विश्व कविता दिवस पर ऑनलाइन कवि सम्मेलन
मिले शान्ति ये कामना है हमारी
धरा कान्ति ढूँढें सभी आज देखो।
कहीं खो गयी शान्ति को आज देखो।।
सुनो शान्ति आओ पुकारें तुम्हीं को।
मिलेगी तभी चैन आये सभी को।।
मिले शान्ति ये कामना है हमारी।
चढ़े युद्ध की ना किसी को खुमारी।।
करे नाश संसार का युद्ध छाया।
सदा शान्ति ने ही सुखों को बुलाया।।
सदा ही सुखों की प्रदाता बनी हो।
सभी मानवों की विधाता बनी हो।।
तुम्हीं हो युगों से धरा को जरूरी।
तुम्हारे बिना भू रहेगी अधूरी।।
धरा पे जहाँ युद्ध छाया पड़ी है।
गरीबी वहाँ छाप छोड़े खड़ी है।।
तमाशा बड़ा ही अनोखा हुआ है।
सदा शान्ति के साथ धोखा हुआ है।।
विधाता रचे सृष्टि सारी सुहानी।
लहू से लिखें लोग झूठी कहानी।।
मिले संत साधू यहाँ मानवों को।
मिटा ना सके किन्तु वे दानवों को।।
सदा ही किताबें गवाही भरेंगी ।
सदा शान्ति की वाहवाही करेंगी।।
हुआ युद्ध पीढ़ी कराही गयी है।
सदा शान्ति ही तो सराही गयी है।।
सही बुद्ध ने मार्ग प्राणी दिखाया।
अहिंसा सदा श्रेष्ठ ये ही सिखाया।।
अभी जाग जाओ मनुष्यों भला है।
बिना युद्ध जीना अनूठी कला है।।
रचो कृष्ण लीला सभी को जगाओ।
हरो नाथ अंधेर दीप्ती बुलाओ।।
चला चक्र गोविन्द कल्याण वास्ते।
अधर्मी मिटें तो खुलें शान्ति रास्ते।।
- सतेन्द्र शर्मा 'तरंग'
देहरादून - उत्तराखंड
स्थापित करनी होगी शांति
कर लिया है विकास ,
पूरे किए कठिन कार्य !!
पग पग पर की प्रगति ,
पर नहीं पाई शांति !!
स्थापित किए कीर्तिमान ,
जिसका है अभिमान !!
पूर्ण लिए कार्य असाध्य ,
शांति फिर रही अप्राप्य !!
समाप्त हो गया प्यार ,
नष्ट हो गया भाईचारा ,
व्यस्त हुए सब इतने ,
की आज भूल गए अपने !!
भागदौड़ की जिंदगी में,
खोया आपस का स्नेह ,
जुटा तो ली सुविधाएं ,
पर शांति कहाँ से लायें ??
निज पतन की कीमत पर ,
पाए समस्त सुख साधन !!
शांति की कीमत पर अब,
हो रहा अमन चैन हरण !!
बदलने होंगे ये हालात ,
स्थापित करनी होगी शांति ,
तोड़नी हाेगी मिथ्या भ्रांति ,
स्थापित करनी होगी शांति !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
विश्व में शांति बहुत ज़रूरी है
विश्व में शांति बहुत ज़रूरी है।
वर्ना लगेगी हर बात अधूरी है।।
तानाशाही कभी कोई, काम नहीं आएगी।
माटी की है काया मूर्ख, माटी हो जाएगी।।
काहे इठलाए झट, होगी सांस पूरी है।
विश्व में शांति बहुत ज़रूरी है।।
मेरा-मेरा, मेरा तुझे, नर्क ले जाएगा।
दोनों ही जहां में तेरी, कीर्ति डूबाएगा।।
पास में है बैठा यम, पग की ही दूरी है।
विश्व में शांति बहुत ज़रूरी है।।
सोच, जिस ढंग से तू , औरों को सताता है।
असुर है कैसा, 'संतोष' नहीं पाता है।।
तोड़ेंगे घमंड तेरा, थोड़ी मज़बूरी है।
विश्व में शांति बहुत ज़रूरी है।।
- डॉ. संतोष गर्ग ' तोष '
पंचकूला - हरियाणा
शांति सदा मन भाती
जब करुणा का दीप जलेगा,
मन मंदिर बन जाए।
विश्व शांति का प्यारा सपना,
तब पूरा हो पाए ।।
काली छाया युद्धों की से,
दूर रहो अब प्यारे।
नन्हें हाथों में पुस्तक हो,
शिक्षित होते सारे ।।
बंदूकों को मौन करो अब,
करुणा सागर बोले।
मुस्कानें जब सेतु बने तो,
चिड़िया चहकी डोले ।।
मानवता का मधुर गीत भी,
विश्व गगन पर गाएँ।
धरती का श्रृंगार करें तब,
जीवन पथ भी भाएँ ।।
हर मानव को गले लगाकर,
दिल दीवारें तोड़ें।
नफरत की बढ़ती ज्वाला को,
मिलकर हम सब छोड़ें ।।
मन अँधियारा दूर करे हम,
फिर से दीप जलाएँ।
विश्व बने परिवार हमारा,
सबको खूब हँसाएँ ।।
भाषा चाहें अलग-अलग हो,
एक डोर बँध जाएँ ।
रंग, रूप और धर्म कोई हो,
दिल से दिल मिल पाएँ ।।
प्रेम खिले हर आँगन में जब,
कविता भी इठलाती।
शोर युद्ध का मौन रहे तब,
शांति सदा मन भाती ।।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
इस धरती को स्वर्ग बनाना चाहती हूँ
कविता विश्व -शांति के भाव गढ़ती हूँ
युद्ध विराम लगा पूर्ण विराम चाहती हूँ
कविता मनभाव गढ़ती मन को जीती हूँ
साहित्य समाज सेवक जीना चाहती हूँ
ख़ुद को खुश रख ख़ुश रखना चाहती हूँ
कविता स्वस्थ समाज कल्पना करतीहूँ
दूसरों को भी ख़ुश देखना चाहती हूँ
मै अपनी आज़ादी के लिए जीती हूँ ।
क्योंकि अब मै अपने लिये जीती हूँ ।
आज में जीती हूँ कल को भूलती हूँ
ख़ुशियाँ का मंज़िल संवारना जानती हूँ
आज़ादी की मंज़िल बनाना जानती हूँ
पतझड़ मौसम हरियाली को ढूँढती हूँ
में आज में जीती हूँ कल को भूलती हूँ
ज़िंदगी हररंग ख़ुशरंग बनाना जानती हूँ
हाँ मै अपनी आज़ादी के लिए जीती हूँ
भूखे की भूख का निवाला बन जाती हूँ
वक़्त से छले लोगों की प्यास बुझातीहूँ
दिलों में लगे ज़ख्म मलहम लगाती हूँ
राहत की सास ले दिलों में बस जाती हूँ
दिलों में लगी चोट रंजो गम भूलाती हूँ
कोरे काग़ज़ रंग भर गीत बन जाती हूँ ।
ख़ुशियाँ का मंज़िल संवारना जानती हूँ
आज़ादी की मंज़िल बनाना जानती हूँ
बीते मंज़र भूल नये ख़्वाब सजाती हूँ
ख़ुशियों से दिलों की आस बन जाती हूँ
दोस्ती पैग़ाम दे कल सजाना जानती हूँ
ग़म भरी दुनिया सरउठा जीना चाहतीहूँ
बंद दीवारों खिड़कियों झिरियों सेझाँक
पुर्ज़ों में ख़ुशियों का पैग़ाम दे जाती हूँ
दिन के उजाले में रोशनी दिखा जाती हूँ
रात अंधेरो में रोशनी पता बता ज़ाती हूँ
यादों डूब बच्चों साथ बचपन जीती हूँ
आज में जीती कल को भुलाती हूँ
जवानी की ख़ूबसूरत यादों को पतंग
की डोर बसन्ती हवाओं में उड़ा जाती हूँ
प्रोढो को मन की मुरादें पूरी कर
नवयुग का प्रणेता बना जाती हूँ ।
बुज़ुर्गों को अपनी बची ज़िंदगी में
की ख़ुशियाँ ढूँढने राज बता जाती हूँ
यादों के कनस्तर में रखी तस्वीरों
दीवारों से ढहाना चाहती हूँ
मिट्टी एक नया बीज फिर से रोपित
एक नये तस्वीर में आना चाहती हूँ
पतझड़ में बहार लाना चाहती हूँ ।
चाँद पर घर बसाना चाहती हूँ
ममता उदगारों दिलों में रहना चाहती हूँ
इस धरती को स्वर्ग बनाना चाहती हूँ
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
हित बुद्ध सी क्रांति हो
शांति हो विश्व में,ऐसी है कामना,
हो अशांति से न कोई भी सामना।
खुद जिओ और सबको जीने भी दो,
त्याग दो मन से सारी ही दुर्भावना।।
शांति, हर लेती है नीति विस्तार की,
यह वजह होती है सारी तकरार की।
विश्व युद्ध जैसे हालात संसार में,
चल रही चालें बस जीत की हार की।।
विश्व शक्ति हो तो, शांति पे ध्यान दो,
विश्व की भावनाओं को सम्मान दो।
युद्ध की आग में विश्व को झोंककर,
नीति नियमों का मत खोखला ज्ञान दो।।
शांति हो, शांति हो, शांति हो, शांति हो,
अब सुपर पावर जैसी न कुछ भ्रांति हो।
अपनी सीमाओं को अब न लांघें कोई,
विश्व शांति के हित,बुद्ध सी क्रांति हो।।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर- उत्तर प्रदेश
नहीं हो युद्ध की काली छाया
जब आकाश में प्रेम का सूरज उगता है,
जन - जन में उजियारा जगता है,
नहीं किसी से हो बैर अपना,
न कोई दूरी, न हो मजबूरी,
मानवता का दीप जलाएं,
चलों साथ में खुशी मनाएँ ।
नहीं हो युद्ध की काली छाया,
नफरत का नहीं कोई साया,
हाथों में हाथ लिए सब चलें,
आओ सभी अब तो कुछ करें ।
भाषा, धर्म नहीं रंग बाँटे,
चलों सभी दूरियों को काँटे ।
सभी को धागों में हम पिरोए,
करुणा की सरिता बहे निरंतर,
चलों सुमन से ख़ुशबू लाएँ ।
हर मन को शीतलता से संजोए।
न हो कोई भूखा रोनेवाला,
आओ धरा पर हम खुशियां बाँटे,
हर आँगन खुशियों के हो बीज,
हर नन्हे सपनों को पंख मिलते,
जीवन हर पल मुस्काए चहके।
आओ मिलकर ले संकल्प,
शांति का दीप हर दिल में रखें,
विश्व बने एक सुंदर उपवन,
जहाँ प्रेम के पुष्प सदा ही खिले ।
- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'
मुंबई - महाराष्ट्र
अब शांति चाहिए
युद्ध से
उपजी विभीषिका
डरे हुए लोग
चीजों की कमियों से
दुख से भरे हुए लोग
आखिर ये युद्ध
क्यों और किसलिए
और कब तक?
लालच, अधिकार, नाम,पद
इनकी जकड़न से
मुक्ति अनिवार्य है
तभी रुकेंगे युद्ध,
अब शांति चाहिए
प्रेम, मानवता चाहिए
विश्वास और निस्वार्थ
कर्म चाहिए
क्या यह दायित्व लोगी कविता?
लोगों की भावनाओं से
शब्दों में उतर कर
बदलोगी जन मानस
बनाओगी उन्हें जिम्मेदार
करवाओगी कर्तव्य का बोध,
तुम ही अंतिम आशा हो
तुम ही कर सकती हो
युद्ध को रोक कर
संपूर्ण विश्व में
प्रेम और शांति का संचार
करोगी कविता हमारा यह काम!
- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून - उत्तराखंड
शांति ही है सबसे बड़ी सौगात
जहाँ न हो कोई बैर-भाव,
जहाँ न हो मन में कोई घाव,
ऐसा हो ये सारा संसार,
बस प्रेम ही हो सबका आधार।
न कोई युद्ध, न कोई डर,
हर दिल में बसता हो ईश्वर,
हाथों में हाथ लिए सब चलें,
नफरत के बादल खुद ही ढलें।
रंग, धर्म का न हो भेद,
हर चेहरे पर हो खुशियों का मेहद,
एक धागे में बंधा हो जग,
मिले सभी को अपना रब।
नन्हे-नन्हे सपनों की उड़ान,
हर आँखों में सजे अरमान,
बच्चों की हँसी गूंजे हर ओर,
न आए कभी आँसू का दौर।
धरती बने प्रेम का आँगन,
जहाँ खिले हर दिल का चमन,
हर कोना गाए एक ही गीत,
"शांति से सुंदर कुछ नहीं प्रीत"
आओ मिलकर वचन ये लें,
नफरत को हम दूर करें,
विश्व में फैले बस यही बात,
शांति ही है सबसे बड़ी सौगात
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
चाहते हो तुम अगर विश्व में शान्ति
चाहते हो तुम अगर विश्व में शान्ति
सत्य,अहिंसा, प्रेममय जीवन जियो।
स्वार्थ- घृणा की दलदल बहुत है बुरी,
फस गऐ फिर तो बस कफन ही सियो।।
विश्व में बन्धुत्व का विकास हो
नहीं किसी की भावना का त्रास हो।
अरे ! अपना हित देखत ही देखत
क्यों ? युद्ध से करते विनाश हो ।।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
हुई नहीं बंद गोलाबारी
आज बारूद के ढेर पर,
खड़ी हुई दुनिया सारी।
त्राहि त्राहि मची हुई है,
सदमे में जनता बेचारी।।
कहीं रूस यूक्रेन भिड़े है,
कहीं अमेरिका ईरान।
चले मिसाइल बड़ी बड़ी,
करे आबादी को वीरान।
हाहाकार मचा दुनिया में,
हुई नहीं बंद गोलाबारी।
समस्या का हल युद्ध नहीं,
आपस में करो विचार भई।
नफरत देती है बाँट हमें,
बस एक बनाता प्यार भई।
आपस में सब लड़ने लगे,
शायद मत ही गई मारी।
मत गर्व करो अपने बल का,
तुम साथ सदा दो निर्बल का,
ये छोटे बड़े सब सम रहकर,
करो विरोध जंगी छल का।
प्रेम दिलों को जीत सका है,
इस नफरत से दुनिया हारी।
सत्य, अहिंसा और प्रेम की
ये राही बुद्ध दिखलाता है।
विश्व में शांति बनी रहे,
बुद्ध यही पाठ पढ़ाता है।
दिया शांति संदेश बुद्ध ने,
हुई लाभांवित दुनिया सारी।
- भूपसिंह 'भारती'
नारनौल - हरियाणा
अहिंसा परमो धर्म
विश्व शांति हो ऐसी बात बताएं
मिलके वतन में खुशियाँ लाये
किसीसे भी कोई न टकराये
सौहार्द के सब फूल खिलाये
सबसे हो प्रेम भावना
नहीं नफ़रत किसी से
कहीं नहीं हो बैर भावना
सब रहे हसीं- खुशी से
जात पात की बातें करके
क्यों बात करें शर्म की
ऐसी बातों से क्या लेना
बात करें कर्म की
अहिंसा परमो धर्म यह
नींव हमारे धर्म की
वासुदेव कुटुंबकम यह
बात है बड़े गर्वकी
- अभिनव कुमार शर्मा
धामपुर - उत्तर प्रदेश
गीत
एक दीप जलाना होगा हिन्दोस्तान के लिए।।।
देश के मान के लिए हाँ सम्मान के लिए ।।
शुभ शुभ शुभ हो सृष्टि सारी अशुभ दलन का नाश हो
कोरोना के नाश को शुभ संकल्पों के प्रमाण को
एक दीप ....
व्याधि भय का भंजन होगा नही कहि भी क्रंदन होगा
राष्ट भक्ति के नाम का पावन महिमा गान का
एक दीप.....
तम हरने को यह गम हरने को
मन के अंध व ज्ञान का जनजन कल्याण का
एक दीप...
तम से लड़ने को अस्त्र यही है झपी तप का शस्त्र यही है
धर्म कर्म की बाते छोड़ो देश के अभिमान का
एक दीप जलाना होगा हिन्दोस्तान के लिएटी
भारत की जन" शक्ति" दिखाओ आओ मिलकर दीप जलाओ
नव युग के निर्माण का आत्मज्योत उत्थान का
एक दीप....
- डॉ बबीता चौबे शक्ति
दमोह - मध्यप्रदेश
जिंदगी भी खुशी - शांति पाए
पार्वती माँ तुझे मैं सजाऊँ।
पुष्प माला चढ़ा के रिझाऊँ।।
पालकी की सवारी सजी माँ।
गीत में रागिनी है बजी माँ।।
ध्यान तेरा सदा मैं करूँ माँ।
गोद तेरी फलों से भरूँ माँ।।
धान्य भी पास तेरे धरे है।
पात्र खाली सभी माँ भरे है।।
भक्त सारे खड़े द्वार तेरे।
दूध हल्दी चढ़े हार तेरे।।
आरती वे करे प्यार से हैं।
ढोल ताशे बजे धार से हैं।।
भोग पूड़ी चना का लगाऊँ।
नौ कुँवारी सुता मैं जिमाऊँ।।
मातु देना मुझे तू सहारा।
कष्ट भी तू मिटाना हमारा।।
श्लोक में छंद में गीत में तू।
भक्त की भक्ति में प्रीत में तू।।
माँ रखो याद मेरी सदा ही।
याद आए मुझे तेरी सदा ही।।
चेतना में रहो संग मेरे।
रंग जाऊँ सदा रंग तेरे।।
मोह माया सभी छूट जाए।
जिंदगी भी खुशी - शांति पाए।।
विश्व कविता दिवस के पावन अवसर पर आयोजित ऑनलाइन काव्य सम्मेलन में जैमिनी अकादमी, पानीपत (हरियाणा) द्वारा ‘कवि देवल आशीष स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया जाना मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है।
ReplyDeleteइस सम्मान के लिए मैं हृदय की गहराइयों से जैमिनी अकादमी परिवार की आभारी हूँ।💐💐🙏🙏
यह सम्मान केवल मेरा नहीं, अपितु उन भावनाओं, संवेदनाओं और शब्दों का है, जिन्हें मैं अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास करती हूँ।
आप सभी का स्नेह, विश्वास और प्रोत्साहन मेरी लेखनी को निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है।
सभी को सादर नमन एवं हृदय से आभार।
💐💐🙏🙏
---डाॅ. छाया शर्मा, अजमेर, राजस्थान
(WhatsApp से साभार)