पाठकों के बीच में नरेन्द्र श्रीवास्तव की लघुकथाएं
नरेन्द्र श्रीवास्तव
जन्मतिथि- 01/07/1955
तहसील-गाडरवारा,जिला-नरसिंहपुर, म.प्र.
प्रकाशित साहित्य :-
1. अपनी ढपली; अपना राग
(हास्य- व्यंग्य की कविताएं)
2. चिड़िया बनी शंकुतला
( बाल उपन्यास)
3. लिखते रहना है
( कविता संग्रह)
4. इतने लोगों में
( लघुकथा संग्रह)
5. बातों-बातों में
(फिल्मों के नाम से हास-परिहास)
6. उथल- पुथल
( हास्य- व्यंग्य की कविताएं)
7. ये मेरी तरफ से
( कविता संग्रह)
8. लाइन में आइए
( हास्य- व्यंग्य संग्रह)
9. बारहमासी
( बच्चों की कविताएं)
10. ऐसा भी ...
(लघु कहानियों का संग्रह-2)
11. फिल्मी पटखनी
(फिल्मी हास्य व्यंग्यिकाएं)
12. मटियामेट
(हास्य- व्यंग्य काव्य संग्रह)
13. ऐसा तो नहीं
( ग़ज़ल एवं दोहे)
14. किसी के हिस्से में
(ग़ज़ल-गीत संग्रह)
15. हाल-ए- दिल
(शे'र-रुबाई संग्रह)
16. ये और बात है
( कविता संग्रह)
17. तनक हँस बोल लंईयें
( क्षेत्रीय भाषा में कविता संग्रह)
18. तिकड़म
( हास्य- व्यंग्य की रचनाएं)
19. शब्द बोलते हैं
( हाइकु संग्रह)
20. अभी उम्मीद है
(कविता संग्रह)
21. बात पते की
( बच्चों के लिए आलेख)
22.शाबाश
(बाल लघु कथाएं )
23. होनहार अवि
(बाल कहानियाँ )
24. नजर लगे न
(बच्चों की कविताएं)
अन्य :-
1. बोल अनमोल
विद्युत की बचत,सुरक्षा संबंधी संदेश
2. बिजली चालीसा
सम्मान एवं पुरस्कार :-
राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तरीय अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित : -
1. साहित्य अकादमी ,म.प्र. संस्कृति परिषद, भोपाल द्वारा ' ज़हूर बख़्श पुरस्कार-2015'
2. जैमिनी अकादमी पानीपत, हरियाणा द्वारा म.प्र.रत्न-2015 '
3.म.प्र.तुलसी साहित्य अकादमी, भोपाल द्वारा
' तुलसी सम्मान-2017 '
4. हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली द्वारा ' हिन्दुस्तानी भाषा काव्य प्रतिभा सम्मान '
5.मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच(भारत)
दिल्ली ' लाल बहादुर शास्त्री रत्न सम्मान' '
6.सलिला संस्था, सलूम्बर(राजस्थान) द्वारा ' स्वतंत्रता सैनानी श्री औंकार लाल शास्त्री स्मृति पुरस्कार '
7.विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ ईशीपूर (बिहार) द्वारा ' विद्या वाचस्पति ' की उपाधि
8.वीरभाषा हिन्दी साहित्यपीठ, मुरादाबाद, उ.प्र. द्वारा ' साहित्य वाचस्पति ' की उपाधि
9.साहित्य सेवा समिति, जिला नरसिंहपुर, म.प्र. द्वारा साहित्य गौरव सम्मान-2016
10.'बटोही ' साहित्य, संस्कृति एवं समाजिक संस्था, कानपुर,उ.प्र. द्वारा 'बटोही सारस्वत सम्मान-2018'
11. जी.वी.प्रकाशन,जालन्धर, द्वारा 'काव्य शिखर सम्मान '
12. हिन्दी सेवा समिति, म.प्र. की जबलपुर इकाई द्वारा ' साहित्य शिरोमणि सम्मान '
13. शब्द प्रवाह साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक मंच,उज्जैन, म.प्र.द्वारा व्यंग्य कृति ' लाइन में आइए' को प्रथम पुरस्कार एवं शब्द रत्न की मानद उपाधि
14.म.प्र.लघुकथाकार परिषद जबलपुर द्वारा ' स्व.बाबूलाल उपाध्याय स्मृति कथा सम्मान '
15..चेतना, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, शैक्षणिक एवं पर्यावरण संस्था, गाडरवारा, म.प्र.द्वारा ' राष्ट्रीय प्रेम साहित्य सम्मान-2019
16.कादम्बरी जबलपुर द्वारा 'स्व. श्रीमती आशा देवी दुबे सम्मान 2021'
17. केन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद, मुगलसराय, चंदौली, उ.प्र. द्वारा'शब्द सम्मान 2021'
18.साहित्य सृजन परिषद,गाडरवारा, म.प्र. द्वारा सम्मानित।
आदि अनेक संस्थाओं से सम्मानित।
पता :-
नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा ( जबलपुर) मध्यप्रदेश
1. छुपेरुस्तम
मोहल्ले की मढ़िया के चबूतरे पर घनश्याम जी अपने परिचितों के साथ बैठे बातें कर रहे थे तभी उनके एक परिचित राधेलाल जी वहाँ आ गए और घनश्याम जी से कहने लगे, " यार आपका परसों मरीजों को फल वितरण वाला कार्यक्रम तो बहुत शानदार रहा। मैंने अखबार में समाचार पढ़ा और फोटो भी देखीं।"
" हाँ यार! थोड़ा-बहुत जितना बन सकता है, कभी-कभी कुछ जनहित के काम कर लेता हूं "- घनश्याम जी मन ही मन खुश होते हुए बोले।
" वो तो है। आपके इन कार्यों के समाचार और फोटो अक्सर अखबार में पढ़ने मिल जाते हैं "- राधेलाल जी बोले।
बातें हो ही रहीं थीं कि वहाँ से उन दोनों के परिचित मिश्रा जी निकले। उन्हें देखकर घनश्याम जी बोले - " यार, इन मिश्रा जी को देखा। ये कभी किसी कार्यक्रम में नहीं आते। इन्हें कभी कोई धरम-करम करते भी नहीं देखा और न ही कोई जनहित के कार्य करते किसी ने देखा। बस अपनी दुनिया में मस्त। देखो कैसे चुपचाप निकल गए।"
" सच कह रहे हो। मैने भी कभी नहीं देखा "-राधेलाल जी ने हाँ में हाँ मिलाई।
" ऐसा नहीं है। वे बहुत नेक दिल इंसान हैं। मेरे पोते की फीस वही जमा करते हैं " - वहाँ बैठे एक गरीब बुजुर्ग बोले।
"हाँ, मुझे भी कई बार दवाओं के लिए रुपए दिए हैं और डॉक्टर के पास भी ले गए हैं " एक और सज्जन बोले।
" मेरी भी अक्सर मदद करते रहते हैं " - एक और सज्जन बोले।
परंतु , मुझे कभी अखबार में पढ़ने नहीं मिला "- घनश्याम जी बोले।
ये भी उनकी विशेषताता ही समझिये कि उन्होंने कभी अपने नेक कामों का प्रचार-प्रसार नहीं चाहा। " - चबूतरे पर बैठे लोगों में से कोई बोला।
" मानगए। मिश्रा जी तो छुपेरुस्तम निकले " - कहते हुए घनश्याम जी, राधेश्याम जी के साथ वहाँ से निकल गए।०००
2. लिफ्ट
वे उनके एक परिचित के अस्थि- विसर्जन के कार्यक्रम में आये थे।अस्थियाँ विसर्जन के पश्चात सब वापिस होने लगे। वे एक कार के नज़दीक पहुँचे और कुछ कह पाते कि उसमें बैठे नवयुवकों में से एक उनसे बोलने लगा-"अंकल जी,आप पीछे वाली कार में बैठ जाईये,इसमें जगह नहीं है।"
वे पीछे वाली कार के नज़दीक पहुँचे तो चालक सीट पर बैठा लड़का बोला- "आप पीछे जो बोलेरो खड़ी है न,उसमें जगह है,वहाँ चले जाईये।
वे बोलेरो के नज़दीक पहुँचे तो बोलेरो में से एक ने उन्हें आवाज दी-" अंकल! इसमें जगह नहीं है,आप पीछे जो कार खड़ी है,उसमें बैठ जाईये।"
"आप सही कह रहे हैं।मैं उसी कार से जाऊँगा।वह कार मेरी ही है और मैं ही लेकर आया हूं।मैं तो यह कहने के लिये आप सभी के पास आया था कि किसी को परेशानी हो रही हो तो मेरी कार से चल सकते हैं। परंतु आप लोग तो जगह होते हुये भी मुझे ही न बिठालने के लिये बहाना बना रहे हैं।"
"नहीं... नहीं ...ऐसी बात नहीं है मैं आपकी कार में आ जाता हूं " ... कहते हुये वही व्यक्ति जो अभी उनसे पीछे की कार में बैठने के लिये कह रहे थे,बोलेरो से उतरने ही वाले थे कि उन्होंने मना करते हुये कहा- " क्षमा करें, मेरी कार में भी जगह नहीं है"... कहते हुये वे अपनी कार में बैठे और कार को रिवर्स कर बाजू से आगे बढ़ गये।
जो... उनसे ... "उसमें बैठ जाओ ... उसमें बैठ जाओ " कह रहे थे,मुँह ताकते रह गये। ०००
3. खुशी की हिस्सेदारी
' लो अम्मा, मुँह मीठा कर लीजिए '- कहते हुए आलोक ने मिठाई का डब्बा पड़ोस में रहने वाली कमला बुआ को देते हुए कहा।
' किस खुशी में बेटा '- कमला बुआ ने खुश होकर डब्बा लेते हुए पूछा।
' बुआ जी, आज पापा ने मुझे कार दिलाई है। अब मैं कार से कालेज जाया करूंगा '- आलोक खुश होते हुए बोला।
' वाह! ये तो बहुत खुशी की बात है। मन लगाकर पढ़ना बेटा '- कमला बुआ बोलीं।
' बुआ, ये गोलू क्यों रो रहा है?इसे क्या हुआ? '- आलोक ने पूछा।
' आज सुबह बाजू वाली चंदा बहन के नाती के पास चाबी वाली बाइक क्या देख ली। तभी से जिद कर रहा है मुझे भी दिला दो। बताओ बेटा? सौ रुपए से कम में नहीं आने वाला, वह खिलौना और दो-चार दिन में टूट जायेगा तो फिर ...? तुम्हीं समझाओ बेटा। मैं तो समझा- समझा कर थक गई। '- कमला बुआ यह कहकर कुछ उदास हो गईं।
' इसमें समझाना क्या। वह खिलौना मैं दिलाये देता हूं। आप परेशान न हों। ' कहकर आलोक ने गोलू को साथ में लिया और सामने की खिलौने की दूकान से बाइक खरीदने पहुँच गया। ०००
4. अहमियत
गोलू एक बाइक रिपेयर वाले मेकेनिक के यहाँ कार्य करता था। वह रोज सुबह जल्दी आकर दुकान खोलता। झाड़ू लगाता फिर दुकान में रखी बाइक को बाहर निकालता। मालिक करीब दो घंटे बाद आते। गोलू दिनभर मालिक के साथ बाइक सुधारने में हाथ बंटाता। कभी मालिक के कहने पर पास के दुकान से चाय ले आता। कभी कोई और काम से कहीं जाना पड़े तो वह काम भी कर आता।रात में दुकान बंद करते समय, सुधारने के लिए बची बाइक को दुकान के भीतर रखता। फिर दुकान बंद करता। मालिक उसे रोज सौ-डेढ सो रुपए देते। वह खुश होकर रुपए लेकर चला जाता। कई दिनों से उसकी यही नियमित दिनचर्या बन गई थी।
एक दिन अचानक उसकी माँ की तबीयत खराब हो गई। वह तीन- चार दिन दुकान नहीं आया। उसके नहीं आने से मालिक परेशान हो गया । बात-बात पर गोलू की कमी महसूस हुई। वे मन ही मन बुदबुदात लगे, ' अरे! गोलू इतना सब करता था। मुझे तो इस बात का एहसास ही नहीं था। और बदले में मैं उसे देता था बस सौ-पचास। वह भी छ चुपचाप रख लेता। कभी अतिरिक्त रुपयों की मांग नहीं की। '
उन्होंने फौरन दुकान बंद की और गोलू के घर जा पहुंचे। अचानक मालिक आया देखकर गोलू अचंभित था। पास में रखे स्टूल को हाथ से ही साफ करते हुए बोला- 'आइए चाचा, बैठिए। कल और मम्मी को एक इंजेक्शन लगना है। फिर परसों से काम पर आ जाऊँगा।'
' ठीक है, गोलू बेटा। ' कहते हुए उन्होंने जेब से सौ-सौ के पाँच नोट निकालकर देते हुए कहा। ' ये मेरी तरफ से रख लो। तुम्हारे काम आयेंगे। अच्छा चलता हूं। '
और यह कहते हुए वे वहाँ से सीधे घर चले आए। ०००
5. संजोग
शर्मा जी उनींदे नीचे की बर्थ पर लेटे थे। उन्हीं के पास उनकी पत्नी आँखों में आँसू लिए खिड़की पर सिर रखे अनमनी-सी आँखें बंद किए बैठीं, अपनी 4 साल की खोयी हुई बच्ची की यादों में खोयीं थीं।
तकरीबन दो महीने पहले स्कूल से लौटते वक्त जाने किस मनहूस घड़ी में उनकी बच्ची को कोई बच्चा-चोर उठा के ले गया । ' न जाने किस हाल में होगी मेरी बिटिया। ' सोच- सोच के उनका बुरा हाल था।
शहर-शहर बच्ची को खोजते हुए वे आज म.प्र. के इटारसी शहर से निराश और दुखी मन से लौट रहे थे। इटारसी देश के बड़े जंक्शन में से एक है। यहाँ देश के हर तरफ जाने वाली ट्रेन रुकती हैं।
तभी एक छोटी लड़की नेछ शर्मा जी की पत्नी को झकझोरते हुए पैसे मांगने के लिए हथेली बढ़ाई। पत्नी ने अपनी आँसू भरी आँखों से झकझोरने वाली लड़की पर नजर डाली तो चौंक गईं। सामने उन्हीं की वह खोयी हुई बेटी थी।
' मेरी बच्ची '... वे खुशी में इतने जोर से चीखीं कि आसपास के सभी यात्री घबराकर देखने लगे। शर्मा जी भी हड़बड़ाकर उठ बैठे। वास्तव में वह लड़की उन्हीं की खोयी हुई बेटी थी। ०००
सामान्य प्रसंगों से प्रेरित
नरेन्द्र श्रीवास्तव जी की पाँचों लघुकथाओं पर संक्षिप्त समीक्षा :-
1. छुपेरुस्तम
यह लघुकथा दिखावे और निस्वार्थ सेवा के अंतर को प्रभावी ढंग से उजागर करती है। अंत का मोड़ कथ्य को सार्थक बनाता है और पाठक को यह संदेश देता है कि सच्ची भलाई प्रचार की मोहताज नहीं होती।
2. लिफ्ट
मानवीय संवेदनहीनता और स्वार्थ पर तीखा व्यंग्य है। कथानक रोचक है तथा अंत में पात्र द्वारा दिया गया जवाब कथा को प्रभावशाली और स्मरणीय बना देता है।
3. खुशी की हिस्सेदारी
छोटी-सी घटना के माध्यम से करुणा, उदारता और खुशी बाँटने का सुंदर संदेश देती है। सरल भाषा और सकारात्मक भाव इस लघुकथा की विशेषता हैं।
4. अहमियत
यह कथा श्रम और श्रमिक के महत्व को रेखांकित करती है। किसी व्यक्ति की वास्तविक कीमत उसके अनुपस्थित होने पर समझ में आती है—इस भाव को लेखक ने सहजता से व्यक्त किया है।
5. संजोग
भावनात्मक और मार्मिक लघुकथा। खोई हुई बच्ची से अप्रत्याशित मिलन का प्रसंग पाठक को भाव-विभोर कर देता है। कथा में संवेदना और रोमांच का संतुलित समावेश है।
समग्र टिप्पणी:
पाँचों लघुकथाएँ जीवन के सामान्य प्रसंगों से प्रेरित होकर मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं, परोपकार, श्रम की गरिमा और सामाजिक व्यवहार को सरल किंतु प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं। कथानकों की सहजता, संदेशात्मकता और रोचक अंत इन्हें पठनीय बनाते हैं।
- अलका पाण्डेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
सामाजिक ताने-दाने में लघुकथा
नरेंद्र श्रीवास्तव जी की पांच लघु कथाएं पढी।श्रीवास्तव जी एक अच्छे लघुकथाकार हैं सामाजिक ताने-दाने में लघुकथा के तत्व और सिर्फ से बंधी हुई मार्ग स्पर्शी उनके सभी लघु कथाएं पढ़ीं :-
1 छुपा रुस्तम-
आज के समाज का वास्तविक चरित्र लेखक ने इस लघु कथा में प्रस्तुत कर दिया है।छोटी-छोटी चीजों और मदद का जब तक प्रचार प्रसार ना हो जाए तब तक वह जैसे अपनी पूर्णता को प्राप्त ही नहीं करती। मिश्रा जी की मौन रहकर सहायता करने की प्रवृत्ति अनुकरणीय व नमन योग्य है लेखक ने शीर्षक के साथ बहुत सुंदर कथन रखते हुए सार्थक रचना की है!
2-लिफ्ट -
शुरू से खीझ उत्पन्न करने वाला घटनाक्रम और अंत में व्यंग्यात्मक शैली में आज की पीढ़ी करके हम पर कटाक्ष करती सुंदर लघु कथा।
3-खुशी की हिस्सेदारी -
आलोक के रूप में समाज की उस युवा पीढ़ी का चित्रण किया गया है जो केवल अपना जीवन ही नहीं जीती बल्कि दूसरों को भी उनके हिस्से की खुशी देना जानती है आलोक के रूप में आपको साधुवाद।
4-अहमियत -
सच है व्यक्ति हो या वस्तु उसकी अहमियत हम उसकी अनुपस्थिति में ही मालूम होती है 100-50रुपये रोज कमाने वाले गोलू की अहमियत ने ही उसे बिना काम पर गए ही₹500 देने पर मलिक को बाधित कर दिया सुंदर लघु कथा अपने लक्ष्य का उचित स्पर्श करती हुई।
5-संजोग
-अत्यंत मार्मिक लघु कथा माता-पिता से बिजली मासूम लाडली बच्ची जब अपनी ही मन को झंझोढ़ कर भीख मांगने के लिए उसके सामने अपना हाथ फैलाती है तब मां-बाप का कलेजा मुंह को आ गया होगा। लेकिन यह भी संजोग ही था कि निराशा के अंधेरे में डूबे दंपति को उनकी खोई बेटी ऐसे अचानक मिल ही गई और एक दुखद लघु कथा का सुख अंत हुआ लेखक बधाई के पात्र हैं।
- पी एस खरे "आकाश"
पीलीभीत - उत्तर प्रदेश
सरस और प्रभावी
"छुपेरुस्तम"
लघुकथा अपनी अंतिम पंक्ति "उन्होंने कभी अपने नेक कामों का प्रचार प्रसार नहीं चाहा" से आज के धर्म कर्म करने वालों पर करारा व्यंग्य कसने में सफल रही। लघुकथा संवादपरक सुंदर और समसामयिक बन पड़ी है।
"लिफ्ट"
लघुकथा समसामयिक विषय वस्तु पर रची गई एक सशक्त रचना बन पड़ी है। ये लघुकथा लोगो की घटिया मानसिक सोच को उजागर में में सफल रही है। लघुकथा में सरल, सहज और प्रभावी भाषा का प्रयोग हुआ है।
"खुशी की हिस्सेदारी"
लघुकथा उच्च आदर्श को समाहित किये हुए है। यदि ऐसे मूल्य आमजन में आ जाए तो दुनिया स्वर्ग बन जाए। सबकी खुशी में अपनी खुशी ढूंढना ही इस रचना का मूल तत्व है। सरल सी रचना उच्च उद्देश्य की पूर्ति करती है।
"अहमियत"
लघुकथा द्वारा लघुकथाकार ने मालिक को मजदूर की अहमियत का "अरे गोलू, इतना सब करता था। मुझे तो इस बात का अहसास ही नहीं था और बदले में मैं उसे देता था बस सौ पचास रुपए, वह भी चुपचाप रख लेता" संवाद से मात्र तीन चार दिनों में ही अहसास करा दिया और कर भला तो हो भला की कहावत को चरितार्थ करने में सफल रही लघुकथा।
" संजोग "
लघुकथा में अपने के बिछुड़ने का दुख, तड़फ और निराशा के सुंदर चित्रण के साथ बिछुड़े हुए के अचानक मिलने के संजोग पर होने वाली मनोदशा का शानदार चित्रण करने में कलमकार सफल रहा है।
भारतीय लघुकथा विकास मंच हिंदी भवन, जैमिनी अकादमी पानीपत द्वारा लेखक नरेंद्र श्रीवास्तव की लघुकथाएं पढ़ने को मिली। सभी रचनाएं अच्छी लगी। भाषा सहज, सरस और प्रभावी रही। लघुकथाकार नरेंद्र वास्तव की पांच लघुकथाएं पढ़ने को मिली।
- भूपसिंह 'भारती'
नारनौल -हरियाणा
सामाजिक व्यवहार के विविध पक्ष
नरेन्द्र श्रीवास्तव की ये पाँचों लघुकथाएँ जीवन के विविध मानवीय पक्षों को सरल, सहज और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं। कथाकार ने बिना किसी जटिल शिल्प के रोजमर्रा की घटनाओं से सार्थक संदेश निकालने का सफल प्रयास किया है :-
‘छुपेरुस्तम’
दिखावे और वास्तविक परोपकार के अंतर को रेखांकित करती है। जो व्यक्ति अपने सद्कार्यों का प्रचार नहीं करता वही सच्चे अर्थों में समाजसेवी सिद्ध होता है। कथा का अंत प्रभावशाली है।
‘लिफ्ट’
मानवीय स्वार्थ और अवसरवादिता पर तीखा व्यंग्य है। दूसरों को असुविधा में छोड़ने वालों को अंत में उसी व्यवहार का सामना करना पड़ता है। कथा में व्यंग्यात्मक न्याय का सुंदर निर्वाह हुआ है।
‘खुशी की हिस्सेदारी’
संवेदनशीलता और सामाजिक सहभागिता की कहानी है। अपनी खुशी में दूसरों की छोटी-सी इच्छा पूरी कर देना मानवीयता का सुंदर उदाहरण बन जाता है। कथा सहज होकर भी हृदयस्पर्शी है।
‘अहमियत’
श्रम और श्रमिक के महत्व को रेखांकित करती है। अक्सर किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी अनुपस्थिति में समझ आता है। कथा मानवीय संबंधों में संवेदना और कृतज्ञता का भाव जगाती है।
‘संजोग’
एक खोई हुई बच्ची के अप्रत्याशित मिलन के माध्यम से करुणा और भावुकता का वातावरण निर्मित करती है। यद्यपि कथानक कुछ हद तक संयोग पर आधारित है फिर भी इसका भावनात्मक प्रभाव पाठक को स्पर्श करता है।
समग्रतः
ये लघुकथाएँ मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं, नैतिकता और सामाजिक व्यवहार के विविध पक्षों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती हैं। कथाकार की दृष्टि समाज की छोटी-छोटी घटनाओं में जीवन-सत्य खोजने की है जो इन रचनाओं की प्रमुख विशेषता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
संवेदना का घटक महत्वपूर्ण
नरेंद्र श्रीवास्तव की लघुकथाओं पर मेरे विचार :-
1. छुपे रूस्तम :-
समाज में भिन्न-भिन्न सोच के लोग रहते हैं जो अपने तरीके से समाज सेवा करते हैं । यहां मिश्रा जी निष्काम योगी की तरह बिना किसीण प्रचार -प्रसार के मौन होकर समाज सेवा कर रहे हैं ।
2. लिफ्ट :-
सामने वाले की बात सुने बिना ही अपना निर्णय सुना देना धैर्य की कमी को प्रगट करता है । अगले का मन्तव्य समझे बिना ही जबाब देना और बाद में वास्तविकता समझ में आने पर पछताना ही होता है ।
3. खुशी की हिस्सेदारी :-
अपनी खुशियों के साथ -साथ दूसरों की खुशियों का भी ध्यान रखना सबसे महत्वपूर्ण मानवीय गुण है । हमारे समाज का ढांचा भी ऐसा है जहां एक व्यक्ति को कार आसानी से मिल जाती है जबकि दूसरा खिलौना भी खरीदने में असमर्थ है । यहीं कार वाले की संवेदना उभरकर सामने
आती है ।
4.अहमियत :-
जब जिंदगी के दैनिक काम बिना किसी रुकावट के चलते रहते हैं तब तक हमें साथ वाले की अहमियत समझ नहीं आती है ।किसी भी प्रकार का व्यवधान होने पर ही हम सही मूल्यांकन कर पाते हैं ।
5.संजोग :-
किसी प्रकार की अप्रिय घटना घट जाने पर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए बल्कि प्रयास करते रहना चाहिए l पता नहीं कब भगवान की कृपा हो जाये । चमत्कार होना कभी भी सम्भव है ।
नरेंद्र जी की लघुकथाओं में सहज भाव से सरल भाषा में बातें कहीं गयीं हैं जिसमें संवेदना का घटक महत्वपूर्ण है ।
- निहाल चन्द्र शिवहरे
झाँसी - उत्तर प्रदेश
वस्तुस्थिति का मुआयना
नरेंद्र श्रीवास्तव जी की लघुकथाएँ समाज की वस्तुस्थिति का मुआयना करती चिंतन करने पर विवश करती हैं :-
'छुपे रुस्तम'
शिक्षा देती है कि ढिंढोरा पीटकर की गई समाज सेवा व्यर्थ है।
'लिफ्ट'
एक अच्छी लघुकथा है जो बताती है कि मदद करने की बजाय जो लोग किसी को इधर-इधर धकेलते हैं, उन्हें जरूरत के समय किसी की मदद नहीं मिलती। अतः मदद करनी चाहिए।
'खुशी की हिस्सेदारी'
बताती है कि यदि आपको पिताजी से कार मिलती है तो पड़ोसी के रोते बच्चे को खिलौना बाइक तो दिला ही देनी चाहिए। इसका पात्र यही करता है। खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं।
'अहमियत'
शिक्षा देती है कि सहायक को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। वह इतने सारे काम करता है, इसका पता उसकी अनुपस्थिति में लगता है।
'संजोग'
लघुकथा सिर्फ यह बताती है कि खोई बेटी संयोग से भिखारी बनकर माँ के सामने आ जाती है। यह लघुकथा एक शब्दचित्र बनाती है, कोई सीख नहीं देती।
- डॉ अंजु दुआ जैमिनी
फरीदाबाद - हरियाणा
व्यक्ति की वास्तविक पहचान
नरेंद्र श्रीवास्तव जी की इन लघुकथाओं में सरल भाषा, सहज संवाद और अंत में प्रभाव छोड़ने वाली स्थिति है :-
1. छुपेरुस्तम
समीक्षा: दिखावे और निस्वार्थ सेवा के अंतर को उजागर करती प्रभावी लघुकथा।
पंच लाइन: "मिश्रा जी तो छुपेरुस्तम निकले।"
चिंतन बिंदु: क्या हर अच्छे कार्य का प्रचार आवश्यक है?
संवाद: स्वाभाविक एवं कथानक को आगे बढ़ाने वाले।
2. लिफ्ट
समीक्षा: संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य करती रोचक लघुकथा।
पंच लाइन: "क्षमा करें, मेरी कार में भी जगह नहीं है।"
चिंतन बिंदु: सुविधा के समय हम दूसरों के प्रति कितने संवेदनशील हैं?
संवाद: छोटे, सटीक और प्रभावशाली।
3. खुशी की हिस्सेदारी
समीक्षा: अपनी खुशी को दूसरों की मुस्कान में बाँटने का सुंदर संदेश देती लघुकथा।
पंच लाइन: "वह खिलौना मैं दिलाये देता हूं।"
चिंतन बिंदु: सच्ची खुशी साझा करने से बढ़ती है।
संवाद: आत्मीय, सहज और भावपूर्ण।
4. अहमियत
समीक्षा: साधारण दिखने वाले व्यक्ति के महत्व का मार्मिक चित्रण।
पंच लाइन: "मुझे तो इस बात का एहसास ही नहीं था।"
चिंतन बिंदु: किसी की अनुपस्थिति ही उसकी वास्तविक अहमियत बताती है।
संवाद: पात्रानुकूल और संवेदनापूर्ण।
5. संजोग
समीक्षा: संयोग, करुणा और मातृत्व की पीड़ा को समेटती भावुक लघुकथा।
पंच लाइन: "सामने उन्हीं की वह खोयी हुई बेटी थी।"
चिंतन बिंदु: जीवन में कभी-कभी असंभव लगने वाले संयोग भी घटित होते हैं।
संवाद: कम, किंतु भावनात्मक प्रभाव उत्पन्न करने वाले।
पाँचों लघुकथाएँ अलग-अलग कथानकों पर आधारित होते हुए भी मानवीय संवेदनाओं और जीवन-मूल्यों की साझा भूमि पर खड़ी हैं। लेखक निस्वार्थता, सहानुभूति, आत्मीयता और व्यक्ति की वास्तविक पहचान को सरल किंतु प्रभावी ढंग से उभारने में सफल रहे हैं।
- छाया सक्सेना प्रभु
जबलपुर - मध्यप्रदेश
भाषा- शिल्प की दृष्टि से उत्तम
सकारात्मकता से पुष्ट लघुकथाएं :-
1.छुपेरुस्तम
प्रस्तुत लघुकथा का शीर्षक यथा नाम तथा गुण के उद्देश्य को बखूबी से सार्थकता प्रदान करता है। आदर्शवादी जीवन से युक्त पात्र मिश्रा जी का चरित्र दिखावे के प्रतीक से बहुत दूर है । क्रियात्मकता के पक्षधर हैं वह। संदेश प्रधान लघुकथा है।
2. लिफ्ट
लघुकथा के कलेवर में फिट शीर्षक को पात्र की मूल संवेदना उदारात्मकता से जोड़ती उत्तम लघुकथा है पर वर्तमान में इस विचार के लोग कम ही होते हैं। पात्र का नाम निर्दिष्ट करते तो और अधिक अच्छा लगता फिर भी विपरीत व्यवहार को देखकर अपने को बदल लेना गुमनाम पात्र की बुद्धिमानी का चित्रण है।
3.खुशी की हिस्सेदारी
तीसरी लघुकथा में खुशी के भाव को बड़ी सफलता और उदारवादी दृष्टिकोण के साथ रोचक संवादों के साथ प्रस्तुत किया गया है। यह सफल और शिक्षाप्रधान कार्य से जुड़ी हुई है। पात्र आलोक का नाम उसके गुण कार्य शीर्षक को स्पष्ट गति देते सुख मय संदेश देते हैं।
4.अहमियत
बहुत सुंदर अपने उद्देश्य को सटीकता से प्रस्तुत करती यह लघुकथा मैकेनिक गोलू और उसके मालिक का अन्तर्मन से वास्तविकता को मनन करना और आवश्यकता के अनुरूप उसकी सहायता करने को अहमियत देना सफलतम आदर्श से युक्त लघुकथा है।
5.संजोग
बच्ची के खोने के वियोग को संयोगवश मिलवा देने की घटना भावात्मकता से परिपूरित सुखमय आशावान संदेश देती संक्षिप्त सुंदर लघुकथा है।
निष्कर्ष
मान्यवर लघुकथा लेखक श्री नरेंद्र श्रीवास्तव जी की पांचो लघु कथाओं का अध्ययन मनोयोग से किया।सभी लघुकथाएं शीर्षक की संक्षिप्तता से जुड़ी प्रभावकारी उद्देश्य को रोचकता से स्पष्ट करती ,पात्र- संयोजन, भाषा- शिल्प की दृष्टि से उत्तम हैं। सभी में आशावादी दृष्टिकोण परि लक्षित होता उपादेय भी है।
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