सहारे की राजनीति


लघुकथा कसौटी - 01

      सहारे की राजनीति

पढ़ाई पूरी करने के बाद सोमेश नौकरी की तलाश में दर-दर भटकता रहा। हर जगह निराशा ही हाथ लगी।

तभी राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और बेरोज़गारी भत्ता मिलने लगा। उसने राहत की साँस ली—

“डूबते को तिनके का सहारा ही सही।”

इसी बीच उसकी शादी ऐसी लड़की से हो गई, जो स्वयं भी बेरोज़गारी भत्ता पा रही थी।

दोनों ने सोचा—अब कुछ बड़ा करना चाहिए।

बैंक से दस लाख का ऋण लेकर उन्होंने कोचिंग सेंटर खोलने की योजना बनाई।

कुछ पैसे कुर्सी-टेबल और सजावट में लगे, और बाकी से कार खरीद ली।

कार में बैठकर वे रोज़ नए सपने बुनते, योजनाएँ बनाते और शहर में घूमते।

पर सपने कागज़ से आगे बढ़ न सके।

न अनुशासन था, न दिशा। धीरे-धीरे कोचिंग सेंटर सूना पड़ गया और अंततः बंद हो गया।

अब सवाल था—बैंक की किश्त कैसे भरी जाए?

तभी चुनाव की आहट सुनाई दी।

दोनों जोश से प्रचार में जुट गए।

सोमेश ने मुस्कुराकर पत्नी से कहा—

“बस इस बार सरकार बदल जाए… सब ठीक हो जाएगा।”

पत्नी ने भी आशा से सिर हिला दिया।

उन्हें अब भी भरोसा था—

अपनी गलती सुधारने से नहीं,

सरकार बदलने से उनकी किस्मत बदलेगी। ***

       -  छाया सक्सेना ' प्रभु '

         जबलपुर - मध्यप्रदेश 

                

         लघुकथा में बेरोज़गारी दिखाई गई है। जिसमें कर्म की कमजोरी स्पष्ट हुई है। जिस में कोचिंग सेंटर तो खोला है। परन्तु सेंटर के अनुरूप संघर्ष नहीं  है। राजनीति के सहारे पर अधिक विश्वास  है। परन्तु यहां पर शादी जैसा गंभीर मामला दिखाना उचित सा नहीं लगा है। फिर भी लेखिका की अपनी सोच है। लघुकथा का शीर्षक स्पष्ट व उचित दिखाई पड़ता है। सरल भाषा का उपयोग हुआ है। परन्तु फिर भी लघुकथा का परिवेश काल्पनिक अधिक व सार्थकता कम नज़र आया है। परन्तु लेखिका अपनी बात कहने में सफल रही है। अन्त में पंच लगाने का प्रयास भी अवश्य किया है। कथा अवश्य ही लघुकथा की श्रेणी में आतीं है।

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

                            - 

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