पंडित हरिभाऊ उपाध्याय स्मृति में चर्चा परिचर्चा

       नम्र ही जीवन का श्रृंगार है। जो कभी ‌चापलूस का प्रतीक नहीं हो सकता है। फिर भी कुछ स्थिति ज़रूर चापलूस का प्रतीक साबित होती है। दोनों में बहुत अंतर है। कर्मवीर की अपनी पहचान होती है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
     नम्रता स्वाभिमान रखती है और चापलूसी रखती है स्वार्थ।जो कर्मवीर होते हैं वो कर्म में विश्वास रखते हुए अपने स्वाभिमान को नहीं खोते। स्वार्थ से दूर, वह कर्मशील रहते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपना जीवन व्यतीत करते हैं।कभी स्वार्थ के वशीभूत रोते गिड़गिड़ाते नहीं वह। हमेशा ही अपनी मेहनत के सुफल के प्रति आशान्वित रहते हुए जीवन के प्रति सकारात्मक सोच रखते हैं। ऐसे कर्मवीर न केवल अपनी, बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति में रचनात्मक योगदान करते हैं। जबकि स्वार्थी और चापलूस  लोग समाज के लिए बोझ ही होते हैं।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

         मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी सबसे बड़ी पहचान होता है। कोई अपनी वाणी की मिठास से हृदय जीतता है, तो कोई अपने कर्मों की दृढ़ता से इतिहास रचता है। ऐसे में एक सूक्ष्म किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण भेद समझना आवश्यक है—नम्र  होना और चापलूस होना।नम्र होना मन की कोमलता है, संवेदनाओं की सच्चाई है। यह वह गुण है जो मनुष्य को विनम्र बनाता है, उसे दूसरों के दुख-दर्द को समझने की क्षमता देता है।  नम्र व्यक्ति अपने व्यवहार से प्रेम बाँटता है, सम्मान देता है और बिना किसी स्वार्थ के संबंधों को सींचता है। उसकी वाणी में मिठास होती है, पर वह मिठास आत्मा से उपजी होती है, दिखावे से नहीं। इसके विपरीत, चापलूसी एक बनावटी या कृत्रिम आवरण है—जहाँ शब्दों में मिठास होती है, पर हृदय में स्वार्थ छिपा होता है। चापलूस व्यक्ति सच्चाई से दूर रहता है, वह केवल लाभ के लिए झूठी प्रशंसा करता है। उसकी विनम्रता नहीं, बल्कि अवसरवादिता बोलती है। वह सामने झुकता है, पर भीतर से कभी समर्पित नहीं होता। इसी प्रकार, जीवन के संघर्षों में कर्मवीर का स्थान सर्वोपरि होता है। कर्मवीर वह है जो परिस्थितियों से हारकर बैठता नहीं, बल्कि हर चुनौती को अवसर में बदल देता है। उसके जीवन में भी पीड़ा आती है, असफलताएँ दस्तक देती हैं, पर वह रोकर समय नहीं गंवाता। वह अपने आँसुओं को शक्ति में बदलता है और निरंतर आगे बढ़ता रहता है। यह कहना नहीं कि कर्मवीर के हृदय में भावनाएँ नहीं होतीं; बल्कि वह अपने भावों को संयम में रखकर कर्म को प्रधानता देता है। उसकी आँखों में सपने होते हैं, और उन सपनों को साकार करने का अटूट संकल्प भी। वह जानता है कि रोने से समस्याएँ नहीं सुलझतीं, उन्हें सुलझाने के लिए साहस और कर्म आवश्यक है। अतः जीवन का सार यही है कि हम अपने स्वभाव में  नम्र रहें—दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम बनाए रखें, परंतु चापलूसी से दूर रहें। साथ ही, अपने भीतर कर्मवीर की ज्वाला जलाए रखें, जो हर कठिनाई में भी हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

          नम्रता पूर्वक विचार-विमर्श होता है, तो अपनत्व भावनात्मक संदेश जाता है। नम्र बनों कभी चापलूस नहीं, कर्मवीर तो कभी रोते नहीं। वास्तविक पहचान है, किसी- किसी आदत ही होती है, सब चापलूस होकर करने की, ऐसे चापलूस ज्यादातर नहीं चल पाते है, कहीं न कहीं अपनी पहचान छोड़कर चले जाते है, यही चापलूस बाद में रोते फिरते रहते है। जो जीवन में अंतिम समय तक बिना चापलूस होकर काम करता है, तो उसे रोने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उसका जीवन वैसे ही कट जाता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

    यह सही बात है जब हम अहंकार से कोसों दूर शांत स्वभाव से मंद मुस्कान लिए शिष्टता के साथ धैर्य पूर्वक हर व्यक्ति के साथ सरल व्यवहार करते हैं तो हमें परिवार समाज राष्ट्रीय स्तर पर महान विनम्र शालीन व्यक्तित्व के रूप में आंका जाता है। वहीं उपर्युक्त गुण व्यवहार के अभाव में जब हम अपना उल्लू सीधा करने के लिए गिरगिट जैसा रूप बना लेते हैं और चापलूसी के लिए उद्यत हो जाते हैं तो इस जमाने के कुछ प्रतिशत लोग तो उन्हें पसंद करते हैं पर कलई खुलने पर सारा काम तमाम हो जाता है तथा जिंदगी भर का रोना हो जाता है अतः विभिन्न बाधाओं , विघ्नों को देखकर घबराना और रोना नहीं चाहिए बल्कि भाग्य के भरोसे न रहकर,स्वयं के कर्म पर विश्वास रखते हुए धैर्यपूर्वक, शालीनता, सौम्यता, सज्जनता, विनम्रता के साथ जीवन जीना चाहिए जिसे एक सच्चा कर्मवीर कह सकते हैं। यही मनुष्य का विद्या रूपी धन भी  है जो उसे हर तरह से संपन्न बनता है कहा भी गया है-- "विद्या ददाति विनयम्" ।

- डाॅ. रेखा सक्सेना

 मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     ““नम्र बनों कभी चापलूस नहीं, कर्मवीर तो कभी रोते नहीं।” उक्त पंक्तियाँ जीवन के उच्च आदर्शों को प्रकट करती हैं, जहाँ नम्रता को आत्मबल और चापलूसी को आत्मसम्मान के पतन के रूप में देखा गया है, किंतु वर्तमान यथार्थ अत्यन्त ज्वलन्त और पीड़ादायक है। आज कई बार सत्यनिष्ठ और कर्मवीर ही सबसे अधिक उपेक्षा और अन्याय का सामना करते हैं। जब संविधान के तीनों स्तम्भ अर्थात विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपने मौलिक कर्तव्यों के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाते, और पत्रकारिता भी विभिन्न कारणों से निर्भीक होकर सत्य नहीं कह पाता, तब कर्मवीर का रोना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंत संवेदना, न्याय के प्रति उसकी अटूट आस्था और व्यवस्था को आईना दिखाने की शक्ति का प्रतीक बन जाता है। अतः वास्तविक कर्मवीर वह है, जो पीड़ा को अपनी पराजय नहीं बनने देता, बल्कि उसी को संघर्ष की ऊर्जा में बदलकर अन्याय के विरुद्ध और अधिक दृढ़ता से खड़ा हो जाता है, क्योंकि अंततः सत्य और न्याय का मार्ग कठिन अवश्य होता है, परन्तु वही इतिहास में परिवर्तन का आधार भी बनता है। क्योंकि मानवीय प्रवृत्ति ही ऐसी है कि उसके रोकने के बावजूद ऑंखें नम हो जाती हैं। लेकिन समय आने पर यही ऑंसू मोती बन जाते हैं। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

       नम्रता, कायरता और चापलूसी, इन तीनों में अंतर है परंतु थोड़ा सा। और कोई समझे अथवा न समझे हमें स्वयं यह अंतर समझना है। स्वयं को चेक करते रहना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं। हम नम्र हैं लेकिन कायर नहीं। जब आवश्यकता हो तो अपने विचारों को पूरे आत्म विश्वास और दृढ़ता के साथ व्यक्त कर सकते हैं। कायर व्यक्ति यह नहीं कर सकता। चापलूस व्यक्ति के अपने कोई विचार होते ही नहीं हैं। यदि होते भी हैं तो उसे अपने आप को ठीक से व्यक्त करना ही नहीं आता। वह केवल एक बिना रीढ़ की हड्डी वाला, बिना पैंदी के लोटे के समान होता है। उसने केवल जी हाँ, हाँ जी, यस सर और यस मैडम ही सीखा है। कर्मवीर व्यक्ति सही कर्म में विश्वास रखता है।वह हर समय बेकार की बहस और समय बर्बादी से बचता है।उसका पूरा ध्यान अपने कर्म पर रहता है। हाथ कंगन को आरसी क्या? उसके कर्म में ही उसका पूरा व्यक्तित्व झलकता है। अधिक शब्दों का प्रयोग करने की उसे आवश्यकता नहीं होती। सफलता ऐसे ही व्यक्ति के कदमों को चूमती है। 

- रेनू चौहान 

 नई दिल्ली

     विनम्रता वो महान गुण है जो व्यक्ति को उच्चतम शिखर तक पहुंचा देती है , व स्वतः आदरणीय भी बना देती है ! नम्रता व्यक्ति के व्यवहार को भी उत्कृष्ट बना देती है , अतः हमें विनम्र बनना चाहिए , पर चापलूस नहीं !! चापलूसी एक ऐसा गुण है , जो निज स्वार्थ हेतु , व्यक्ति की नैतिकता को गिरा देता है , व दूसरे की जी हुजूरी पर लगा देता है !! चापलूसी कर , स्वयं को गिराने के बजाय , स्वयं पर भरोसा रखें व अपने कर्म करें ! जो कर्मवीर होते है , उन्हें लोगों की चापलूसी नहीं करनी पड़ती क्योंकि वे अपने कर्म पर विश्वास रखते है !! कर्म पर विश्वास रखनेवाले सदा कर्म में ही विश्वास रखते है  , व हिम्मत नहीं हारते , न निराश होकर रोने बैठते है !! कर्मवीर तो, हारकर भी , नवीन ऊर्जा के साथ , असाध्य को, साध्य बनाने मैं जुट जाते हैं !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

    "नम्र बनो कभी चापलूस नहीं” और “कर्मवीर तो कभी रोते नहीं” — ये दोनों पंक्तियाँ जीवन के संतुलित और सशक्त दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं। नम्रता व्यक्ति का आभूषण है, जो उसके संस्कार, आत्मविश्वास और श्रेष्ठता को दर्शाती है, जबकि चापलूसी स्वार्थ से उपजी एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो व्यक्ति के आत्मसम्मान को कमज़ोर कर देती है। इसलिए आवश्यक है कि हम विनम्र रहें, पर अपनी गरिमा और सत्यनिष्ठा को बनाए रखें। इसी प्रकार, “कर्मवीर तो कभी रोते नहीं” का आशय यह है कि जो व्यक्ति कर्म में विश्वास रखता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानता और न ही केवल शिकायत करता है, बल्कि अपने परिश्रम और दृढ़ निश्चय से समस्याओं का समाधान खोजता है। इस प्रकार, ये पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि जीवन में विनम्रता के साथ आत्मसम्मान बनाए रखते हुए, संघर्षों का सामना साहस और कर्मठता से करना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

      स्वभाव और चरित्र में निश्चल, निश्छल,उदार और नम्र होना ऐसे कोहिनूर गुण होते हैं, जो परिवार, परिजन, पड़ोस और समाज में अपना विशेष स्थान बना लेते हैं और विशेष मान-सम्मान भी पाते हैं। ऐसे गुणवानों के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता और हर काम सहजता और सरलता से पूरे कर लेते हैं। इसीलिए ये कर्मवीर भी होते हैं। सदैव लोगों की मदद के लिए तत्पर रहते हैं। न काम के लिए बहाने बनाते हैं, न झुंझलाहट और न ही रोते हैं।  सदैव हँसमुख और उत्साही नजर आते है। इसके विपरीत जो मतलबी, कठोर और चालाक किस्म के होते हैं, वे नकारा होते हैं, इसलिए चापलूस होते हैं और चापलूसी से अपना काम पूरा करना चाहते हैं। जो लोग इनकी इस चापलूस गुण से परिचित होते हैं, वे ऐसे लोगों की बातों में नहीं फंसते और न ऐसे चापलूसों को पास फटकने देते हैं। खैर। सार यही कि हमेशा नम्र रहें। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       यह सही है कि नम्र बनो, चापलूसी करना ठीक नहीं. साहस का अभाव कायरता को जन्म देता है और आत्मविश्वास का अभाव चापलूसी को जन्म देता है. कर्मवीर कर्म करते हैं, अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहते हुए नम्र भी रहते हैं, इसलिए कर्मवीर को चापलूसी की आवश्यकता ही नहीं रहती और वे कभी रोते नहीं. इसलिए ही यह उक्ति सार्थक होती है कि-

नम्र बनो कभी चापलूस नहीं 

कर्मवीर तो कभी रोते नहीं.

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

रोते हुए आते हैं सब हँसता हुआ जो जाएगा

वो मुकद्दर का सिकंदर जाने हम कहलायेगा - -।।

        कितना सच्चा है यह गीत जिसमें जीवन और मृत्यु की सबसे बड़ी सच्चाई छिपी है। कर्म वीर रोते नहीं बल्कि बहती धारा को भी अपनी ओर मोड़ लेने का माद्दा रखते हैं  - - - भरपूर नम्रता के साथ। कर्म का अहंकार उन्हे घमंडी चापलूस नहीं बनाता बल्कि उन्हे मानसिक तौर पर और भी मजबूत बनाता है। "रोना कभी नहीं रोना चाहे टूट जाये कोई खिलौना" जी हाँ - - कर्मवीर अपनी पीढ़ियों को  भी मजबूत और संघर्षशील संस्कारों बनाते हैं। नम्रता और चापलूसी के बीच बड़ा ही नाजुक सा फर्क़ होता है जो बिरले ही पहचान पाते हैं। अति नम्रता को लोग आपकी कमजोरी समझने की भूल कर लेते हैं लेकिन हमें हतोत्साहित नहीं होना चाहिए बल्कि एक विश्वास एक आत्मपरिष्कार एक संकल्प को लेकर बढते ही रहना होगा अपने रास्तों पर। तात्पर्य यही कि दुनिया के साथ चलना है तो छोटी छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखना होगा - - तभी  जीवन की गहराइयों को समझेंगे और और अभिनंदनीय राहें चुन कर सफलतम इंसान बनेंगे।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र  

    मानव जीवन में सत्य अहिंसा प्रेम नम्र स्वभाव लेकर ही इंसान क्रोध त्याग कर शान्ति मार्ग अपनाया है! मानव हमेशा व्यावहारिक जीवन पथ नम्रता से पेश हो सुगम सरल बनाया है !कर्मवीर खुद्दारी से चुनौतियों का सामना कर सामंजस्य बिठाते जीवन नैया पार लगाते हैं उन्हें कभी रोते नहीं देखा !नम्र बनों ,कभी भी चापलूसी को आदत ना बनायें ,खुद्दारी का नशा चढ़ाओं नम्रता से समाजस्य बिठा  । खुद्दारी को हथियार बना आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बनों! कर्मवीर तो कभी हार नहीं मानते चौनीतियों का सामना कर अपनी और दूसरों की मंजिल सँवार सुकून का रास्ता दिखाओं!  चापलूसी कर आप अपना और दूसरों का सम्मान करना भूल जाते हो जो चापलूसी कर आगे बढ़ते  है धाराशाही होने का क्रम जारी रहता हैं ! वह कभी नजरे नही मिला सकते अपनी बात रखने में समझदारी होनी चाहिये । मानव जीवन में सत्य अहिंसा प्रेम नम्र स्वभाव लेकर ही क्रोध त्याग कर शान्ति मार्ग अपनाया !व्यावहारिक जीवन पथ को सुगम सरल बनाते निर्णायक की भूमिका में सत्य को हथियार बना कर्मवीर  कहलाते रोते नहीं है !

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

     अगर नम्रता और चापलूसी की बात करें तो नर्म होना एक अच्छा  गुण है जबकि चापलूस होना एक स्वार्थी भूमिका है जो आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है और नरम स्वभाव से दुसरों के दिल को जीता जा सकता है इसलिए अगर आप कर्मवीर हैं तो चापलूसी करने का मतलब नहीं हो सकता क्योंकि कर्मवीर तो कर्म कर के दिखाते हैं न की रोना रोते हैं तो आईये आज की चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि नम्र बनो कभी चापलूस नहीं, कर्मवीर कभी रोते नहीं, मेरा मानना है कि सच्चाई और ईमानदारी से व्यवहार करना ही सबसे उत्तम है और अगर नरम दिल इंसान हो तो  सोने पे सुहागे का काम होगा, क्योंकि नरम दिल इंसान पर लोग भरोसा करते हैं तथा इंसान खुद भी तनाव  मुक्त रहता है अगर कर्मवीर की बात करें तो, कर्मवीर व्यक्ति कठिन परिश्रम, अटूट लगन और साहस के साथ अपने कार्यों को पूरा करता है लेकिन चापलूस बन कर रोना नहीं रोता सिर्फ अपने कर्म को ही धर्म समझ कर पूरा करने में लगा रहता है, और कर्मवीर ही अपने सकारात्मक कार्यों से समाज के लिए एक मिसाल बनते हैं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा 

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

   चापलूसी करना कभी अच्छा नहीं होता। स्वयं के विवेक के अनुसार कार्य करना चाहिए। जो उचित लगे वही करना मुनासिब है। व्यवहार में उद्दंडता न हो नम्रता रहे। सभी के प्रति सद्भाव हों। अपना कार्य दिल से करते रहें। सभी कर्मवीर बनें। कर्मवीर कभी रोता नहीं ।बस केवल अपना कर्म करता है। 

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

    मनुष्य के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान उसकी नम्रता होती है, परंतु नम्रता और चापलूसी में बहुत अंतर है। नम्र व्यक्ति सच्चाई, सरलता और आत्मसम्मान के साथ व्यवहार करता है, जबकि चापलूस स्वार्थ के लिए झूठी प्रशंसा करता है। इसलिए हमें नम्र तो बनना चाहिए, पर अपने स्वाभिमान को कभी नहीं खोना चाहिए। इसी प्रकार कर्मवीर व्यक्ति अपने कर्म पर विश्वास करता है। वह कठिनाइयों से घबराकर रोता नहीं, बल्कि उनका सामना करता है। जीवन में संघर्ष और चुनौतियाँ आना स्वाभाविक है, परंतु सच्चा कर्मयोगी उन परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस बनाए रखता है। अतः हमें अपने जीवन में नम्रता और कर्मशीलता को अपनाना चाहिए। यही गुण हमें सच्ची सफलता और सम्मान दिलाते हैं ।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

" मेरी दृष्टि में " कर्मवीर नम्र भी होता है। परन्तु चापलूस कभी नहीं होता है। यही उसकी पहचान होती है और यही उन का अभिमान है। सब कुछ कर्म से बनता है। जो सकारात्मकता का प्रतीक साबित होता है। अतः कर्म से सब-कुछ सम्भव है।

          - बीजेन्द्र जैमिनी 

        (संचालन व संपादन)

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