पद्म विभूषण बसंती देवी स्मृति में चर्चा परिचर्चा

         आत्मबल के लिए कर्म आवश्यक है। तभी आत्मबल प्राप्त किया जा सकता है। सफलता के लिए भी आत्मबल जरूरी है। इसलिए आत्मबल, कर्म और सफलता । ये एक - दूसरे के पूरक हैं। फिर भी समान्तर भूमिका निभाते हैं। यह कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        जब हमें हर परिस्थिति में मात्र अपने कर्म पर विश्वास होता है कि अमुक कर्म करके मुझे अवश्य सफलता मिलेगी तो यह भरोसा हमारी विशेष मानसिक दृढ़ता या आत्मविश्वास ही है। इसे सकारात्मक चिंतन भी कह सकते हैं। भले ही जीवन कठिन दौर से गुजरा हो तब तो हार मानकर कर्म करने में निराश न होकर और दृढ़ता के साथ कर्म करते-करते एक दिन सफलता मनुष्यता प्राप्त कर ही लेता है और फिर कर्म करके सफल होने पर तो हर व्यक्ति का आत्मबल और भी दुगुना बढ़ जाता है। वह प्रसन्न होकर के कार्य को और सहजता व सुगमता के साथ गति देने  में तल्लीन होता जाता है। पंत जी की कविता "चींटी" से भी मनुष्य  शिक्षा ले सकता है जो बार-बार गिरकर आत्मबल बनाए रखती है और फिर वह अपने मकसद में सफल भी हो जाती है। यह तो जीव जंतु की बात है, पर मनुष्य में तो विवेक, धैर्य सहनशीलता, कर्मठता  जैसी  अनगिनत विशेषताएं होती हैं जो कर्म + सफलता  =  आत्मबल सूत्र का जानकार  होता है ।

- डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     हमेशा से सुनते आ रहे हैं कि बल में बल आत्मबल होता है। जिसमें आत्मबल होता है वह इंसान दुनिया को जीत लेने की ताकत रखता है। कर्म से मिलती है सफलता और सफलता से  मिलता है आत्मबल - - और इस परस्पर पूरकता से मिलती है पूर्णता। और हम सब जानते है कि हर कार्य का लक्ष्य होता है "पूर्णता"! मानव मात्र अपने जीवन में बहुत कुछ हासिल करना चाहते हैं लेकिन सच्ची सच्चाई यह है कि कर्म करना हमारे हाथ में है लेकिन कर्म की पूर्णता करम के हाथ है। इंसान को करमवादी अर्थात भाग्यवादी नहीं होना चाहिए - - - लेकिन कर्म की बार बार होने वाली हार इंसान को भाग्यवादी होने पर मजबूर कर देती है। आभार इस दुनिया के सबसे बड़े तंत्र का जिसमें हम "अपना काम करो अपना ध्यान रखो"वाली मानसिकता के लोगों के साथ जीवन जीना सीख जाते हैं। सफलता से मिलने वाला आत्मबल उसी में ढूँढ लेते हैं अन्यथा आज के दौर में अपनी शर्तों पर जीवन जीना बहुत कठिन है। भले ही आप अपना कर्म कितनी ही निष्ठा से करें लेकिन परिस्थितियों के आगे आप मजबूर होते होते हैं। अतः कर्म करें और सार्थक जीवन पायें - - जियें।। 

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र

     हम जब भी कोई कार्य मन लगाकर करते हैं तब हमारे मन में स्वत: ही उत्साह का संचार होता है और आत्मबल प्रखर होता है। इसका कारण  कार्य के प्रति रुचि होना और सच्चे दिल एवं तन्मयता से निर्वहन करना है। किसी भी कार्य की सफलता के ये प्रमुख कारक होते हैं। इसीलिए कहा गया है कि जो भी कार्य करें उसे लगन और निष्ठा से पूरा करेंगे तो सफलता अवश्य मिलेगी और जब सफलता मिलेगी तो हमारा आत्मबल दृढ़ होगा। जैसे-जैसे आत्म बल में वृद्धि होगी वह समृद्घ होता चलेगा और तब न केवल  बड़े से बड़ा कार्य करने में हमारी सामर्थ्य बढ़ेगी बल्कि सफलता भी मिलती चलेगी।इससे हमारा मान-सम्मान भी बढ़ेगा और समृद्घि भी होगी। सार यही कि हम जो भी कार्य करें, उसे तन्मयता,रुचि,लगन और निष्ठा से यानी समर्पित भाव से करें। यही सफलता और फिर यही सुख-सुकून का आधार है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

        कर्म और सफलता एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और अलग भी हैं। गीता में कहा गया है कि हमें परिणाम की चिंता किये बिना अपना कर्म करते जाना चाहिए। तो जब हम कर्म करते हैं और परिणाम की चिंता किये बिना अपनी पूरी शक्ति और समर्पण से कार्य करते हैं तो आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। अनुकूल परिणाम ना मिलने पर भी निराशा नहीं आती बल्कि सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए हम स्वयं अपने कार्य, श्रम और साधनों की समीक्षा और मंथन करते हैं की हमारे काम में हमारी मेहनत में कहाँ, कौन सी और क्या कमी रही जिसके कारण हमें अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। यहाँ आत्मबल टूटता नहीं है, कम नहीं होता है बल्कि दुगुनी आशा और विश्वास से परिपूर्ण होकर पुनः कर्म करने के लिए तैयार होता है। दूसरी ओर देखें तो कार्य में मिली सफलता भी आत्मबल बढ़ाती है, पर यदि असफलता मिली और उसे व्यक्ति सहन नहीं कर पाया तो टूटा आत्मबल उसे निराशा की ओर भी धकेल सकता है और आत्मघाती कदम तक उठा लेता है। तो मेरे विचार से परिणाम की चिंता किये बिना किया गया कार्य आत्मबल और आत्मविश्वास अधिक प्रदान करता है और वह स्थायी होता है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून -  उत्तराखंड

      कर्म ही वह मूल शक्ति है जिससे आत्मबल का जन्म होता है और वही आत्मबल जीवन में सफलता की वास्तविक नींव रखता है। जब मनुष्य निष्ठा, सत्यनिष्ठा, अनुशासन और निरंतर परिश्रम के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तब उसके भीतर एक अदृश्य किन्तु अटूट शक्ति विकसित होती है, जो उसे हर प्रकार की विपरीत परिस्थितियों, अन्याय और बाधाओं के सामने अडिग रहने का साहस प्रदान करती है। यही आत्मबल उसे केवल लक्ष्य की ओर अग्रसर नहीं करता, बल्कि उसे नैतिक दृढ़ता, आत्मविश्वास और धैर्य से परिपूर्ण बनाता है, जिससे वह असफलताओं को पराजय नहीं बल्कि अनुभव और उन्नति का साधन मानता है। वास्तविक सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों का नाम नहीं, बल्कि उस आंतरिक परिपक्वता, संघर्षशीलता और अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति है, जो निरंतर कर्म और तपस्या से उत्पन्न होती है। अतः जो व्यक्ति अपने कर्म को श्रेष्ठ, निष्काम और समर्पित भाव से करता है, उसका आत्मबल समय के साथ इतना प्रखर हो जाता है कि सफलता स्वयं उसके चरणों में आकर नतमस्तक हो जाती है, और यही जीवन का सर्वोच्च सत्य है कि कर्म ही आत्मबल का स्रोत है और आत्मबल ही महान, स्थायी एवं सार्थक सफलता का पथ प्रदर्शक। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

      कर्म ही वह आधार है, जिससे आत्मबल की शुरुआत होती है। जब इंसान ईमानदारी से मेहनत करता है, तो उसके अंदर एक विश्वास जन्म लेता है कि “मैं कर सकता हूँ।” यही विश्वास आत्मबल बनता है।‌लेकिन केवल सफलता ही आत्मबल नहीं देती, बल्कि असफलता भी उसे मजबूत करती है। फर्क बस इतना है कि सफलता आत्मबल को दिखाती है, और कर्म उसे बनाता है। असली बात यह है कर्म = आत्मबल की नींव । सफलता = आत्मबल की पहचान। अगर कोई व्यक्ति बिना कर्म के सिर्फ सफलता चाहता है, तो उसका आत्मबल कमजोर रहेगा। लेकिन जो लगातार कर्म करता है, वह बिना सफलता के भी मजबूत बना रहता है। आत्मबल का असली स्रोत कर्म है, सफलता तो उसका परिणाम मात्र है।

 - सुनीता गुप्ता

 कानपुर - उत्तर प्रदेश 

         जीवन में कर्म प्रतिदिन प्रातःकाल से रात्रिकालीन सोते तक अच्छा रहना चाहिए। कर्म से मिलता है आत्मबल, सफलता से मिला है आत्मबल।  वास्तव में सत्यता की झलक दिखाई देती है। कर्म अच्छा नहीं रहा तो आत्मबल किसी भी काम का नहीं रहता है, न ही सफलता मिलती है। फिर हम अपने कर्म को दोषी मानते है। अच्छा कर्म किए जाए और फल की चिंता न कीजिए। अच्छे कर्मों से आत्मबल मजबूत होता है.और सफलता से ही आत्मबल सर्वोपरि होता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

     बालाघाट - मध्यप्रदेश

        मनुष्य का जीवन संघर्षों, अनुभवों और उपलब्धियों की एक सतत यात्रा है। इस यात्रा में आत्मबल वह अदृश्य शक्ति है, जो हमें गिरकर भी उठना सिखाती है, हारकर भी आगे बढ़ना सिखाती है। परंतु यह आत्मबल अचानक नहीं आता—यह तो कठिनाइयों की भट्टी में तपकर जन्म लेता है, या फिर सफलता की ऊँचाइयों को छूकर परिपक्व होता है। “कर्म  से मिलता है आत्मबल”—इस पंक्ति में जीवन का गूढ़ सत्य छिपा है। जब मनुष्य अभावों से गुजरता है, जब उसके पास साधन कम होते हैं, जब परिस्थितियाँ विपरीत होती हैं—तभी वह अपने भीतर झांकता है। वह बाहरी सहारों की अपेक्षा छोड़कर अपने अंतर्मन की शक्ति को पहचानता है। यही वह क्षण होता है जब आत्मबल का बीज अंकुरित होता है। अभाव हमें झुकाता नहीं, बल्कि भीतर से मजबूत बनाता है। जैसे सूखी धरती पर गिरने वाली हर बूँद का महत्व बढ़ जाता है, वैसे ही कम संसाधनों में की गई हर छोटी उपलब्धि आत्मबल को गहराई देती है। वहीं दूसरी ओर—“सफलता से मिला है आत्मबल”—यह पंक्ति जीवन के दूसरे आयाम को उजागर करती है। जब व्यक्ति अपने परिश्रम, धैर्य और संकल्प के बल पर सफलता प्राप्त करता है, तब उसके भीतर आत्मविश्वास का एक नया प्रकाश फैलता है। यह आत्मबल उसे यह विश्वास दिलाता है कि वह और भी ऊँचाइयों को छू सकता है। सफलता केवल बाहरी उपलब्धि नहीं होती, यह भीतर के विश्वास को पुष्ट करने का माध्यम बनती है। परंतु यहाँ एक सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है। अभाव से मिला आत्मबल व्यक्ति को विनम्र और सहनशील बनाता है, जबकि सफलता से मिला आत्मबल उसे आत्मविश्वासी और प्रेरणास्रोत बनाता है। दोनों ही अवस्थाएँ आवश्यक हैं—एक हमें जड़ से जोड़ती है, और दूसरी हमें आकाश की ओर उड़ने का साहस देती है। जीवन का सच्चा संतुलन तब बनता है, जब मनुष्य अभावों से मिले धैर्य और सफलताओं से मिले आत्मविश्वास—दोनों को अपने व्यक्तित्व में समाहित कर लेता है। तब उसका आत्मबल अडिग हो जाता है, जिसे कोई परिस्थिति डिगा नहीं सकती। अंततः कहा जा सकता है कि आत्मबल कोई बाहरी वस्तु नहीं, यह जीवन के अनुभवों की उपज है। कभी यह आँसुओं से सिंचित होता है, तो कभी मुस्कानों से सुसज्जित होता है। जो व्यक्ति इन दोनों स्थितियों को स्वीकार कर लेता है, वही जीवन के हर मोड़ पर विजयी बनता है। आत्मबल वही है—जो कम में भी संपूर्णता देख ले और सफलता में भी विनम्रता बनाए रखे।

- डा अलका पान्डेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

      जिसमें आत्मबल होगा , वो ही सार्थक प्रयास अथवा कर्म करेगा , व इसी आत्मबल के सहारे ही मनुष्य अपनी असफलताओं  का आकलन कर, नवीन शक्ति के साथ पुनः सकारात्मक प्रयास या कर्म करता है !! इसी तथ्य की अगली कड़ी यह है कि जब मनुष्य सार्थक प्रयास करता है , तो उसे सफलता मिलती है ! इसी सफलता से प्रेरित हो , मनुष्य एक नवीन ऊर्जा के साथ , कर्म करता है क्योंकि उसका आत्मबल उसकी शक्ति बन जाता है !! अतः मेरी व्यक्तिगत राय है कि कर्म , सफलता , आत्मबल , एकदूसरे पर निर्भर करते है , व आपस मैं जुड़े हुए हैं !! मनुष्य को सदा अपने कर्म करने चाहिए !! आत्मबल , व सफलता तो अनुयायियों की तरह , पीछे पीछे आएंगी !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

   “कर्म से मिलता है आत्मबल, सफलता से मिलता है आत्मबल” यह दोनों पंक्तियाँ जीवन के दो महत्वपूर्ण पक्षों को सामने लाती हैं—कर्म और सफलता। वास्तव में आत्मबल का मूल स्रोत कर्म है, क्योंकि जब मनुष्य निष्ठा, ईमानदारी और सतत प्रयास के साथ कार्य करता है, तो उसके भीतर एक आंतरिक विश्वास जन्म लेता है। यह विश्वास ही आत्मबल बनकर उसे हर परिस्थिति में दृढ़ बनाए रखता है। सफलता भी आत्मबल को बढ़ाती है, पर वह परिणाम आधारित होती है। सफलता मिलने पर व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है, लेकिन यदि सफलता न मिले तो वही आत्मबल डगमगा भी सकता है। इसलिए सफलता से प्राप्त आत्मबल क्षणिक हो सकता है, जबकि कर्म से प्राप्त आत्मबल स्थायी और गहन होता है। कर्म हमें यह सिखाता है कि परिणाम चाहे जैसा हो, प्रयास हमारा सच्चा साथी है। वहीं सफलता उस प्रयास का उत्सव है, जो आत्मबल को और प्रखर कर देती है। अतः कहा जा सकता है कि कर्म आत्मबल की जड़ है, और सफलता उसकी शाखाएँ। यदि जड़ मजबूत होगी, तो शाखाएँ स्वतः ही फलें-फूलेंगी। 

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर -  राजस्थान

      अगर आत्मबल की बात करें तो सच्चा आत्मबल केवल सफलता से ही नहीं मिलता बल्कि कर्म की अग्नि में तपकर ही मिलता है इसलिए चुनौतियों से घबराना नहीं चाहिए हमें कर्मठ बन कर सफलता की और बढ़ने का प्रयास करना चाहिए तभी जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है तो आईये आज इसी बात पर चर्चा को आगे ले चलते हैं कि कर्म  से मिलता है आत्मबल और सफलता से मिला है आत्मबल, मेरा मानना है कि  सफलता पाने के लिए निरंतर परिश्रम और धैर्य अनिवार्य है जो आत्मबल को  निखारने में मदद करती है,  इसके साथ साथ जब हम कर्म करते हैं तो सफलता मिलना संभव है लेकिन हमारे कर्म सकारात्मक व सही दिशा में होने चाहिए ऐसे कर्मों से मिली सफलता से आत्मबल बढ़ता है और यही आत्मबल जीवन के संघर्ष में सही दिशा दिखाता है इसके अतिरिक्त अगर हम  फल की चिंता किए बिना कर्म करते हैं तो ऐसी भावना से भी मन को शांति और स्थिरता मिलती है जो एक उच्च आत्मबल की निशानी है, यही नहीं कर्मयोग और निरंतर प्रयास के माध्यम से प्राप्त सफलता ही सच्चा आत्मबल है जिससे आत्मविश्वास और मानसिक शांति मिलती है भगवद्गीता के अनुसार निष्काम कर्म ही सफलता की कुन्जी है जो भाग्य का निर्माण करता है तथा मानसिक संतुलन बढाता है इसके साथ संघर्षों से  लड़ने की आंतरिक शक्ति प्रदान करता है, अन्त में यही कहुंगा कि कर्म से ही भाग्य बनता है और सफलता हमें मनचाहा परिणाम, सुख, संतोष और आत्मविश्वास प्रदान करती है, अच्छे कर्म हमें जीवन में सुख शांति और स्थिरता प्रदान करते हैं लेकिन सही दिशा में की गई मेहनत ही सफलता की कुंजी है जो सपनों की हकीकत में बदलती है,  जब भी  हम बिना परिणाम की चिंता किए केवल कर्म पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो मानसिक शांति और आत्मविश्वास मिलता है और सफलता मिलने पर आत्मविश्वास बढ़ता है और असफल होने पर कर्म ही हमें कुंदन बनाकर सफलता के योग्य बनाते हैं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

          कर्म, आत्मबल और सफलता का अन्योन्याश्रित संबंध है. कर्म तभी हो सकता है जब आत्मबल हो. बिना आत्मबल के कर्म नहीं हो सकता, कर्म के बिना सफलता नहीं मिल सकती और सफलता मिलने से आत्मबल और भी बढ़ता है. इसलिए यह उक्ति एकदम सटीक और सार्थक है कि कर्म से मिलता है आत्मबल, सफलता से मिला है आत्मबल.

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

   कर्म करना बहुत आवश्यक है।जब तक किसी कर्म को किया नहीं जाएगा तो उसकी अनुभूति कैसे होगी! हर कार्य एक अनुभव देता है। ज्ञान देता है और आत्म बल को बढ़ाता है। कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी किसी कार्य को करके अपने आप में आत्म बल महसूस करते हैं। कार्य करने के उपरांत जब सफलता मिलती है तब यह आत्म बल और भी अधिक बढ़ जाता है। इंसान का अपने आप पर भरोसा बढ़ जाता है और आगे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। इसलिए कर्म करते रहें।आत्मबल बढ़ते रहें।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

     कर्म से मिलता है आत्मबल सफलता से मिलती है  सफलता आत्मबल की कुंजी है  जो कर्म की चाबी से खुलती हैं  और सफलता आत्मबल दोनों की कुंजी सच्चाई मानवता के राह चलने वालों की पहचान मदद कर मिलती है कर्म से मिलता है आत्मबल, सफलता से मिलती है पहचान! यह एक सुंदर विचार है जो हमें कर्म और सफलता के महत्व को समझाता है। जो हमें आंतरिक कर्म शक्ति से  आत्मबल मिलता है लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। वही मदद वक्त में ना मिले तो घाव नासूर बन पीड़ा देती है ! इंसान जान से हाथ धो बैठता है ! सफलता नींव का पत्थर है जिसकी पकड़ मजबूत होती है वही इंसान सफल होता है जो उस नींव की क्रद्र आत्मबल से मजबूत बनाना जानता है करना चाहता है इंसानियत से क़रो प्यार कही सफलता विचारोंमें सामंजस्य बिठा बड़ी से बड़ी मुश्किलों को आसान बना गांधी के सिद्धान्तों से प्यार करो ,आज से बेहतर कल बनाओ । सत्कर्म सिद्धान्तों विचार बनाओं ,प्रकृति पर्यावरण जीवनमें मधुर मुस्कान सजाओं कमियों को नज़र अन्दाज़ कर ,पारदर्शी जीवन दर्पण दिखाओं सज्ञान लेकर देकर जीवन सवारों जीवन अपना को सफल बनाओ ! सफलता कर्म आत्मबल से कभी निराश नहीं होने देती ! कर्म करने से हमें आंतरिक संतुष्टि मिलती है और हमारा आत्म-विश्वास बढ़ता है।

- अनिता शरद झा  

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

" मेरी दृष्टि में " जीवन में आत्मबल बहुत जरूरी है। बिना ‌बल के कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है। आत्मबल से ही कर्म होता है और सफलता मिलती है। आत्मबल के बिना जीवन की कल्पना करना भी असम्भव है। वास्तव में जीवन का आत्मसम्मान आत्मबल से है। जो सकारात्मककता की रूपरेखा तैयार करता है। 

 ‌              - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)

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