पाठकों के बीच में डॉ. मंजु गुप्ता की लघुकथाएं
डॉ. मंजु गुप्ता
जन्म तिथि : 21 दिसंबर 1953
जन्म – स्थान : ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत
शिक्षा :एम. ए (राजनीति - शास्त्र ), बी. एड
संप्रति : सेवा निवृत्त हिंदी शिक्षिका, जयपुरियार सीबीएससी हाईस्कूल, सानपाड़ा, नवी मुंबई , स्वतंत्र लेखन।
कृतियाँ : -
प्रांत पर्व पयोधि (काव्य), दीपक (बाल नैतिक कहानियाँ ), सृष्टि (खंड _काव्य), संगम (काव्य) अलबम (नैतिक कहानियाँ), भारत महान (बाल - गीत) सार (निबंध), परिवर्तन (सामाजिक कहानियाँ ) (923 दोहों में ) मनुआ हुआ कबीर, पारस मणि (आलेख-संग्रह ) अंतस् की कुहूक़ (हाइकु-संग्रह ) अप्प दीपो भव (अतुकांत कविता-संग्रह महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से ) सृजन के स्वर (सुविचार संग्रह)
मेरी प्यारी माँ (साझा काव्य-संग्रह की संकलक)
ऑपरेशन सिंदूर (साझा काव्य-संग्रह ,संपादक)
माँ धरती-पिता आकाश(साझा काव्य-संग्रह ,संपादक)
साझा संग्रह-152
प्रकाशन : -
देश-विदेश की प्रतिष्ठित विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं, भारत की साहित्य अकादमी में कृतियों में रचनाएँ प्रकाशित
उपलब्धियाँ :-
- बचपन में भारत के प्रथम राष्ट्रपति महामहिम स्व. डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी से मुलाकात, भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय द्वारा 1967 में आयोजित राष्ट्रीय शारीरिक दक्षता परीक्षण (जुनियर) में ‘टू स्टार मेरिट सर्टिफिकेट’ पुरस्कार से सम्मानित, लायंस क्लब, ऋषिकेश में चित्रकला स्पर्धा में सम्मानित, पद्मश्री डॉ. गोपाल दास नीरज जी द्वारा मेरी पांडुलिपियों की भूमिका गुनी। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी मुंबई हिंदी साहित्य भारती, मुंबई द्वारा क्राइस्ट अकादमी स्कूल, जूनियर कॉलेज, नवी मुंबई में प्रेम चन्द्र जयंती पर सम्मान, मुंबई सर्वोदय मंडल और गाँधी सेंटर ऑस्ट्रेलिया द्वारा शांति-अहिंसा र्स्पधा में प्रशंसा सम्मान, विश्व हिंदी संस्थान ने कल्चरल ऑर्गेनाइजेंशन, कनाडा द्वारा खट्टे-मीठे रिश्ते उपन्यास में सह रचनाकार सम्मान, कलम हस्ताक्षर द्वारा काव्यात्मक अभिव्यक्ति हेतु अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस सम्मान, शुभ संकल्प इंदौर के अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में विशेष सम्मान, ज्येष्ठ नागरिक संघ, नेरुल द्वारा हिरकरणी सम्मान, ज्येष्ठ नागरिक संघ, नेरुल द्वारा कवि सम्मेलन में सहभागी, आचार्य महाप्रज्ञ प्रवास में प्रेक्षाध्यान, वासी, नवी मुंबई में द्वितीय श्रेणी पुरस्कार। समस्त भारत की विशेषताओं को प्रांत पर्व पयोधि में समेटने वाली भारत की प्रथम कवयित्री, मुंबई दूरदर्शन से सांप्रदायिक सद्भाव पर कवि सम्मेलन में सह भाग, गाँधी जीवन शैली निबंध स्पर्धा में तुषार गाँधी द्वारा विशेष सम्मान से सम्मानित, मॉडर्न कॉलेज, वाशी, नवी मुंबई, द्वारा गुण गौरव सावित्री बाई फूले पुरस्कार से सम्मानित, भारतीय संस्कृति प्रतिष्ठान द्वारा प्रीत रंग में स्पर्धा में पुरस्कृत, आकाशवाणी मुंबई से कविताएँ, कहानियाँ, आलेख प्रसारित, विभिन्न व्यंजन स्पर्धाओं में पुरस्कृत, दूरदर्शन पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में सह भाग। भागलपुर विश्वविद्यालय बिहार से विद्या वाचस्पति से सम्मानित। नवभारत में प्रकाशन, नवभारत टाइम्स में मेरे मत, बोध कथा आदि प्रकाशित नवी मुंबई, मैत्री फाउंडेशन विरार, कन्नड़ समाज संघ, राष्ट्र भाषा महासंघ मुंबई, प्रेक्षा ध्यान केंद्र, नव चिंतन सावधान संस्था मुंबई कविरत्न से सम्मानित, हिन्द युग्म, दिल्ली यूनि पाठक सम्मान, काव्य रंगोली साहित्य भूषण सम्मान, अग्निशिखा काव्य मंच काव्य सम्मान, मगसम, रचना रजत प्रतिभा सम्मान, आशीर्वाद 24 घंटे मुंबई का कवि सम्मेलन में काव्य पाठ, के जे. सोमैया मुंबई से निबंध पुरस्कृत, गुरु ब्रह्मा सन्मान, सबरंग कवि रत्न अवार्ड, कॉपरेटर नवी मुंबई साहित्य सम्मान, इपीक लिटरी कौंसिल सम्मान, विश्व हिंदी संस्थान, कनाडा से विश्व हिन्दी कथा- शिल्पी सम्मान और हिंदी उपन्यास रचना सहभागी सम्मान, ओंकार प्रतिष्ठान सम्मान, हिन्दुस्तानी प्रचार सभा मुम्बई, सम्मान सेलिब्रेटिंग आईडिया जूरी पैनल सम्मान, नेपाल, आकाशवाणी में मेरा साक्षात्कार, काव्य वाचन, ऑनलाइन 100 से ज्यादा काव्य पाठ के प्रमाण पत्र आदि। मुंबई आकाशवाणी से कविता, कहानी, आलेख, मेरा साक्षात्कार आदि प्रसारण और चिंतन में कबीर के दोहे, टाइम्स ऑफ इंडिया, नवी मुम्बई, विविध पत्रिकाओं, अखबारों में मेरा साक्षात्कार, आवाज, मुनि की रेती, ऋषिकेश, उत्तराखण्ड, विभिन्न राज्यों के चैनल पर मेरा ऑनलाइन लाइव इंटरव्यू प्रसारित। डुगडुगी चैनल जीवन वृत्त, दूरदर्शन, देहरादून, उत्तराखंड परिचर्चा में सहभागी।
- जैमिनी अकादमी, पानीपत स्पर्धा द्वारा सच्ची श्रद्धांजलि को प्रथम पुरस्कार 1100 रुपये, सामयिक परिवेश द्वारा लघुकथा पुरस्कृत, कथा-दर्पण साहित्य मंच, इंदौर स्पर्धा में गोद उठाई, राष्ट्रीय त्यौहार लघुकथा प्रथम, द्वितीय पुरस्कार।अखण्ड गहमरी स्पर्धा में अहसास लघुकथा द्वितीय स्थान, वुमैनी मंच द्वारा लघुकथा - साझा चूल्हा , पुरुषार्थ की ऊष्मा, बहू पराई प्रथम स्थान, नेहा का सिंदूर पुरुस्कृत , मेरी कई सारी लघुकथाओं का अंग्रेजी, कन्नड़, नेपाली, गुरुमुखी, मराठी, उड़िया में अनुवाद हुआ है और रूपांतरण भी।
- स्कूल, कालिजों में हिंदी दिवस पर जज की भूमिका अदा की। कोरोना काल में ऑनलाइन वर्चुअल हिंदी कार्यक्रमों में निर्णायिका की भूमिका, ऑनलाइन लाइव एकल काव्य पाठ, कवि सम्मेलन, लघुकथा वाचन, शिक्षा अभियान, स्वरचित भजन, काव्यगोष्ठी, प्रतियोगिता आदि में प्रतिभागी रहना जारी है। महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी, मुम्बई में ऑनलाइन कवि सम्मेलनों में सहभागी। सोशल मीडिया मंचों पर विविध सम्मानों से सम्मानित।
- वैश्विक स्तर पर मेरी बायोग्राफी इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रूडेंट पेन द्वारा ‘गोल्डन बुक ऑफ अर्थ’ में विश्व की हस्तियों के साथ हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी सहित, मेरी बायोग्राफी, 20 देशों के राष्ट्र प्रमुखों की प्रेरक आत्मकथाओं के साथ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुई।
- नववर्ष 2022 से ‘कबीर दोहे सीरीज’ पर ‘चिंतन’ पर आकाशवाणी, मुम्बई से प्रसारण।
- सिंगापुर संगम में कनाडा संस्मरण। मन से मंच तक महिला काव्य मंच अन्तर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में सम्मानित। हंगामा लोक से नारी रतन सम्मान।
- निष्कर्ष प्रकाशन द्वारा माँ धरती -पिता आकाश साझा काव्य संग्रह हेतु संपादक सम्मान।
-विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा अंतर्राष्ट्रीय गीत लेखन स्पर्धा भौगोलिक क्षेत्र 5 भारत में तृतीय स्थान मिला और 100 डॉलर राशि सम्मान।
- साईं ट्रस्ट असोसिएशन (सीता ट्रस्ट) द्वारा अतिथि सम्मान ट्राफी तथा 106 पुस्तक विमोचन ऐतिहासिक साहित्य विश्व विक्रम पंजीकरण रिकॉर्ड और मां की ममता साझा काव्य संग्रह में डॉ मंजु गुप्ता ने माँ पर 53 कविताएँ विविध छंद में रची। जिसमें 5121 रचनाएँ है इस काव्य की भूमिका और समीक्षा भी की। स्मृति सम्मान से सम्मानित।
- डॉ मंजु गुप्ता
(सेवा निवृत्त शिक्षिका, साहित्यकार,एंकर, योग शिक्षिका, कवयित्री,पर्यावरण प्रेमी, समाज सेविका )
वाशी , नवी मुंबई - 400703 (महाराष्ट्र)
1.गणेशोत्सव
बेटी हिमानी अपनी माँ के साथ में शो रूम में खड़ी थी।
उसे उस बड़ी दुकान से माँ का गणेश जी खरीदना अच्छा नहीं लग रहा था।
" माँ, हम वेंडर्स स्ट्रीट चलते हैं। कोरोना के लॉकडाउन होने की वजह वहाँ पर बेचने वालों को रोजी - रोटी के लाले पड़ गए थे। उन्हीं से खरीदते हैं।"
"हाँ! चल उधर। चलते हैं।"
वे उस गली में एक दुकान पर खड़े हो गए।
विक्रेता ने कहा , " मैडम ! हमने गणेश उत्सव हेतु
गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति के बनाने में पंचतत्व के साथ एक और तत्व का उपयोग किया है। पृथ्वी , जल , वायु , अग्नि और आकाश के अंश के प्रभु तत्व के साथ इसमें अन्न तत्व भी
विद्यमान हैं। जौ , चावल , दालों का आटा मिलाकर पर्यावरण -अनुकूल गणेश जी बनाएँ हैं। जब आप नदी या तालाब में विसर्जन करेंगी तो कितने जलचरों , जलीय वनस्पतियों को भोजन मिलेगा।"
"ठीक है ।
सच में ,मानव संपदा के साथवनस्पतियों और जीवों का संसार सुरक्षित रहेगा।पर्यावरण के अनुकूल है और पर्यावरण बचेगा , यह दे दो ।"
उसने श्री गणेश जी की प्रतिमा को आस्था , उल्लास के साथ अपने सिर पर रखा।
माँ ने ' गणपति बप्पा मोरया' का पूरे जोश , भक्ति भाव के साथ उदघोष किया।
वे दोनों देश, विश्व को महामारी कोरोना से मुक्त करने की प्रार्थना करती हुयी उत्साह के साथ घर की ओर चल दी। ***
2. समता का धरातल
आलमारी के ऊपर घोंसले में चूजों की आवाज सुन, छत ने खुश होकर, कबूतरी को कहा - " तुम इंसानों से कितनी अच्छी हो। तुमने बिना भेदभाव किए ममता के आँचल में अपने वंश को बढ़ाया है। स्वार्थी इंसान तो लड़के की चाह में कन्या- भ्रूण हत्या जैसा पाप कर रहा है।"
तभी मुस्कुराती हुईं हवा ने आलमारी से कहा -
" बहन ! तुमने कबूतर - कबूतरी को संरक्षण देकर बहुत अच्छा किया।"
कबूतर ने आत्मीयता से अपने चूजों को गले लगाते हुए हवा , अलमारी और छत को आभार देते हुए कहा - "हम दोनों मिलकर, समता के धरातल पर इन्हें बड़ा करेंगे। "
" परिवार में नर -मादा एक सिक्के के दो पहलु होते हैं। लेकिन जिस घर को मैँ संभाले हुए हूँ, वहाँ इस बात का कोई महत्व नहीं। यहाँ बहू को ,पुत्र जन्म न देने के कारण अपमान सहन करना पड़ता है।" छत यह कहते-कहते उदासी से भर गई।
यह सुन, कबूतर-कबूतरी भी उदास हो गए।
हवा चुप हो गई।
आलमारी की आँखों में आहत बहू घूम रही थी। ***
3. बुझा चूल्हा
मनिहारिन आवाज लगा रही थी,"चूड़ी ले लो, चूड़ी।"
मनिहारिन की आवाज सुनकर , मधु ने उसे घर में बुलाया।
बहू से कहा, " देख तो,मनिहारिन रंग -बिरंगी, खूबसूरत डिजाइन की चूड़ियाँ लायी है। तुम्हारी मुम्बई में तो ये मिलने वाली नहीं। पसंद कर लो, बाँह भर -भर पहन लो। आज सुहागिनों का हरियाली तीज पर्व भी है।"
मनिहारिन चूड़ियाँ दिखाती गयी और बहू पसंद कर,पहनती गयी।
उसके दोनों हाथ चूड़ियों से भर चुके थे।
मधु बोल उठी, "अरे वाह! लाल, हरि और सुनहरी
चूड़ियों ने तो तुम्हारी गोरी कलाईयों में चार चाँद लगा दिए।"
बहू के गाल लाल हो गए ।
"मम्मी जी, मथुरा में आपके संग मनायी यह तीज मुझे हमेशा याद रहेगी । एक काम करते हैं। लच्छों से भरी पूरी टोकरी ही खरीद लेते हैं।
मुंबई में तो घर से निकलना ही मुश्किल होता है और ऐसी सस्ती चूड़ियाँ तो कभी दिखी भी नहीं।"
मनिहारिन, बहू को दुआएँ देती हुईं बाहर आ चुकी थी।
वह चलते हुए बुद्बुदा रही थी, " भगवान भला करे इन घरवालों का।अब दो दिन से बुझा चूल्हा, फिर जल जाएगा।" ***
4. आत्मा का दर्पण
सुरेखा अँधेरों में भटक रही थी। जैसे भूत -प्रेत उसके पीछे पड़ गए हों । सवालों से परेशान हो रही थी। लिविंग रिलेशनशिप में वह रमेश के साथ रह रही थी।
एक औरत दुनिया के सारे दुख सह लेगी। वह अपना घर टूटता हुआ नहीं देख सकती है।
सुरेखा के पेट में बुरी तरह से दर्द होने पर वे दोनों डॉक्टर के पास गए। पता लगा वह पेट से है।
रमेश को अविवाहित होने की बात खाई जा रही थी। शारीरिक सुख देने वाला दिखावटी प्यार उसे आईना दिखा रहा था। सुरेखा से उसने पूछा कि यह पाप किसका है। यह इल्जाम लगा कर वह वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गया।
सुरेखा के दिल दिमाग में सन्नाटा छा गया। गर्भ को जन्म दूँ या गिराऊँ उसे समझ नहीं आ रहा था। उसकी आत्मा ने उसे दर्पण दिखाया कि भ्रूण गिराने का अपराध मत करना...।
वह दर्पण से कहने लगी मैं इसको जन्म दूँगी ।
समृद्ध भविष्य की कुँजी को जन्म देनाऔर माँ बनना नारी का अधिकार है। ***
5.सच्ची श्रद्धांजलि
कोलकता के वृद्धाश्रम के ' बहुउद्देशीय सेवा केंद्र ' द्वारा भेजे गए कोरियर में
" रीमा , बिल फॉर फ्युनरल यूअर मदर " को विस्मृत नेत्रों से पढ़कर इकलौती बेटी रीमा अपनी बूढ़ी माँ की अंतिम क्रिया में न शामिल होने के दुःख से फफक - फफक रो पड़ी . उस की अंतरआत्मा उसे धिक्कार रही थी . तभी पास बैठे उसके पति ने रीमा से रोने का कारण पूछा तो रीमा ने वह बिल दिखाया .
सांत्वना देते हुए पति ने उसका ढाढ़स बंधाया और फिर रीमा से कहा -
" तुम्हारे कहने से ही तो मैं अपनी माँ को वृद्धाश्रम में छोड़ आया था . चलो हम उसे वापस घर ले आते हैं . "
रीमा ने अपने पति को हाँ में गर्दन हिलाकर अपनी सहमती जताई .
रीमा ने मन ही मन में सोचा यही मेरी माँ के लिए मेरा प्रायश्चित और सच्ची श्रद्धांजलि होगी . ***
अच्छे कथ्य और शिल्प
आदरणीया डॉ.मंजु गुप्ता जी की प्रस्तुत लघुकथाएं सामाजिक जीवन के अनेक पहलूओं पर, निदान के साथ सटीक चित्रण है। सरल और सहजता लिये सभी लघुकथाएं आज के समय का गंभीरतापूर्वक चिंतन और चित्रण है। जो लघुकथाकार के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण होता है।
1.गणेशोत्सव
इस लघुकथा के माध्यम से पर्यावरण को बचाने के मूलभाव को दृष्टिगत रखते हुए जो भी सहज और सरलता से संभव हों उन विकल्पों को अपनाए जाने पर जोर देने का प्रयास किया गया है। सार्थक कथ्य के साथ पर्यावरण को लेकर अच्छी परिकल्पना का सटीक चित्रण।
2.समता का धरातल
कथ्य अच्छा है। किंतु छत, आलमारी आदि का पात्र के रूप में प्रतीक स्वरूप प्रयोग ज्यादा आकर्षक नहीं लगा।
3.बुझा चूल्हा
दो पीढ़ी और दो संस्कृतियों के सामंजस्य की भावात्मक खींचतान का अच्छा चित्रण। एक छोटी सी लघुकथा में बहुत कुछ समझने योग्य। मनिहारिन के माध्यम से एक अतिरिक्त संदेश।
4.आत्मा का दर्पण
लिविंग रिलेशन को लेकर अनेक लघुकथाएं और कहानियां, यहाँ तक कि उपन्यास भी लिखे गए हैं। ऐसे रिश्ते न के बराबर सफल हुए हैं फिर भी इनका चलन और आकर्षण खत्म नहीं हो रहा है। प्रस्तुत लघुकथा में नयापन कुछ नहीं। परंतु ऐसा भी नहीं, यह लघुकथा अच्छी है। कथ्य भी सुंदर है।
5.सच्ची श्रद्धांजलि
" सुबह का भूला शाम को घर आ जाये " ऐसे संदर्भ को सार्थक करती अच्छी लघुकथा।संक्षेप में कहा जाये तो सभी लघुकथा अच्छे कथ्य और शिल्प लिये हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
कथनी के द्वारा समाज सुधार
डॉ. मंजू गुप्ता एक वरिष्ठ साहित्यकारा हैं। जिनकी लेखनी धरातल से जुड़ी है जो रूकने का नहीं, हमेशा चलने का सोचती हैं। जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक विशेष छाप छोड़े हुए हैं। इनकी कलम सदा आशा और विश्वास का हाथ पकड़े रखती हैं। घृणा की नहीं, प्यार मोहब्बत की बात करती हैं। बढ़ती उम्र को पीछे छोड़कर मंद- मंद मुस्कुराती, जड़ चेतन को हर्षित करती हुई आगे बढ़ती जाती हैं। इनके पास शब्दों का अपार भंडार है :-
1. गणेशोत्सव
डॉ. मंजू गुप्ता की लघुकथा 'गणेशोत्सव' हमें संकेत करती है कि हमें छोटी-छोटी दुकानों को भी नहीं भूलना चाहिए, वहां से भी खरीदारी करनी चाहिए और साथ में भारतीय संस्कृति के उत्सवों की याद दिलाती है कि इन त्योहारों को मनाते हुए हमें पर्यावरण का विशेष ध्यान रखना होता है। अक्सर लोग गणेश जी की प्रतिमा विसर्जित करते हुए उसे खरीदते हुए ध्यान नहीं देते। किसी भी प्रकार की मिट्टी और केमिकलों के द्वारा तैयार की गई मूर्ति या किसी भी धातु की मूर्ति खरीदते हैं और पूजा के बाद उसको जल में प्रवाहित कर देते हैं। इनकी लघु कथा हमें संकेत करती है कि हमें माटी से मूर्तियां बनाने वाले की मेहनत को भी भूलना नहीं चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह मूर्तियां हमारे जल को प्रदूषित न करें। जल में रहने वाले जीव जंतुओं का संरक्षण भी हो। मंजू जी के मन की कोमलता भारतीय संस्कृति की मान मर्यादा त्योहारों की गरिमा को बनाए भी रखती हैं और साथ में पर्यावरण को बचाने का संदेश भी देती है।
2. समता का धरातल
डॉ मंजू गुप्ता की लघु कथा 'समता का धरातल' भी हमें जीव जंतुओं के द्वारा एक नहीं अनेक संदेश दे रही है।मां की ममता, कन्या भ्रूण हत्या जैसा पाप, प्रकृति के संसाधन और स्त्री पुरुष जो एक दूसरे के पूरक हैं आज के समय में और लड़के- लड़कियों का बढ़ता अनुपात की ओर ध्यान दिलवाती हैं।
3. बुझा चुल्हा
डॉ मंजू गुप्ता की 'बुझा चुल्हा' लघु कथा में सास बहू के स्नेह भरे रिश्ते को दर्शाया गया है। 'वांह भर- भर पहन लो' कथानक में सांस मां की ममता भरी दृष्टि झलकती है। यह लघु कथा परिवारों में कटुता भरे रिश्तों में एक मिठास भरा संदेश देती है।
4.आत्मा का दर्पण
'आत्मा का दर्पण' लघुकथा कथानक की दृष्टि से डॉक्टर सरोज जी को एक बार और थोड़ा सा ध्यान देना होगा। इस कथा से समाज को एक बहुत अच्छा संदेश भी जा रहा है कि हमारी भारतीय संस्कृति में रिश्तों को जीवंत रखने के लिए विवाह प्रथा परिवार की एक आवश्यक रीति है।
5. सच्ची श्रद्धांजलि
लघु कथा 'सच्ची श्रद्धांजलि' आजकल के बच्चों को सच का आइना दिखा रही है कि बड़ों की चुप्पी का वह नाजायज़ फायदा ना उठाएं। अगर बड़े चाहें तो वह छोटों की अकल ठिकाने लगा सकते हैं क्योंकि आखिर वे भारतीय संस्कृति के संस्कारों में ही पले बड़े हैं।
कुल मिलाकर वर्तमान समय की आवश्यकता अनुसार डॉक्टर मंजू गुप्ता की लघुकथाएं अपनी कथनी के द्वारा समाज सुधार व नई पीढ़ी को सच का सामना करवा रही हैं।
- डॉ संतोष गर्ग 'तोष'
पंचकूला - हरियाणा
कथ्य और कथानक का तालमेल उत्तम
वरिष्ठ लेखिका मंजू गुप्ता साहित्य की विभिन्न विधाओं में पारंगत है लघु वकथाओं पर भी वे अपनी लेखनी बखूबी चलती हैं भिन्न-भिन्न विषयों पर आधारित पांचो लघुकथाएं समाज में व्याप्त विद्रूपताओं व विषमताओं को रेखांकित करती हुई अपने ध्येय में सफल हुई है कथ्य और कथानक का तालमेल उत्तम है :-
गणेशोत्सव
दो तीन उद्देश्य को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से स्वयं में समाहित किए हुए हैं एक और निधन वर्ग के प्रति सहानुभूति तो दूसरी और पर्यावरण सुरक्षा के साथ जीव जंतुओं के प्रति सहृदयता जताई गई है।
समता का धरातल
कबूतर कबूतरी के माध्यम से समाज में हो रही कन्या भ्रूण हत्याओं पर गहरा कटाक्ष है।
बुझा चूल्हा
प्रस्तुत लघुकथा में सजने संवरने के माध्यम से पारंपरिक व्यवस्था को कायम रखने का एक सुंदर प्रयास होने के साथ ही गरीबों को आर्थिक संबलता प्रदान करने में सहायक है ।
आत्मा का दर्पण
इसमें एक नारी के ममत्व भावों को उकेरा गया है किंतु लिव इन पर कटाक्ष करने से लघुकथा वंचित रह गई ।
सच्ची श्रद्धांजलि
मां के माध्यम से सासू मां के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य को रेखांकित करती नजर आती है।
- मीरा जैन
उज्जैन - मध्यप्रदेश
सकारात्मक परिवर्तन की चेतना
डॉ. मंजु गुप्ता की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ समकालीन समाज की विभिन्न समस्याओं, मानवीय संवेदनाओं तथा सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं :-
1- यह लघुकथा पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व का सुंदर संदेश देती है। हिमानी का बड़े शोरूम के बजाय छोटे विक्रेता से गणेश प्रतिमा खरीदने का आग्रह संवेदनशील उपभोक्ता दृष्टि को सामने लाता है। मूर्ति निर्माण में अन्न तत्व के प्रयोग की कल्पना कथा को नवीनता प्रदान करती है। कोरोना काल की पृष्ठभूमि कथा को यथार्थ से जोड़ती है। पर्यावरण और आजीविका—दोनों के संरक्षण का संदेश इसकी प्रमुख उपलब्धि है।
2- यह लघुकथा कन्या-भ्रूण हत्या और पुत्र-मोह जैसी सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करती है। कबूतर-कबूतरी, हवा, आलमारी और छत के संवाद कथा को रोचक बनाते हैं। प्रकृति और पशु-पक्षियों के माध्यम से मनुष्य को समता का पाठ पढ़ाने का प्रयास प्रभावी है। अंतिम दृश्य में आहत बहू की छवि पाठक के मन में गहरी संवेदना जगाती है।
3- यह कथा ग्रामीण जीवन, लोक-संस्कृति और श्रमिक वर्ग के संघर्ष का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। हरियाली तीज के उत्सवी वातावरण के बीच मनिहारिन की आर्थिक विवशता का संकेत कथा को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करता है। अंतिम पंक्ति—"दो दिन से बुझा चूल्हा, फिर जल जाएगा"—पूरी कथा का प्राण है।
4- यह लघुकथा आधुनिक जीवनशैली, लिव-इन रिलेशनशिप और उससे उत्पन्न सामाजिक-मानसिक जटिलताओं को केंद्र में रखती है। रमेश का पलायन और सुरेखा का आत्ममंथन कथा का मुख्य बिंदु है। लेखिका ने नारी के मातृत्व-अधिकार और भ्रूण-हत्या के विरोध को रेखांकित किया है।
5- यह लघुकथा वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न उठाती है। माँ की मृत्यु के पश्चात् प्राप्त बिल रीमा के अंतर्मन को झकझोर देता है। कथा का अंत प्रायश्चित और आत्मबोध की भावना से परिपूर्ण है। यह संदेश देती है कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य निभाना ही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है।
इन लघुकथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन की चेतना जगाना है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
सामाजिक चेतना की वाहक
डॉ. मंजु गुप्ता की इन पाँचों लघुकथाओं में सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदना, पर्यावरण चेतना, नारी-अस्मिता और पारिवारिक मूल्यों का सशक्त समावेश दिखाई देता है। भाषा सरल, सहज और जनसामान्य की समझ के अनुरूप है। कथ्य स्पष्ट है तथा अधिकांश लघुकथाएँ अपने संदेश को प्रभावी ढंग से पाठक तक पहुँचाने में सफल रहती हैं :-
1. गणेशोत्सव
यह लघुकथा पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व का सुंदर संदेश देती है। मिट्टी, अन्न और पंचतत्व से निर्मित गणेश प्रतिमा का विचार अत्यंत नवीन और प्रेरणादायक है। कथा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पर्यावरण और जीव-जगत के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। कोरोना काल की पृष्ठभूमि इसे समकालीन संदर्भ भी प्रदान करती है।
2. समता का धरातल
यह लघुकथा प्रतीकात्मक शैली में कन्या-भ्रूण हत्या और पुत्र-मोह जैसी सामाजिक विकृतियों पर प्रहार करती है। छत, आलमारी, हवा और कबूतर-कबूतरी का मानवीकरण कथा को रोचक बनाता है। अंत में बहू की पीड़ा का चित्रण पाठक को सोचने पर विवश करता है। कथा का संदेश स्पष्ट और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है।
3. बुझा चूल्हा
यह संग्रह की अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली लघुकथाओं में से एक है। पूरी कथा में उत्सव, रंग और खुशियों का वातावरण बना रहता है, किंतु अंतिम पंक्ति — "अब दो दिन से बुझा चूल्हा, फिर जल जाएगा" — अचानक पाठक को गरीब मनिहारिन की वास्तविक स्थिति से परिचित कराती है। यही अप्रत्याशित अंत इस लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।
4. आत्मा का दर्पण
यह लघुकथा आधुनिक जीवनशैली, लिव-इन रिलेशनशिप, पुरुष की गैर-जिम्मेदारी और मातृत्व के अधिकार जैसे विषयों को स्पर्श करती है। लेखिका ने भ्रूण हत्या के विरोध और नारी के आत्मनिर्णय के पक्ष में अपनी बात रखी है। कथा का उद्देश्य सकारात्मक है, यद्यपि कथानक को थोड़ा और कसाव मिलता तो प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता था।
5. सच्ची श्रद्धांजलि
यह लघुकथा वृद्धाश्रमों की बढ़ती प्रवृत्ति और वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा पर केंद्रित है। कथा का अंत आत्मबोध और पश्चाताप के माध्यम से एक सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देता है। "सच्ची श्रद्धांजलि" को लेखिका ने केवल शोक तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवन में सुधार के संकल्प से जोड़कर इसे सार्थक बना दिया है।
समग्र मूल्यांकन
डॉ. मंजु गुप्ता की ये लघुकथाएँ सामाजिक चेतना की वाहक हैं। इनमें उपदेशात्मकता तो है, पर वह बोझिल नहीं बनती। विशेष रूप से "बुझा चूल्हा", "समता का धरातल" और "सच्ची श्रद्धांजलि" अपनी मार्मिकता और प्रभाव के कारण अधिक देर तक स्मृति में बनी रहती हैं।
लेखिका की दृष्टि समाज के वंचित, उपेक्षित और संवेदनशील पक्षों पर केंद्रित है। यही उनकी रचनात्मक शक्ति है। इन लघुकथाओं का मूल स्वर मानवता, समानता, पर्यावरण संरक्षण और पारिवारिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, जो इन्हें पठनीय और सार्थक बनाता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
पांचों लघुकथा की समीक्षा
1. गणेशोत्सव
यह लघुकथा पर्यावरण संरक्षण, मानवीय संवेदना और भारतीय आस्था का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। कोरोना काल की पृष्ठभूमि में स्थानीय विक्रेताओं का समर्थन तथा पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमा का संदेश कथा को सामाजिक सरोकारों से जोड़ता है। संवाद सहज हैं और अंत सकारात्मक भावना मन में जगाता है।
2. समता का धरातल
यह लघुकथा प्रतीकात्मक शैली में कन्या भ्रूण हत्या और स्त्री-असमानता पर गहरी चोट करती है। कबूतर-कबूतरी, छत, हवा और आलमारी के माध्यम से लेखिका ने मानवीय संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से उभारा है। कथा का संदेश मार्मिक और चिंतनशील है।
3. बुझा चूल्हा
साधारण घरेलू प्रसंग के माध्यम से यह कथा श्रमिक वर्ग की आर्थिक पीड़ा और मानवीय करुणा को उभारती है। चूड़ियों की रंगीन दुनिया के पीछे छिपी मनिहारिन की भूख और संघर्ष पाठक के मन को स्पर्श करते हैं। अंतिम पंक्ति कथा को अत्यंत प्रभावशाली बना देती है।
4. आत्मा का दर्पण
यह लघुकथा आधुनिक संबंधों की विडंबना और नारी-अस्तित्व के प्रश्न को उजागर करती है। लेखिका ने लिव-इन संबंधों में जिम्मेदारीहीनता और स्त्री की मानसिक पीड़ा को संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अंत में मातृत्व के अधिकार का संदेश कथा को गंभीरता प्रदान करता है।
5. सच्ची श्रद्धांजलि
यह लघुकथा वृद्धाश्रम की त्रासदी और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर संवेदनशील प्रहार करती है। माँ के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने का पश्चाताप कथा को अत्यंत मार्मिक बना देता है। अंत में अपनी सास को वापस घर लाने का निर्णय मानवता और प्रायश्चित की सुंदर अभिव्यक्ति है।
ReplyDeleteमैंने डॉ मंजु गुप्ता की लघुकथाएँ पढ़ीं :-
1. कोरा उपदेश है
2. मारक या चमत्कारी अंत नहीं है
3. संवादों की भाषा पात्रानुकूल नहीं है। संवादों में बोलचाल के शब्द होने चाहिए न कि बनावटी, क्लिष्ट शब्द
-डॉ अंजु दुआ जैमिनी
फरीदाबाद - हरियाणा
( WhatsApp से साभार)
सभी साहित्य जगत में स्थापित अनुभवी , वरिष्ठ आलोचकों , समालिचकों और समीक्षकों की श्रम साध्य समीक्षा हेतु हार्दिक आभार प्रेषित करती हूँ। सदर नमन ।
ReplyDeleteआ भाई बीजेन्द्र जी का नवीन प्रयास लघुकथा समीक्षा हेतु आयोजन बेहद आकर्षक , नया और सभी लघुकथाकारों , पाठक को प्रभावित करता है। जो समीक्षक हमारी लघुकथा नहीं पढ़ पाए। वे इस पद्धति द्वारा पढ़ लेते हैं । मुझे आ बीजेंद्र जैमिनी जी का समीक्षा उत्सव बहुत रोमांचक और साहित्य जगत में लघुकथाओं को मंच प्रदान करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। - डॉ.मंजु गुप्ता , वाशी , नवी मुंबई - महाराष्ट्र
ReplyDelete(WhatsApp से साभार)