पाठकों के बीच में छाया सक्सेना ' प्रभु ' की लघुकथाएं
छाया सक्सेना ' प्रभु '
आत्मज
माता- श्रीमती शारदा सक्सेना
पिता- डॉ. विश्वनाथ प्रसाद सक्सेना
जीवन साथी: श्री मनीष सक्सेना
शिक्षा: बी. एस. सी. , बी. एड., एम. ए. राजनीति विज्ञान, एम. फिल. ( नीति शोध )
व्यवसाय: पूर्व उच्चश्रेणी शिक्षिका,
संप्रति- स्वत्रंत लेखन ।
वर्तमान पद- अधीक्षिका नारी मंच, संगम सुवास,
कोषाध्यक्ष- साहित्य संगम संस्थान
( एस-1801-2017) नई दिल्ली
प्रधान संपादक -
अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका, साहित्य संगम संस्थान ।
मुख्यालय सचिव -
अभियान, विश्ववाणी संस्थान , जबलपुर (म.प्र.)
प्रकाशित कृतियाँ : -
व्यक्तिगत ई काव्य संग्रह- धवल काव्य अनुभूति,
ई लघुकथा संग्रह- ड्योढ़ी के पार ,तुम कली सुंदर हमारी
साझा पुस्तकें -
एक पृष्ठ मेरा भी, समीक्षा सुधा, छंद कलश, मन की बात, दो शब्द, साहित्यमेध, छंद शास्त्र, भाव स्पंदन, कविता अनवरत, लघुकथा साझा संकलन, मन की बात, बरनाली (उपन्यास )नयी सदी की लघुकथाएँ, मासिक पत्रिकाओं में, दोहा नर्मदा, मिली भगत ( व्यंग्य संकलन) , लॉक डाउन व्यंग्य, 21 वीं सदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार ।
संपादन : -
साझा संकलन लघुकथा संगम, 25 रचनाकार विशेष पुस्तक साहित्यमेध, साझा उपन्यास, कई साझा काव्य संकलन का ।
उपलब्धि : -
अभ्युदय सम्मान, संगम रत्न सम्मान,काव्य श्री , जिज्ञासा रत्न सम्मान, काव्य कलश , दोहा सिद्ध, काव्यधारा रत्न , भाव भूषण ।
निवास स्थान -
जबलपुर - मध्यप्रदेश
1.सहारे की राजनीति
पढ़ाई पूरी करने के बाद सोमेश नौकरी की तलाश में दर-दर भटकता रहा। हर जगह निराशा ही हाथ लगी।
तभी राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और बेरोज़गारी भत्ता मिलने लगा। उसने राहत की साँस ली—
“डूबते को तिनके का सहारा ही सही।”
इसी बीच उसकी शादी ऐसी लड़की से हो गई, जो स्वयं भी बेरोज़गारी भत्ता पा रही थी।
दोनों ने सोचा—अब कुछ बड़ा करना चाहिए।
बैंक से दस लाख का ऋण लेकर उन्होंने कोचिंग सेंटर खोलने की योजना बनाई।
कुछ पैसे कुर्सी-टेबल और सजावट में लगे, और बाकी से कार खरीद ली।
कार में बैठकर वे रोज़ नए सपने बुनते, योजनाएँ बनाते और शहर में घूमते।
पर सपने कागज़ से आगे बढ़ न सके।
न अनुशासन था, न दिशा। धीरे-धीरे कोचिंग सेंटर सूना पड़ गया और अंततः बंद हो गया।
अब सवाल था—बैंक की किश्त कैसे भरी जाए?
तभी चुनाव की आहट सुनाई दी।
दोनों जोश से प्रचार में जुट गए।
सोमेश ने मुस्कुराकर पत्नी से कहा—
“बस इस बार सरकार बदल जाए… सब ठीक हो जाएगा।”
पत्नी ने भी आशा से सिर हिला दिया।
उन्हें अब भी भरोसा था—
अपनी गलती सुधारने से नहीं,
सरकार बदलने से उनकी किस्मत बदलेगी।***
2. स्पेस का सच
“अरे भई, किस स्पेस की बात कर रहे हैं? आजकल तो हर तरफ स्पेस ही स्पेस है!”
दयाशंकर जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“सो तो है,” राघव जी ने हल्का ठहाका लगाया।
दोनों बचपन के मित्र थे। ज्वलंत मुद्दों पर व्यंग्य करते हुए चर्चा करना उनकी पुरानी आदत थी।
राघव जी बोले—
“कुछ साल पहले लोग चाँद और मंगल पर बसने के सपने देख रहे थे। अंतरिक्ष में कॉलोनी बसाने की योजनाएँ बन रही थीं। पर देखो, एक झटके में धरती पर ही सबको पर्सनल स्पेस मिल गया।”
दयाशंकर जी ने मास्क ठीक करते हुए कहा—
“अब तो हर जगह यही नियम है—मास्क लगाइए, दो गज दूरी रखिए, स्पेस बनाए रखिए।”
राघव जी मुस्कुराए—
“युवा पीढ़ी तो बरसों से ‘मेरा स्पेस’ की बात कर रही थी। लगता है ऊपर वाले ने उनकी सुन ली।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
फिर दयाशंकर जी धीरे से बोले—
“अजीब बात है…
कल तक लोग पास आने के बहाने ढूँढ़ते थे,
आज पास आने से डरते हैं।”
राघव जी ने सड़क पर चलते लोगों को देखा—सब अपने-अपने घेरे में।
उन्होंने धीमे से कहा—
“लगता है इंसान ने दूरी बनानी सीख तो ली…
पर शायद नज़दीक रहना भूल गया है।”
दोनों एक क्षण ठहरे, फिर अपनी-अपनी राह चल पड़े—
स्पेस बनाए रखते हुए। ***
3. एक और एक… ग्यारह
“देखना, ज़्यादा दिन नहीं चलेंगी तुम दोनों,” पड़ोस की विमला चाची मुस्कुराकर बोलीं, “औरतों की दोस्ती कब तक टिकती है?”
स्मिता और राधा ने एक-दूसरे को देखा और हल्का-सा मुस्कुरा दीं।
दोनों बचपन की सहेलियाँ थीं। वर्षों बाद जीवन ने उन्हें फिर साथ ला खड़ा किया था। घर-परिवार और जिम्मेदारियों ने बहुत कुछ सिखाया था, पर भीतर की ऊर्जा अब भी जीवित थी।
एक दिन स्मिता ने कहा—
“क्यों न हम मिलकर कुछ नया करें?”
राधा ने हँसते हुए जवाब दिया—
“क्यों नहीं, एक और एक मिलकर ग्यारह बनें!”
बस, वहीं से शुरुआत हुई। दोनों ने मिलकर एक यूट्यूब चैनल शुरू किया—घरेलू हुनर, सरल जीवन-प्रबंधन और सकारात्मक सोच पर।
शुरुआत में मोबाइल स्टैंड भी नहीं था; किताबों के ढेर पर मोबाइल टिकाकर वीडियो बनाए जाते थे।
पहले वीडियो पर मुश्किल से पचास व्यू आए।
कुछ कमेंट भी आए—“देखते हैं कब तक साथ रहती हो।”
पर दोनों ने न ईर्ष्या को जगह दी, न अहं को। काम बाँट लिया—एक बोलती, दूसरी तकनीकी पक्ष संभालती। धीरे-धीरे दर्शक बढ़ने लगे।
एक दिन लाइव में किसी ने पूछा—
“तुम दोनों में झगड़ा नहीं होता?”
राधा हँसी—“झगड़ा नमक जैसा है, थोड़ा हो तो स्वाद देता है।”
स्मिता ने जोड़ा—“पर हम नमक को भोजन नहीं बनने देते।”
आज उनका चैनल हजारों लोगों तक पहुँच चुका है।
सचमुच, कदम से कदम मिलाकर चलती दो सहेलियाँ
एक और एक होकर ग्यारह बन गई थीं।***
4.काश, यह झूठ होता
मोबाइल की गैलरी में जमा अनगिनत तस्वीरें हटाते-हटाते उसकी उँगलियाँ थक चुकी थीं।
व्हाट्सऐप के दर्जनों ग्रुप—जहाँ हर पल कोई न कोई संदेश, फोटो, शोर… मन को थका देता था।
वह एक-एक करके सब साफ कर रही थी कि अचानक उसकी उँगलियाँ ठिठक गईं।
एक तस्वीर…
और उसके साथ लिखा था—
“विनीत नहीं रहे…”
उसका दिल जैसे एक पल को रुक गया।
हाथ काँप उठे।
उसने माथे पर हाथ रख लिया—
“हे भगवान… उसके परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति देना।”
मन अनायास ही वर्षों पीछे लौट गया।
कभी वह भी विनीत की ज़िंदगी बनना चाहती थी।
पर पिता अड़े रहे—
“इस लड़के से रिश्ता नहीं करूँगा। झूठ बोलने वालों पर भरोसा नहीं होता।”
वह चुप रह गई थी।
विनीत सचमुच झूठ बोलता था—छोटे-बड़े, बेवजह… आदतन।
बाद में सुना था—विवाह के बाद वह बदल गया था। जिम्मेदारियों ने उसे संभाल लिया था। वह अपने परिवार के साथ खुश था।
पर आज…
मोबाइल की स्क्रीन अब भी उसी तस्वीर पर ठहरी थी।
आँखों में नमी उतर आई।
मन ने जैसे आखिरी उम्मीद से फुसफुसाया—
काश… यह खबर भी
उसके किसी पुराने झूठ जैसी होती।
कुछ देर बाद उसने फोन उठाया…
और उस नंबर को ढूँढ़ने लगी
जिस पर वर्षों से उसने कभी कॉल नहीं किया था।***
5.नेहा से नेहा जी तक
बरसों बाद फोन की घंटी बजी।
“रीमा जी, मैं संतोष बोल रहा हूँ। आज मेरी पुस्तकों का विमोचन है। आप अवश्य आइएगा। नेहा जी भी आई हैं। उन्होंने विशेष रूप से आपको बुलाया है।”
रीमा के चेहरे पर मुस्कान आ गई—
“नेहा से मिलने मैं ज़रूर आऊँगी।”
फोन रखते ही मन कॉलेज के दिनों में लौट गया—साझा हँसी, साझा सपने। उसने जल्दी-जल्दी काम निपटाया, लाल बॉर्डर की साड़ी पहनी, बड़ी बिंदी लगाई—मानो किसी कार्यक्रम में नहीं, अपनी सहेली से मिलने जा रही हो।
कार्यक्रम स्थल पर पहुँचते ही उसने नेहा को फोन किया।
“दीदी, बस थोड़ी देर में आती हूँ…”
एक घंटा… फिर दूसरा…
मंच से बार-बार आवाज़ गूँज रही थी—
“नेहा जी… नेहा जी…”
उनकी उपलब्धियों और विद्वता का गुणगान हो रहा था।
तभी हलचल हुई—
“नेहा जी आ गईं!”
फूल-मालाओं और कैमरों की चमक के बीच नेहा आगे बढ़ीं। रीमा के पास आकर झुकीं—
“दीदी, देर हो गई।”
रीमा मुस्कुरा दी, पर उस मुस्कान में प्रतीक्षा की थकान थी।
कुछ देर बाद रीमा को लगा—
जिस नेहा से मिलने वह आई थी, वह कहीं पीछे छूट चुकी है।
सामने जो खड़ी है, वह अब केवल “नेहा” नहीं—“नेहा जी” है।
उसे समझ आ गया—
समय केवल चेहरों को नहीं बदलता,
संबोधन भी बदल देता है…
और कभी-कभी रिश्ते भी। ***
अपने उद्देश्य में सफल
सभी लघुकथाएँ एक से बढ़ कर एक हैं। संतुलित, उद्देश्यपूर्ण, मारक अंत। समसामयिक विषयों को उठाती ये लघुकथाएँ अपना प्रभाव छोड़ती हैं :-
'सहारे की राजनीति'
राजनीति को भुनाते कामचोर युवाओं को बेपर्दा करती है।
'स्पेस का सच'
लघुकथा स्वार्थपरकता की स्थिति को उजागर करती है। स्पेस चाहते युवा अंततः अकेलेपन का शिकार होकर अवसाद से घिर जाते हैं, यह यथार्थ इसमें परोक्ष रूप से समाहित है।
'एक और एक ग्यारह'
औरत ही औरत की दुश्मन की उक्ति को झुठलाती है।
'काश यह झूठ होता'
परिस्थितिजनक है जो यह बताती है कि व्यक्ति समय के साथ अच्छा इंसान भी बन जाता है।
'नेहा से नेहा जी तक'
लघुकथा यह बताती है कि समय के साथ सरल व्यक्ति में अहं आ जाता है, जिससे मित्रता पहले जैसी नहीं रहती।
कमोबेश सभी लघुकथाएँ शब्दसीमा में बंधी, अपने उद्देश्य में सफल रहीं।
-डॉ अंजु दुआ जैमिनी
फरीदाबाद - हरियाणा
समग्र समीक्षा
1. सहारे की राजनीति
यह लघुकथा व्यक्ति की आत्मनिर्भरता और राजनीतिक आश्रयवाद की मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करती है। सोमेश और उसकी पत्नी अपनी असफलताओं का कारण स्वयं में खोजने के बजाय सत्ता परिवर्तन में समाधान तलाशते रहते हैं। कथा का अंतिम वाक्य इसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जो पूरी मानसिकता को उजागर कर देता है। यह केवल दो पात्रों की कथा नहीं, बल्कि समाज के एक व्यापक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है।
2. स्पेस का सच
कोरोना काल की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह लघुकथा 'स्पेस' शब्द के बहुस्तरीय अर्थों को उजागर करती है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक दूरी और भावनात्मक निकटता के बीच का विरोधाभास बहुत सहजता से सामने आता है। अंत में "इंसान ने दूरी बनानी सीख तो ली, पर शायद नज़दीक रहना भूल गया है" कथ्य को गहरी मानवीय संवेदना प्रदान करता है।
3. एक और एक ...ग्यारह
यह लघुकथा स्त्री-मित्रता और सहयोग की सकारात्मक शक्ति को रेखांकित करती है। समाज में प्रचलित धारणा कि महिलाओं की मित्रता टिकाऊ नहीं होती, उसका सशक्त खंडन इस कथा में दिखाई देता है। कथा प्रेरणादायी है और साझेदारी, विश्वास तथा सामूहिक प्रयास के महत्व को प्रभावी ढंग से स्थापित करती है।
4. काश, यह झूठ होता
पाँचों में यह सबसे अधिक मार्मिक और भावनात्मक प्रभाव छोड़ने वाली लघुकथा प्रतीत होती है। एक पुरानी प्रेम-स्मृति, जीवन की विडंबना और मृत्यु-समाचार की पीड़ा को अत्यंत संयमित भाषा में व्यक्त किया गया है। अंतिम पंक्ति—"काश… यह खबर भी उसके किसी पुराने झूठ जैसी होती"—पाठक के मन में देर तक गूंजती रहती है। यह कथा संवेदना और शिल्प, दोनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है।
5. नेहा से नेहा जी तक
यह लघुकथा समय, सफलता और संबंधों के बदलते स्वरूप की सूक्ष्म पड़ताल करती है। संबोधन के परिवर्तन के माध्यम से रिश्तों में आए भावात्मक अंतर को व्यक्त करना लेखिका की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। कथा बिना किसी नाटकीयता के पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि उपलब्धियाँ कभी-कभी आत्मीयता की कीमत पर भी प्राप्त होती हैं।
शिल्पगत विशेषताएँ :-
भाषा सरल, सहज और संवादप्रधान है।कथानक संक्षिप्त होने पर भी प्रभावपूर्ण हैं।प्रत्येक कथा का अंत पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
- अलका पाण्डेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
पांचों लघुकथा की समीक्षा
1.सहारे की राजनीति
यह लघुकथा आज के उस युवा मानस पर तीखा व्यंग्य है, जो आत्मसंघर्ष से अधिक राजनीतिक सहारों पर भरोसा करने लगा है। छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ने बड़ी सहजता से दिखाया है कि भाग्य बदलने के लिए सरकार नहीं, सोच बदलनी पड़ती है। कथा का अंत गहरी सामाजिक विडंबना को उजागर करता है।
2. स्पेस का सच
“स्पेस का सच” केवल महामारीकाल की दूरी नहीं, रिश्तों में बढ़ती भावनात्मक दूरियों की भी कथा है। संवादों के माध्यम से लेखिका ने आधुनिक जीवन की विडंबना को मार्मिक ढंग से उकेरा है। अंतिम पंक्तियाँ मन को भीतर तक छू जाती हैं।
3. एक और एक… ग्यारह
यह लघुकथा स्त्री-मित्रता, सहयोग और सकारात्मक साझेदारी का सुंदर उदाहरण है। छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ने सिद्ध किया है कि विश्वास और सामंजस्य से साधारण प्रयास भी बड़ी सफलता बन सकते हैं। कथा प्रेरणा और आत्मीयता दोनों से भरपूर है।
4.काश, यह झूठ होता
यह लघुकथा स्मृतियों, अधूरे प्रेम और भावनात्मक टीस की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति है। एक साधारण-सी खबर के माध्यम से लेखिका ने मन की गहरी संवेदनाओं को जीवंत कर दिया है। अंत पाठक के हृदय में लंबे समय तक गूँजता रहता है।
5. नेहा से नेहा जी तक
यह लघुकथा बदलते समय के साथ रिश्तों में आती औपचारिकता का सूक्ष्म चित्रण है। “नेहा” का “नेहा जी” बन जाना केवल संबोधन का परिवर्तन नहीं, आत्मीयता के धुंधलाने का संकेत है। लेखिका ने बहुत कम शब्दों में गहरी भावनात्मक अनुभूति रची है।
Comments
Post a Comment