परम्परा
लघुकथा कसौटी -02
परम्परा
सुबह-सुबह अदिति और अपूर्व जैसे ही अपने कमरे से निकल कर बाहर आए, पापा ने चाय की ट्रे मेज़ पर धरते हुए मीठे स्वर में कहा," आ जाओ बच्चों ! गर्मागर्म चाय तैयार है । "
उनके पाँव छूते हए अदिति ने नर्म स्वर में कहा , " आप क्यों रोज शर्मिंदा करते हैं मुझे पापा जी ! यह काम तो मेरा है न !"
" हर काम घर की माँ - बहन या बहू-बेटी का ही नहीं होता बेटा जी ! हम पुरुषों का भी कुछ फर्ज़ बनता है । "
" पर पापा जी!.....
" केई पर- वर नहीं बेटा जी ! इधर बैठो और मेरी बात सुनो ," प्याले में चाय ढालते हुए वे बोले ," मैंने बचपन से देखा था कि मेरे दादू जी ही सुबह की पहली चाय दादी माँ और हम सबको पिलाते थे। वे बीमार हो गए ,फिर न रहे तो यह दायित्व मेरे बाबू जी ने ले लिया और उनके बाद मैंने । पता है बेटा ! तुम्हारी सास श्री कहती थीं,' जी ! प्रेम से पिलाई आपकी पहली चाय मेरे भीतर ' हॉर्स-पॉवर ' भर देती है ।' फिर वह भी चली गई । बस बच्चों ! मैं उसी परम्परा को निभा भर रहा हूँ। जब मुझमें दम नहीं रहेगा या मैं ही नहीं रहूँगा तो इस परम्परा को अपूर्व आगे बढ़ाएगा । क्यों अप्पू ठीक कह रहा हँ न मैं ?"
" जी पापा जी ! ," अपूर्व ने भीगे स्वर में कहा और उठ कर पापा के गले में बाहें डाल दीं ।
- कमल कपूर
फरीदाबाद - हरियाणा
बाप - बेटे के बीच संवाद की कथा पूर्ण रूप से संस्कार पर आधारित है। जो समाज में या परिवार में अपनी छाप बनाने का माध्यम है। जिस में सकारात्मक भरी पड़ी है। कोई टकराव नहीं है। चाय तो सिर्फ एक माध्यम है। परन्तु वास्तव में परम्परा के माध्यम से नई पीढ़ी को सीख दी है। यही वर्तमान में समाज की आवश्यकता है। पुरुष को जिम्मेदारी निभाने का अहसास दिलाया गया है।आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। हॉर्स - पॉवर जैसे शब्दों का प्रयोग भी रोचकता प्रदान करता है। यही लेखिका की सफलता का राज़ है। यही बात शीर्षक की है जो एक दम सटीक है।
पंचलाइन:
" जी पापा जी ! ," अपूर्व ने भीगे स्वर में कहा और उठ कर पापा के गले में बाहें डाल दीं ।
संदेश:
परिवार में संस्कार देने का नायाब तरीका
चिंतन:
परिवार में संस्कार ज़रुरी है
लघुकथा का प्रकार:
परिवारिक लघुकथा
नवीनता :
बाप - बेटे के बीच शांतिपूर्वक वार्तालाप
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