पाठकों के बीच में बी एल अच्छा की लघुकथाएं

          बी एल आच्छा

जन्म- 5 फरवरी 1950

 देवगढ़ मदारिया, जि. राजसमंद (राजस्थान)

 शिक्षा-एम.ए. हिन्दी - मोहनलाल सुखाड़िया वि. वि., उदयपुर (राजस्थान)

वृत्ति- 1972- 2015  तक मध्यप्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में अध्यापन

संप्रति-सेवानिवृत्त प्राध्यापक-हिन्दी, उच्च शिक्षा विभाग, म.प्र.शासन

प्रकाशन :-

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास : सर्जनात्मक भाषा और आलोचना

 "जल टूटता हुआ" की पहचान

सृजन का अंतर्पाठ:रचनात्मक समीक्षा 

कृति की राह से(सृजन समीक्षा)

रचना और आलोचना के रिश्ते

 आस्था के बैंगन (व्यंग्य)

पिताजी का डैडी संस्करण (व्यंग्य)

मेघदूत का टी. ए. बिल (व्यंग्य)

चुप्पी अर्थ भरी(काव्य संग्रह)

हिन्दी की कालजयी लघुकथाएं

 (संकलन में 85 पृष्ठों की भूमिका)

लघुकथाएं: इक्कीसवीं सदी के दो दशक (95पृष्ठों में समीक्षात्मक भूमिका)

संपादन-अतिथि संपादन 

 'संवाद सृजन 'लघुकथा विशेषांक 

 प्रेमचंद सृजनपीठ, उज्जैन (संस्कृति 

विभाग, म. प्र. शासन)

पुरस्कार/सम्मान :-

- डॉक्टर देवराज उपाध्याय आलोचना  पुरस्कार

 राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर

-  पं. नंददुलारे वाजपेयी आलोचना  पुरस्कार

   मध्यप्रदेश साहित्यअकादमी, भोपाल

- डॉ. संतोष तिवारी समीक्षा सम्मान

   मध्यप्रदेश लेखक संघ, भोपाल

- लघुकथा समालोचना सम्मान - 

  क्षितिज (साहित्य संस्था) इंदौर

- शताब्दी सम्मान-श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर

-साहित्य गरिमा समिति सम्मान

   (आचार्य कृष्णदत्त स्मृति व्यंग्य विधा सम्मान) हैदराबाद

-व्यंग्य यात्रा व्यंग्य चिंतक सम्मान

 व्यंग्य यात्रा त्रैमासिक पत्रिका का आयोजन

संपर्क :-

बी एल आच्छा 

 फ्लेट- 701 ,टावर -27 , नॉर्थ टाउन , स्टीफेंशन रोड 

पेरंबूर,चेन्नई (टी एन) तामिलनाडु पिन-600012 

             1. चंदा                  

           चंदे से झंडा फहराती उनकी काया बहुत यशस्वी है। चंदा उगाहने का लहजा । सामाजिक होता व्यक्तित्व। माइक पर छाये उनके तेवर। संस्था में उनका ओहदा। सरकारी महकमों में सम्पर्क महिमा।इस बार किसी आयोजन के लिए चंदा उगाहने निकले तो दो तीन लोगों के साथ मुझे भी उलझा लिया । यो ऐसे व्यक्तित्व के साथ जाना भी सुहाना होता हैऔर पंगा लेना भी खतरे से खाली नहीं। बाजार में दलाल को नाराज करो तो पेढी की साख को बट्टा लगने में देर नहीं लगती।

          इस बार वे किसी जाने माने महाशय के पास पहली बार पहुँचे। आयोजन की रूपरेखा रंगीली जबान से दी। जैसे कोई दुकानदार साड़ी के रेशमी महीनपन के साथ कई शेड्स भी दिखा रहा हो। अंत में वे बोले 'जितनी भी आप की श्रद्धा हो, बता दीजिए।' और रसीद सामने कर दी ।

       चंदा देने वाले सज्जन के माथे पर रंच भर शिकन नहीं था। बोले- 'जो भी आप चाहें - ।' इतना कहकर वे अलमीरा से अलग अलग संस्थाओं के रसीद कट्टे ले आये। बोले- 'मैं भी हमारी संस्थाओं के आयोजन करता रहता हूँ। गो- सेवा से लेकर वृद्ध-सेवा तक। सत्संग से लेकर भवन निर्माण तक। अच्छा हुआ, आप सभी आ गये। अब आपकी जो भी श्रद्धा हो, इन रसीदों में...। उस सामाजिक व्यक्तित्व वाले चंदेबाज चेहरे पर शिकन पड़ गये। मैं भी पहली पहली बार निकला था और फंदा गले पड़ गया। जेब छाती से चिपकने लगी। अनुभवी चंदेबाज को चंदे की मल्ल- विद्या से साबका पड़ा। चाय तो चलती रही, पर दोनों ओर की रसीदें अनकहे ही फड़फड़ाती रहीं....। 000

             2.सेवा                   

            डॉ. याज्ञवल्क्य ने डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। वे अगले बरस प्रोफेसर एण्ड हैड हो गये। विभाग में जगह खाली हुई तो उनके खास शिष्यों के पैर खूंदने लगे। डॉ. मैत्रेय ने पीएच.डी. की उपाधि हासिल कर ही रखी थी और डॉ. कात्यायन भी गुरु कृपा से पीएच.डी. हो गये। दोनों ही गुरु के खास थे। एक मिजाज से एकेडेमिक और तर्कशील ।दूसरे सेवाभावी। एक के अपने फण्डे थे, दूजे का संडे भी गुरूजी का था।

         एक दिन मैडम याज्ञवल्क्य ने रात्रि की शयनयान संगोष्ठी में पूछ ही लिया-" सुना है विश्वविद्यालय ने प्राध्यापक पद के लिए विज्ञापन दे दिया है।"डॉ. याज्ञवल्क्य ने हामी भरी। पत्नी ने पूछा-" इस बार किसे चुनोगे ? किसी और को या मैत्रेय और कात्यायन में से किसी एक को डॉ. याज्ञवल्क्य कहा-" पराये का क्या भरोसा होना ।इन्हीं में से है।" मैडम ने फिर पूछा- "आपका पुष्टिमार्ग किसके सिर पर होगा ? याज्ञवल्क्य मुस्कुराए-"अरे !तुम भी बड़ी दार्शनिक अंदाज में पूछने लगी हो ? हाँ, मेरे विचार से सेवाभावी को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐकेडमिक को लिया तो मेरे ही अवसरों में फंदा फँसाएगा। मौका आने पर मुझ पर ही तरकश खाली कर देगा। इससे तो सेवाभावी ही अच्छा है, अकादमिक लक्षण तो इसके पास भी भरे-पूरे हैं। संडे को भी काम पड़ा तो कन्नी - तो नहीं काटेगा।' 

    मैडम की नजरें डॉ. याज्ञवल्क्य से मिलीं और आश्वस्त होकर झुक गयीं।000

       3. रोटी और रुपया          

               मेले में कई अजूबे से आए थे ।झूलों में युवा और बच्चे मजे ले रहे थे। मौत के कुएँ में भी खासी भीड़ थी। यूँ तो सर्कस लुभा रहा था पर मेरी नजर एक अलग से शो पर पड़ी ।लिखा था-' आपका जीव '।अजब सा लगा ।मैं यहाँ और मेरा जीव वहाँ ।जीव भी कोई फ्रिज में सुरक्षित रखने या परखनली में देखने की चीज तो है नहीं ।पर लोग थे कि आपका जीव देखने जा रहे थे ।मैं और मेरे जीव का अलग होना मुझे दर्शन की ओर धकेल रहा था ।देखने की इच्छा प्रबल हो गई। 

           मैं भी पहुँचा। दस रुपये का टिकट लिया ।बुरा भी नहीं था अपना जीव दस रुपए में देखना। एक पतली सी गली से एक व्यक्ति भीतर जा रहा था ।बस एक ही और भीतर भी एक ही आदमी था। पर उसके सामने केवल रोटी और पानी रखा था। मैंने उनसे पूछा -कहाँ है आपका जीव?वह बोला-' यह है ना रोटी और पानी'। मैंने कहा -'रोटी पानी तो रोज ही खाते पीते हैं यह कहाँ का जीव !'वह बोला- 'बाबूजी इसके बगैर जीव कहाँ रह पाता है?' अजीब सा लगा। क्या कहता ;ठगा सा रह गया। पर वह बोला -बाबूजी बाहर मत बताइएगा आपको कसम है। यह पेट और रोटी का सवाल है ।मैंने पूछा '-अच्छा बताओ  तुम्हारा जीव किसमें है ?'उसने तपाक से दस रुपये का नोट ऊपर किया और बोला-' बाबूजी मेरा जीव इस में।' उसका जीव मेरे नोट में जी रहा था। मैं मुस्कुराया और चल दिया।000     

               4.श्रद्धांजलि        

        सफेदी का रंग भी कितना निस्तब्ध होता है। पर आज घर के लोगों के शब्द सफेद स्क्रीन पर काले अक्षरों में उभरकर आकुल कर रहे हैं। "   पापा बहुत कम खर्चे में चला लेते हैं।" "हां, पर कभी कभार हम बच्चों को भी पानी- पूरी जरूर खिला देते हैं।"

"पापा के पास कुछ तो होगा ही पर कभी शादी में नए कपड़े खरीदने को नहीं कहते। "

"दादा कभी होटल तो ले जाते ही नहीं "

"अरे, दादा कभी पिक्चर नहीं दिखाते, तो होटल जाएंगे?"

" कुछ नहीं तो दोनों ही कहीं घूम आएँ ताजे हो जाएंगे।"

 "हमारी कॉपियोंऔर प्रोजेक्ट के लिए दादा कुछ दे ही देते हैं।"

 "पर कभी किसी को जाने- आने, खाने-पहनने के लिए टोका नहीं।"

        पापा के दिवंगत हो जाने के बाद की शोक के दो दिन बीत गए। शोक बैठक से लोगों के चले जाने के बाद आज सभी भाइयों के परिवार सहित बच्चे भी एक साथ बैठे  थे।फाइलों और कागज़ों को देखते हुए। पापा के बक्से को खोला। शायद कुछ निकले।

"अरे कितने सारे फिक्स डिपाजिट"

"और कितने इन्वेस्टमेंट। रजिस्टर्ड चिट्ठी-पत्री तो आती ही रहती थी।"

"सबके नॉमिनेशन, बाप रे।"

"अरे इस लिफाफे में क्या है?"भाई ने पूछा। 

"कोई चिट्ठी लगती है।"

लिफाफा खुला । पिताजी की चिट्ठी में लिखा था- "प्यारे बच्चों, अभाव हर एक के जीवन में आते हैं। उनका रोना मत रोना। मैंने एक ही बाल सोच रखी थी। सर्दी के थपेड़ों से बचाने के लिए परिवार के लिए सुरक्षा की दीवार बन सकूँ। संयत चलो और अपनी पीढ़ी को सँवारते रहो।" 

पिताजी की कंजूसी से रुके हुए सबके आँसू आँखों की कोर से टपक कर श्रद्धांजलि दे रहे थे। 000

             5.ब्रांडेड             

           तीन बरस पहले कुंकुम लगे पाँवों से बहू का घर में स्वागत किया था। अब तो नया प्राणी भी घर में आ गया है। यशोदा की तरह पत्नी नंदलाल में डूबी रहती है। पर नन्हें प्राणी की माँ प्रकृति से ही ब्रांडेड है। इसीलिए जनम-घुट्टी से लेकर देशी ईलाज शहर की आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी की तरह कोने की ताक से झाँकते भर रह गये। हल्दी और अजवाईन पेटेंट नहीं बन पाये। बहू की विज्ञापनी नजरों में कंपनियों के डिब्बे ही थिरकते रहते थे। पर इस बार बच्चे को दस्त लगे तो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। तीन चार डॉक्टर बदल लिये। दवाएँ बदली। बच्चे का वजन घटने लगा तो डॉक्टर भी चिंतित होकर बोला-" पानी तो कम नहीं होना चाहिए, वर्ना....।"

         थक हारकर पड़ोस की दादी से बात की। दादी ने कहा- "बच्चे को एकदम घुटे हुए चावल ठण्डे करके, दही में मिलाकर दो। आराम हो जाएगा। थक हारकर ब्रांडेड बहू ने सास की देखरेख में वही किया। शाम होते होते बच्चे के दस्त रुक गये। पूरे घर में जान आ गई। बहू ने सास को कनखियों से देखा तो कोने की ताक में रखी देशी दवाएँ मुसकुरा गई। ब्रांडेड बहू की आँखों में पुराना 'दादी ब्रांड' अनुभवी जगह तलाश रहा था। 000

  आपकी लेखनी को नमन !

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री बी. एल. आच्छा जी की पाँच लघुकथाओं पर कुछ लिखने , मेरे लिए सूरज को दिया दिखाने जैसी बात होगी। फिर भी एक पाठक की हैसियत से कुछ कहना भी ज़रूरी बनता है :-

(१) चंदा 

पहली लघुकथा का शीर्षक एक सामान्य गतिविधि का संकेत करता है।लेकिन जब “अनुभवी चंदे बाज को चंदे की मल्ल विद्या से साबका पड़ा…. “ असलियत सामने आ गई और दोनों ओर की रसीदें …..। बहुत बढ़िया ।

(२) सेवा 

सही है ज्ञान से ज़्यादा सेवा भावी अधिक फ़ायदेमंद होगा। “संडे को भी सेवा कर जाएगा “और ज्ञानी तो हो ही जाएगा । अच्छा निर्णय और यथार्थ का दर्शन ।।

(३) रोटी और रुपया 

    मेले में “अपना जीव “ देखने की सुविधा सस्ते का सौदा ही है, लेखक की दृष्टि से।वह भी महज़ दस रुपए में। सच है इंसान का जीव रोटी-पानी में और शो दिखाने वाले का १० रु० के नोट में।गुप्तता अनिवार्य। पोल खुलते ही सारा फीका पड़ जाता है। फिर कुछ भी काम नहीं आता। 

(४) श्रद्धांजलि 

सफेद रंग श्रद्धांजलि का पवित्र रंग। पिता के कंजूस होने का कारण पिता के जाने के बाद मिली सम्पत्ति से पता चला। पिता-माता सब कुछ बच्चों के लिए बचाते हैं ताकि बाद में परिवार को कोई मुश्किल न आए।भारतीय व्यवस्था का सुरक्षा गढ़ यही है। 

(५) ब्रांडेड 

अनुभवी भारतीय देसी नुस्ख़ों की अहमियत को बताने के लिए अच्छी कहानी गढ़ी। घरेलू नुस्ख़े महंगे इलाज से कहीं ज़्यादा कारगर सिद्ध होते हैं यह बहुत ही रोचक ढँग से बताने का प्रयास किया है।

             पांचों लघुकथा एक से बढ़ कर एक हैं। आच्छा जी सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। आपकी लेखनी को नमन । 

- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

          अमेरिका

आच्छा जी की  लघुकथाओं पर  समीक्षा

1. चंदा

यह लघुकथा सामाजिक संस्थाओं में चंदा उगाहने की विडम्बना और दोहरे मानदण्डों पर तीखा व्यंग्य करती है। अंत का उलटफेर कथा को प्रभावशाली बनाता है।

2. सेवा

शिक्षा-जगत में योग्यता की अपेक्षा चाटुकारिता और सेवाभाव को प्राथमिकता मिलने की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार है। कथा विश्वविद्यालयी राजनीति का यथार्थ उजागर करती है।

3. रोटी और रुपया

यह कथा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं और आर्थिक विवशताओं का मार्मिक चित्रण करती है। 'जीव' के प्रतीक के माध्यम से रोटी और रुपये के संबंध को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

4. श्रद्धांजलि

मितव्ययिता और दूरदर्शिता के वास्तविक अर्थ को उजागर करती संवेदनशील लघुकथा। पिता के त्याग और परिवार के प्रति उनके समर्पण का भावपूर्ण चित्रण पाठक को भावुक कर देता है।

5. ब्रांडेड

आधुनिक जीवनशैली और पारंपरिक अनुभव के बीच के द्वंद्व को सहजता से प्रस्तुत करती है। कथा बताती है कि दादी-नानी के घरेलू ज्ञान का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है।

 - अलका पाण्डेय

 मुम्बई - महाराष्ट्र 

           जीवन से जुड़े पहलू

आदरणीय बी एल आच्छा जी की प्रस्तुत लघुकथाएं आम जीवन से जुड़े पहलू हैं जिन्हें अच्छे कथ्य और अच्छे शिल्प के साथ उकेरा गया है :-

1.चंदा

बहुत ही अच्छी लघुकथा। चंदा के नाम से जो गोरखधंधा चल रहा है। इससे सभी हैरान भी हैं और परेशान भी। इसे उकेरने के लिए अच्छे विकल्प के साथ सटीक प्रस्तुति। 

2.सेवा

जीवन में हर तरफ, हर जगह,हर वर्ग में स्वार्थी लोगों की भरमार है। शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं। इसी परिप्रेक्ष्य में अच्छे कथ्य और बढ़िया शिल्प के साथ अच्छी लघुकथा।

3.रोटी और रुपया

मेले आदि में मनोरंजन के अलावा ठगी के भी नये-नये हथकंडे देखने मिलते हैं और  लोग शिकार हो जाते हैं। प्रस्तुत लघुकथा में कुतर्क से भले ही जीवन की सच्चाई दिखलाई गई हो। परंतु असल में है तो ठगी ही। इस तरह अच्छे कथ्य के साथ अच्छी लघुकथा।

4.श्रद्धांजलि

    उलझी और अस्पष्ट कथ्य के कारण लघुकथा में आकर्षण नहीं।आम पाठक  ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहता।उसे चाहिए सरल,सहज और सरसता लिए लघुकथा। 

5. ब्रांडेड

 आर्युवेदिक और घरेलू नुस्खों में रुचि रखने वालों की मनपसंद लघुकथा। आजकल लोगों का रुझान भी इस ओर बढ़ रहा है। इस संदर्भ से अच्छी लघुकथा।

         कुलमिलाकर सभी लघुकथाएं आम जीवन से जुड़े भिन्न-भिन्न आयामों को चित्रित करती हैं। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

    जीवन-सत्य के सफल समन्वय

बी. एल. आच्छा की ये पाँचों लघुकथाएँ समकालीन समाज, शिक्षा-जगत, मानवीय प्रवृत्तियों और पारिवारिक मूल्यों पर तीक्ष्ण व्यंग्य करती हैं। चंदा', 'सेवा', 'रोटी और रुपया', 'श्रद्धांजलि' तथा 'ब्रांडेड'—ये पाँचों लघुकथाएँ जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करती हुई मानवीय व्यवहार की परतें खोलती हैं:-

'चंदा' 

लघुकथा सामाजिक प्रतिष्ठा और चंदा-संस्कृति पर तीखा कटाक्ष है। जो व्यक्ति दूसरों से सहजता से चंदा माँगता है, वही जब प्रतिदान की स्थिति में आता है तो असहज हो उठता है। यह लघुकथा सामाजिक सेवा और सामाजिक प्रदर्शन के बीच के अंतर को उजागर करती है।

'सेवा' 

शिक्षा-जगत में व्याप्त भाई-भतीजावाद और स्वार्थपरक चयन-प्रक्रिया पर प्रभावशाली प्रहार करती है। यहाँ योग्यता से अधिक महत्त्व 'सेवाभाव' अर्थात् व्यक्तिगत निष्ठा को दिया जाता है। कथाकार ने विश्वविद्यालयी व्यवस्था की विडम्बना को बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के अत्यंत सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। याज्ञवल्क्य, मैत्रेय और कात्यायन जैसे प्रतीकात्मक नाम कथा को अतिरिक्त व्यंजना प्रदान करते हैं।

'रोटी और रुपया' 

दार्शनिक धरातल पर खड़ी एक विचारोत्तेजक लघुकथा है। 'जीव' की खोज से प्रारंभ होकर कथा अंततः मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं और आर्थिक यथार्थ तक पहुँचती है। अंतिम संवाद—"मेरा जीव इसमें है"—पूँजी और जीवन के संबंधों पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है।

'श्रद्धांजलि' 

भावनात्मक स्तर पर सबसे अधिक प्रभाव छोड़ती है। जीवन भर कंजूस समझे गए पिता की वास्तविक संवेदनशीलता उनके निधन के बाद सामने आती है। कथाकार ने पारिवारिक संबंधों में त्याग, उत्तरदायित्व और दूरदृष्टि को अत्यंत मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। अंत में बहते आँसू ही सच्ची श्रद्धांजलि बन जाते हैं।

'ब्रांडेड' 

आधुनिक उपभोक्तावादी मानसिकता और पारंपरिक लोक-ज्ञान के संघर्ष को सामने लाती है। कथाकार ने किसी पक्ष का प्रत्यक्ष समर्थन नहीं किया, बल्कि एक सामान्य घरेलू घटना के माध्यम से अनुभवजन्य ज्ञान की महत्ता को रेखांकित किया है। 'दादी ब्रांड' का संकेत कथा को रोचक और व्यंग्यात्मक दोनों बनाता है।

      बी. एल. आच्छा की ये लघुकथाएँ व्यंग्य, संकेत, प्रतीक और जीवन-सत्य के सफल समन्वय का उदाहरण हैं। इनमें कथ्य की विविधता है, भाषा की सहजता है और अंत में विचार की ऐसी चुभन है जो पाठक को रचना के साथ लंबे समय तक जोड़े रखती है। यही किसी सशक्त लघुकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

आज की पीढ़ी का मार्गदर्शन

   

'चंदा' 

बी एल आच्छा जी की पहली लघुकथा 'चंदा' की भाषा मंझी हुई है अर्थात बुनावट अनुभवी है। दो चंदेबाज़ों का आमना-सामना हो गया। अब कौन किसकी संस्था के लिए चंदा दे, यह प्रश्न करारी चोट है चंदेबाज़ों के मुँह पर। बढ़िया लघुकथा है। यही होता है।

'सेवा' 

'सेवा' लघुकथा के पात्रों के नाम पौराणिक पात्रों के आधार पर रखे गए हैं।  कलयुग में चमचों को पद मिलते हैं, इस पर करारा व्यंग्य किया गया है। आजकल सभी नाम के विपरीत आचरण करते हैं, यह लघुकथा  इसकी पुष्टि करती है।

'रोटी और रुपया' 

'रोटी और रुपया' लघुकथा  दार्शनिकता का पुट लिए है। मेले में ठगने के लिए प्रपंच रचता खेल दिखाता गरीब आदमी कहता है कि रोटी और पानी के बिना जीवन नहीं, रुपये के बिना तो जीवन बिल्कुल ही नहीं। अलग अंदाज में लिखी लघुकथा प्रभावित करती है।

'श्रद्धांजलि' 

'श्रद्धांजलि' लघुकथा में पिता के मरणोपरांत सभी उनकी कंजूसी के बारे बात कर रहे थे लेकिन उनका बक्सा खोलते ही एफ डी, इन्वेस्टमेंट के कागजात और एक चिट्ठी मिली। उसमें लिखा था कि अभाव का रोना कभी मत रोना। सभी पढ़कर रो पड़े।यथार्थ यही है कि जेन ज़ी बचत का महत्व नहीं जानती।

'ब्रांडेड' 

अंतिम लघुकथा 'ब्रांडेड'  युवा पीढ़ी को सीख देती है कि आज भी ब्रांड की बजाय देसी नुस्खे काम करते हैं।

      सभी लघुकथाएँ आज की पीढ़ी का मार्गदर्शन करती हैं। 

-डॉ अंजु दुआ जैमिनी

फरीदाबाद -हरियाणा

 स्वाभाविक एवं परिपक्व अभिव्यक्ति 

    आदरणीय बी.एल.आच्छा जी स्वयं एक उत्कृष्ट आलोचक एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं। उनकी प्रस्तुत पांँच लघुकथाओं में हम उनकी व्यंग्यात्मक-शैली के सहज ही दर्शन कर सकते हैं :-

1. चंदा 

   लघुकथा में चंदा उगहाने के विभिन्न पैतरों का उपमाओं के साथ चित्रण किया गया है। उदहारण स्वरूप वे चंदा लेने के लिए आयोजन की रूपरेखा रंगीली जबान में ऐसे बताते जैसे कोई दुकानदार साड़ी के रेशमी महीनपन के साथ कई शेड्स भी दिख रहा हो। जेब छाती से चिपकने लगी..., चंदे की मल्ल-विद्या जैसे वाक्यों का सटीक चयन लघुकथा को कसावट दे रहे हैं। और लघुकथा का अंतिम वाक्य 'चोर-चोर मौसेरे भाई' या 'सेर को सवा सेर' मुहावरों को चरितार्थ करता है- 'चाय तो चलती रही, पर दोनों ओर की रसीदें अनकहे ही फड़फड़ाती रहीं।'

2. सेवा 

    बी. एल. अच्छा जी ऐसे लघुकथाकार हैं, जो समाज की आंँखों में उंगली डालकर विसंगतियों का पर्दाफाश करते हैं। हाल ही में 'नीट' की परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के बारे में किसे नहीं पता। उनकी लघुकथा 'सेवा' में अकादमिक स्तर पर योग्यता को दरकिनार कर स्वार्थवश भ्रष्टाचार उजागर होता है। डॉक्टर याज्ञवल्क्य अपने दोनों शिष्यों में से प्राध्यापक के पद के लिए सेवाभावी पीएचडी छात्र को चुनते हैं, क्योंकि वह गाहेबगाहे उनकी बेगार भी कर देगा। वह स्पष्ट कहते हैं- 'यदि दूसरे को लिया तो वह मेरे अवसरों में फंदा फंसाएगा। मौका आने पर मुझ पर ही तरकश खाली कर देगा।' स्वार्थ के रेगिस्तान के आगे यहां योग्यता धरी की धरी रह गई और चापलूसी जीत गई।

3. रोटी और रुपया

   पापी पेट क्या-क्या धोखे, करतब नहीं करवाता और झूठ नहीं बुलवाता? 'रोटी और रुपया' लघुकथा में लेखक मेले में 'आपका जीव' नामक अजीबोगरीब शो की ओर आकर्षित होता है... दस रुपए का टिकट खरीद कर वह शो देखने के लिए मजबूर हो जाता है। अंदर जाने पर वह ठगा सा रह जाता है और पूछता है- " कहां है आपका जीव?"  पूछने पर वह बोला, "यह है रोटी और पानी। इसके बगैर जीव कहां रह पाता है? साथ ही उसने गुहार लगाई कि पेट और रोटी का सवाल है बाबूजी, बाहर मत बताइएगा। उसने तपाक से दस रुपए का नोट ऊपर किया और बोला बाबूजी मेरा 'जीव' इसमें है।" आत्मकथात्मक शैली की इस लघुकथा में पेट और रोटी का सवाल उस गरीब की मजबूरी को दर्शाता है।

4. श्रद्धांजलि

      जीवन में बचत के महत्व को रेखांकित करती लघुकथा है 'श्रद्धांजलि'। जीवन भर बेटे और पोते-पोतियो को यही लगता रहा कि पापा और दादाजी बहुत कंजूस है। किंतु मरणोपरांत उनकी एफडी तथा लिखे पत्र का आशय और कंजूसी का अभिप्राय समझ में आने पर सबकी आंखें भीग जाती हैं- "प्यारे बच्चो! अभाव का रोना कभी मत रोना। बुरे समय के लिए कुछ न कुछ बचत अवश्य करनी चाहिए।" 

5. ब्रांडेड

     सोशल मीडिया के युग में विज्ञापनों के माध्यम से दुष्प्रचार आधुनिक पीढ़ी के किस प्रकार सिर चढ़कर बोलता है, को दर्शाया गया है 'ब्रांडेड' लघुकथा में। इसमें बहू की विज्ञापनी नजरों में कंपनियों के डिब्बे ही थिरकते थे' अंततः जब बच्चे को दस्त लगे और वह ब्रांडेड इलाज से ठीक न हुआ, तब पड़ोस की बूढी दादी के देसी इलाज (घुटे हुए चावल में दही)  खिलाकर ठीक कर दिया तो बहू चकित रह जाती है। अंतिम वाक्य में लेखकीय प्रवेश है। वैसे भी कथानक स्वयं ही प्रभावशाली अंत ले आता है, इस वाक्य 'दादी का ब्रांड ही काम आया', की आवश्यकता ही नहीं।

        कुल मिलाकर उपरोक्त लघुकथाओं में सहज, स्वाभाविक एवं परिपक्व अभिव्यक्ति प्रभावित करती है। सटीक शीर्षक तथा सरल, सहज भाषा में सीमित पात्रों के साथ बी.एल अच्छा जी अपनी लघुकथाओं में व्यंग्य की धार का बखूबी प्रयोग करते हैं।

- डॉ. शील कौशिक 

सिरसा - हरियाणा

सार्थक और पठनीय रचनाएँ 

इन पाँचों लघुकथाओं में बी. एल. आच्छा जी की व्यंग्य-दृष्टि, सामाजिक अवलोकन और मानवीय संवेदनाएँ प्रभावशाली रूप से उभरकर सामने आती हैं। संक्षेप में मेरी समीक्षा इस प्रकार है

1. चंदा

यह लघुकथा सामाजिक प्रतिष्ठा और चंदा-संस्कृति पर तीखा व्यंग्य करती है। जो व्यक्ति दूसरों से चंदा लेने में दक्ष है, वही जब स्वयं चंदे के घेरे में आ जाता है तो उसकी असहजता उजागर हो जाती है। कथा का अंत अत्यंत प्रभावी है। "दोनों ओर की रसीदें अनकहे ही फड़फड़ाती रहीं" कथन पूरे व्यंग्य को सार्थक बना देता है। विशेषता: व्यंग्य की धार और कथानक का अप्रत्याशित मोड़।

2. सेवा

विश्वविद्यालयी राजनीति, गुरु-शिष्य संबंधों और योग्यता बनाम चाटुकारिता के द्वंद्व को यह कथा बहुत सधे हुए ढंग से प्रस्तुत करती है। यहाँ "सेवा" का अर्थ निष्ठा नहीं, बल्कि स्वार्थ-सिद्धि का माध्यम बन जाता है। याज्ञवल्क्य का निर्णय व्यवस्था की विडम्बना को उजागर करता है। विशेषता: अकादमिक जगत की यथार्थपरक और मारक प्रस्तुति।

3. रोटी और रुपया

यह लघुकथा दार्शनिकता और यथार्थ का सुंदर संगम है। "आपका जीव" शीर्षक से उत्पन्न जिज्ञासा अंततः जीवन की मूलभूत सच्चाई तक पहुँचती हैरोटी और रुपया ही अधिकांश लोगों के जीवन का आधार हैं। अंतिम पंक्ति "उसका जीव मेरे नोट में जी रहा था" अत्यंत अर्थगर्भित है।विशेषता: कम शब्दों में गहन जीवन-दर्शन।

4. श्रद्धांजलि

पिता के त्याग, दूरदर्शिता और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व को मार्मिक ढंग से चित्रित करती है। जीवित रहते हुए जिनकी कंजूसी आलोचना का विषय थी, उनके जाने के बाद वही मितव्ययिता परिवार की सुरक्षा बनकर सामने आती है। अंत भावुक होने के साथ-साथ आत्ममंथन भी कराता है।विशेषता: संवेदना, पारिवारिक मूल्य और प्रभावी समापन।

5. ब्रांडेड

आधुनिकता और पारंपरिक ज्ञान के बीच संघर्ष को सरल किंतु प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। "दादी ब्रांड" अनुभव की विजय और अंध-उपभोक्तावाद की पराजय का प्रतीक बन जाता है। कथा का संदेश सहज रूप से पाठक तक पहुँचता है।विशेषता: लोकानुभव और आधुनिक जीवनशैली का संतुलित टकराव।

समग्र मूल्यांकन

बी. एल. आच्छा जी की ये पाँचों लघुकथाएँ जीवन के विभिन्न पक्षोंसामाजिक दिखावे, शैक्षणिक राजनीति, आर्थिक यथार्थ, पारिवारिक मूल्यों और लोकज्ञान को केंद्र में रखती हैं। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और व्यंग्यात्मक है। कथाओं का सबसे बड़ा गुण उनका प्रभावशाली अंत है, जो पाठक को सोचने पर विवश करता है। मेरे अनुसार "श्रद्धांजलि" और "रोटी और रुपया" सबसे अधिक प्रभाव छोड़ती हैं, क्योंकि इनमें भाव और विचार का संतुलन अत्यंत सशक्त रूप में उपस्थित है।कुल मिलाकर ये पाँचों लघुकथाएँ समकालीन हिन्दी लघुकथा की सार्थक और पठनीय रचनाएँ हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ गहरी सामाजिक चेतना भी जगाती हैं।

- सुनीता गुप्ता 

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

    लघुकथाएँ की समीक्षा

1-चंदा

चंदा उगाहने की आज की परम्परा पर बहुत सटीक व्यंग्य और सीख है..इस हाथ लेना उस हाथ देना।तुम डाल-डाल हम पात-पात। पर आरम्भ में अनावश्यक भूमिका थोड़ी खलती है।

2-सेवा

वर्तमान समय का बहुत सटीक व्यंग्य है जहाँ कुर्सी पर चयन में योग्यता से अधिक घरेलू सेवा को प्राथमिकता दी जाती है।

3-रोटी और रुपया

यह अलग तरह के कथानक पर मज़ेदार व्यंग्य है।आदमी पेट भरने की ख़ातिर क्या क्या ढकोसले नहीं करता और अजीबो-गरीब नाम सुनकर उसको देखने की उत्सुकता में किस तरह आम आदमी मूर्ख बन जाता है।

4-श्रद्धांजलि

एक अच्छा संदेश देती लघुकथा है।जहाँ बाबूजी ने पढ़ाई के लिए पैसे देने में कोई कंजूसी नहीं की पर चाट बताशे और पिक्चर के शौक पूरे नहीं किए पर अपने बच्चे के भविष्य के लिए कुछ पूँजी छोड़ गए। लघुकथा मे स्पष्ट है कि परिवार अभी सैटिल नहीं है और न ही आर्थिक स्थिति अच्छी है।इस स्थिति में उनका सबके लिए एकमुश्त रकम छोड़ना बहुत अच्छा संदेश है।

5-ब्रांडेड

पश्चिमी नकल में आज की पीढ़ी का बहुत बढ़िया उदाहरण है।

और भारतीय घरेलू चिकित्सा की श्रेष्ठता का संदेश भी।

- मंजू सक्सेना

लखनऊ - उत्तर प्रदेश 

 पांचों लघुकथा की समीक्षा 

1. चंदा

प्रस्तुत लघु कथा *चंदा* में आदरणीय बी एल आच्छा जी ने चंदा मांगने वालों पर अच्छा व्यंग्य किया है। तीन जने चंदा लेने जा रहे थे ।लेखक को भी साथ ले लिया ।इनका यह पहला अनुभव था। वहां जाने पर चाय चलती रही ।और जिसके गए थे ,उसने कहा जो चाहे चंदा ले लीजिए। मैं भी कई गो- सेवा से लेकर वृद्ध सेवा की संस्थाओं के लिए चंदा लेता हूं ।आप चारों भी जो श्रृद्धा हो दे दीजिए। उल्टा हमें वहां जाना महंगा पड़ गया।

2. सेवा

प्रस्तुत लघु कथा सेवा में आदरणीय बी एल आच्छा जी ने बताया की डा.याज्ञवल्क्य ने डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त करी हुई है। उनकी अब तरक्की हुई है।उन्हीं के दो शिष्यों में डा मैत्रेय पहले पी एच डी कर चुके।व डा कात्यायन ने भी अभी पी एच डी की। एक दिन अचानक मैडम याज्ञवल्क्य  के द्वारा अपने पति से अपने पद पर किसे विराजोगे तो याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि जो सेवा भावी है और संडे भी गुरु के लिए ही समर्पित रहता है उसे ही। उन्नीस इक्कीस में जो अपने फायदे का हो उन्नीस होने पर भी उसी को।

3. रोटी और रुपया

प्रस्तुति लघु कथा में आदरणीय बी एल एल आच्छा जी ने मेले का जिक्र करते हुए बताया कि मेले में झूले और भी कई किस्म के सर्कस वह खेल लगे हुए थे ।पर मुझे तो एक अलग ही शो ने लुभाया। जिस पर लिखा था -'आपका जीव ' उत्सुकतावश मैं खिंचा चला गया ।टिकट भी दस रुपए। एक पतली सी गली से एक व्यक्ति और एक मैं जा रहा था।अंदर गया देखता क्या हूं -एक आदमी बैठा हैं और उसके आगे एक रोटी व एक गिलास पानी रखा है ।जाकर अपने को ठगा सा महसूस कर रहा था। उनसे पूछा ऐसा क्यों ??वह बोले बाहर जाकर किसी से कुछ नहीं कहना। आदमी रोटी के लिए ही तो सारी उमर भागता रहता है।जो सच्चाई थी।

4. श्रद्धांजलि

प्रस्तुत लघु कथा श्रद्धांजलि में आदरणीय बी एल आच्छा जी ने एक मध्यम परिवार के संघर्ष के बारे में बताते हुए उनकी श्रद्धांजलि सभा में सभी बेटे -बहू व पोते-पोतियों  के करुण विलाप की स्थिति दिखाई है। उनके कंजूस करने की किस तरह व्याख्या कर रहे हैं सब अपने-अपने अंदाज में।फिर भी मन में एक जिज्ञासा ।की कुछ तो जोड़ा ही होगा।और संदूक खोलने पर कई जमा। पुंजी व फिक्स डिपाजिट निकलने पर। अरे ! कितनी मेहनत से उन्होंने पैसा जोड़ा। सारा कुछ याद करते हुए उन्हें श्रद्धा से श्रद्धांजलि देते हुए आंखें नम हो जाती है। पैसे का खेल, एफडी का पता चलने से पहले और बाद के बच्चों के भाव।

5. ब्रांडेड

प्रस्तुत लघु कथा ब्रांडेड में आदरणीय बी एल आच्छा जी द्वारा नए द्वारा घबराकर महंगे हॉस्पिटल में अंधा-धुंध खर्च और पुराने के अनुभव का बीमारी के समय किस प्रकार फ्री में इलाज संभव ।जहां महंगे हॉस्पिटल में तो ब्रांडेड बहू के द्वारा काफी खर्च करने पर भी डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए ।बच्चे के दस्त होने पर पडौस की दादी द्वारा अनुभव का खजाना फ्री में इलाज,बच्चा ठीक।

- अलका जैन आनंदी 

        दिल्ली

    संदेशपरक लघुकथाएं

       आदरणीय बीजेन्द्र जैमिनी जी, आपका शुक्रिया कि आपने मुझे बी एल आच्छा की लघुकथाएं पढ़ने का अवसर दिया। बी एल आच्छा की लघुकथाएं मैं प्रथम बार पढ़ रहा हूँ :-

चंदा 

चोरों पर शानदार व्यंग्य कसा है। लोग किस तरह से चंदा इकट्ठा करने बेशर्मी से किसी के भी घर पहुंच जाते है। अपने लेखन में मुहावरों का सटीक प्रयोग कर कथ्य को कसने का सुंदर प्रयास भी किया है। लघुकथा की अंतिम पंक्ति "...दोनों ओर की रसीदें अनकहे ही फड़फड़ाते रही..." मन में कई प्रश्न करने लगी।

 सेवा

 शैक्षणिक योग्यता के स्थान पर सेवाभाव को तरजीह दिया जाना आज की चयन प्रक्रिया पर सही व सुंदर कटाक्ष किया गया है।

 रोटी और रुपया

 एक सामान्य सी लघुकथा है। आदमी के रोटी कमाने के हुनर को दर्शाती है और ठगे जाने पर शर्मिंदगी तथा अन्य को बताने पर उपहास उड़ाए जाने के डर पर लोग आपका जीव देखने के लिए उस ओर खींचे जा रहे थे। मगर रोटी और पानी देखर खुद को ठगा सा महसूस कर निकल रहे थे। ऐसा ही एक चुटकुला भी पढ़ा हुआ है कि मेले में एक तंबू के बाहर लिखा था जो देखेगा वो पछतायेगा, जो नहीं देखेगा, वो भी पछताएगा। वहाँ भी भीड़ लगी थी। जो अंदर जाता तो देखता कि वहां एक गधा बंधा है। कोई किसी को इसलिए नहीं बता रहा है कि लोग उसका मजाक बनाएंगे और दूसरी बात, मैं तो ठगा गया ओरों को भी इसका मजा चखने दे।

श्रद्धांजलि

 लघुकथा में लेखक ने बड़ा ही सुंदर सबक देने का प्रयास किया है कि बाप दादा की कमाई पर गुलछर्रे मत उड़ाओ। बिना वजह खर्च न करें। मितव्ययी को कंजूस मत समझो। भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बचत जरूरी है।

 ब्रांडेड 

 लेखक ने नानी के नुकसे कोई बेकार की चीज नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों का सार होते हैं। हमें आधुनिकता के साथ अपने गौरवमय पुरातन को भी नहीं भुलाना चाहिए। आधुनिक काल की अच्छाइयों को अपनाएं न कि उनका दास बने और पुरातन की बुराइयों को तजे और अच्छाई को गर्व से अपनाये। तभी जीवन आनंदमय होगा।

        लघुकथाकार बी एल आच्छा जी की लघुकथाएं अच्छी बन पड़ी है। भाषा सहज, सरल और प्रभावशाली है। मुहावरों का सुंदर प्रयोग हुआ है। संदेशपरक लघुकथाएं पढ़ने को मिली। लघुकथाकार को बधाई और आदरणीय बीजेन्द्र जैमिनी जी का हार्दिक आभार, जिन्होंने मेरे पास समीक्षा के लिए ये रचनाएं भेजी। 

- भूपसिंह 'भारती'

नारनौल - हरियाणा

      पांचों लघुकथा की समीक्षा 

 "चंदे" 

  धन उगाही की यह परंपरा बरसों की है। बस, अब उसके कई रूप सामने आने लगे है।इस लघुकथा का कथ्य-शिल्प बहुत कसावट के साथ प्रस्तुत होता है। ऐसा की पाठक के मन में देर तक बजती है ये लघुकथा। कुछ वाक्य बेहतरीन शिल्प की बुनावट को समक्ष लाते हैं जैसे :- "जैसे कोई दुकानदार साड़ी के रेशमी महीनपन के साथ की शेड्स भी दिखा रहा हो" या " जेब छाती से चिपकने लगी"। इसमें आम आदमी की जेब के खालीपन का मर्म उकेरा गया है। "शेर को सवा शेर मिल गया" इस मुहावरे का सार्थक करता तीखे व्यंग्य में लिपटी रचना। ०००

 "सेवा" 

शीर्षक ने पंचलाइन को लघुकथा का सारा सार सौंप दिया। लघुकथा की उत्कृष्टता का यही पैमाना भी होता है। पी.एच.डी मिलने से लेकर उच्च पद प्राप्त करने तक, चापलूसी का जो दौर चलता है, उस पर कुठाराघात करती बढ़िया लघुकथा।  "सेवा" के मायने कितने बदल गये है। इसी सोच पर तीखी चोट करती रचना है ये।०००

" रोटी और रूपया" 

साधारण शीर्षक लगता हो मगर इसका कथ्य असाधारण है। लघुकथा तो अलहदा विषय पर लिखी गई है। ये लघुकथा हमें उस मार्ग पर ले चलती है जिसके हर मोड़ चौंकाते हैं। रोटी का जुगाड़ करने के लिए किस तरह के हथकंडे  अपनाने पड़ते हैं, इस लघुकथा में उसकी बानगी को बहुत बारीकी से गढ़ा गया है।०००

"श्रृद्धांजलि "

 भूमिका ने कितने रंग भर दिये भावों के। कहते है आदमी के जाने के बाद उसकी बात पता चलती है। इस कथा में परिवार के मुखिया की कटौती उनके जाने के बाद परिवार को समझ आई। कितना त्याग करके अपने परिवार के भविष्य को मजबूती प्रदान कर गये। बुजुर्ग की दूरअंदेशी का एक पुष्ट उदाहरण है यह लघुकथा। ०००

"ब्रांडेड"

 ऐसी लघुकथाओं की आजकल बहुत आवश्यकता है। कारण भी है। जिस आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम शामिल हो जाते है वह हमें न घर का और न घाट का रखती है। हमारी घर की रसोई ही सौ बीमारियों का मात दे सकती है लेकिन "ब्रांडेड" का मोह कभी-कभी मंहगा और दुष्परिणाम लेकर आता है। इसी सीख पर ठप्पा लगाती है यह लघुकथा

- अंजू निगम 

लखनऊ - उत्तर प्रदेश 

     समीक्षात्मक अध्ययन

        श्री बी एल आच्छा की पाँच लघुकथाओं का अध्ययन किया। पाँचों लघुकथाएँ अपने आप में श्रेष्ठता की श्रेणी में आती हैं :-

चंदा

 'चंदा' लघुकथा बहुत रोचक है जिसमें चंदा उगाहने की प्रवृत्ति का उल्लेख किया है। लेखक का कहना है कि चंदा उगाहने का लहजा लाजवाब है। सामाजिक होता व्यक्तित्व। माइक पर छाए तेवर। संस्था में उनका ओहदा, कितना सुंदर व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया गया है जिसे पढ़ने के स्वत: ही जिज्ञासा होती है। चंदा उगाहने वाले का सामना भी कभी -कभी शेर का सामना सवा शेर हो जाता है और वह बहुत सारी रसीद बुक सामने रखते हैं एवं कहते हैं कि आप भी मेरी कौन सी रसीद काटना चाहेंगे ?पहले वाले चंदेबाज का दूसरे अनुभवी चंदेबाज का सामना करना पड़ा। भाषा की कसावट एवं शब्द चयन लाजवाब है । छोटे-छोटे और सरल वाक्य है। बेहतरीन लघुकथा है। 

सेवा

बी एल आच्छा जी ने दूसरी लघुकथा में  संदेश दिया है कि विभाग में जगह खाली होने पर नियुक्ति के लिए हलचल और विचार विमर्श प्रारंभ हो जाता है कि किसे रखा जाए। एक शिष्य मिज़ाज से एकेडेमिक और तर्कशील और दूसरा सेवा भावी। तर्कसंगत बात यह रही कि पहला एकेडेमिक तर्कशील हर काम में कमी निकालेगा इसलिए जो आज्ञाकारी और सेवाभावी है उसे रखा जाएगा। सेवा लघुकथा आज के परिप्रेक्ष्य में खरी उतरती है। भाषा- शैली विषयानुकूल है। दर्शनशास्त्र, पुष्टिमार्ग  जैसे गंभीर विषय का उल्लेख किया गया है। बेहतरीन लघुकथा है

रोटी और रूपया

  लेखक ने इस कहानी के माध्यम से संदेश दिया है कि रोटी और रूपया के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है, चाहे किसी को मूर्ख क्यों न बनाना पड़े। लेखक भी मेले में  अलग से लगने वाले शो में गए जिस पर लिखा था मैं और मेरा जीव। दस रूपये का टिकट लेकर लेखक अंदर गए और पूछा कहाँ है आपका जीव? वह बोला-यह है ना रोटी और पानी।  लेखक ने पूछा कि जीव कहाँ है? वह बोला बाबूजी इनके बगैर जीव कहाँ रह पाता है। बाबूजी बाहर मत बताइएगा आपको कसम है। पेट का सवाल है। लेखक की पैनी नजरों से कुछ नहीं छुपता है। यही कहानी का उद्देश्य है कि आदमी पैसे और रोटी के लिए कुछ भी करता है। संवाद शैली, प्रश्न शैली का प्रयोग किया गया है। सरलता, रोचकता का समावेश किया गया है

 श्रद्धांजलि 

 पिता की मृत्यु के बाद बेटों ने पिता की संदूक खोला तो उसमें सबकी अलग अलग वियतनाम देख पिता को कंजूस समझने वाले बच्चों की आँखों में आँसू थे। लघुकथा श्रद्धांजलि समसामयिक है आज यही चल रहा है समाज में।

 ब्रांडेड

लघुकथा में भी समसामयिक समस्या उजागर हुई है। बहू आधुनिकता के रंग में रंगी ब्रांडेड चीजों को प्रयोग में लाती है। बच्चे को दस्त लगने पर ब्रांडेड दवा देने के बाद भी आराम नहीं मिला तब पड़ोस की दादी ने कहा बच्चे को घुटे हुए चावल दही में मिल कर खिलाओ। बहू ने ‌वैसा ही किया। दस्त बंद हो गए। कहानी देशी चीजों के उपयोगी होने का संदेश देती है। अनुभवी बड़ी दादी, सास या माँ बहुत बार डॉक्टर से बढ़कर होती हैं। भाषा भावानुकूल है। अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग किया गया है जैसे ब्रांडेड, डिस्पेन्सरी आदि।

- डॉ कृष्णा जैमिनी

गुरुग्राम - हरियाणा





Comments

  1. मैं स्वयं इस विधा के आलोचना पक्ष की सैद्धांतिकी पर एकाग्र नहीं हो पाया।इसलिए कि मेरा 2012 तक लघुकथा से रिश्ता5%था।मजबूरी में एक विशेषांक का संपादक बना दिया ।यद्यपि 242 ए फोरसाइज के पन्नों में 2012 में छपा।बड़ी संख्या थी रचनाकारों की।फिर मधुदीप ने लपक लिया।कोई चार सौ प्रकाशित पेज में छपा भी।पर व्यंग्य और आलोचना इससे प्रभावित हुए।
    गलती मेरी, सैद्धांतिकी को ज्यादा गढ़ता, तो व्यावहारिक समीक्षा से तालमेल बन जाता।
    अब वैसी पठनशीलता और विश्लेषण आयु के साथ नहीं सधते।इसलिए ये टुकड़ा टुकड़ा कार्य मजबूरी में ही।
    व्यंग्य अब भी, उसकी वैचारिकी पर आलेख भी।इसके लिए प्रेम जनमेजय जी ने व्यंग्य यात्रा चिंतक सम्मान दिल्ली में दिया।
    लघुकथा समालोचना के लिए भी मिले हैं।पर अब सारे मुद्दे अखबारों की सुर्खियों में सिमटे हैं।और कुछ तो निरर्थक भी।
    अभी लघुकथाओं के शीर्षक पर लिखा।चैतन्य त्रिवेदीऔर अशोक भाटिया जी पर समकालीन भारतीय साहित्य पत्रिका में।पर जब नया नहीं कर पाता तो खुद ही जगह छोड़ देता हूं।योगराज प्रभाकर जी ने बहुत स्नेह दिया।परामर्श में रखा लघुकथा कलश में, पर मैं ही उतना सक्रिय नहीं रहा। आंखें भी अब कसमसा जाती हैं।
    - बी एल आच्छा
    पेरंबूर,चेन्नई (टी एन) तामिलनाडु
    दिनांक : 12 जून 2026
    (WhatsApp से साभार)

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