पाठकों के बीच में डॉ आदर्श प्रकाश की लघुकथाएं

        डॉ. आदर्श प्रकाश

पिता का नाम - प्रो. शांति प्रकाश जी 

माता का नाम - श्रीमति पुष्पा देवी जी 

जन्न्म तिथि - 27 दिसम्बर 1950

जन्म स्थान  - मु. नगर ( मूल -उधमपुर )

शिक्षा - बी. ए , बी. ए. एम . एस ( कानपुर वि . वि ) 

व्यवसाय - चिकित्सक / लेखक 

जम्मु कश्मीर राज्य सरकार की स्वास्थ्य सेवा में मैडिकल ऑफीसर के पद पर 28 वर्ष (1980 -2008) का अनुभव । 

मातृ भाषा - डोगरी 

प्रकाशित पुस्तकें - 

1. प्रश्न तुमसे (कविता संग्रह)

2. एक आयास अनायास (संयुक्त काव्य संग्रह)

3. दस दरवाजे (कहानी संग्रह)

4. अभिव्यक्त होने दो (संयुक्त कहानी संग्रह)

5. चौराहे की आग (काव्य संग्रह)

6. सत्य मार्ग का राही (जीवनी) 

7. कथा अनंता (कहानी संग्रह)

8. मुनिवर हँसो, मुनिवर नाचो (जीवनी)

9 रेड वुड जंगल ( कहानी संग्रह ) 

अनुवाद - 

1. वेदराही जी के उपन्यास 'अनन्त' का डोगरी से हिन्दी अनुवाद। 

2 वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग , नई दिल्ली के द्वारा 2011 में आयोजित कार्यशाला , प्रशासनिक शब्दावली / डोगरी में , डोगरी विशेषज्ञ रूप में प्रतिभागिता ।

पुरस्कार - 

1 दस दरवाजे (कहानी संग्रह) जम्मू कश्मीर अकादमी ऑफ़ आर्ट , कल्चर  , एंड लैंग्वेजेज द्वारा  1998 वर्ष की सर्वोत्तम कृति घोषित एवं पुरस्कृत । 

 2. चौराहे की आग कविता संग्रह, केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा पुरस्कृत 1994 । 

3. कथा अनंता कहानी संग्रह, केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा पुरस्कृत (2004)। 

अन्य विवरण -

1 - देश की सभी स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में कहानी, कविता, आलोचना, और लेख आदि प्रकाशित। 

2 - आकाशवाणी जम्मू व दूरदर्शन पर नियमित रूप से  रचनाओं का प्रसारण । 

3 - केंद्रीय हिंदी निदेशालय , दिल्ली की  अन्य योजनाओं से जुड़ाव । 

4 - केंद्रीय हिंदी निदेशालय के हिंदीतर भाषी नव लेखक शिविर , जम्मू  - 2022 में विशेषज्ञ के रूप भागीदारी । 

5 -  टेली फिल्म सी० पी० सी०, द्वारा जमीर के नाम से निर्मित

6 - कोलकोत्ता स्थित साहित्यिक संस्था - शब्दाक्षर , की     त्रैमासिक  पत्रिका ‘ शब्दाक्षर ‘ का पिछले तीन वर्षों से सम्पादन । 

पता -

 डॉ.आदर्श प्रकाश 

 25 , एम . आई . जी / हाउसिंग कॉलोनी / उधमपुर / जम्मू -कश्मीर / 182101

                 1. सिकंदर 

तालियों की गड़गड़ाहट से बेख़बर माँ , केवल संकल्प को निहारे जा रही थी । जब वह गाए जा रहा था , तब उसकी निहार से बरसता आशीर्वाद , सभी महसूस रहे थे । संकल्प का चुनाव हो गया था । 

लेकिन माँ के सामने वह दृष्य एक के बाद एक आते जा रहे थे , कि कैसे उसनें घरों में काम कर करके संकल्प को बड़ा किया और उसकी संगीत साधना को भी । उसने तब भी उसे टूटते - टूटते , खड़ा किया , जब उसके मना करते रह कर भी संकल्प ने अपने खोए पिता को ढूँढ निकाला । उस पिता ने मुँह बिचकाते , घृणा से थूकते कहा , “ जा , चला जा , तू तो मेरी औलाद ही नहीं है ।” 

“ आपने जीवन में बहुत कुछ झेला होगा ?” एक्सपर्ट ने माँ से पूछा ।

“ मैं उसे झेलना नहीं , प्रकृति का नियम कहती हूँ । जब तक आप टूट कर बिखरोगे नहीं , नया अंकुर बनेगा कैसे ? बादल फटता है तो बारिश होती है , लोगों को बहुत शांति मिलती है । इस लिए वो झेला नहीं मैंने , वह होना ही था । “ 

तभी दूसरे एक्सपर्ट ने कहा , 

“ जो सुरों को बारीकी से जान जाए उसे धुरंधर कहते हैं , और जो गिर कर खड़ा हो जाए , उसे सिकंदर कहते है ।” 

माँ अपने सिकंदर को देख - देख निहाल थी । ०००

                  2.भूख 

पहाड़ी शलगम बेहद सुंदर व सस्ते थे ।मैं सब्ज़ियों के सौंदर्य का आशिक  रहा हूँ । 

विभिन्न रंगों वाली शिमला मिर्चें , चमकते बैंगन , पास बुलाते गोल गोल रसीले टमाटर , गुलाबी गुलाबीो राजमें की फलियाँ और गुँथीं पहाड़ी गोभी मुझे एक मुस्कुराते चित्रकार का आभास देती है और मेरा भीतर आनंद की गुदगुदी से सिक्त हो उठता है । 

मेरे हाथों में शलगमों से भरा बैग देख मृदुला का झुँझलाना स्वाभाविक था । 

“ क्या होगा इस ढेर का ? हम दो कितना खाएँगे ? अचार भी कितना डलेगा ? “ वह पूछ रही थी । 

“ चलो , जितने बचेंगे वह मालती को दे देना । काम करके जब लोटेंगी तब । चार बच्चे हैं उसके ।” मैंने अपनी गलती को सार्थक करने का यत्न किया । 

“ मालती ! शलगम बनाए थे कल जो तुम्हें दिए थे ? “ 

“ कहाँ साहब जी ! वह तो बच्चों ने कच्चे ही खा लिए । मैंने भी एक खाया । मीठा था बहुत ।” मालती के स्मित चेहरे पर पहाड़ी शलगमी मिठास उभर आई थी । 

“स्वाद का सीधा सम्बंध भूख से है । उस भूख से विशेष रूप से , जो अभाव से निरंतर प्रज्ज्वलित रहती हो ।”

मैंने सोचा और समझा । ०००

                 3. सेवा 

वह 80 बरस की उम्र में पिछले 45 बरसों से अपने इस ठीये पर  बराबर बने हुए हैं । ठीया भी अद्भुत । पीपल के पुराने वृक्ष ने मानो अपनी गोद में उन्हें पनाह दी हो । धरती से लगते उस वट वृक्ष के मोटे तने में ,  एक नन्ही कोठरी जितनी जगह बन गई थी । यही बाबा अजीत सिंह की चाय वाली दुकान प्रसिद्ध हो गई ।

वह बाबा के नाम से पूरे अमृतसर में  प्रसिद्ध यूँ ही नहीं हैं । वह स्वभाव से बाबा हैं । पक्के कोयलों की अंगीठी उनकी अल सुबह सुलग जाती है  जिस पर चाय का पानी दिन भर खौलता रहता है । इस आयु में भी वह अपने ग्राहकों को उनके आस -पास के ठिकानों पर चाय पहुँचा आते हैं । कितनी ही बार अनुपस्थिति में इनके पतीले आदि चोरी हुए लेकिन यह बंदा बेपरवाह डटा रहा । 

मज़ा यह कि इनकी चाय पीकर कोई पैसे न भी दें तो यह उससे मांगते भी नहीं । अलमस्त फकीरी  अंदाज । 

जब उनसे पूछा गया कि लोग चाय पीकर पैसे दिए बिना जब चले जाते हैं तब आपको क्या महसूस होता है ? तब इस संत का पंजाबी में जवाब था , 

“ ना दे , वह बर्तन झूठा कर चला गया । बर्तन  तो धोया न उसका  । उसने अपनी सेवा का मौक़ा तो दिया । सेवा तो मिली । इस संसार में हम सेवा करने ही आए हैं ।” ०००

                  4.रंग 

ओवेरियन सिस्ट ऑप्रेशन के बाद ही डॉ सिरोही ने मुझे स्पष्ट कह दिया था कि सिस्ट  मैलिगनैंट नहीं था , लेकिन मैं माँ शायद ही बन पाऊँ । 

ऐसा उन्होंने एकदम से ब्लंटली तो नहीं कहा लेकिन घुमा -फिरा कर गम्भीर स्थिति से बच जाने का संतोष जताते वह अपना मैडिकल कर्तव्य , मुझे सचेत करते उन्होंने पूरा किया था । 

मैंने पूछा था , “ शायद का मतलब कितने परसैंट चांस हैं मेरे कन्सीव करने के ?”

“ टैन परसैंट ।” 

मैं क़तई निराश नहीं हुई । टैन परसैंट में ही मैंने अपना मार्ग खोजा । मैं बल्लियों उछल पड़ीं जब मेरी यूरीन रिपोर्ट एक दिन पॉज़िटिव आई । 

मेरी जाँच नियमित चलती । 

एक अवसर ऐसा आया जब मुझे पता चला डॉ सिरोही मेरे गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग की जाँच करेंगे । वह मुझसे लगातार सम्पर्क में रहते , वात्सल्य करने लगे थे । मुझे निराशा की ओर वह कभी न बढ़ने देते । 

“ अंकल । एक बात पूछूँ ? “ 

“ पूछो ।” 

“ मेरे गर्भ में पल रहा मेल है या फ़ीमेल ? मैंने सारे कपड़े , खिलौने , और कमरे के पर्दे तक गुलाबी सजा लिए हैं । मुझे लड़की चाहिए । “ 

“ यह मैं तुम्हें बिलकुल नहीं बतला सकता अनाया । तुम जानती हो कि यह मैडिकल एथिक्स के विरुद्ध है । “ कहते -कहते डॉ सिरोही का चेहरा सख़्त हो उठा था । 

मैं उतरा चेहरा लिए बाहर जाने के लिए वापिस मुड़ी । लम्बे हॉल  कमरे के दरवाज़े तक बाहर निकलने के लिए जैसे ही पहुँची, पीछे से आवाज़ आई , 

“ सुनो अनाया ! तुम्हें रंग बदलने की कोई ज़रूरत नहीं है ।” ०००

                 5. तिरंगा

पहली बार रजत एन. सी. सी . में अंडर ऑफ़िसर रे रूप में , अपने दल के साथ जब चुना गया , तब उसका मन बल्लियों उछल  रहा था । दिल्ली  गणतंत्र दिवस परेड अपने तिरंगे को सलामी देते उसका सीना गर्व से फूल उठा था । 

इस तिरंगे के विषय में कितना कुछ पढ़ा - समझा था उसने । इसकी रक्षा के लिए सियाचिन में , ऊँचाई पर स्थित शत्रुओं की गोलियों का कैसे सामना करते हुए वीर सैनिक बलिदान हुए थे , उसने बचपन में स्वयम् टी. वी पर देखा था । सभी चोटियों पर जब तिरंगा पुन: फहराया गया था , तब देश ने सुख की साँस ली थी । 

दो दिन पहले ही कुख्यात एम.एल.ए , दलवीर सिंह की हत्या हो गई । अज्ञात हमलावरों ने दशहरे के पटाखों के शोर का लाभ लेते हुए , उस पर ताबड़तोड़ गोलियाँ दाग दीं । पहले भी उसकी हत्या के दो प्रयास हो चुके थे । उस पर अनेक मुकदमें दर्ज थे । दलवीर  सिंह अपराध की दुनिया से ही अमीर बन कर राजनीति में आया था । ड्रग्स और अंडरवर्ल्ड से वह गहराई से जुड़ा था । 

दलवीर सिंह भूत पूर्व मंत्री भी रह चुका था , अत: राज्य सरकार ने उसके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान दिया था । 

एक बड़ी फूलमालाओं से लदी गाड़ी  में उसकी शव यात्रा , जब रजत के घर के सामने से गुजरी , तब बाहर का दृष्य देख वह स्तब्ध रह गया । 

रजत के पापा भी उसके साथ खड़े थे । 

दलवीर का शव तिरंगे से ढँका हुआ था । शव के पीछे लोगों की अपार भीड़ बदला लेने , और सत्ता दल के विरोध में नारे लगा रही थी । पुलिस का भारी बंदोबस्त था । 

“  मैंने तो तिरंगे को आज तक बहुत ऊँचाई पर ही लहराता देखा था पापा ! “ घर का गेट बंद करते बड़ी मायूसी से रजत ने कहा । ०००

         

   आत्म चिंतन की ओर...

1. सिकंदर

इस लघुकथा की पंचलाइन प्रभावशाली है—“गिर कर खड़ा हो जाए, उसे सिकंदर कहते हैं।” कथा पाठकों को माँ के संघर्ष और बेटे की सफलता से भावनात्मक रूप से जोड़ती है। विषय नया नहीं है, पर प्रस्तुति में संवेदनात्मक गहराई है। यह प्रश्न छोड़ती है कि सफलता का वास्तविक आधार प्रतिभा है या संघर्ष?

2. भूख

यह लघुकथा साधारण घटना के माध्यम से अभाव और भूख का गहरा सत्य उद्घाटित करती है। अंतिम पंक्ति ही इसकी सशक्त पंचलाइन है। पाठक सहज ही सम्पन्नता और अभाव के अंतर को महसूस करता है। कथा सोचने पर विवश करती है कि स्वाद का मूल्य भोजन में है या भूख में? कथ्य परिचित है, दृष्टि ताज़ा है।

3. सेवा

कथा का सबसे बड़ा आकर्षण बाबा का दृष्टिकोण है, जो पंचलाइन में चरम पर पहुँचता है—“उसने अपनी सेवा का मौक़ा तो दिया।” यह पाठकों को भीतर तक छूती है और सेवा की परिभाषा पर पुनर्विचार कराती है। विषय आध्यात्मिक है, पर प्रस्तुति में जीवन-दर्शन का नया कोण दिखाई देता है।

4. रंग

यह लघुकथा सामाजिक पूर्वाग्रहों के विपरीत एक सकारात्मक और संवेदनशील संदेश देती है। अंतिम वाक्य—“तुम्हें रंग बदलने की कोई ज़रूरत नहीं है”—अत्यंत प्रभावी पंचलाइन बनकर उभरता है। कथा पाठक को लिंग भेद और मातृत्व की भावनाओं पर सोचने को प्रेरित करती है। विषय प्रासंगिक है और प्रस्तुति अपेक्षाकृत नवीन।

5. तिरंगा

यह पाँचों में सबसे तीखा सामाजिक प्रश्न उठाने वाली लघुकथा है। अंतिम संवाद पाठक के मन में गहरी टीस छोड़ता है। तिरंगे के सम्मान और राजनीति की विडम्बना का टकराव कथा को प्रभावी बनाता है। यह प्रश्न छोड़ती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान पात्रता से जुड़ा होना चाहिए या पद से?

         पाँचों लघुकथाएँ अलग-अलग विषयों पर आधारित होते हुए भी मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और सामाजिक विसंगतियों की पड़ताल करती हैं। लेखक केवल घटनाएँ नहीं सुनाता, बल्कि पाठक को आत्ममंथन की दिशा में ले जाता है। संघर्ष, भूख, सेवा, मातृत्व और राष्ट्रसम्मान—इन सबके माध्यम से लेखक जीवन के बाहरी नहीं, भीतरी सत्य को उजागर करना चाहता है। अधिकांश कथाओं की शक्ति उनकी प्रभावी पंचलाइन और चिंतनशील अंत में निहित है, जो पाठक के मन में देर तक प्रतिध्वनित होती हैं।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

 पांचों लघुकथा की समीक्षा 

 1. सिकंदर 

लघुकथा सकारात्मक संदेश देती अच्छी रचना है। लेखक ने माँ के प्यार,विश्वास और कोशिश के बल पर बेटे को सफ़ल गायक बनाया।  पिता की उपेक्षा के वाबजूद  संकल्प ने अपनी माँ के सपनों को पूरा कर दिखाया और सही में सिकंदर की तरह विजयी बना। प्रस्तुति और शीर्षक बहुत सुंदर है।

2. भूख 

 लघुकथा की प्रस्तुति में गज़ब का अनूठापन है। भूख में चॉइस रहता ही कहां है।  लघुकथा में तीन पात्र हैं और तीनों के संवादों से एक उत्कृष्ट लघुकथा का सृजन हुआ है। भूख एक उत्कृष्ट लघुकथा है।

3. सेवा 

 लघुकथा सेवा में लेखक ने सेवा को जिस तरह से परिभाषित किया है वह काबिलेतारिफ है।  पूरी कथा में लगता है बाबा अजीत सिंह किसी चित्र की तरह मौजूद हैं।शानदार प्रस्तुति।

4. रंग

 लघुकथा रंग को पढ़कर पाठक दंग रह जाएंगे।लगता है लेखक खुद डॉक्टर हैं। कथा को पढ़कर ओवेरियन सिस्ट के बारे में सटीक जानकारी भी मिली। मेडिकल एथिक्स में लिंग की जानकारी देना अनैतिक और अवैध है।लेकिन  गर्भवती अनाया  जब  कहती है कि वह पुत्री चाहती है  और उसके लिए गुलाबी कपड़े,खिलौने और पर्दे की व्यवस्था कर चुकी है तो डॉक्टर  कहता कि उसे रंग बदलने की जरूरत नहीं है। लघुकथा का पंच लाइन बेहद प्रभावशाली है।

5. तिरंगा 

आज के राजनीतिक परिदृश्य के चेहरे को नंगा करने में सक्षम लग रही है।  अज्ञात हमलावरों द्वारा एक कुख्यात विधायक की हत्या  और इस हत्या के विरोध में  क्रोधित जनता की भीड़ और बदला लेने के नारे, तिरंगे से शव को ढँका जाने से एन सी सी के अंडर ऑफिसर रजत के मन में घृणा पैदा हो जाती है।एक कुख्यात विधायक जिसका ड्रग्स और अंडर वर्ल्ड से संबंध था,इसके वाबजूद उनकी शव यात्रा में सैकड़ों की भीड़ ..फिर सरहद पर लड़ने वालों शहीदों के सम्मान का क्या महत्त्व रह जाता है।लघुकथा के कथ्य को लेखक ने बहुत ही निपुणता के साथ उकेरा है।

- निर्मल कुमार दे 

जमशेदपुर - झारखंड

जीवन-दर्शन का सुंदर समन्वय 

       डॉ. आदर्श प्रकाश की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ जीवन के विविध आयामों—संघर्ष, अभाव, सेवा, मातृत्व और सामाजिक विडंबना—को प्रभावशाली ढंग से उजागर करती हैं :-

"सिकंदर" 

संघर्ष और मातृत्व की शक्ति का सशक्त चित्रण है।

"भूख" 

अभावग्रस्त जीवन की सच्चाई को मार्मिकता से सामने लाती है।

"सेवा" 

निस्वार्थ कर्म और मानवता का प्रेरक संदेश देती है।

"रंग" 

कन्या-प्रेम और चिकित्सकीय नैतिकता को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है।

"तिरंगा" 

व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा प्रश्नचिह्न लगाती हुई अत्यंत प्रभावशाली लघुकथा है।

         भाषा सहज, कथ्य समकालीन और अंत प्रभावोत्पादक हैं। इन लघुकथाओं में संवेदना, सामाजिक सरोकार और जीवन-दर्शन का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

- अलका पाण्डेय

 मुम्बई - महाराष्ट्र 

   विशेष शिल्प में गढ़ीअभिव्यक्तियां

            आदरणीय डॉ. आदर्श प्रकाश की प्रस्तुत लघुकथाएं लेखकीय दृष्टि से बड़ी सूक्ष्मता से अनुभूत किये गये तथ्यों और कथ्यों की विशेष शिल्प में गढ़ी अभिव्यक्तियां हैं। सभी लघुकथाएं आम लघुकथाओं से हट के हैं  :-

1.सिकंदर

परिस्थितियों से हार न मानकर, हिम्मत और हौसला रखते हुए अपनी औलाद का न केवल भरण-पोषण करना बल्कि उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे शिखर तक पहुंचाने का काम एक माँ भी कर सकती है। प्रस्तुत लघुकथा इस कथ्य को साबित करने में सफल रही है। दृष्य नहीं दृश्य सही है।

2.भूख

अस्पष्ट कथ्य। पात्रों में अपेक्षित संवाद-भाव के सामंजस्य की कमी लगी।

3. सेवा

 बढ़िया कथ्य। अच्छी लघुकथा। यथा नाम,तथा गुण। रुचिकर ।

4.रंग

   अच्छी लघुकथा। अच्छा कथ्य। शिल्प भी अनुकूल। यह बात जरूर है कि ऐसी लघुकथा आम पाठकों के लिए असमान्य और असहज प्रतीत होती हैं।

5. तिरंगा

अच्छी लघुकथा।सरल,सहज और सरसता से परिपूर्ण।

     संक्षिप्त में कहा जावे तो डॉ. आदर्श प्रकाश जी की प्रस्तुत लघुकथाएं फुर्सत के समय, एक चित्त होकर पढ़ने और समझने वाली लघुकथाएं हैं। जीवन के विभिन्न पहलुओं को  कथाकार ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से कथ्य और कथानक के माध्यम से टटोला भी है और उकेरा भी है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

मन में करुणा, चिंतन और सकारात्मकता

         डाॅ. आदर्श प्रकाश की इन पाँचों लघुकथाओं में जीवन-दर्शन, मानवीय संवेदना और सकारात्मक दृष्टि प्रमुख रूप से उभरकर आती है। लेखक का झुकाव घटना से अधिक उसके भीतर निहित भाव और जीवन-सत्य की ओर है, कुछ में कथात्मक विस्तार लघुकथा की तीक्ष्णता को थोड़ा कम करता है :-

1. सिकंदर

यह लघुकथा संघर्ष, मातृत्व और आत्मविश्वास की कथा है। माँ का चरित्र अत्यंत प्रेरक  है। "टूटकर बिखरोगे नहीं तो नया अंकुर कैसे बनेगा" जैसी जीवन-दृष्टि कथा का केंद्र है। अंतिम वाक्य—"जो गिरकर खड़ा हो जाए उसे सिकंदर कहते हैं"—कथा का सार प्रस्तुत करता है।किन्तु कथा में फ्लैशबैक और विवरण अपेक्षाकृत अधिक हैं। यदि इसे थोड़ा संक्षिप्त किया जाता तो प्रभाव और तीव्र हो सकता था। फिर भी मातृत्व की गरिमा और संघर्ष की विजय का सुंदर चित्रण है।

2. भूख

यह पाँचों में सबसे सफल लघुकथाओं में से एक प्रतीत होती है। शलगम के सौंदर्य से प्रारंभ होकर कथा अभावजन्य भूख के यथार्थ तक पहुँचती है। "बच्चों ने कच्चे ही खा लिए"—यह एक साधारण-सा वाक्य पूरी कथा का केंद्र बन जाता है।

लेखक ने बिना उपदेश दिए भूख और स्वाद का संबंध उजागर किया है। अंतिम पंक्ति विचारोत्तेजक है, यद्यपि उसे पाठक पर छोड़ दिया जाता तो प्रभाव और गहरा हो सकता था। 

3. सेवा

यह लघुकथा एक जीवन-दर्शन प्रस्तुत करती है। बाबा अजीत सिंह का चरित्र पाठक को प्रभावित करता है। "उसने अपनी सेवा का मौका तो दिया"—यह कथन कथा को ऊँचाई प्रदान करता है। यहाँ भी कथा में संस्मरणात्मक विस्तार कुछ अधिक है। लघुकथा के स्थान पर यह लघु-रेखाचित्र या व्यक्तिचित्र के निकट पहुँच जाती है। 

4. रंग

इस कथा में मातृत्व की आकांक्षा, चिकित्सकीय नैतिकता और कन्या के प्रति सकारात्मक भाव—तीनों का सुंदर संयोजन हुआ है।अंतिम वाक्य—"तुम्हें रंग बदलने की कोई जरूरत नहीं है"—बहुस्तरीय अर्थ खोलता है। यह केवल भ्रूण के लिंग की सूचना नहीं अपितु बेटी के स्वागत की सांकेतिक स्वीकृति भी है। पाँचों में यह सबसे कलात्मक और लघुकथा-सुलभ रचना कही जा सकती है।

5. तिरंगा

यह लघुकथा तीखा सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य प्रस्तुत करती है। एक ओर तिरंगे के प्रति सम्मान और बलिदान की स्मृतियाँ हैं, दूसरी ओर अपराधी छवि वाले नेता का राजकीय सम्मान।अंतिम वाक्य—"मैंने तो तिरंगे को आज तक बहुत ऊँचाई पर ही लहराता देखा था पापा!" कथा का प्रहार-बिंदु है। बिना किसी प्रत्यक्ष टिप्पणी के लेखक ने व्यवस्था की विडंबना को उजागर कर दिया है। यह एक प्रभावी और सफल व्यंग्यात्मक लघुकथा है।

         डॉ. आदर्श प्रकाश की इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी शक्ति उनकी मानवीय संवेदना, सकारात्मक दृष्टिकोण और जीवन-मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता है। वे निराशा के बीच आशा, अभाव के बीच मानवीयता और विडंबना के बीच मूल्यबोध खोजते हैं।हाँ, शिल्पगत दृष्टि से कुछ रचनाओं में कथात्मक विस्तार अधिक है जिससे वे कहीं-कहीं लघुकथा से अधिक संस्मरणात्मक या कथात्मक रचना का आभास देती हैं। ‘रंग’, ‘भूख’ और ‘तिरंगा’ लघुकथा की कसौटी पर विशेष रूप से अधिक सशक्त प्रतीत होती हैं जबकि ‘सिकंदर’ और ‘सेवा’ अपने प्रेरक भाव और जीवन-दृष्टि के कारण प्रभावित करती हैं। इनकी लघुकथाएँ मन में करुणा, चिंतन और सकारात्मकता का संचार करती है।

- डाॅ.छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

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