पाठकों के बीच में उमा मिश्रा 'प्रीति ' की लघुकथाएं

         उमा मिश्रा 'प्रीति'

पिता का नाम -- स्व. आर.डी. पाण्डेय 

माता का नाम -- लीला पाण्डेय 

पति -- श्री एस.के. मिश्रा

शिक्षा -- एम.ए.,बी .एड

पूर्व शिक्षिका -- नेवी चिल्ड्रन स्कूल 

 जबलपुर 

प्रकाशित साहित्य -

१-  'उमा की काव्यांजली' (काव्य संग्रह) 

२ - 'उड़ान' (लघुकथा संग्रह) 

आहुति (ई पत्रिका) में तथा

अनेक साझा संकलनों में सहभागिता 

पुरस्कार एव सम्मान -

 - 'कादंबरी'* संस्था (म०पर०) द्वारा सम्मानित (04 नवंबर 2023)

- पाधेय* संस्था द्वारा *कथाश्री अलंकरण* सम्मान से सम्मानित 

साहित्य संगम संस्थान द्वारा *विद्या वाचस्पति की उपाधि* ।

- 3 मार्च2024 को हिंदी लेखिका संघ मध्य प्रदेश भोपाल द्वारा सम्मानित।

- "शहर समता अखबार" द्वारा *साहित्य गौरव सम्मान*(तीन बार प्राप्त हुआ) तथा "शहर समता अखबार", प्रयागराज द्वारा 

- "वर्तिका" जबलपुर साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक संस्था द्वारा 

- वर्तिका राष्ट्रीय काव्य गौरव अलंकरण*

- "प्रखर" सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था,भोपाल (म०प्र०)* द्वारा सम्मानित।

- "प्रसंग" अंतर्राष्ट्रीय संघ मंच द्वारा सम्मानित

- "बिलास साहित्यिक शैक्षणिक संस्थान", छत्तीसगढ़ द्वारा सम्मानित

- जैमिनी अकादमी, पानीपत - हरियाणा द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी स्मृति सम्मान - 2025 से सम्मानित 

- विश्व हिंदी रचनाकार मंच द्वारा "अमृत रत्न सम्मान" से सम्मानित

युगधारा फाउंडेशन(लखनऊ) द्वारा सम्मानित 

- नशा मुक्ति में सहभागिता वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा सम्मानित

- "साहित्यांजलि"  प्रकाशन (प्रयागराज) द्वारा सम्मानित 

- "स्वर्णिम आकाश साझा संकलन" द्वारा गोल्डन बुक का अवार्ड सम्मानित

- हिंदी प्रेरणा प्रचार समिति द्वारा "हिंदी महाकुंभ" में "हिंदी सम्मान" से सम्मानित

विशेष - 

- "शहर समता" अखबार, प्रयागराज* की महिला विचार मंच की कार्यक्रम संयोजक एवं मध्य प्रदेश अध्यक्ष

पता :-

उमा मिश्रा प्रीति 

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

            1. रिश्ते जिंदा है क्या

अरे !देवर जी तुम कब आ गए आश्चर्य पूर्वक कमल जी ने कहा। 

अपनी भाभी भाई के घर में आने के लिए क्या मुझे कोई इजाजत लेनी पड़ेगी यह कार्ड छपवाना पड़ेगा नवीन बोल।

कमल जी ने कहा-नहीं नहीं भैया मैं ऐसा नहीं बोल रही इतने दिनों तक आपने दर्शन नहीं दिया आज अचानक आप आए इसलिए मैंने ऐसा कहा।

भाभी भैया कहाॅं है नवीन बोला।

तुम्हारे भैया 13वीं का इंतजाम करने के लिए बाजार गए हैं  कमल जी ने कहा। 

नवीन बोला- तुम लोगों ने घर और खेत ले लिया है मेरे पास सिर्फ मेरा हिस्सा और दुकान है सब चीजों का बंटवारा तो हो जाना चाहिए।

कमल जी ने कहा- ठीक है देवर जी मैं भी यही चाहती हूॅं लेकिन दुकान और घर का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो आपके ही कब्जे में है जहाॅं आप हमें जान भी नहीं देते अभी पिताजी को गुजरे दो ही दिन हुए हैं। हम पर पहाड़ टूट पड़ा है और आप हमें आकर इस तरह बोल रहे हैं कम से कम 13 दिन तो रुक जाना था।

नवीन बोला भाभी रोने धोने का नाटक तो तुम बहुत अच्छा कर लेती हो गरीब बनाकर सबसे हमदर्दी लेकर पूरे समाज में हमारी बदनामी कर रही हो कि हमने सबसे ज्यादा हिस्सा ले लिया। 

रोते हुए कमला ने कहा - अब हमारा तुम्हारा कैसा नाता चले जाओ अभी मैं तुमसे बात करने के मूड में नहीं हूॅं, कुछ दिन बाद हम आराम शांति से बैठेंगे दीदी लोग को  बुला लेंगे।

 दो बहने भी है तुम्हारी और फिर तय करेंगे कि किसी क्या मिलना चाहिए सारी पिताजी की विरासत में तुम्हारा ही हक  है। 

नवीन ने कहा-

 ठीक है देखता हूॅं कैसे तुम सब हिस्सा लेते हो? नवीन गुस्से से बड़बड़ाता हुआ गया। 

कमल जी कहती है कि हे भगवान इस दुनिया में क्या रिश्ते नाते जिंदा है? 

जाना सबको है छोड़कर लेकिन फिर भी लोग कैसे लड़ते हैं। ***

          2. नमक-मिर्च लगी बातें

शाम ढल रही थी। शांति के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। तभी उसकी बड़ी बहन कमला तेज़ कदमों से घर में दाखिल हुई।

“इतनी बड़ी बात हो गई और तूने मुझे बताया तक नहीं?” — आते ही कमला बरस पड़ी।

शांति धीमे स्वर में बोली, “दीदी, घर की इज़्ज़त का सवाल था। बेटी सुबह से घर नहीं लौटी… थाने में रिपोर्ट लिखवाई है। सोचा पहले उसे ढूँढ़ लें, फिर किसी को बताऊँ।”

कमला ने आँखें फैलाकर कहा, “मोहल्ले में तो लोग तरह-तरह की बातें बना रहे हैं। कोई कह रहा है किसी लड़के के साथ भाग गई। ऊपर से दूसरी जाति का लड़का बताया जा रहा है!”

यह सुनते ही शांति की आँखें भर आईं।

“दीदी, मुझे पहले ही डर था… तुम हर बात में नमक-मिर्च लगाकर उसे और बड़ा बना देती हो। अभी मुझे सहारे की ज़रूरत है, तानों की नहीं।”

कमला कुछ पल के लिए चुप हो गई, पर आदतवश फिर बोली,

“अरे, मैं तो सच कह रही हूँ। लोग तो पूरी कहानी बना चुके हैं।”

शांति ने गहरी साँस ली—

“लोगों की बातें आग नहीं लगातीं दीदी, अपने ही जब नमक-मिर्च लगाकर उन्हें फैलाते हैं, तब घर जलते हैं।”

इतने में फोन की घंटी बजी। पता चला, बेटी अपनी सहेली के घर थी। मोबाइल बंद होने के कारण संपर्क नहीं हो पाया था।

यह सुनते ही शांति की आँखों से राहत के आँसू बह निकले। कमला भी शर्मिंदा हो गई। उसने बहन का हाथ पकड़कर कहा—

“आज समझ आया, बातों में नमक-मिर्च स्वाद बढ़ाने के लिए ठीक है, रिश्तों में नहीं।” ****

        3.विश्वास की टूटती डोर

किसी ने सच ही कहा है कि जीवन में सबसे बड़ा दुख तब मिलता है, जब अपना समझकर किसी पर विश्वास किया जाए और वही विश्वास टूट जाए। गलत लोगों का साथ रिश्तों की नींव को धीरे-धीरे कमजोर कर देता है। रिश्तों की डोर बहुत नाज़ुक होती है, एक बार हाथ से फिसल जाए तो संभालना कठिन हो जाता है। 

मालती स्वभाव से शांत, सरल और संस्कारी महिला थी। उसकी दुनिया उसका परिवार था। वह हमेशा घर की मर्यादा और सम्मान बनाए रखने की कोशिश करती रहती थी। लेकिन उसकी बहू रोमा का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था। वह छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती, सबको डराती-धमकाती और घर का माहौल अशांत कर देती थी। 

मालती सब कुछ सहकर भी चुप रहती, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि परिवार टूटे। पर उस दिन तो रोमा ने सारी सीमाएँ पार कर दीं। वह ऊँची आवाज़ में उल्टी-सीधी बातें करने लगी और मोबाइल में सबकी रिकॉर्डिंग करने लगी। 

“आप लोगों को बात करने की तमीज़ नहीं है! मैं इतना बोल रही हूँ और कोई मुझे रोकता तक नहीं!” — रोमा गुस्से में चिल्लाई। 

मालती ने धैर्य से कहा,

“बेटी, तुम शांत हो जाओ। अपने कमरे में जाकर आराम करो।” 

फिर उसने अपने बेटे अरुण से धीमे स्वर में कहा,

“बेटा, कल इसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा देना या इसकी माँ को बुला लो। मैं रोज-रोज के इन झगड़ों से बहुत थक गई हूँ। अब मुझसे यह सब सहा नहीं जाता। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो मुझे ही यह घर छोड़कर जाना पड़ेगा।” 

माँ की बातें सुनकर अरुण की आँखें भर आईं। वह टूटे हुए स्वर में बोला,

“माँ, गलती मेरी है। मैंने बिना समझे यह रिश्ता स्वीकार किया। अगर किसी का कसूर है, तो वह मेरा है। सज़ा मुझे दीजिए।” 

उस पल घर में गहरा सन्नाटा छा गया। रिश्तों की डोर टूटने की आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती, पर उसका दर्द हर दिल महसूस करता है। ***

             4..पत्थर दिल

दादी ओ दादी दरवाजा खोलो जोर-जोर से बाहर घंटी बजने की और दरवाजे को पीटने की आवाज आ रही थी।

कौन है मुझे परेशान कर रहा है दोपहर में चैन से सोने भी नहीं देता कमला जी धीरे-धीरे दरवाजे की ओर आई।

दादी मैं चीकू हूं ।

दोपहर में चैन से मुझे सोने क्यों नहीं देते हो घर के सामने पार्क होना भी एक मुसीबत हो गई है?

आज मुकेश नहीं आया है आप लोग बगीचे से स्वयं अपनी गेंद ले लो और मुझे तंग मत करो?

कमला जी ने जोर से चीकू से कहा।

दादी मुझे गेंद नहीं चाहिए मेरे दोस्त बंटी को चोट लग गई है थोड़ी सी हल्दी दे दीजिए उसे बहुत जोर से खून निकल रहा है।

आज मुकेश नहीं आया है इसलिए घर का काम भी नहीं हुआ है और खाना भी नहीं बना है खाना मैंने बाहर से ऑर्डर देकर मंगवाया है, कुछ भी नहीं मिलेगा।

मेरी बड़ी कोठी को देखकर सब लोग जलते हैं और तुम बच्चे अपने घर में क्यों नहीं जाते हो आए दिन कुछ न कुछ मांगने चले आते हो , एकदिन कुछ दे दिया तो रोज-रोज चले आओगे अपने घर जाओ और अपनी मां से मांगो।

दादी भी तो मां होती है मेरा घर थोड़ा दूर है मेरे दोस्त का बहुत खून निकल रहा है आप कुछ दवाई बता दीजिए जिससे उसका खून बंद हो जाए।

बहाने मत बनाओ यहां कुछ नहीं मिलेगा यहां से भाग जाओ।

कमला जी ने सोचा यदि इसे दया करके आज मैंने हल्दी दे दी तो रोज का कुछ ना कुछ लगा रहेगा...।

पोते और बेटों ने छोड़ दिया है और तुम अकेली इस घर में भूत की तरह रहती हो सब लोग तुम्हें ठीक ही कहते हैं मैं तो  सामान के बहाने हाल समाचार लेने को खटखट किया करता था लेकिन तुम तो पत्थर दिल हो पड़ी रहो अकेले। चीकू रोता हुआ वहां से चला जाता है।

कमला जी हां सच कह रहा है तू मैं तो पत्थर हूं.....। ***

                  5.शौक

विमला जी आज सुबह से काम को लेकर बड़ी परेशान थी। 

कुछ बड़बड़ा रही थी और काम पर लगी थी।

मालती उसके साथ रोज नाच गाने में लगी रहती है।

ऐसा लगता है दोनों को कि बस जीवन में नाच गाना ही है...।

  आज अच्छे से खबर लेती हूं..। 

चलो अच्छा है याद तो आएगी।

काम करने भी जाना है दीदी के घर?

दीदी थोड़ा सा समय नाच गा लेती हूं खुश हो जाती हूं तो तुम्हारा क्या बिगड़ता है तुम भी आया करो , फ्रेश हो जाओगी।

तुम दोनों की तरह में फुर्सत नहीं हूं मुझे घर में बहुत काम  हैं।

  घर में तो कोई  बच्चे  नहीं हैं, दिनभर नाच गाने में लगी रहती है।

झुमरी ने गुस्से से बोला-

देखो दीदी तुम किसी की जब तक परिस्थिति नहीं जानती हो तो उसके बारे में कुछ भी मत कहा करो। 

  सब घरों का काम छोड़ कर उसी के घर में काम करना।

ठीक है दीदी तुमसे तो वह दीदी लाख गुना अच्छी हैं ।

थोड़ी देर यदि खुश रहती हैं तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता है?

उनके बाल बच्चे नहीं हैं।

ऐसा उन्हें ताने मत दिया करो।

उनकी एक बिटिया है, जो गूंगी  है।

बहुत होशियार है दीदी उसको पढ़ाती है।

हम सब मिलकर नाच गाना करते हैं इससे वह बहुत खुश हो जाती है।

झुमरी की बातें विमला के मन में एक घाव कर गई ।

अच्छा चल कल से मैं भी नाचने आऊंगी......। ***

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       बड़े संदेश देने का प्रयास

उमा मिश्रा प्रीति की इन पाँचों लघुकथाओं का मूल स्वर पारिवारिक संबंधों, मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक व्यवहार और आत्मचिंतन से जुड़ा हुआ है। लेखिका ने सरल भाषा में जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से बड़े संदेश देने का प्रयास किया है। 

1. रिश्ते जिंदा हैं क्या 

यह लघुकथा संपत्ति-विवाद के कारण टूटते पारिवारिक संबंधों की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। पिता की मृत्यु के तुरन्त बाद विरासत की चर्चा करना नवीन के चरित्र की संवेदनहीनता को उजागर करता है। कमला का संवाद – "हे भगवान, इस दुनिया में क्या रिश्ते-नाते जिंदा हैं?" – पूरी कथा का केंद्रीय प्रश्न बन जाता है। कथा का संदेश प्रभावी है कि लालच अक्सर रिश्तों पर भारी पड़ जाता है।

2. नमक-मिर्च लगी बातें 

यह लघुकथा अफवाहों और बढ़ा-चढ़ाकर बात करने की सामाजिक प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार करती है। बहन कमला का चरित्र उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो अनजाने में ही समस्याओं को और गंभीर बना देते हैं। बेटी के सुरक्षित मिलने के बाद कथा का निष्कर्ष अत्यंत स्वाभाविक और शिक्षाप्रद बन जाता है। संदेश: रिश्तों में सहारा दीजिए, सनसनी नहीं। 

3. विश्वास की टूटती डोर 

यह कहानी पारिवारिक तनाव, गलत रिश्तों के चयन और विश्वास के संकट को सामने लाती है। मालती और अरुण के संवाद भावनात्मक हैं तथा पाठक के मन को स्पर्श करते हैं। हालांकि यह लघुकथा की अपेक्षा एक लघु-कहानी का आभास अधिक देती है क्योंकि इसमें भूमिका और विवरण अपेक्षाकृत अधिक हैं।

4. पत्थर दिल 

यह संग्रह की सबसे प्रभावशाली लघुकथाओं में से एक प्रतीत होती है। कमला जी का अहंकार, अकेलापन और संवेदनहीनता अंततः उन्हें आत्मबोध की स्थिति तक ले जाता है। चीकू का संवाद – "तुम तो पत्थर दिल हो" – कथा का निर्णायक मोड़ बन जाता है। अंतिम आत्मस्वीकृति कथा को मार्मिक बना देती है।संदेश: संपत्ति नहीं, संवेदनशीलता मनुष्य को बड़ा बनाती है। 

5. शौक 

यह कथा बाहरी आकलन और वास्तविकता के अंतर को उजागर करती है। विमला का पूर्वाग्रह और झुमरी द्वारा सच्चाई सामने लाना कथा को संवेदनशील बना देता है। गूंगी बच्ची को खुश रखने के लिए नाच-गाने का आयोजन करने वाली महिला का चरित्र पाठक के मन में सम्मान उत्पन्न करता है। संदेश: किसी के जीवन को जाने बिना उसके बारे में निर्णय नहीं करना चाहिए। 

समग्र समीक्षा 

उमा मिश्रा प्रीति की ये पाँचों लघुकथाएँ पारिवारिक मूल्यों, रिश्तों की गरिमा, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार पर केंद्रित हैं। उनकी भाषा सरल, सहज और आम पाठक के लिए सुग्राह्य है। कथाओं में संवादों का अच्छा प्रयोग हुआ है, जिससे घटनाएँ जीवंत बनती हैं। लेखिका उपदेश देने के बजाय परिस्थितियों के माध्यम से संदेश देने का प्रयास करती हैं, जो उनकी रचनात्मक शक्ति है।

निष्कर्ष : -

उमा मिश्रा प्रीति की ये लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों और मानवीय रिश्तों की ऊष्मा से भरी हुई हैं। विशेष रूप से "पत्थर दिल", "नमक-मिर्च लगी बातें" और "शौक" पाठक के मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ने में सफल दिखाई देती हैं। लेखिका की संवेदनशील दृष्टि और सहज अभिव्यक्ति उन्हें समकालीन लघुकथा लेखन में एक सार्थक पहचान प्रदान करती है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

    पांचों लघुकथा की समीक्षा 

1. रिश्ते जिंदा हैं क्या

लघुकथा पारिवारिक संपत्ति विवाद के माध्यम से रिश्तों की संवेदनहीनता को उजागर करती है। संवाद प्रभावी हैं और अंत विचारोत्तेजक है। सुझाव: शीर्षक के अनुरूप अंत में रिश्तों के टूटने की पीड़ा को थोड़ा और मार्मिक बनाया जा सकता था।

2. नमक-मिर्च लगी बातें

समाज में अफवाहों और बढ़ा-चढ़ाकर बात करने की प्रवृत्ति पर सटीक प्रहार करती है। कथानक सरल, संदेश स्पष्ट और प्रभावशाली है। सुझाव: बेटी के मिलने का प्रसंग थोड़ा और स्वाभाविक ढंग से जोड़ा जा सकता था।

3. विश्वास की टूटती डोर

पारिवारिक तनाव और टूटते विश्वास की वेदना को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया है। भावनात्मक पक्ष मजबूत है। सुझाव: आरंभ में उपदेशात्मक भूमिका कुछ लंबी है, सीधे घटनाक्रम से शुरुआत होती तो प्रभाव और बढ़ता।

4. पत्थर दिल

मानवीय संवेदनाओं के अभाव और अकेलेपन के परिणाम को मार्मिक ढंग से दर्शाती है। अंत आत्मबोध के कारण प्रभाव छोड़ता है।सुझाव: चीकू का संवाद थोड़ा संक्षिप्त होता तो कथा और कसावट पा सकती थी।

5. शौक

दूसरों की परिस्थितियों को जाने बिना टिप्पणी करने की आदत पर सुंदर संदेश देती है। सकारात्मक अंत कथा की विशेषता है।सुझाव: शीर्षक "शौक" के स्थान पर कोई अधिक भावानुकूल शीर्षक कथा के प्रभाव को बढ़ा सकता है।

- अलका पाण्डेय 

मुम्बई - महाराष्ट्र 

      सुंदर कथ्य और वर्तमान परिवेश 

बहन उमा मिश्रा जी की लघुकथाएं पारिवारिक रिश्तों में व्याप्त खटास और मिठास का परिदृश्यों का यथार्थ चित्रण हैं जो पाठकों के मन को झकझोरते हुए सोचने को विवश करती हैं।

1.रिश्ते जिंदा हैं क्या

     आपसी प्रेम और भाईचारे की मिठास से दूर सिर्फ जमीन -जायदाद की खींचतान का यथार्थ चित्रण इस लघुकथा में है। वर्तमान के अनेक परिवार में ऐसा ही देखने मिल रहा है।  पिता की तेरहवीं भी नहीं होती कि बंटवारे की खींचतान शुरु हो जाती है। " रिश्ते जिंदा है क्या " लघुकथा का शीर्षक  पूरे कथ्य को स्पष्ट कर देता है।

2.नमक-मिर्च लगी बातें

    वर्तमान का दुखद पहलू यह और पीड़ादायक है कि जो हमारे अपने हैं, वो ही ज्यादा चोटिल कर रहे हैं। स्थितियों को संभालने के बजाय और हवा देते हैं। प्रस्तुत लघुकथा में इसी कथ्य को बखूबी चित्रित किया गया है।

3. विश्वास की टूटती डोर

मार्मिक लघुकथा। ऐसा अनेक  परिवार में हो रहा है। रिश्तों में अपनापन का अभाव, सामंजस्य की असफलता और अपेक्षाओं की अकुलाहट , अपने-अपने अंतद्वंद्व। इन सब का सारगर्भित सशक्त चित्रण है लघुकथा में।

4.पत्थर दिल

    एक अलग और विशेष कथ्य लिए असाधारण लघुकथाओं में से एक। सुंदर चित्रण। ऐसा भी होता है लोग पत्थर दिल दिखते हैं पर उसके आधार में भी कुछ छिपा होता है। जो दादी के पात्र में बखूबी झलकता है। चीकू के माध्यम से बाल संवेदनाओं और दोस्त की मदद के प्रयासों का सकारात्मक प्रभावी चित्रण। 

5.शौक

  कथ्य अच्छा है परंतु शिल्प की कसावट के अभाव में अस्पष्ट और बिखर गया। इससै पाठक को लघुकथा से जुड़ने में अड़चन और असहजता महसूस हुई।

       संक्षेप में कहा जावे तो मेरी दृष्टि में प्रस्तुत लघुकथाएं सुंदर कथ्य और वर्तमान परिवेश में व्याप्त ऐसे पारिवारिक दृश्यों की यथार्थता को चित्रित करती हैं। कहीं-कहीं शिल्प में कमी नजर आयी। बहन उमा मिश्रा जी के सामाजिक चिंतन और सृजन को नमन करता हूं और मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं। 

  - नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा - मध्यप्रदेश

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