पाठकों के बीच में डॉ. मिथिलेश दीक्षित की लघुकथाएं
डॉ. मिथिलेश दीक्षित
शिक्षा : -
हिन्दी और संस्कृत विषय में एम.ए. कर पी-एच.डी.की और 35 वर्षों तक महाविद्यालय में रीडर एवं हैड तथा प्राचार्य के पदों का निर्वहन किया।
लेखन/प्रकाशन : -
75 ग्रन्थ प्रकाशित हैं और आपने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों और पत्रिकाओं का सम्पादन किया। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कोश ग्रन्थों में आपका परिचय प्रकाशित है। आपकी रचनाधर्मिता पर प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा 12 ग्रन्थ प्रकाशित हुए, 12 स्तरीय पत्रिकाओं के विशेषांक निर्गत हुए तथा अनेक शोधकार्य हुए। काव्य, निबन्ध, इतिहास, साक्षात्कार, समीक्षा, लघुकथा आदि पर प्रमुख पुस्तकें प्रकाशित हैं। आपके द्वारा अनेक पत्रिकाओं का अतिथि सम्पादन किया गया है तथा आपके साहित्य पर अनेक शोध कार्य हुए हैं।समीक्षा, साक्षात्कार, लघुकथा पर अनेक पुस्तकों के साथ साहित्य और संस्कृति, आस्थावाद एवं अन्य निबन्ध, सृजन और सार्थकता, मेरे चयनित निबन्ध, समान्तर विमर्श आदि निबन्ध की विशेष पुस्तकें हैं।
सम्मान :-
देश-विदेश से शताधिक सम्मान मिले हैं। साहित्य के क्षेत्र में आपको 200 सम्मान प्राप्त हुए। सरकारी सम्मानों में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आपको पत्रकारिता पर 1995-96 तथा 1997-98 में धनराशि सहित सम्मानित किया गया। 2017 में भी दो लाख धनराशि सहित आपको साहित्य भूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया।अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों में इंडोनेशिया में महादेवी परिकल्पना सम्मान, मॉरिशस में अन्तर्राष्ट्रीय शीर्ष हिन्दी सम्मान, वियतनाम में साहित्य धारा सम्मान, नार्वे से प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय प्रेमचन्द सम्मान, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से साहित्य वारिधि सम्मान प्राप्त हुए। इंटरनेशनल फ्रंटियर फॉर पीस ऐंड ह्यूमैनीटेरियन आर्गनाइजेशन द्वारा औनरेरी डाक्टर्स अवार्ड मिला। यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक ऐंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन द्वारा माइलस्टोन अचीवमेंट अवार्ड मिला।नेशनल ह्यूमन राइट्स ऐंड एंटी करप्शन फोर्स द्वारा आइकॉन अवार्ड मिला। सेवा कार्यो के लिए नेशनल चाइल्ड ऐंड वोमैन डेवलपमेंट काउंसिल द्वारा अनेक सम्मान उपलब्ध हुए। अनेक इन्टरनेशनल ह्यूूमैनीटेरियन अवार्ड और इंटरनेशनलइंस्पायरिंग अवार्ड प्राप्त हुए हैं।अनेक मानद उपाधियाँ प्राप्त हुईं हैं। भारत सरकार द्वारा स्पोंसर सम्मान श्रेणी में ICMRP--2024 का लाइफ अचीवमेंट अवार्ड प्राप्त हुआ।मीडिया में आपकी निरंतर सक्रियता है और दो चैनल की आप संरक्षक हैं।
सम्प्रति : -
साहित्य लेखन, पर्यावरण एवं सेवापरक कार्य। माधवी फाण्डेशन तथा हिन्दी हाइकु परिषद की अध्यक्ष और अखिल भारतीय लघुकथा सृजन संस्थान की सचिव हैं। आपके नाम से संस्था भी स्थापित की गयी है 'डॉ. मिथिलेशदीक्षित साहित्य, संस्कृति,सेवा न्यास'।
पता :-
मिथिलेश दीक्षित
13, ग्राउंड फ्लोर ,लेख राज रेसीडेंसी-1 ,राजाजी पुरम
लखनऊ-17 ( उत्तर प्रदेश )
1.छोटी कोठरी
" कितना होशियार है मेरा बेटू। इसीलिए तो सबसे नामी स्कूल में पढ़ा रहा हूँ अपने बेटू को, जिससे बड़ा होकर बहुत बड़ा इंजीनियर बने अपने पापा की तरह। " मासिक परीक्षा में अच्छे नंबर आने से विक्रम बहुत खुश थे अपने बेटे अक्षत से। बेटू भी बहुत खुश होकर बोला, "पापा, इंजीनियर बन जाने पर मेरे पास खूब पैसे होंगे!" विक्रम ने हँसते हुए कहा, "और क्या!"अक्षत तुरन्त बोला," बड़ी सी गाड़ी होगी और बहुत बड़ा सा घर होगा। "
"बिलकुल होगा मेरे बेटे के पास।"
पापा की बात सुनकर अक्षत की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।विक्रम ने आगे कहा, "फिर सुन्दर -सुन्दर सी बहू आयेगी मेरे बेटू की।" अब अक्षत के चेहरे पर हल्की सी शर्म झलकने लगी, लेकिन जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी, "फिर, पापा!"
"फिर प्यारे -प्यारे दो बेटे होंगे,"यह बात पसन्द नहीं आने पर उसने बात काट दी पापा की,
"नहीं, दोनो बेटे नहीं, एक बेटा और एक बेटी।"
"अच्छा बाबा, एक बेटा और एक बेटी,"कहकर विक्रम ने अक्षत को खुश कर दियाऔर कहने लगा,
"अब तुम बोलो आगे, फिर क्या होगा!"
"फिर दोनो पढ़ने जायेंगे।"
"फिर!"
" फिर मम्मी -पापा बूढ़े हो जायेंगे। "
"फिर!"
"फिर हमलोग बड़े -बड़े कमरों में रहा करेंगे और मम्मी -पापा को पीछे वाली छोटी कोठरी में रहने देंगे, जैसी कि आपने दादू को दी है।" ०००
2.डुबकी
"ओ घूरी, तनिक इधर तो आइयो ", दरवाज़े पर खड़ी प्रकासा ने अपनी धोती के छोर से हाथ पोछते हुए गली में जाती हुई घूरी को पुकारा। घूरी पास आकर खड़ी हो गयी।
" सुन, यह कटोरा ले जा। वह कोने पर जो मकान बन रहा है, वहाँ से बहुत छोटी -छोटी कंकडी
भर कर ला दे मुझे।" पीछे खड़ी रंन्नो ने माँ को टोक दिया, "अम्मा,
तुम भी क्या हो!पुराने जमाने की
सासों वाले हथ कंडे अपना रही हो। स्कूल से आने के बाद भाभी को एक ही घंटा मिलता है, उसमें भी तुम चैन नहीं लेने दोगी।"
" तू चुप कर। बड़ी आयी भाभी -भाभी करने वाली। देख, जब तक तेरे हाथ पीले नहीं हो जाते, तब तक उसे पूरे दिन काम पर लगाये रखना है। छोरा के वैसे ही दिमाग खराब हैं। बीबी के बस में होते देर ना लगेगी। तू इतना कर दे, दाल वाला कंटर उतार कर रसोई में नीचे रख दे। उसमें ये
कंकड़ी मिलानी हैं। रोज दो -दो घंटे बीनेगी। पंद्रह बीस दिन तो बीत ही जायेंगे," कहकर प्रकासा बड़बड़ाने लगी -पुराने जमाने की सासों वाले हथ कंडों की बात करती है। तू क्या जाने, हमारे जमाने में तो पक्के घरों की जमीन भी कच्ची हुआ करती थी। कच्ची मिट्टी के चूल्हे हुआ करते थे लीपने पोतने के लिए।-
फिर हाथ हिलाते हुए जोर से बोली, "बस, तेरे हाथ पीले हो जायें, तो गंगा मैया एक डुबकी लगा कर उऋन हो जाऊँ मैं।"
रंन्नों अपने हाथ दिखाते हुए बोली, "अगर पीले होने वाले ये हाथ भी कंकड बीनते -बीनते लाल हो जायें, तो गंगा मैया में एक डुबकी और लगा
आना, अम्मा। "
अचानक ही प्रकासा के खुले मुख से निकला -"आँ --!"
रसोई की ओर बढ़ती हुई रंन्नों बोलउठी --"हाँ --!" ०००
3.फ़ाइलों के बीच
क्लर्क रामबाबू आलमारी से फ़ाइलें निकालते हुए मनोज से बोले," मनोज, लिफ़ाफ़ा लाये !"
" जी, तीन -चार फाइलों के बीच में दबा दिया है।"
रामबाबू ने ऊपर की कुछ फ़ाइलें देख डालीं। लिफ़ाफ़ा नहीं दीखा , तो उन्होंने मनोज से उसे निकाल कर सबसे ऊपर वाली फ़ाइल में रखने को कहा और चले गये ।
वह लिफाफा किसी फ़ाइल से नीचे गिर गया । हैड क्लर्क मोबाइल पर बात करते-करते आते हैंऔर लिफ़ाफ़ा उठा कर अपने बैग में रखने ही वाले थे कि बड़े साहब राउंड पर आगये और हैड क्लर्क जल्दी से पैड के नीचे लिफ़ाफ़े को खिसका कर खड़े होगये । बड़े साहब ताड़ गये और लिफ़ाफ़ा देख कर बोले,"यह क्या है !"
हैड क्लर्क ने कांपती आवाज़ में रामबाबू का नाम लिया।
रामबाबू को बुला कर पूछा गया।उसने मनोज का नाम लगा दिया।
मनोज ने कांपते हुए हाथ जोड़ कर कहा, " साहब जी, मुझे पवन सर ने राम बाबू सर को देने
कोकहा था । "
पवन को तुरंत बुलाया गया ।
बड़े साहब की त्यौरी देखकर पवन क़बूल गये," साहब, नमकौरी गांव के दिनेश ने अपनी शिक्षिका बहन केकिसी काम के लिए ये पैसे भेजे थे।"
बड़े साहब आग-बबूला हो रहे थे। " तुम लोगों की शर्म नहीं आयी खुलेआम रिश्वत लेते हुए और वह भी खुले लिफ़ाफ़े में ।
अगर पकड़े गये, तो नानी याद आ जायेगी । चलो सब मेरे कक्ष में चलो ।अभी ख़बर लेता हूँ तुम सबकी ।हद हो गयी ।"
जैसे ही सब निकले बड़े साहब ने मनोज को इशारे से बुलाकर कहा," देख, इस लिफ़ाफ़े को फेवीकोल से अच्छी तरह चिपका कर मेरी गाड़ी की पिछली सीट पर रखीं फाइलों के बीच में रख दे जाकर !" ०००
4.फ़ाइल
दरवाज़े की ओर सर घुमा कर क्लर्क ने कहा , " काय कूँ रोज -रोज चक्कर लगाया करती हो, अम्मा। "
" बेटा, मेरी फाइल ।"
अम्मा के काँपते होठों से इतना ही निकला ।
" अच्छा, वो।ठीक है,देख लेंगे।
हाँ तो अम्मा ,तुम जे बताओ,
कुछ खेत -टपरिया है तुम्हारे पास," क्लर्क खुसपुसा कर बोला ।
" हाँ बेटा,दो बीघा खेत है।"
"उसमें क्या बोया जाता है।"
"गेहूँ । खाने भर को हो जाता है ।"
" अच्छा ठीक है, मैं बीस किलो तुम्हारे घर से उठवा लूँगा ।"
"लेकिन बेटा फिर हम खायेंगे क्या।दवा दारू भी उसी से चलती है ।"
" अब तुम यह चाहती हो कि काम भी हो जाये, जल्दी भी हो जाये, सही भी हो जाये , पैसा भी न लगे, तो यह तो नामुमकिन है। सोच लो, अम्मा।"
मरता क्या न करता। अम्मा ने सोचा कि रोज -रोज दौड़ते दौड़ते यह बूढ़ा जर्जर शरीर थक चुका है। इससे तो अच्छा है कि कुछ दिन भूखे ही रह लेंगे।
उसने गिड़गिड़ा कर कहा, "अच्छा,बेटा , ले लो, लेकिन काम तो हो जायेगा।"
क्लर्क ने खुश होकर कहा,"क्यों
नहीं , क्यों नहीं,"--और अलमारी से उसने तेजी से फ़ाइल खींची और अम्मा ने गहरी साँस। ०००
5. निर्णय
" रोज़ -रोज़ के झगड़ों से तंग आ चुके हम। देखो, एक निर्णय ले लो। बेटे के साथ पुणे में रहोगी या मेरे साथ यहाँ ", दिवाकर ने पत्नी सुनीता को घूर कर देखते हुए ज़ोर से कहा।
सुनीता ने भी घूर कर देखते हुए उसी तेवर में कहा, "तुम भी एक निर्णय ले लो। बेटे के साथ रहोगे या मेरे साथ!"
"यह क्या बात हुई! बात तो एक ही है", चौंक कर दिवाकर ने खिसियाते हुए कहा।
" बिलकुल नहीं, "सुनीता ने एक पल रुककर दृढ़ता से कहा,"तुम्हारी बात में पुरुष प्रधान मानसिकता की गन्ध आ रही है। यह घर भी मेरा है, बेटा भी मेरा है और तुम भी मेरे हो। मैं किसी को भी नहीं छोड़ूँगी। तुमको जहाँ जाना है, अकेले निकल जाओ।"
दिवाकर ने ऑंखें झुका लीं और
धीमी आवाज़ में कहा, "अच्छा, ठीक है, जहाँ भी रहेंगे, हम दोनो साथ रहेंगे।"दोनो के चेहरों पर मुस्कान खिल उठी। ०००
आधुनिक समाज का आईना
मिथिलेश दीक्षित की ये पाँचों लघुकथाएँ—“छोटी कोठरी”, “डुबकी”, “फ़ाइलों के बीच”, “फ़ाइल” और “निर्णय”—समकालीन जीवन की विडंबनाओं, सामाजिक व्यवहार, नौकरशाही की सच्चाइयों और पारिवारिक संबंधों की जटिलता को अत्यंत सरल, संवादात्मक और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं की सबसे बड़ी विशेषता है—छोटे-छोटे संवादों में गहरी सामाजिक सच्चाइयों का उद्घाटन :-
1. “छोटी कोठरी” —
संस्कारों का विडंबनात्मक प्रतिबिंब ।यह कथा एक बच्चे की मासूम बातचीत के माध्यम से पीढ़ीगत सोच और बदलते मूल्यों को उजागर करती है।बच्चे की कल्पना में “भविष्य का सुख” भौतिकता से जुड़ा है। दादा-दादी के प्रति व्यवहार में उपेक्षा की झलक आज परिवार में बदलते संस्कारों की चिंता को दर्शाता है। लघुकथा का अंत अत्यंत तीखा और झकझोर देने वाला व्यंग्य प्रस्तुत करता है। बच्चा जो सुनता है, वही सीखता है—और वही भविष्य बनाता है। यह कथा आधुनिक परिवारों को आत्मचिंतन के लिए मजबूर करती है।
2. “डुबकी” —
परंपरा बनाम शोषण का संघर्ष ।यह कथा सास-बहू संबंधों के माध्यम से पुरानी मानसिकता और श्रम-शोषण को दिखाती है। बहू से अनावश्यक श्रम कराना “गंगा डुबकी” जैसी धार्मिक भावना का भावनात्मक उपयोग है। नई पीढ़ी का प्रतिरोध और व्यंग्य। लघुकथा में संवाद अत्यंत जीवंत और लोकभाषा से जुड़ा हुआ है। “डुबकी” प्रतीक बन जाती है—पाप-मोचन और सामाजिक दबाव दोनों का।
3. “फ़ाइलों के बीच” —
भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का व्यंग्य किया गया है।यह कथा कार्यालयी जीवन की सच्चाई को उजागर करती है। लिफाफा (रिश्वत) का इधर-उधर होना । जिम्मेदारी से भागना अधिकारी का दोहरा चरित्र। यह कथा अत्यंत तीखे व्यंग्य और यथार्थवादी प्रस्तुति की मिसाल है। “लिफाफा” यहाँ केवल वस्तु नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का प्रतीक बन जाता है।
4. “फ़ाइल” —
प्रशासनिक व्यवस्था पर करुण व्यंग्य। यह लघुकथा एक वृद्धा और कार्यालयी व्यवस्था के बीच संघर्ष को दिखाती है।गरीब और असहाय व्यक्ति की मजबूरी। “काम कराने” की कीमत व्यवस्था की संवेदनहीनता। यह कथा करुणा और व्यंग्य का संतुलित मिश्रण है। वृद्धा की “फाइल” वास्तव में उसका जीवन और अधिकार है जिसे व्यवस्था रोक देती है।
5. “निर्णय” —
आधुनिक दांपत्य जीवन का यथार्थ । यह कथा पति-पत्नी और पुत्र के बीच संबंधों की पुनर्संरचना को दर्शाती है।अधिकार बनाम संबंध ।परिवार में सत्ता-संतुलन। अंततः समझौता और प्रेम। लघुकथा का अंत सकारात्मक है जहाँ टकराव के बाद सामंजस्य और साथ रहने की भावना उभरती है।
इन पाँचों लघुकथाओं की संयुक्त विशेषताएँ—
1. संवाद प्रधान शैली
लघुकथाएं लगभग पूरी तरह संवादों पर आधारित हैं, जिससे वे जीवंत और नाटकीय बनती हैं।
2. सामाजिक व्यंग्य
भ्रष्टाचार, पारिवारिक विडंबना, परंपरा और आधुनिकता के टकराव को तीखे व्यंग्य में प्रस्तुत किया गया है।
3. यथार्थ चित्रण
हर लघुकथा समाज के किसी न किसी वास्तविक चेहरे को उजागर करती है।
4. सरल भाषा
भाषा सहज, बोलचाल की और प्रभावशाली है, जिससे पाठक सीधे जुड़ता है।
5. संदेशात्मकता
हर कथा के अंत में एक स्पष्ट सामाजिक या नैतिक संदेश निहित है।
निष्कर्ष
डॉ. मिथिलेश दीक्षित की ये लघुकथाएँ आधुनिक समाज का आईना हैं—जहाँ हँसी के पीछे व्यंग्य है, संवाद के पीछे सच्चाई है और सरल कथानक के भीतर गहरे सामाजिक प्रश्न छिपे हैं।समग्र रूप से कहा जा सकता है— “ये लघुकथाएँ केवल कहानियाँ नहीं, बल्कि समाज की चुप चीखें हैं, जिन्हें लेखक ने संवेदना और व्यंग्य के साथ स्वर दिया है।”
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
विभिन्न संघर्षों का सजीव चित्रण
आदरणीय डॉ.मिथिलेश दीक्षित जी की प्रस्तुत लघुकथाएं आम जीवन से जुड़ी घटनाओं का प्रतिबिंब हैं। जिन्हें बहुत ही सरसता से उकेरा गया है :-
1.छोटी कोठरी
यह बात सच है कि बेटे बचपन में जितना पढ़ाई से सीखते हैं, उससे कहीं अधिक वे अपने माता-पिता के अपने परिजनों के प्रति व्यवहार से सीखते हैं। प्रस्तुत लघुकथा इस बात को सिद्ध करती है।अच्छा कथ्य,अच्छे शिल्प के साथ, समाज को अच्छा संदेश देने वाली अच्छी लघुकथा।
2. डुबकी
ओछी मानसिकता और दकियानूसी सोच को चित्रित करती लघूकथा। सास की बहू के प्रति कटुता और कठोरता का यथार्थ चित्रण ।
3. फ़ाइलों के बीच
रिश्वतखोरी को लेकर अधिकारी और स्टाफ के बीच के तालमेल का वास्तविक चित्रण। ऐसे कथ्य को लेकर अनेक लघुकथाएं लिखी जाती हैं। नयापन नहीं है। फिर भी अच्छी लघुकथा की श्रेणी में रखने योग्य।
4.फ़ाइल
आफिस में निर्लज्जता और निर्दयता से लिये जाने वाली रिश्वतखोरी के अनेक किस्से रोज देखने मिलते हैं। इस लघुकथा में इस बात को बहुत ही वास्तविकता के साथ चित्रित किया गया है। अच्छा कथ्य।अच्छा शिल्प।
5.निर्णय
इस लघुकथा में विशेष कुछ नहीं। अस्पष्ट कथ्य और कमजोर शिल्प से लघुकथा में वांछित आकर्षण नहीं। कुलमिलाकर आदरणीय डॉ.मिथिलेश जी की लघुकथाओं में आम जीवन के विभिन्न संघर्षों का सजीव चित्रण है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडलवारा - मध्यप्रदेश
शब्दों का सटीक प्रयोग
देश ही नहीं विदेशों में भी अपने साहित्य सृजन में चर्चित आदरणीय डा. मिथलेष दीक्षित जी की पाँचों लघुकथाएँ लघुकथा के हर मानक पर खरी उतरती है। साहित्य का मूल उद्देश्य है समाज में कोई सकारात्मक संदेश देना। :-
1."छोटी कोठरी"
मएक बच्चे के माध्यम से लेखिका ने वर्तमान पीढ़ी को अपने माँबाप के प्रति उपेक्षित व्यवहार पर चेतावनी जताई है कि जो वह अपने माँबाप के साथ कर रहे हैं उनका बच्चा भी भविष्य में वैसा ही करेगा। हाँलाकि विषय पुराना है पर प्रस्तुतीकरण नया है जो पाठक को अंत तक बाँधे रखता है।
2."डुबकी"
लेखिका ने बड़े रोचक ढंग से बेटी रन्नो के माध्यम से अपनी माँ प्रकासा को यह संदेश दिया गया है कि जैसा व्यवहार वह अपनी बहू के साथ कर रही है वही व्यवहार उसकी बेटी को भी अपनी ससुराल में मिलेगा तो उसे कैसा लगेगा।
3. “फ़ाइलों के बीच”
लघुकथा रिश्वतखोरी पर करारा व्यंग्य है कि किस तरह सरकारी तंत्र का ऊपर से लेकर नीचे तक का स्टाफ लिफाफे के चक्कर में रहता है।
4. "फाइल "
यह दर्शाती है कि एक सरकारी कर्मी किस हद तक लालची और संवेदनहीन हो सकता है।
5. "निर्णय "
आम दम्पतियों की तरह पति-पत्नी की बढ़ती उम्र में प्यारी सी नोक-झोंक है जो जिस तरह शुरू हुई उसी तरह खत्म भी हो गई।
हर लघुकथा के सटीक शीर्षक हैं और अंत भी पंचलाइन पर हुआ है जो लघुकथाकार के आवश्यक अंग हैं।हर लघुकथा के दमदार कथानक हैं।शब्दों का सटीक प्रयोग है।कुछ अनावश्यक नहीं लिखा गया।लघुकथा लेखन में लेखिका सिद्धहस्त हैं।
- मंजू सक्सेना
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
दीक्षित की लघुकथाओं पर मेरे विचार
छोटी कोठरी :-
प्रकृति का नियम है कि जैसा बोयेगे ,वैसा ही काटोगे । बचपन से ही बच्चे अपने माता -पिता का घर के बुजुर्गों के प्रति व्यवहार देखते हैं तदानुसार उनकी सोच भी अपने माँ-बाप के प्रति हो जाती हैं l वर्तमान त्रासदी पर सटीक लघुकथा l
डुबकी :-
बहू और बेटी के प्रति अलग अलग सोच रखने की प्रवत्ति को दर्शाती लघुकथा । यही सोच घरों मे अशांति का प्रमुख कारण हैं l
फाइलों के बीच :-
चोर -चोर मौसेरे भाई को चरितार्थ करती लघुकथा । जहाँ पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट हो वहाँ भगवान ही मालिक है l
फाइल :-
यह लघुकथा भ्रषटाचार का दूसरा रूप प्रस्तुत कर रही है जहाँ काम के बदले खुले आम रिश्वत मांगी जा रही है l भ्रष्ट का कोई ईमान नहीं होता है उसके मन में बुजुर्गों के प्रति भी कोई दया नहीं होती है ।
निर्णय :-
पति -पत्नि कै मध्य जब तक ईगो रहता है तब तक घर में अशांति रहती है । आपसी समझ एवं सहमति से ही पारिवारिक हल सौहार्द पूर्ण तरीके से निकाला जा सकता है ।
- निहाल चन्द्र शिवहरे
झांसी - उत्तर प्रदेश
पांचों लघुकथा की समीक्षा
आदरणीया मिथिलेश दीक्षित जी की लघुकथाओं की समीक्षा की है जो निम्न प्रकार से प्रस्तुत है :-
डुबकी
पुरातनपंथी, रूढ़िवादी विचारों की गठरी खोल दी। ससुराल का ऐसा ही खौफ नई ब्याही लड़कियों के मन में जारी रहता था। लेकिन यहाँ नन्द की भुमिका सुखद है।भाभी का साथ देती ननद और नई सोच को आगे बढ़ाना ,इस लघुकथा का सबसे सुदृढ़ और सार्थक पहलू है।
छोटी कोठरी
जैसा बोएंगे वैसा ही काटना पड़ेगा। इस उक्ति को अक्षरता उकेरती है ये लघुकथा।बालमन वह सत्य समक्ष ले आता है जो अपने स्वार्थ के आगे बेटा सोचना ही नहीं चाहता। आज के परिवेश में ऐसी लघुकथाएं आना आवश्यक है।समाज की भौतिकवादी मानसिकता पर कुठाराघात करना अति आवश्यक भी है।
निर्णय
निर्णय में एक दंपति की आपसी खींचतान को बहुत सरल भाव से उकेरा है।एक स्त्री विवाह के पश्चात अपने पति-धर्म का तन-मन से निर्वाह करती है और सदैव कोशिश करती है कि परिवार बिखरे नहीं। इसके लिए कभी कोमल, कभी तीखे शब्दों में अपना प्रतिकार करती है। सहजता से प्रवाहित होती लघुकथा।" तुमको जहाँ निकलना है निकल जाओ" तक लघुकथा पूर्ण हो सकती है।
फ़ाइल
भ्रष्ट्राचार से पीसता आम आदमी , जिसे हर कोई लूटने को तैयार बैठा है। तिल-तिल होम होते ऐसे किरदारों की सुध लेने के लिए कोई नहीं बैठा। इस बेबसी,पीड़ा को बारीकी से उभारती है " फ़ाइल"।
फ़ाइलों के बीच
ये खेल बहुत पुराना है। कई महकमें इसकी चपेट में है। नीचे से लेकर ऊपर तक सब इस जद में आते हैं। मेज़ के नीचे या फाइलों में दबे नोट भ्रष्ट सरकारी तंत्र की कहानी सुनाता तो है पर किसी के कान में जूँ नहीं रेंगती क्योंकि सब रंगे सियार है।खूब गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार पर एक बेहतरीन लघुकथा
- अंजू निगम
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
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समसामयिक ज्वलंत मुद्दे
छोटी कोठरी
पुराने विषय पर सुंदर प्रस्तुति दी गई है। पिता और पुत्र के बीच संवादों के माध्यम से लेखिका ऋ बहुत ही सुंदर ढंग से अपना संदेश देने में सफल रही हैं इस लघुकथा में।एक उत्कृष्ट लघुकथा।
डुबकी
एक उत्कृष्ट सृजन। पुराने जमाने की सोच वाली सास को उनकी खुद की बेटी ही आईना दिखाई और इशारे इशारे में अपनी सोच बदलने की बात कह दी। सुंदर प्रस्तुति।एक भी अनावश्यक शब्द नहीं।सुंदर लघुकथा।
फाइलों के बीच
डॉक्टर मिथिलेश दीक्षित की एक बेहतरीन लघुकथा है।इसमें ऑफिसों में चल रही घूसखोरी का पर्दाफाश किया गया है। हमाम में सभी नंगे हैं वाले मुहावरा को चरितार्थ करती इस लघुकथा की प्रस्तुति और अंत बड़ा शानदार है।
फ़ाइल
लघुकथा फाइल भी एक बेहतरीन रचना है।कथा की बुनावट लाज़वाब है।लालफीताशाही और रिश्वतखोरी के चलते एक गरीब औरत की लाचारी को बड़े ही मार्मिक रूप से चित्रित किया गया है।शीर्षक भी बिल्कुल सटीक है।
निर्णय
लेखिका डॉक्टर मिथिलेश दीक्षित की लघुकथा निर्णय आज के पारिवारिक जीवन की मार्मिक स्थिति का एक आईना है।नौकरीपेशा बेटे के साथ उसके कर्मस्थल पर रहे या अपने पैतृक घर पर यह गंभीर प्रश्न आज के माता पिता के साथ है।कहीं न कहीं दोनों को समझौता करने पड़ते हैं।समसामयिक ज्वलंत मुद्दे पर लेखिका ने उत्कृष्ट सृजन किया है।
- निर्मल कुमार दे
जमशेदपुर - झारखंड
छोटे कलेवर में बड़ा प्रश्न
डॉ. मिथिलेश दीक्षित की ये पाँचों लघुकथाएँ अपने छोटे कलेवर में बड़ा प्रश्न खड़ा करती है और पाठक को भीतर तक सोचने के लिए विवश कर देती है :-
1. छोटी कोठरी — संवेदनाओं को झकझोरती लघुकथा
यह लघुकथा आधुनिक परिवारों में वृद्धों की उपेक्षा पर तीखा व्यंग्य करती है। बालमन की निष्कपटता के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाया है कि बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं। अक्षत का सहज उत्तर पाठक को भीतर तक झकझोर देता है। कथा का अंत अत्यंत प्रभावी है और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। बिना किसी उपदेश के लेखिका ने पीढ़ियों के बदलते संबंधों की विडम्बना को अत्यंत मार्मिकता से उकेरा है।
2. डुबकी — स्त्री-जीवन की पीड़ा और प्रतिरोध का सशक्त चित्र
यह लघुकथा पारंपरिक सोच और स्त्री-शोषण की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती है। प्रकासा का चरित्र पुराने संस्कारों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि रंन्नों नई चेतना और प्रतिरोध की आवाज़ बनकर उभरती है। “गंगा मैया में एक डुबकी और लगा आना” जैसा संवाद कथा को अत्यंत प्रभावशाली बना देता है। ग्रामीण परिवेश, लोकभाषा और संवादों की स्वाभाविकता कथा को जीवंत बना देती है।
3. फ़ाइलों के बीच — भ्रष्ट व्यवस्था का सजीव दस्तावेज
यह लघुकथा सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र पर तीखा व्यंग्य है। कथा क्रमिक रूप से आगे बढ़ती है और अंत में बड़े साहब का असली चेहरा सामने आते ही पूरी व्यवस्था की पोल खुल जाती है। लेखिका ने अत्यंत कुशलता से यह दिखाया है कि भ्रष्टाचार केवल नीचे के स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि शीर्ष तक फैला हुआ है। कथा का अंत चौंकाने वाला होने के साथ-साथ गहरी व्यंग्यात्मक चोट करता है।
4. फ़ाइल — व्यवस्था के सामने विवश आम आदमी की त्रासदी
यह लघुकथा संवेदनहीन प्रशासनिक व्यवस्था का करुण चित्र प्रस्तुत करती है। बूढ़ी अम्मा की विवशता और क्लर्क की लालच भरी मानसिकता पाठक के भीतर पीड़ा उत्पन्न करती है। “मरता क्या न करता” जैसी स्थिति आज भी समाज की कटु सच्चाई है। कम शब्दों में इतनी बड़ी सामाजिक विडम्बना को उभारना लेखिका की रचनात्मक दक्षता का परिचायक है। कथा अत्यंत मार्मिक और यथार्थपरक है।
5. निर्णय — नारी चेतना और समानता का सकारात्मक स्वर
यह लघुकथा पति-पत्नी संबंधों में समानता और आत्मसम्मान का सुंदर संदेश देती है। सुनीता का आत्मविश्वास और स्पष्ट दृष्टिकोण उसे सशक्त स्त्री के रूप में स्थापित करता है। लेखिका ने बिना कटुता के नारी-अस्मिता की बात कही है। कथा का अंत सौहार्द और पारस्परिक समझ के भाव से भरपूर है, जो इसे अत्यंत सकारात्मक बना देता है।
मूल्यांकन
इन पाँचों लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना, व्यंग्य और संदेश का सुंदर संतुलन देखने को मिलता है। डॉ. मिथिलेश दीक्षित की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता रखती हैं। संवाद स्वाभाविक हैं, कथानक सशक्त हैं और अंत प्रभावशाली। ये लघुकथाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित भी करती हैं।
- उमा मिश्रा "प्रीति "
जबलपुर - मध्यप्रदेश
चिंतनीय और विचारणीय
मिथिलेश दीक्षित जी का नाम साहित्य जगत में जाना पहचाना है। आज आपकी लघुकथाएँ पढ़ रही हूँ :-
(१) छोटी कोठरी —
बच्चे ही माँ -बाप को आईना दिखाने का काम करते हैं। कर सकते हैं।बहुत सार्थक लघुकथा। संवाद शैली में सरल -सहज भाषा में गहरे चिंतन के लिए व्यापक फलक देती लघुकथा। बहुत सशक्त संदेश।
(२) डुबकी -
यह लघुकथा भी कुछ उसी तर्ज़ पर हकीकत बयान करती है। बेटी का माँ को समझाना अधिक सरल और लाभप्रद है। जब तक मनुष्य पर आप बीती वाली बात नहीं होती । तब तक सही दृश्य सामने नहीं आता। बहुत ही सलीके से समझाना, सुखद। काश! कि हर ननद ऐसी विचारों वाली हो सार्थक संदेश देती लघुकथा।
(३) फ़ाइलों के बीच —
यही वजह है कि घूस लेना-देना बंद नहीं हो पाता। सब ललचाए हैं । कौन किसे रोके-टोके। कितना भी कहो “ न खाऊँगा न खाने दूँगा “ कितने ऐसा कर पाते है?सबके हिस्से(प्रतिशत में) बँटे होते हैं। मातहतों को डॉंटने वाला खुद मनोज को लिफाफा अपनी गाड़ी में रखने के लिए कहता है। अब मनोज क्या करेगा? वह भी तो यही करेगा। सत्य का उद्घाटन करती लघुकथा। यह कथा जिन तक पहुँचनी चाहिए वहाँ कभी पहुँचती ही नहीं। यही तो दुःख की बात है।
(४) फ़ाइल —
कोई किसी को नहीं छोड़ता। ये केस भी सब झूठे बनाए गए होंगे महज़ सीधी -सादी जनता को परेशान करने के लिए। यही सच है आज के जमाने का। क्या किया जा सकता है। कैसे निजात मिले इसका समाधान भी लघुकथाओं में आना चाहिए। बहुत बढ़िया ।
(५) निर्णय —
यह हुई न बात ! एक नए मिज़ाज की लघुकथा। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और अहम् के दबाव में गलत निर्णय लेने से बचाव करती बुद्धिमान स्त्री द्वारा सही निर्णय का ऐलान करती बेहतरीन लघुकथा।
बहुत-बहुत बधाई !मिथिलेश जी! आपकी सभी लघुकथाएं बहुत अच्छी हैं। सरल भाषा में गहन विचारों को सम्प्रेषित करती हैं। चिंतनीय और विचारणीय ।
- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘
अमेरिका
कथ्य की दृष्टि से सभी रचनाएँ सशक्त
ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक विसंगतियों, पारिवारिक संबंधों और मानवीय व्यवहार के विभिन्न पक्षों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कम शब्दों में तीखा व्यंग्य और गहरा संदेश पाठक तक पहुँचता है।
1. छोटी कोठरी
यह लघुकथा पीढ़ियों के बीच व्यवहार की विरासत को बहुत मार्मिक ढंग से सामने लाती है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। अक्षत का मासूम उत्तर कहानी का सबसे सशक्त बिंदु है, जो पिता को आईना दिखा देता है। अंत अत्यंत प्रभावशाली और विचारोत्तेजक है।
2. डुबकी
यह कथा पुराने समय की सासों द्वारा बहुओं पर किए जाने वाले मानसिक उत्पीड़न पर व्यंग्य करती है। प्रकासा का बहू को परेशान करने का षड्यंत्र और रन्नो का चुटीला प्रत्युत्तर कथा को जीवंत बनाता है। संवाद स्वाभाविक हैं और अंत में उत्पन्न हास्य के साथ एक सामाजिक संदेश भी उभरता है।
3. फ़ाइलों के बीच
भ्रष्टाचार की जड़ों पर करारा प्रहार करती यह लघुकथा अत्यंत सफल है। छोटे कर्मचारियों से लेकर बड़े अधिकारी तक रिश्वतखोरी की श्रृंखला में शामिल दिखाई देते हैं। अंत में बड़े साहब का असली चेहरा सामने आना कथा को व्यंग्यात्मक ऊँचाई प्रदान करता है। शीर्षक भी कथ्य के अनुरूप सार्थक है।
4. फ़ाइल
सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और आम नागरिक की विवशता का यथार्थ चित्रण इस कथा में हुआ है। अम्मा का असहाय चरित्र पाठक की संवेदना जगाता है। “बीस किलो गेहूँ” रिश्वत के रूप में माँगना व्यवस्था की क्रूरता को उजागर करता है। कथा का अंत प्रभावी और मार्मिक है।
5. निर्णय
यह लघुकथा दांपत्य संबंधों में समानता और स्त्री-अस्मिता का सशक्त पक्ष प्रस्तुत करती है। सुनीता का आत्मविश्वासपूर्ण उत्तर पुरुष प्रधान सोच को चुनौती देता है। कथा का संदेश स्पष्ट है कि परिवार किसी एक का नहीं, बल्कि सभी का साझा संसार है। अंत सकारात्मक और संतुलित है।
इन पाँचों लघुकथाओं में कथ्य की विविधता, संवादों की सहजता और अंत में आने वाला प्रभावशाली मोड़ विशेष रूप से आकर्षित करता है। लेखक ने सामाजिक यथार्थ को बिना उपदेशात्मक हुए प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से “छोटी कोठरी”, “फ़ाइलों के बीच” और “फ़ाइल” अपनी तीक्ष्ण व्यंग्यात्मकता और मारक अंत के कारण अधिक प्रभाव छोड़ती हैं। कहीं-कहीं भाषा और विराम चिह्नों का थोड़ा संपादन किया जा सकता है, परंतु कथ्य की दृष्टि से सभी रचनाएँ सशक्त हैं। ये लघुकथाएँ पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देतीं, बल्कि सोचने के लिए भी विवश करती हैं, जो किसी भी सफल लघुकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
- सीमा वर्मा
लुधियाना - पंजाब
विसंगतियों पर तीखा प्रहार
डॉ. मिथिलेश दीक्षित की पाँचों लघुकथाएँ समकालीन सामाजिक यथार्थ, मानवीय संबंधों और व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं। भाषा सरल है, कथ्य प्रभावशाली है और अंत में आने वाला व्यंग्यात्मक या मार्मिक मोड़ पाठक को सोचने पर विवश कर देता है :-
1. छोटी कोठरी
यह लघुकथा पीढ़ियों के बीच व्यवहार के बदलते स्वरूप और बच्चों पर पड़ने वाले पारिवारिक संस्कारों के प्रभाव को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। अक्षत का मासूम उत्तर वास्तव में उसके घर के वातावरण का प्रतिबिंब है। कथा का अंत झकझोर देता है और यह संदेश देता है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं।
2. डुबकी
यह कथा पारिवारिक सत्ता, स्त्री-शोषण और पुरानी मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करती है। प्रकासा का बहू को व्यर्थ के कामों में उलझाने का षड्यंत्र और रन्नो का तर्कपूर्ण प्रतिवाद कथा को जीवंत बना देता है। अंतिम संवाद में निहित व्यंग्य कथा की सबसे बड़ी शक्ति है।
3. फ़ाइलों के बीच
सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की परत-दर-परत तस्वीर इस लघुकथा में उभरती है। रिश्वतखोरी की श्रृंखला नीचे से ऊपर तक फैली हुई दिखाई देती है। सबसे प्रभावशाली बात यह है कि जो अधिकारी दूसरों को डाँट रहा है, वही अंततः उसी भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा निकलता है। कथा का अंत अत्यंत सशक्त और व्यंग्यपूर्ण है।
4. फ़ाइल
यह लघुकथा व्यवस्था की संवेदनहीनता और गरीब व्यक्ति की विवशता को मार्मिक ढंग से सामने लाती है। एक वृद्धा को अपने ही अधिकार के लिए रिश्वत देने को मजबूर होना पड़ता है। क्लर्क का व्यवहार और अम्मा की बेबसी पाठक के मन में करुणा और आक्रोश दोनों उत्पन्न करते हैं। संक्षिप्त होते हुए भी कथा गहरा प्रभाव छोड़ती है।
5. निर्णय
यह कथा दांपत्य संबंधों में समानता, सम्मान और स्त्री-अस्मिता का सुंदर संदेश देती है। सुनीता का आत्मविश्वासपूर्ण उत्तर पुरुष प्रधान सोच को चुनौती देता है। संवादों के माध्यम से कथाकार ने बिना किसी उपदेश के एक सकारात्मक और संतुलित समाधान प्रस्तुत किया है। कथा का अंत सुखद और प्रेरक है।
- अलका पाण्डेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
आधुनिक समाज के मुँह पर तमाचा
डॉ. मिथिलेश दीक्षित द्वारा रचित लघुकथाएँ आधुनिक समाज के मुँह पर तमाचा हैं, समाज को आईना दिखाती हैं :-
1.'छोटी कोठरी'
मुख्यपात्र विक्रम अपने बेटे अक्षत की पढ़ाई को लेकर प्रशंसा करते हुए भविष्य की सुनहरी इमारत बना लेता है जहाँ बेटू अक्षत का विवाह हो जाता है। फिर अक्षत कहता है कि 'फिर हम लोग बड़े-बड़े कमरों में रहा करेंगे और मम्मी-पापा को पीछे वाली छोटी कोठरी में रहने देंगे जैसी आपने दादू को दी है।' पिता विक्रम अवाक रह गया। सबके कर्मों की खेती होती है और जो बोओगे, वही काटोगे, की शिक्षा देती लघुकथा है।
2. 'डुबकी'
रन्नो अपनी माँ प्रकासा को भाभी को तंग न करने की सलाह देती है। कहीं रन्नो को भी प्रकासा जैसी सास मिल गई तो? यह लघुकथा चेतावनी देती है कि जैसा करोगे, वैसा भरना भी पड़ सकता है।
3.'फाइलों के बीच'
रिश्वतखोरी के हमाम में सभी नंगे हैं। ऊपर से नीचे तक सब भ्रष्ट हैं। इस लघुकथा में सरकारी दफ्तरों का बदरंग हाल दिखाया है।
4. ' फाइल'
ऐसी ही लघुकथा है। गरीब-गुरबत को भी नोचने से बाज नहीं आते सरकारी लोग ।
5.'निर्णय'
लघुकथा में पति-पत्नी की लड़ाई में पत्नी पति की बात को घुमाकर जता देती है कि उसका घर है, बेटा भी उसका और पति भी उसका ! पुरुष प्रधान समाज के अहं पर चोट करती अच्छी लघुकथा है यह ।
आधुनिक समाज का चित्र खींचती सभी लघुकथाएँ सोद्देश्य हैं तथा निम्न मानसिकता बदलने का दम रखती हैं।
- अंजु दुआ जैमिनी
फरीदाबाद - हरियाणा
लघुकथाओं का गठन और प्रभाव अंत तक
डॉक्टर मिथिलेश दीक्षित की लघुकथाओं की समीक्षा :-
(1 ) छोटी कोठरी
छोटी कोठरी में रहने वाले लोगों की आकांक्षाएं छोटी ना होकर ऊंची ही होती हैं पर स्वार्थ के सामने छोटी हो जाती हैं। इसमें बचपन से धन प्राप्ति की लालसा, भौतिक जीवन की बड़ी चाहत ,संस्कारों का प्रभाव हावी होता देखा गया। बेटे अक्षत पर यथा भविष्य में बड़ा और धनवान होना पर ऐशोआराम के सामने वृद्धों की अपेक्षा के प्रतिकार को बड़े रोचक एवम प्रभावी ढंग से कथा कलेवर में बुना गया है ।भाषा सरस, सहज पात्रानुकूल, संवाद प्रधान है।
2. डुबकी
सास का बहू के प्रति परंपरागत रवैया बयां करती यह लघु कथा सुंदर है पर वर्तमान रिश्तो में ननद का भाभी के प्रति प्यार, करूणा, सहज आत्मीयता का भाव साथ ही ननद के द्वारा मां को सुधारने की कोशिश नवीनतम प्रभावकारी है। संवाद प्रधान कथ्य सरल भाषा से युक्त है; ऊबाऊ नहीं है।
3 . फ़ाइलों के बीच
वर्तमान समय में ऑफिस में रिश्वतखोरी के गुपचुप तरीके ऊपर से नीचे तक सब एक थैली के चट्टे बट्टे होते हैं; देखा जा सकता है। सभी की मिली भगत रहती है इस कथा के माध्यम से अंत तक परिणाम पर पहुंचने की उत्सुकता रोचक बनी रही संवादों के माध्यम से। शीर्षक प्रधान कथ्य है।
4 . फाइल
फाइलों के बीच जैसी ही यह भी "फाइल" लघुकथा है ।यहां एक क्लर्क की मानसिकता को उजागर किया गया है वह किसी भी हद तक किसी के भी साथ रिश्वत के सामने समझौता नहीं कर सकता। वृद्धावस्था , असहायता, निर्धनता ,भुखमरी, लाचारी एक रिश्वतखोर के सामने कोई मायने नहीं रखती ।बस इस लघु कथा में रिश्वत लेने का तरीका अलग है। हृदयहीनता के साथ चतुरता के उदाहरण को प्रस्तुत किया गया है।
5. निर्णय
संवाद के माध्यम से इक समझदार पत्नी सुनीता के निर्णयात्मक वक्तव्यों से टूटते परिवार को बचाने की प्रकिया प्रभावकारी है। यहां पुरूष मानसिकता ने भविष्य के भंयकर आगत परिणामों से बचने के लिए जो स्वीकृति दर्शायी ; नि:संदेह पति दिवाकर के विवेक का परिचायक है। परिवार के जुड़ाव के लिए यथार्थ आदर्श से युक्त सन्देशपरक लघुकथा है।
मूलतः-
माननीया लघुकथाकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित जी की पांचों लघुकथाएं उत्तम, संवाद प्रधान, समकालीन समाज की विसंगतियों को सुंदरता से और कुशलता से चित्रण करती स्पष्ट और यथार्थ से जुड़ी हुई हैं। लेखिका सभी कथाओं में मुख्य भाव के साथ शीर्षक और उद्देश्य को स्पष्ट करने में सक्षम है। शिल्प संरचना की दृष्टि से सभी लघुकथाओं का गठन और प्रभाव अंत तक बना रहा है जो की प्रभावकारी एवं प्रशंसनीय है।
इन लघुकथाओं को पढ़ गया । यह नई सोच की कथा है , प्रभावशाली ।
ReplyDeleteपहली लघुकथा - छोटी कोठरी का विषय बहुत पुराना और पिटा - पिटाया है ।अंत इसी लिए पंच नहीं बन पाया ।
दूसरी का विषय भी पुराना है । डुबकी में वही सास - बहू । हमारे सामने विषयों की कमी नहीं है । बदलता समाज , मूल्य , नैतिकता , निरंतर बदलते वैज्ञानिक उपकरणों का हम पर प्रभाव , आदि हमारे विषय बन सकते हैं।
इसी प्रकार - फ़ाइलों के बीच , और फ़ाइल जैसी लघुकथाएं हैं ।
आपके पास भाषा है , सीमित कसी कहन शैली है । ज़रूरत नए विषयों की है , दृष्टि की है ।
- डॉ आदर्श / उधमपुर
(WhatsApp से साभार)