पाठकों के बीच में सिद्धेश्वर की लघुकथाएं
सिद्धेश्वर
०जन्मतिथि:20 जून 1959
०जन्म स्थान : पटना ( बिहार )
0 शिक्षा: स्नातक(कला) विशिष्टता के साथ
0लेखन की भाषा: हिंदी
0 सम्प्रति : अवकाश प्राप्त, मुख्य टिकट निरीक्षक (पूर्व मध्य रेल)
0: अवकाश प्राप्ति के पश्चात् स्वतंत्र लेखन
0लेखन की विधाएं :कविता/ कहानी/ लघुकथा/ लेख/ चिंतन/ बाल कविता/ भेंटवार्ता/ डायरीनामा और बाल कहानी
0विशेष अभिरुचि :कलाकृति (रेखाचित्र)
0अब तक (2024 )* एक हज़ार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में, पांच हजार से अधिक साहित्य की लगभग सभी विधाओं में प्रकाशित एवं सात हजार से अधिक रेखाचित्र और रंगीन कलाकृतियां राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं और पुस्तकों के आवरणों में प्रकाशित।
O पूरे देश में पहली बार (1976) कविता एवं लघुकथा पोस्टर प्रदर्शनी सिद्धेश्वर द्वारा l इसके बाद लगतार [25 बार ] कलाकृति प्रदर्शनी!
पटना पुस्तक मेला में 5 बार l
() बिहार सरकार द्वारा "रेणु पुरस्कार"
o भारत सरकार द्वारा मैथिलीशरण गुप्त एवं प्रेमचंद पुरस्कार
o सारिका सर्वभाषा लघुकथा पुरस्कृत
o वर्तमान साहित्य कहानी पुरस्कृत
O इंडिया नेटबुक साहित्य रत्न सम्मान
प्रकाशित पुस्तकें : -
० बूंद बूंद सागर / लघुकथा संग्रह / पुरस्कृत
0 इतिहास झूठ बोलता है / कविता संग्रह / पुरस्कृत
0 ढलता सूरज ढलती शाम/ कहानी संग्रह /पुरस्कृत
0 भीतर का सच (लघुकथा कृति)
o काव्य कलश / काव्य लघु पुस्तिका
o सोने के पंख/ बाल कथा संग्रह
O कैनवास पर बिखरे मोती (कला एवं कविता पर केंद्रित पुस्तक ) ( इंडिया नेट बुक अवार्ड से सम्मानित )
संपादित पुस्तकें : -
०आदमीनामा एवं उत्कर्ष लघुकथा संकलन
o गजल यात्रा/ गजल संकलन
0 टूटे जुड़ते संदर्भों के बीच / कविता संकलन
o शताब्दी की कविताएं / काव्य संकलन
0 कथा दशक ( कथा संकलन )/ सिद्धेश्वर की गजलें ( गजल संग्रह)
O राइजिंग बिहार एवं तर्पण साप्ताहिक अखबार का साहित्य संपादक
o संपादक :अवसर साहित्य यात्रा (ई त्रैमासिक )
अध्यक्ष
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद
संपर्क सूत्र : -
सिद्धेश्वर
"सिद्धेश् सदन" अवसर प्रकाशन, (किड्स कार्मल स्कूल के बाएं) /पोस्ट :बीएचसी, द्वारिकापुरी रोड नंबर:०2 हनुमाननगर ,कंकड़बाग ,पटना 800026 (बिहार )
१. बुढ़ापे की लाठी
अस्पताल के बेड नंबर 37 के बूढ़े मरीज की स्थिति को देख नर्स सोनी परेशान हो गई थी l आज शाम को उसकी आंखों का ऑपरेशन है और स्थिति यह है कि उसके साथ कोई भी परिजन नहीं । वह खीजते हुए 70 वर्षीय बूढ़े मरीज शंकर की आंख में इंजेक्शन लगाने के बाद बोली -
" बाबा ! आज ही आपकी आंखों का ऑपरेशन है l कम से कम एक परिजन तो आपके साथ होना चाहिए ? आँख के ऑपरेशन के बाद कौन आप की दवा- दारू, देख -रेख बढ़िया से कर सकेगा ?"
" सिस्टर, इस बुढ़ापे में सगे भी बेगाने हो जाते हैं l एक बेटी थी हमारी, मगर उसकी शादी ऐसे घर में हुई, जिसका पति हमारे घर उसे जल्दी आने ही नहीं देता l "
" आपकी पत्नी तो होगी ? "
" हां, मेरी पत्नी ममता ही तो है, जो हमारे साथ हमारे गांव में रहती है l उसके भाई की शादी थी, वहां जाते ही वह बीमार पड़ गई l "
" बेटा रहता तो, वह जरूर आपके पास दौड़ा चला आता l इसलिए कहते हैं, दर्जनों बेटियां हो जाएँ,मगर उससे क्या ? एक बेटा भी साथ हो, तो वह बुढ़ापे की लाठी बन जाता है !"
" बेटे की बात मत कहो सिस्टर! ऐसा बेटा होने से ज्यादा बेहतर है निर्वंश होना। आज के जमाने में बेटा, जो शादी-ब्याह होते ही जमाने के रंग में रंग जाता है और अपनी प्राइवेसी बनाए रखने के लिए अपने बूढ़े -मां बाप को अपने गांव पर ठिकाने लगा आता है l सुबह - शाम अपने बेटे - बहू की कड़वी बातें सुनने से अच्छा है उससे दूर, अकेले जीवन यापन करना। "
अपनी आंखों में छलकते आंसुओं को पोंछते हुए उसने आगे कहा -
" बेटे ने तो मोबाइल फोन पर ही अपने नहीं आने का बहाना बना दिया कि ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल रही है ! मैं पैसे भेज रहा हूं पापा जी, मम्मी के साथ हॉस्पिटल जाकर अपनी आँखों का ऑपरेशन करवा लीजिएगा। प्लीज पापा जी, सॉरी.. ! "
मोबाइल फोन पर बेटे की आवाज अब भी मेरे कानों में गूंज रही है सिस्टर.. !"
नर्स और मरीज के बीच अभी वार्ता चल ही रही थी कि उस बूढ़े की पत्नी दौड़ती हुई आई और सामने खड़ी हो गयी -
" किस बात की चिंता करते हो जी ? तबीयत बिल्कुल ठीक हो गई है मेरी !आपकी आंखों के ऑपरेशन की खबर पाते ही मैं अपने मायके से दौड़ी चली आ रही हूं l बेटा नहीं है तो क्या, हम दोनों एक - दूसरे के लिए बुढ़ापे की लाठी है न ! " ०००
२. बूढ़ा होना पाप तो नहीं!
" आपके पिताजी की आयु कितनी है? "- साहब ने बेड पर पड़े बीमार लक्ष्मण के बेटे से पूछा ।
" 85 वर्ष । "
" तब तो उन पर दवा का असर भी ठीक से नहीं हो सकता! उनका खराब किडनी भी बदला नहीं जा सकता l दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया है l आपके पिताजी पर टीवी का भी असर है l फेफड़ा निमोनिया से ग्रस्त है l डॉक्टर ने समझाते हुए कहा l
" अब मैं क्या करूं डॉक्टर साहब ? पिताजी को मरते हुए देखता रहूं ? और अपना हाथ-पांव बांधे रखूं ? "
" ऐसा कब कहा मैंने ? किंतु आप उनकी बीमारी पर और कितना खर्च कर सकते हैं, यह जान लेना भी जरूरी है मेरे लिए , ताकि आगे का इलाज उसी के हिसाब से कर सकूं l उनका रोग मिटाना संभव नहीं, बस कुछ दिनों तक उनकी मौत को टाला जा सकता है l " - कुछ देर रुकने के बाद, पुनः डॉक्टर साहब ने कहा --
"............ कहीं ऐसा न हो कि आपकी घर जमीन भी बिक जाए और उनकी जान भी ना बचे l दोनों में से एक को बचाना होगा न ?....."
" डॉक्टर साहब! पिताजी के पेंशन की जमा पूंजी यानि 70000 रुपये बचे हुए हैं मेरे पास!.... " -- बीमार लक्ष्मण का इलाज करा रहे बेटे सत्येंद्र ने कहा l
" 70000 रुपये खर्च कर उन्हें 1 महीने तक किसी तरह बचा सकते हैं l वह भी बिस्तर से उठ नहीं सकेंगे l........
............. मैं तो आपको यही सलाह दूंगा कि 85 साल के इस बुड्ढे पर इतनी सारी रकम बर्बाद करने से अच्छा है कि आप लोग अपने जीवन सुरक्षा के लिए 70000 रूपया बचा लीजिए और....... "
" ..... बस भी कीजिए!अब आगे मत बोलिये डॉक्टर साहब! मैं यदि अपना पैसा उन पर लुटा नहीं सकता तो उनका पैसा उनकी सांसो की कीमत पर हड़प भी नहीं सकता l " -- पूरे आवेश और तेवर पूर्ण मुद्रा में सत्येंद्र ने कहा l
अपने बेटे सत्येंद्र और डॉक्टर साहब की बातों को, पलक बंद किए, बेड पर पड़ा हुआ बीमार लक्ष्मण सुन रहा था l वह भीतर से और भयभीत हुआ जा रहा था l कुछ बोलना चाह कर भी शब्द कंठ से बाहर निकल नहीं पा रहे थे l अर्ध चेतन अवस्था में कुछ ना बोल पाने की बेबसी उनकी आंखों से स्पस्ट झलक रही थी l ऐसा लग रहा था कि जिंदगी और मौत से लड़ रहे लक्ष्मण की भीगी आंखें डॉक्टर से पूछ रही हो -- " मेरी सांसो की कीमत मेरी उम्र से क्यों लगाते हो डॉक्टर साहब ? मैं अभी भी जीना चाहता हूं! मौत के पहले मैं जिंदगी से हारना नहीं चाहता l 85 वर्ष की उम्र हुई तो क्या ? बूढ़ा होना पाप तो नहीं! " ०००
३. अफवाह की राजनीति
- " भैया मेरे, कोरोना के खतरा को तो समझो ! अफवाह क्यों फैला रहे हो कि पूरे विश्व की चाल है यह l कोरोना वोरोना कुछ नहीं होता l अपना निजी व्यापार बढ़ाने के लिए... ? ". - थोड़ा रुक कर उस विरोधी पार्टी से उसने कहा-
" सारे देश की गतिविधियां रूक गई है l देश को कितनी आर्थिक क्षति पहुंच रही है । कितने लोगों की जानें चली गई है । यह सब तुम को नजर नहीं आ रही है क्या, ? "
-" नजर तो आ रही है भाई मेरे लेकिन.... "
" लेकिन क्या.....?"
" लेकिन, मैं तो कहता हूं कि कोरोना से भी अधिक खतरनाक है ये नेता, मंत्री, अधिकारी, जिसने मुझे सत्ता से ही उखाड़ फेंकने को ठान रखा है । जब सत्ता से ही बेदखल हो जाएंगे हम , तो आखिर जनता के बीच क्या मुंह लेकर जाएंगे हम ? बोलो हम क्या मुंह लेकर जाएंगे ? आखिर कैसे जिंदा रहेगी, हमरी विरोधी पार्टियां ?"
अपने विरोधी पार्टी का ऐसा दलित सुनकर वह खीझ उठा और तिलमिलाहट भरे स्वर में बोला -
" कैसा जल्लाद है रे तू ? यहां पूरी जनता कोरोना को मात देने के लिए, देशभक्त सैनिकों की तरफ दिन-रात सुरक्षा की लड़ाइयां लड़ रहा है ।और तुझे अपनी पार्टी और अपनी सत्ता की चिंता लगी हुई है ?.
...... .....स्साला ई कोरोना राक्षस भी अच्छे भले लोगों के जान के पीछे पड़ गई है । तेरे जैसे राष्ट्र द्रोहियों के पीछे पड़ गई होती, तो इंसानियत भी बची रहती और देश की सत्ता भी खतरे से बाहर आ जाती
अपने मुंह लगी साथी की इन बातों पर वह जोर-जोर से हंसने लगा और बड़ा ही सुकून से बोला-
" अरे यार ! हम विरोधी दल के नेता है, सत्ता दल के नहीं ! सत्ता दल की बातें अच्छी हो या बुरी ! बस हमें सिर्फ बुरी और बुरी ही कहनी है l वह लाख अच्छा काम करें, हमें तो उनकी बुराई ही करनी है । अरे पगलू तू समझा क्यों नहीं ? साला ई कोरोनवा भले जीत जाए, हमें तो सत्ता रूढ़ पक्ष की हार चाहिए l कोरोना हार गया तो हम भी हार जाएंगे या नहीं, बोलो ? इसीलिए तो जनता के बीच जाकर अफवाह फैलाना है, जनता को बरगलाना है और कोरोना को जिताना है.... ! हा हा हा हा हा..''''' ०००
४.ममता की हत्या
" मर जा कलमुंहे ! " - गुस्से में खींझकर, एक बुढ़िया दस -बारह वर्ष के, एक खाते-पीते घर के लड़के को गाली दिए जा रही थी !
...... और वह छोकरा बुखार से कांप रहा था l बुढ़िया जबरन उसका हाथ पकड़ कर, उसे अपने पास बिठा रही थी l अपनी फटी चादर से, उसका भींगा शरीर ढंकने का असफल प्रयास कर रही थी l ताकि सर्द हवा से वह बच सके l
किंतु वह लड़का तो जैसे जिद्द पर ही आ गया था l कहता जा रहा था कि - " तुम्हारी गोद में तो मैं अपना सिर रखूंगा ही नहीं !.... "
..... उस लड़के का यह भी कहना था कि वह जसीडीह में रहता है lरेलगाड़ी में बैठकर अपने मां-बाप के साथ, अपने गांव जा रहा था, और वह पटना जंक्शन पर ही छूट गया l....
पुलिस वाले ने उस लड़के के साथ उलझना अपनी बेवकूफी समझा l किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया l अंत में स्टेशन के किनारे सत्तू बेच रही एक बुढ़िया ने उसे चुप करा कर, अपने पास बिठा लिया और ममता से उसके सिर पर हाथ फेरने लगी l
वह बरसात में भींग रहा था ! परन्तु बुखार चढ़ जाने की आशंका से, बुढ़िया उसे पानी में जाने से बार-बार रोक रही थी l इसीलिए उसने उसे अपनी छाती से चिपका लिया था, अपने बेटे के सामान !
लेकिन उस लड़के का आशंकित मन शायद डर रहा था और वह उस बुढ़िया की आगोश से छूटकर किसी तरह, फिर भाग निकला और पानी में पुनः भींगने लगा !
वह बोलता भी जा रहा था - " ई बुढ़िया अपनी गोद में मेरी नाक बंद करके, मुझे जान से मार डालेगी.. !.. नहीं... नहीं..! मैं इसकी गोद में नहीं जाऊंगा
! "
उस लड़के द्वारा ऐसी बातें सुनकर, बुढ़िया ने डर से फिर उस लड़के को, पकड़कर तो नहीं लाई, परंतु ममता से वशीभूत होकर, उस पर गालियों की वर्षा करती ही रही - " जा, मर जा, कलमुंहे.... ! " 000
५. बेटा बेटी एक समान
" यार, तुम आज भी किस विचारधारा में जी रहे हो ? 21वीं शताब्दी में आ गए, लेकिन अब भी तुम्हारी सोच नहीं बदली ! बेटा और बेटी में फर्क महसूस करते हो ? बेटी जन्म ली थी तब तुम्हारे चेहरे पर मायूसी छाई हुई थी l आज बेटे के जन्म पर धूमधाम से जश्न मना रहे हो ? "
" बेटा की बात ही कुछ और है यार ! तुम लाख मन को मना लो, लेकिन बेटा पाने की खुशी को दबा न सकोगे!
....... बेटी के जन्म लेते ही वेतन में से हजार रुपये की कटौती शुरू कर दिया था l और अपने बैंक खाते में हर महीने आज भी जमा कर रहा हूं, ताकि उसके जवान होते ही, उसकी शादी में लाखों रुपए दहेज देने का बोझ अचानक मेरे सिर पर न आ पड़े l....... लेकिन, अब बेटा के जन्म लेने से थोड़ा सुकून मिला है, दिल को l बोझ कुछ हल्का महसूस कर रहा हूं l बेटी की शादी में जो बैंक बैलेंस खाली हो जाएगा, बेटे की शादी में वह खाली बैंक बैलेंस फिर से तो भर जाएगा ना ? .... "
" जमाना इतना आगे बढ़ गया, फिर भी तुम दहेज लेने-देने की बात करते हो ? यह तो कानूनी अपराध है यार ! "
" सिर्फ सरकार और कानून की नजर में ! हकीकत में तो दहेज पहले से भी अधिक लिया और दिया जाने लगा है l शादी के तामझाम में भी पहले से अधिक खर्चा बढ़ गया है l साग - सब्जी, फूल -फल की तरह, दूल्हा बाजार में दूल्हा का भाव भी तो कई गुना बढ़ गया है !....
...... नेता एवं कानून वाले और सरकारी हुक्म चलाने वाले ही, अपनी बेटी की शादी में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रहे हैं !..तो फिर हम आम जनता उससे कैसे बचे रहेंगे, बोलो?....."
थोड़ा रुककर, दम भर सांस लेते हुए राकेश ने अपनी बात पूरी की-
" अरे यार, सरकार कानून, आदर्श, नैतिकता इन सब की बातें छोड़ो, ये सारी बातें सिर्फ कहने -सुनने में अच्छे लगते हैं ! जिस तरह रेडियो में रोज-रोज बजने वाला सरकारी विज्ञापन अच्छा लगता है - " बेटा बेटी एक समान, इसका तुम रखना घ्यान !"........ मै तो कहता हूँ, कानून हो या सरकार ! दिखाने और खाने के दाँत अलग -अलग होते हैं ! "000
संवाद प्रधान शैली
सिद्धेश्वर जी की इन पाँचों लघुकथाओं का मूल स्वर सामाजिक यथार्थ, पारिवारिक विघटन, मानवीय संवेदना तथा समकालीन विसंगतियों पर आधारित है। लेखक सीधे-सादे कथानक और संवाद प्रधान शैली के माध्यम से पाठक को सोचने पर विवश करता है :-
1. बुढ़ापे की लाठी
यह लघुकथा वृद्धावस्था में माता-पिता की उपेक्षा और पति-पत्नी के पारस्परिक सहारे की मार्मिक प्रस्तुति है। लेखक ने प्रचलित धारणा "बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है" पर प्रश्नचिह्न लगाया है। अंत प्रभावशाली और भावनात्मक है।
2. बूढ़ा होना पाप तो नहीं!
कथा वृद्ध जीवन के मूल्य और चिकित्सा के व्यवसायीकरण पर गंभीर प्रश्न उठाती है। डॉक्टर और पुत्र के संवाद के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि किसी मनुष्य के जीवन का मूल्य उसकी आयु से नहीं आँका जा सकता। कथा संवेदनात्मक प्रभाव छोड़ती है।
3. अफवाह की राजनीति
यह एक व्यंग्यात्मक लघुकथा है जो संकट की घड़ी में भी राजनीतिक स्वार्थ और अवसरवादिता को उजागर करती है। कथानक का व्यंग्य तीखा है, यद्यपि कुछ स्थानों पर संवाद अपेक्षाकृत लंबे हो गए हैं।
4. ममता की हत्या
कथा का सबसे बड़ा गुण इसकी करुणा है। एक अनजान बच्चे के प्रति वृद्धा की ममता और बच्चे का भय, दोनों का चित्रण प्रभावी है। शीर्षक प्रतीकात्मक है और अंत पाठक के मन में गहरी संवेदना उत्पन्न करता है।
5. बेटा बेटी एक समान
यह लघुकथा दहेज प्रथा और समाज की दोहरी मानसिकता पर प्रहार करती है। लेखक ने आदर्श और व्यवहार के बीच के अंतर को उजागर किया है। कथा सामाजिक यथार्थ को बेबाकी से सामने रखती है।
समग्र टिप्पणी:
सिद्धेश्वर जी की ये लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। संवाद शैली उनकी प्रमुख शक्ति है। वृद्धावस्था, पारिवारिक संबंध, राजनीति, मानवीय संवेदना और दहेज जैसी समस्याओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। कहीं-कहीं संवादों की लंबाई लघुकथा की कसावट को प्रभावित करती है, फिर भी कथाओं का संदेश स्पष्ट, प्रासंगिक और विचारोत्तेजक है। कुल मिलाकर ये रचनाएँ पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
नैतिक प्रश्न से सामना
सिद्धेश्वर जी की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन विसंगतियों को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। इनमें कथ्य की विविधता है और अधिकांश रचनाएँ पाठक को किसी न किसी नैतिक प्रश्न से सामना कराती हैं। संक्षेप में मेरी समीक्षा इस प्रकार है—
1. बुढ़ापे की लाठी
यह लघुकथा वृद्धावस्था, पारिवारिक विघटन और पति-पत्नी के पारस्परिक सहारे की मार्मिक कहानी है। लेखक ने उस सामाजिक मिथक पर चोट की है कि केवल बेटा ही बुढ़ापे की लाठी होता है। अंत में पत्नी का आना कथा को भावनात्मक ऊँचाई देता है।
विशेषता: संवेदनशील संवाद और प्रभावी अंत।
सुझाव: कुछ संवाद थोड़े लंबे हैं; उन्हें संक्षिप्त किया जाए तो लघुकथा का प्रभाव और तीखा हो सकता है।
2. बूढ़ा होना पाप तो नहीं!
यह रचना वृद्ध जीवन के मूल्य और चिकित्सा-व्यवस्था के व्यावसायिक दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाती है। बेटे का अपने पिता के प्रति समर्पण तथा बूढ़े लक्ष्मण की मौन पीड़ा अत्यंत मार्मिक बन पड़ी है।
विशेषता: मानवीय संवेदना और नैतिक द्वंद्व का सशक्त चित्रण।
सुझाव: डॉक्टर का चरित्र कुछ अधिक कठोर प्रतीत होता है; यदि उसमें थोड़ी मानवीय दुविधा भी दिखाई जाती तो कथा अधिक यथार्थपरक लगती।
3. अफवाह की राजनीति
यह व्यंग्यप्रधान लघुकथा राजनीतिक स्वार्थ और अवसरवाद पर करारा प्रहार करती है। कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में सत्ता और विपक्ष की मानसिकता को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
विशेषता: तीखा व्यंग्य और स्पष्ट संदेश।
सुझाव: पात्रों के संवाद कुछ अधिक प्रत्यक्ष हैं; संकेतात्मकता बढ़े तो साहित्यिक प्रभाव और गहरा होगा।
4. ममता की हत्या
यह पाँचों में सबसे अधिक मार्मिक और प्रतीकात्मक रचना प्रतीत होती है। बुढ़िया की गालियों में छिपा वात्सल्य तथा बच्चे का भय—दोनों मिलकर एक गहरा मानवीय दृश्य रचते हैं। शीर्षक भी प्रभावशाली है।
विशेषता: करुणा और ममता का उत्कृष्ट चित्रण।
सुझाव: अंत में यदि बच्चे की स्थिति या बुढ़िया की मनोदशा का एक संकेत और मिलता तो भावात्मक प्रभाव और बढ़ सकता था।
5. बेटा बेटी एक समान
यह कथा दहेज-प्रथा और समाज की दोहरी मानसिकता पर केंद्रित है। लेखक ने दिखाया है कि कानून और आदर्शों के बावजूद सामाजिक व्यवहार में भेदभाव अभी भी जीवित है।
विशेषता: सामाजिक यथार्थ का बेबाक चित्रण।
सुझाव: कथा में उपदेशात्मकता कुछ अधिक है। संवादों को थोड़ा संक्षिप्त और सांकेतिक बनाया जाए तो लघुकथा अधिक प्रभावी होगी।
समग्र मूल्यांकन
सिद्धेश्वर जी की इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता, मानवीय संवेदना और जनजीवन से निकटता है। लेखक वृद्धावस्था, पारिवारिक संबंध, राजनीति, ममता और लैंगिक भेदभाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों को सहज भाषा में प्रस्तुत करते हैं। अधिकांश कथाओं के अंत में एक स्पष्ट संदेश उभरता है, जो पाठक को सोचने पर विवश करता है। हालाँकि, लघुकथा की दृष्टि से कहीं-कहीं संवाद और विवरण अपेक्षाकृत लंबे हो गए हैं। यदि कथ्य को और अधिक संक्षिप्त, सांकेतिक तथा कथानक-केंद्रित बनाया जाए तो इन रचनाओं की प्रभावशीलता और साहित्यिक ऊँचाई बढ़ सकती है।कुल मिलाकर, ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों को पुष्ट करने वाली सार्थक एवं पठनीय रचनाएँ हैं। विशेष रूप से “बुढ़ापे की लाठी” और “ममता की हत्या” भावनात्मक प्रभाव की दृष्टि से अधिक स्मरणीय लगती हैं।
- अलका पाण्डेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
पांचों लघुकथा की समीक्षा
बुढ़ापे की लाठी -
इंसान जितना ही शिक्षित होता जा रहा है, भौतिकता उस पर हावी होती जा रही है,वह सुविधा भोगी होता जा रहा है।पैसे कमाने और अत्याधुनिक जीवन शैली अपनाने की होड़ में वह अपने मां-बाप और अपनी जड़ों तक को भूल रहा है।एकल परिवार की अवधारणा ने तो परिवार की आदर्श संरचना को ही छिन्न-भिन्न कर दिया है।ऐसे में जीवन संगिनी को छोड़कर कोई भी साथ नहीं देता, इसकी तड़प लघुकथा में खूबसूरती से अंकित है। लघुकथा थोड़ी और लघु होती, तो कसावट रहती।
बूढ़ा होना पाप तो नहीं -
पिता-पुत्र के बीच ऐसा ही आत्मिक बंधन होना चाहिए, जो आज दुर्लभ हो चला है। डाक्टर और अस्पताल भी अब व्यावसायिक हो चले हैं, जहां हर मरीज उनके लिए पैसे कमाने की मशीन है।यह निर्दयता है, जो आज चतुर्दिक व्याप्त है।जीवन भर पिता त्याग करता है,जिसका प्रतिदान संतान कभी नहीं कर सकती।बूढ़े मां-बाप की सेवा से बड़ा कोई तीर्थ नहीं है, इस संदेश को पहुंचाने में लघुकथाकार सफल हैं। शुरूआत में कुछ शाब्दिक अशुद्धियां हैं, जिनका निराकरण आवश्यक है।
अफवाह की राजनीति -
लघुकथा कोरोना काल के भयावहता की सचबयानी है।राजनीति इतनी राक्षसी हो चुकी है कि सत्ता के लिए वह इंसानों की लाशों पर से गुजर जाए।कोरोना, कुंभ की भगदड़ आदि इसी हत्यारी मानसिकता के उदाहरण हैं।इस लघुकथा में सच और दर्द को अच्छी तरह उकेरा गया है।मगर कई शाब्दिक अशुद्धियां हैं, जिन्हें सुधारने की जरूरत है।
ममता की हत्या -
ममता न तो जात-पात देखती है, न ऊंच-नीच।ममता निर्मल झरने की तरह होती है, जो पूरी सृष्टि को अपने स्नेह से अभिसिक्त करने की ताकत रखती है। यह हमारे समय की विडंबना है कि हमने इस नैसर्गिक भाव को भी कलुषित कर दिया है।मां की ममता को समर्पित अच्छी लघुकथा।
बेटा बेटी एक समान -
लघुकथा सामाजिक विसंगति दहेज के सिर्फ एक पक्ष को ध्यान में रखकर रची गयी है।दूसरा पक्ष भी है, जिस पर आधारित समाज बनाने की जरूरत है, और वह है बेटियों को शिक्षित करना, अपने पैरों पर खड़े करना, आत्मनिर्भर बनाना। हम उस युग में जी रहे हैं जहां बेटियां दसवीं, बारहवीं, आईएएस, पीसीएस, मेडिकल आदि परीक्षाओं में टाप कर रही हैं और आगे बढ़ रही हैं, और ऐसी शादियां भी हो रही हैं, जहां तिलक-दहेज नहीं है।इस परिपाटी को स्थापित करने की जरूरत है।
- डा.विजयानन्द विजय
बक्सर - बिहार
पात्रों की सीमितता
लघुकथा के प्रमुख मापदंड—कथ्य की संक्षिप्तता, प्रभावी अंत, सांकेतिकता, पंच लाइन, पात्रों की सीमितता तथा पाठक पर पड़ने वाले प्रभाव :-
1. बुढ़ापे की लाठी
लघुकथा वृद्धावस्था के अकेलेपन और बदलते पारिवारिक संबंधों को मार्मिकता से उभारती है। अंत में पत्नी का आगमन कथ्य को संवेदनात्मक ऊँचाई देता है। शीर्षक सार्थक और प्रभावशाली है।
2. बूढ़ा होना पाप तो नहीं
वृद्ध जीवन के मूल्य और मानवीय संवेदना पर प्रश्न उठाती प्रभावी लघुकथा। संवादों के माध्यम से आर्थिक यथार्थ और जीवन-अधिकार का द्वंद्व उभरता है। अंत अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक है।
3. अफवाह की राजनीति
राजनीतिक स्वार्थ, अवसरवाद और जनहित की उपेक्षा पर तीखा व्यंग्य करती लघुकथा। संवाद कथ्य को धार देते हैं। अंत सत्ता-लोलुप मानसिकता का प्रभावी उद्घाटन कर पाठक को झकझोरता है।
4. ममता की हत्या
मानवीय ममता और बालमन के भय का संवेदनशील चित्रण। बुढ़िया की गालियों में छिपा वात्सल्य कथा का प्राण है। शीर्षक प्रतीकात्मक है तथा अंत गहरा भावात्मक प्रभाव छोड़ता है।
5. बेटा बेटी एक समान
दहेज, पुत्र-मोह और सामाजिक दोहरेपन पर केंद्रित यथार्थपरक लघुकथा। संवादों में समाज की मानसिकता स्पष्ट होती है। कथ्य प्रासंगिक है, यद्यपि अंत को और अधिक संक्षिप्त बनाया जा सकता था।
- छाया सक्सेना प्रभु
जबलपुर - मध्यप्रदेश
मानसिकता का यथार्थ चित्रण
आदरणीय सिद्धेश्वर जी की प्रस्तुत लघुकथाएं समाज की मानसिकता का यथार्थ चित्रण है। जिसे बखूबी से चित्रित करने में वे सफल हुए हैं :-
1. बुढ़ापे की लाठी
बहुत सुंदर लघुकथा। सुंदर पारिवारिक चित्रण। ऐसा ही हो रहा है, सभी की अपनी-अपनी समस्याएं और लाचारियाँ हैं। लघुकथा के अंत में पत्नी का आ जाना, पति-पत्नी के प्रगाढ़ रिश्ते को उजागर करता है और पाठक को सुकून भी देता है। अस्पताल के वातावरण और नर्स की भूमिका और संवाद सकारात्मकता लिए हुए हैं। अच्छा कथ्य, अच्छी लघुकथा।
2.बूढ़ा होना पाप तो नहीं
घर के बड़े- बुजुर्गों की बढ़ती उम्र में घेरती बीमारियां और फिर उनके इलाज में खर्च। पिता-पुत्र का दायित्व आदि अनेक विषयों को इंगित करती सुंदर लघुकथा। अच्छा कथ्य। अच्छा चित्रण।वास्तविकता।
3.अफवाह की राजनीति
कोरोना काल के समय के माहौल और अपनी-अपनी सोच को प्रदर्शित करती तात्कालिक लघुकथा।
4.ममता की हत्या
अच्छी लघुकथा।अच्छा कथ्य। ऐसा होता है। एक-दूसरे की भावनाओं को न समझते हुए हम अपनी ही सोच में अडिग रहकर कई बार अपना ही नुकसान कर बैठते हैं। माँ की ममता, अमीर-गरीब का भेद इन सभी के संबंध में यथार्थ चित्रण। अच्छी लघुकथा।
5.बेटा-बेटी एक समान
वास्तविकता को प्रदर्शित करती अच्छी लघुकथा। सच कहा जावे तो समाज में बेटा-बेटी के जन्म पर अधिकांश लोग ऐसी ही सोच रखते हैं।
कुलमिलाकर आदरणीय सिद्धेश्वर जी प्रस्तुत लघुकथाएं वर्तमान परिवेश का वास्तविक चित्रण हैं। जिन्हें बहुत ही शालीनता से चित्रित किया है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
समाज को आईना
'बुढ़ापे की लाठी'
लघुकथा यह सीख देती है कि बुढ़ापे में औलाद साथ दे न दे, पत्नी साथ अवश्य देती है। पुत्र-मोह नहीं रखना चाहिए।
'बूढ़ा होना पाप तो नहीं'
श्रवण कुमार सरीखे पुत्र की भावनाओं को व्यक्त करती है और आदर्शवाद से प्रेरित है जिसे अवश्य पढा जाना चाहिए ताकि कलयुगी बेटों के मन बदलें। अच्छी लघुकथा की श्रेणी में आती है यह।
'अफवाह की राजनीति'
चालबाज राजनेताओं का पर्दाफाश करती है जो आमजन की आंखें खोलती है।
'ममता की हत्या'
अलग तरह की कहानी है जो निस्वार्थ ममता भाव को दर्शा रही है।
'बेटा बेटी एक समान'
निराशावादी भाव में पिरोई गई है जो कहती है कि बेटा बेटी समान नहीं होते क्योंकि समाज का रवैया अभी भी स्त्री के प्रति दोगला है।
कुल मिलाकर सभी लघुकथाएँ समाज को आईना भी दिखाती हैं और सचेत भी करती हैं।
🙏🙏🌹
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
🙏 कि आपने हमें भी याद किया
🙏 लघुकथा के क्षेत्र में आप भी एक बेहतर काम कर रहे हैं
🙏 और आपका काम ऐतिहासिक भी है
🙏 हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आपको
- सिद्धेश्वर,"सिद्धेश् सदन" अवसर प्रकाशन, (किड्स कार्मल स्कूल के बाएं) / द्वारिकापुरी रोड नंबर:०2, पोस्ट: बीएचसी, हनुमाननगर ,कंकड़बाग ,पटना 800026 (बिहार )
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