क्यों ‌नहीं,"--और अलमारी से उसने तेजी से फ़ाइल खींची और अम्मा ने गहरी साँस‌। ०००                    

                  5. निर्णय 

     " रोज़ -रोज़ के झगड़ों से तंग आ चुके हम। देखो, एक निर्णय ले लो। बेटे के साथ पुणे में रहोगी या मेरे साथ यहाँ ", दिवाकर ने पत्नी सुनीता  को घूर कर देखते हुए ज़ोर से कहा।

  सुनीता ने भी घूर कर देखते हुए उसी तेवर में कहा, "तुम भी एक निर्णय ले लो। बेटे के साथ रहोगे या मेरे साथ!"

  "यह क्या बात हुई! बात तो एक ही है", चौंक कर दिवाकर ने खिसियाते हुए कहा।

  " बिलकुल नहीं, "सुनीता ने एक पल रुककर दृढ़ता से कहा,"तुम्हारी बात में पुरुष प्रधान मानसिकता की गन्ध आ रही है। यह घर भी मेरा है, बेटा भी मेरा है और तुम भी मेरे हो। मैं किसी को भी नहीं छोड़ूँगी। तुमको जहाँ जाना है, अकेले निकल जाओ।"

 दिवाकर ने ऑंखें झुका लीं और 

धीमी आवाज़ में कहा, "अच्छा, ठीक है, जहाँ भी रहेंगे, हम दोनो साथ रहेंगे।"दोनो के चेहरों पर मुस्कान खिल उठी। ०००



                     

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