शरदिंदु बंदोपाध्याय स्मृति में चर्चा परिचर्चा
परिवर्तन ही जीवन का मूल स्वभाव है। जहाँ परिवर्तन होता है, वहीं से कर्म की शुरुआत होती है। स्थिरता जड़ता को जन्म देती है, जबकि परिवर्तन मनुष्य को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। कर्म ही जीवन का आधार है। बिना कर्म के जीवन निरर्थक हो जाता है। हमारे हर छोटे-बड़े कार्य ही हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम परिवर्तन को स्वीकार करें और उसे सकारात्मक कर्मों में बदलें, क्योंकि कर्म ही जीवन को सार्थक बनाता है।
- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'
मुंबई - महाराष्ट्र
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जहाँ परिवर्तन नहीं, वहाँ जड़ता है; और जहाँ जड़ता है, वहाँ जीवन का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं। परिवर्तन ही वह प्रेरक शक्ति है जो मनुष्य को कर्म के मार्ग पर अग्रसर करती है। जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, तब मनुष्य के विचार बदलते हैं, और विचारों के परिवर्तन से ही कर्म की उत्पत्ति होती है। कर्म, जीवन की धुरी है। यह केवल क्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति के अस्तित्व, उसकी पहचान और उसके उद्देश्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जो व्यक्ति परिवर्तन को स्वीकार करता है, वही कर्मशील बनता है, और जो कर्मशील होता है, वही वास्तव में जीवन को सार्थक रूप से जीता है। परिवर्तन व्यक्ति को चुनौतियाँ देता है, और कर्म उन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है। यदि हम इतिहास, समाज और व्यक्तिगत जीवन को देखें, तो पाएँगे कि हर महान उपलब्धि के पीछे परिवर्तन की चिंगारी और कर्म की अग्नि रही है। बिना परिवर्तन के कर्म संभव नहीं, और बिना कर्म के जीवन केवल एक निष्क्रिय अवस्था बनकर रह जाता है। अतः यह स्पष्ट है कि परिवर्तन ही कर्म का बीज है और कर्म ही जीवन का वट वृक्ष है। आज के युग में, जब समाज, व्यवस्था और मानवीय मूल्यों में निरन्तर बदलाव हो रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम परिवर्तन को भय के रूप में नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखें। सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर, हम अपने कर्मों को दिशा दे सकते हैं और अपने जीवन को उद्देश्यपूर्ण बना सकते हैं। अन्ततः, यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। परिवर्तन से प्रेरित होकर किया गया कर्म ही जीवन को गति, अर्थ और गरिमा प्रदान करता है। अतः हमें परिवर्तन का स्वागत करना चाहिए और सतत कर्म के माध्यम से अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाना चाहिए। इसी उत्कृष्टता से कर्ता राष्ट्रनायक बनकर राष्ट्र का निर्माण करता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
कुछ भी परिवर्तन करने के लिए कर्म करना पड़ता है. या कर्म ही सब कुछ परिवर्तन करता है. जो भी हम कर्म करते हैं उससे ही हमारा जीवन बनता और बिगड़ता है.मनुष्य का वश तो कर्म पर है. पर जीवन तो परमात्मा के हाथ में है. अपने हिसाब से सभी कर्म अच्छा ही करते हैं पर फैल अपने हिसाब से नहीं मिलता है. वह तो प्रकृति के हिसाब से मिलता है. जैसे किसान तो पूरी मेहनत कर के फसल बोता है पर उसका होना उसके हाथ नहीं है. कभी सूखा तो कभी बाढ़ से फसल प्रभावित होता ही रहता है. ठीक उसी तरह मनुष्य तो कर्म करता है पर जीवन उसके हिसाब से नहीं बनता है. कौन व्यक्ति अच्छा जीवन नहीं चाहता है पर सबको कहा अच्छा जीवन मिल पाता है.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
जब हम कोई कर्म करते हैं , टो हमारे मन में एक लक्ष्य , वांछित परिणाम होता है !! कभी हम अपने लक्ष्य को पा लेते हैं , व कभी नहीं ! जब हम असफल होते हैं अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में, तो हमें अपने प्रयासों में संशोधन , व परिवर्तन करना पड़ता है ताकि हम अपने प्रयासों की कर्मों को सुधार सकें , व नवीन ऊर्जा के साथ पुनः अपने कर्म करें !! कर्म तो जीने के लिए , करने ही पड़ते हैं !! कर्म के बिना जीवन असंभव है , व सब कुछ निज कर्मों से ही प्राप्त होता है , व परोसा हुआ कुछ नहीं मिलता !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
परिवर्तन जीवन का नियम है। पल पल परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है सृष्टि में। यानि कर्म हो रहा है,कार्य हो रहा है। बिना कर्म किये जीवन कल्पना व्यर्थ है।कर्म से ही जीवन चक्र गतिमान है। सक्रियता से कर्मरत रहते हुए जीवन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।निष्क्रियता जीवन की गतिविधियों को बाधित करती है। इसलिए कर्म करते रहना अत्यावश्यक है। कहते हैं,जीवन चलने का नाम। चलना यानि कर्म करना ही जीवन की निशानी है और परिवर्तनकारी होता है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
जीवन का मूल स्वभाव परिवर्तन है। प्रकृति का हर कण कण निरंतर बदलता रहता है— दिन से रात, ऋतु से ऋतु, बालक से युवा और फिर वृद्धावस्था तक का सफर—सब परिवर्तन का ही प्रमाण है। यदि परिवर्तन न हो, तो जीवन ठहर जाए, और ठहराव ही जड़ता का संकेत है। इसलिए यह कहना उचित है कि परिवर्तन ही कर्म का प्रेरक तत्व है और कर्म से ही जीवन की सार्थकता निर्मित होती है। परिवर्तन हमें जगाता है, सोचने पर मजबूर करता है और हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो मनुष्य को अपने व्यवहार, सोच और कार्यों में भी बदलाव लाना पड़ता है। यही बदलाव उसे कर्म की ओर अग्रसर करता है। उदाहरण के लिए, जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तो व्यक्ति संघर्ष करता है, मेहनत करता है और समाधान खोजने का प्रयास करता है। यही प्रयास उसके कर्म हैं, जो उसके व्यक्तित्व और भविष्य को आकार देते हैं। कर्म जीवन का आधार है। केवल विचारों या इच्छाओं से जीवन नहीं चलता, बल्कि उन्हें साकार करने के लिए कर्म आवश्यक होता है। बिना कर्म के कोई भी सपना अधूरा ही रह जाता है। यही कारण है कि कर्म को धर्म भी कहा गया है। हमारे हर छोटे-बड़े कार्य हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं। अच्छे कर्म हमें सफलता, सम्मान और संतोष प्रदान करते हैं, जबकि बुरे कर्म हमें दुख और असफलता की ओर ले जाते हैं। परिवर्तन और कर्म का संबंध बहुत गहरा है। परिवर्तन हमें नई दिशा देता है और कर्म उस दिशा में चलने का माध्यम बनता है। जब हम परिवर्तन को स्वीकार करते हैं, तो हम नई संभावनाओं के द्वार खोलते हैं। वहीं, जब हम कर्म करते हैं, तो हम उन संभावनाओं को वास्तविकता में बदलते हैं। इस प्रकार, परिवर्तन और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। आज के आधुनिक युग में, जहाँ हर पल नई चुनौतियाँ और अवसर सामने आते हैं, वहाँ परिवर्तन को अपनाना और निरंतर कर्म करते रहना अत्यंत आवश्यक है। जो व्यक्ति परिवर्तन से डरता है और कर्म करने से पीछे हटता है, वह जीवन की दौड़ में पीछे रह जाता है। वहीं, जो व्यक्ति परिवर्तन को अवसर के रूप में देखता है और कर्म को अपना कर्तव्य मानता है, वह सफलता की ऊँचाइयों को छूता है। अंततः, यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन जीवन की गति है, कर्म उसका साधन है और जीवन उसकी परिणति। यदि हम परिवर्तन को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार करें और निरंतर कर्म करते रहें, तो हमारा जीवन न केवल सफल होगा, बल्कि सार्थक भी बनेगा।
- डा. अलका पान्डेय
मुंबई - महाराष्ट्र
“परिवर्तन” सृष्टि का शाश्वत नियम है। जहाँ परिवर्तन रुक जाता है, वहाँ ठहराव और जड़ता आ जाती है। यह पंक्ति “परिवर्तन से कर्म होता है” यह संकेत देती है कि जब मनुष्य अपने विचारों, दृष्टिकोण और परिस्थितियों में बदलाव स्वीकार करता है, तभी वह कर्म के लिए प्रेरित होता है। परिवर्तन ही वह चिंगारी है, जो व्यक्ति को निष्क्रियता से बाहर निकालकर सक्रियता की ओर ले जाती है। दूसरी पंक्ति “कर्म से ही जीवन होता है” जीवन के वास्तविक सत्य को उजागर करती है। केवल सोचने या चाहने से जीवन सार्थक नहीं होता, बल्कि कर्म ही उसे दिशा और अर्थ प्रदान करता है। कर्म के बिना जीवन केवल एक अस्तित्व बनकर रह जाता है, जबकि कर्म से ही उसमें उद्देश्य, संघर्ष, अनुभव और सफलता का रंग भरता है। यदि हम दोनों पंक्तियों को जोड़कर देखें, तो स्पष्ट होता है कि परिवर्तन और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। परिवर्तन प्रेरणा देता है, और कर्म उसे साकार करता है। बिना परिवर्तन के कर्म संभव नहीं, और बिना कर्म के जीवन अधूरा है। अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि “जो बदलता है, वही आगे बढ़ता है; और जो कर्म करता है, वही वास्तव में जीता है।”
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
परिवर्तन जीवन जीवन में नई दिशा हमारे कर्तव्य आचार विचार व्यवहार में परिवर्तन ला ,महत्व को समझाता है।जिसके पीछे लाजिक होता है वह अपने स्वभाव व्यवहार के अनुकूल जीवन परिवर्तन लाता है !जिसका उद्देश्य लक्ष्य तक पहुंचना समय के जीवन के अनुकल कर्म क्षेत्र में प्रगति ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा उत्साह ललक बनाए रखता है!जीवन को बेहतर बनाने अवसर दे मदद करता है।कर्म सफलता की नींव है,कर्म करने से हमें आंतरिक संतुष्टि मिलती और हमारा जीवन सुखी और समृद्ध बनाता है! एक व्यक्ति से अनेक परिवर्तन स्वस्थ समाज का निर्माण अपने आप से जुड़ने वाले का जुनून जस्बा बहुमूल्य होता है बढ़ते हुए बच्चों में परिवर्तन बदलाव शारीरिक क्षमता के साथ बदलाव में अनेक प्रश्न उठते है जिसकी जिज्ञासा अपने कर्म को देख समझ उनके मित्र हो एक बच्चे की सही राह दिखा सही राह चलने प्रेरित करता है ! रोजमर्रा की ज़िंदगी चाहे कितनी भी सुकूँ भरी क्यों न हो,व्यक्ति कुछ परिवर्तन चाहता है। जिससे जीने का तरीका बदल खुशहाल बनाता है
- अनिता शरद झा
रायपुर -छत्तीसगढ़
जीवन की संकल्पनाएं बड़ी ही विचित्र होती हैं। कर्म ही पूजा है - - हम मानकर चलते हैं। सच्चाई यह है कि कर्म अपने साथ परिवर्तन को लेकर चलते हैं। कर्म से ही वैयक्तिक सार्वजनिक और सामाजिक परिवर्तन निर्धारित होते हैं। इंसान अपने मुँह पर आँखों पर पट्टी बांध ले लेकिन उसका कर्म बोलता है। कार्य शैली उसकी विशेषता बन चाती है। सामान्य से सामान्य परिवर्तन भी इंसान की कार्य शैली को प्रभावित करते हैं और वे सामान्य सी छोटी सी दिखनेवाली बातें बहुत बडे़ बदलाव का निर्णायक बन जाती हैं। खैर - - हम हैं तो समाज है समाज है तो देश है देश है तो विश्व है - - और विश्व है तो मान जीवन है। यह पारस्परिकता ही सृष्टि का आधार है - - परिवर्तन का आधार है - - जीवन का आधार है। अतः सदैव स्पष्ट है कि जीवन के बिना कर्म बेमानी और कर्म के बिना जीवन बेमानी है।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
" मेरी दृष्टि में " परिवर्तन जीवन का आधार है। जो समय गति से लेकर प्राकृतिक संरचना को प्रभावित करते हैं। कहते हैं कि प्राकृतिक परिवर्तनशील है। जो सभी जीवों प्रभावित करतीं है। परन्तु कर्म सबसे ऊपर रहता है। जो जीवन की व्याख्या करता है।यह नियम सब पर लागू होता है।
Comments
Post a Comment