अशांति मन पर बोझ है, विचारों से ही उपचार है... यह बिल्कुल सत्य है। अशांति मन पर भारी बोझ की तरह ही है जो हमारे विचारों से ही उत्पन्न होती है किंतु विचार ही इसका इलाज है । यदि हम हमेशा अपने नकारात्मक विचारों को मन में स्थान देकर हताश हो अपनी बीती नाकामयाबी, अपने दुखों को याद करते रहें तो मन अशांत तो होगा ही, किंतु इसकी जगह यह सकारात्मक विचारों को मन में लाएं, जीवन में मिली छोटी छोटी खुशियों को याद कर उसका आनंद ले तो हमारा मन कभी अशांत नहीं रहेगा। आजकल इसका भी इलाज है...। हमें योग वगैरह करना चाहिए, ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, अकेले ना रहकर सब के साथ रहना चाहिए। क्रोध मन में ना आए इसका भी ध्यान रखना चाहिए। जीवन में अशांति आने से सब बिखर जाता है, हमें स्वयं सकारत्मकता लिए मन को हल्का करना चाहिए यानी खुश रहना चाहिए।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
मन में किसी भी तरह का बोझ होता रहता है, समझ जाईएगा। मन में अशान्ति है। मन विचलित है, किसी भी तरह से मन को केन्द्रित नहीं कर पा रहे है। अशान्ति मन पर बोझ है, विचारों से ही उपचार है। सत्यता प्रतीत होता है। कोई हमारे दुखी मन का बोझ नहीं उतार सकता है, उल्टा मन को अशान्त कर सकता है। हमें अपने मन इंद्रियों को स्वयं ही उपचारित करना पड़ेगा, तभी हमारी स्थितियां नियंत्रित रह सकती है, अन्यथा सब कुछ प्राप्त करने उपरान्त भी पछतावा होना स्वाभाविक ही है.....।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
यह सच है की अशांति का मन पर बहुत भारी बोझ होता है परंतु इसके कारण क्या है यह समझना भी जरूरी है जब भी हम अपनी सामर्थ्य से अधिक पाने की लालसा रखते हैं और हर बात में दूसरों से तुलना करते हैं दूसरे की धन दौलत ,उसका पारिवारिक रहन-सहन ,भौतिक सुख सुविधाओं के समान अपने को बनाना चाहते हैं।माना विचार ऊंचे रखना अच्छी बात है परंतु यदि हमारी सामर्थ्य स्थितियां तद्नुसार नहीं हैं तो फिर स्वाभाविक है कि हमारा मन बहुत अशांत हो जाएगा ।रात-दिन क्या करें कैसे करें इसी ऊहापोह में स्वयं परेशान एवम परिवार का वातावरण भी दूषित अशांत कर लेते हैं ।अंतः कहा भी गया है जितनी चादर उतने पैर फैलाओ। देख परायी छाकडी मत ललचावे जीभ। इसलिए सामर्थ्य और शक्ति के हिसाब से अपने विचार सकारात्मक रख कर ही अशांति से बच सकते हैं।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
अशांति किसी भी तरह की हो मन पर बोझ ही होती है. छोटी-छोटी अशान्ति भी मन पर बोझ बन जाती है. जिसका उपचार हम विचारों से ही कर सकते हैं. अपने शुभ विचार से ही हम अपने मन को शांत कर सकते हैं या दूसरों के भी मन को शांत कर सकते हैं. कभी-कभी बुरे विचारों से भी मन अशांत हो जाता है तब अच्छे विचारों से उसको दूर करना पड़ता है. मन है तो विचार उठेंगे ही. विचार भी परिस्थिति के अनुसार ही उठते हैं. तब ये हमारे ऊपर है कि हम अशांत होते हैं कि शांत रहते हैं.
- दिनेश चन्द्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
अशांति तन उत्पन्न होती है जब मनुष्य को उसका वांछित पेरिन या फल प्राप्त नहीं होता , व जब वह असफल हो जाता है या हालातों के आगे बेबस व मजबूर हो जाता है ! यही विचार उसके मन पर बोझ बन जाते है क्योंकि वह विवश हो जाता है !! नकारात्मकता उसे घेर लेती है , व वह उदास हो जाता है ! ऐसी अवस्थाओं मेंउसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता ! इन सारी समस्याओं का इलाज है उचित समाधान ढूंढना !! समाधान व्यक्ति को आत्मविश्लेषण , मनन , चिंतन , से ही मिल सकता है !! उसे अपने विचारों द्वारा ही स्थिति का उचित समाधान खोजना चाहिए , जो अवस्था का उपचार है !! शांतिपूर्वक , अपने विचारों में से ही उपचार खोजना , व उसे क्रियान्वित करना ही, समझदारी है !!
- नंदिता बाली
सोलन -हिमाचल प्रदेश
अशांति मन पर बोझ है, और इसका उपचार विचारों से ही संभव है।
- अशांति के कारण :
- नकारात्मक विचार
- अतीत की चिंताएं
- भविष्य की अनिश्चितताएं
- दूसरों से तुलना
- शांति का रास्ता :
- ध्यान और प्राणायाम
- सकारात्मक सोच
- वर्तमान में जीना
- क्षमा और स्वीकार्यता
- विचारों की शक्ति :
- विचार ही हमारे मन को आकार देते हैं।
- सही विचारों से मन शांत और मजबूत बनता है।
- विचारों को नियंत्रित कर हम जीवन बदल सकते हैं।
-सद् विचार ही उन्नति ,चरित्र निर्माण,और परिष्करण का सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।
- डा० प्रमोद शर्मा प्रेम
नजीबाबाद - उत्तर प्रदेश
अशांति—मन का बोझ, विचारों से उपचार मनुष्य का मन एक विशाल आकाश की भाँति है—जहाँ कभी शांति का नीलापन छाया रहता है, तो कभी अशांति के घने बादल उमड़ पड़ते हैं। यह अशांति बाहर की परिस्थितियों से कम और भीतर के विचारों से अधिक उत्पन्न होती है। जब विचार असंतुलित, नकारात्मक और अव्यवस्थित हो जाते हैं, तब मन बोझिल हो उठता है, जैसे कोई अदृश्य भार आत्मा पर रख दिया गया हो। अशांति का मूल कारण बाह्य जगत नहीं, बल्कि हमारे अंतर्मन की प्रतिक्रिया है। वही घटना किसी को विचलित कर देती है और किसी को अडिग बनाए रखती है। अंतर केवल विचारों का होता है। जब मन निरंतर तुलना, अपेक्षा, भय और असंतोष के जाल में उलझ जाता है, तब वह स्वयं ही अपने लिए पीड़ा का कारण बन जाता है। ऐसे में मनुष्य बाहर समाधान खोजता है, जबकि उसका उपचार भीतर ही छिपा होता है। विचार ही वह शक्ति हैं, जो अशांति को जन्म भी देते हैं और उसका निवारण भी कर सकते हैं। यदि विचारों को दिशा दी जाए, उन्हें सकारात्मकता और संतुलन का स्पर्श मिले, तो वही मन जो बोझिल था, हल्का और प्रसन्न हो उठता है। यह प्रक्रिया किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि सजगता और आत्मचिंतन से संभव होती है। जब हम अपने विचारों को देखने, समझने और नियंत्रित करने का अभ्यास करते हैं, तब धीरे-धीरे मन की उलझनें सुलझने लगती हैं। आत्मसंवाद इस उपचार की पहली सीढ़ी है। जब मनुष्य स्वयं से ईमानदारी से प्रश्न करता है—“क्या यह चिंता आवश्यक है?” “क्या यह भय वास्तविक है?”—तो उसे अपने ही विचारों की असारता का बोध होने लगता है। यही बोध अशांति के भार को कम करने लगता है। साथ ही, सकारात्मक चिंतन, कृतज्ञता का भाव और वर्तमान में जीने की आदत मन को स्थिरता प्रदान करती है। अशांति को समाप्त करने का अर्थ यह नहीं कि जीवन में समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, बल्कि यह है कि मन उन समस्याओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को संतुलित कर लेगा। जब विचार संयमित होते हैं, तो परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मन विचलित नहीं होता। अतः स्पष्ट है कि अशांति कोई बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि हमारे ही विचारों का परिणाम है। और उसका उपचार भी किसी बाहरी साधन में नहीं, बल्कि हमारे चिंतन की शुद्धता और संतुलन में निहित है। जब हम अपने विचारों के स्वामी बन जाते हैं, तब मन पर पड़ा हर बोझ स्वतः हल्का हो जाता है और जीवन में शांति का प्रकाश पुनः प्रस्फुटित होने लगता है।
- डॉ अलका पाण्डेय
मुंबई - महाराष्ट्र
अशांति का बोझ केवल मन पर ही नहीं तन और धन पर भी पड़ता है और यह बोझ केवल उस व्यक्ति पर ही नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में शांति मंत्र में,शांति में भी शांति की प्रार्थना की जाती है। अशांति से बोझिल मन में क्रोध बहुत जल्दी पैदा होता है और इस क्रोध के कारण कितना कुछ घटित हो जाता है। तो फिर शांति कैसे मिले,इसका उत्तर है कि विचारों पर नियंत्रण रखा जाए। विचारों से ही शांति का उपचार होगा। विचार, मन को शांत करने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण कारक हैं। विचार शुद्ध तो मन शांत। यदि विचार जरा से भी अशुद्ध हुए तो मन की शांति का हरण सुनिश्चित है। इसलिए शुद्ध विचार रखते हुए हमें शांत रहना चाहिए।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
मनुष्य अपने जीवन में अक्सर बाहर की परिस्थितियों को दोष देता है—व्यस्तता, चुनौतियाँ, असफलताएँ। पर वास्तव में, यही परिस्थितियाँ कभी मन को अशांत नहीं बनातीं; असली कारण है हमारे अविचारित, अनियंत्रित विचार। अशांति वह भार है जो हम अपने मन पर स्वयं डालते हैं। जैसे कोई व्यक्ति भारी बोझ उठाकर चलता है, वैसे ही नकारात्मक सोच, भय, क्रोध और चिंता हमारे मन की पृष्ठभूमि में दबाव बनाते हैं। और यह दबाव कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि हमारी खुशी, संतोष और शांति गायब हो जाती है। विचार ही उपचार हैं। यदि हम अपने विचारों को पहचानें, उन्हें समझें और नियंत्रित करें, तो वही हमारे मन का सबसे बड़ा औषधि बन जाते हैं। जब हम कृतज्ञता का अभ्यास करते हैं, तो जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँ भी बड़ी लगती हैं।जब हम वर्तमान में जीना सीखते हैं, तो भय और चिंता अपने आप कम होने लगती हैं।जब हम अपने भीतर की आवाज़ सुनते हैं, तो बाहरी अशांति का प्रभाव हमारे ऊपर कम पड़ता है। अशांति केवल चेतावनी है—मन को सजग करने की, अपने विचारों पर ध्यान देने की। और जब हम अपने विचारों को सकारात्मक दिशा में मोड़ते हैं, तो धीरे-धीरे मन हल्का और मुक्त हो जाता है। संक्षेप में, जीवन की शांति बाहरी संपत्ति, उपलब्धियों या परिस्थितियों में नहीं, बल्कि मन के विचारों में निहित है। यही कारण है कि विचारों का परिष्कार और नियंत्रण ही सबसे बड़ा उपचार है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
अशान्ति वास्तव में मन की वह स्थिति है, जब विचार बिखरकर अपनी दिशा खो देते हैं और व्यक्ति भीतर ही भीतर संघर्ष करने लगता है। यह केवल बाहरी परिस्थितियों का परिणाम नहीं, बल्कि अन्याय की पीड़ा, टूटती अपेक्षाएँ, आत्मसंघर्ष और संशय से उत्पन्न एक गहन मानसिक बोझ है। किन्तु यही वह अवस्था भी है जहाँ विचार स्वयं उपचार का रूप ले लेते हैं। क्योंकि जब मनुष्य अपने विचारों को पहचानकर उन्हें नकारात्मकता से अलग करता है और सत्य, न्याय, धैर्य तथा उद्देश्यपूर्ण दिशा में ढालता है, तब वही विचार उसकी शक्ति बनकर अशान्ति को शान्ति में परिवर्तित करने लगते हैं। आत्मचिंतन इस प्रक्रिया का मूल आधार है। क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है और अपने विचारों को परखता है, तब उसके भीतर स्पष्टता और आत्मबल का उदय होता है, जो उसे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अडिग बनाए रखता है। और जब यही सकारात्मक, संतुलित एवं राष्ट्रहित से प्रेरित विचार कर्म में परिवर्तित होते हैं, तब वे न केवल व्यक्ति के जीवन को स्थिरता और सार्थकता प्रदान करते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अशान्ति को अंत नहीं, बल्कि एक संकेत समझना चाहिए। अपने विचारों को उच्च, संयमित और रचनात्मक बनाने का। क्योंकि जागरूक और सशक्त विचार ही एक दृढ़ व्यक्तित्व और समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होते हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू)-जम्मू और कश्मीर
मेरी राय में, जब मन अशांत होता है तो ऐसा लगता है जैसे भीतर कोई भारी पत्थर रखा हो। छोटी-छोटी बातें भी बड़ी लगने लगती हैं, और जीवन का संतुलन बिगड़ जाता है। लेकिन इस अशांति का मूल कारण बाहरी परिस्थितियाँ कम, और हमारे अपने विचार अधिक होते हैं। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही महसूस करने लगते हैं। नकारात्मक विचार डर, चिंता और बेचैनी को बढ़ाते हैं, जबकि सकारात्मक और स्पष्ट विचार मन को हल्का कर देते हैं। इसलिए अगर हम अपने विचारों को समझना और सही दिशा देना सीख लें, तो मन की अशांति धीरे-धीरे शांत होने लगती है। विचार ही हमारे मन के “डॉक्टर” हैं अगर हम उन्हें संयम, धैर्य और सकारात्मकता से भर दें, तो वही विचार हमें सुकून देने लगते हैं। मन की अशांति को बाहर नहीं, अपने भीतर के विचारों में सुधार कर ही दूर किया जा सकता है।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश।
हमारा तन-मन और उसकी कार्य प्रणाली , इसे चाहे आध्यात्म, दर्शन या वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, अद्भुत और अनुपम है। इसमें कौशल और सामर्थ्य का अपार भंडार है , साथ ही असंभव कुछ भी नहीं। बस, यह निर्भर है, हमारे ज्ञान अर्जन की काबिलियत पर। जो हमारे निश्चल, निश्छल, दृढ़ भावना,लगन, संकल्प और परिश्रम से मिलती है और मिल सकती है। भावनाओं के लिए स्वस्थ मन: स्थिति आवश्यक है। यदि मन अधीर और अशांत होता है तब हम में अस्थिरता होगी और ऐसे में कुछ हासिल नहीं हो सकता। यानी मन का अशांत होना भी लक्ष्य से दूर होना है। अत: मन को स्थिर करना आवश्यक है जिसका उपचार सकारात्मक विचारों से संभव है। परंतु कोई इस युक्ति पर विश्वास नहीं रखते। सार यही कि इन सबका आधार बहुत ही सूक्ष्म और असाधारण है जिसे समझना ,जानना और मानना आम नहीं है क्योंकि आम लोग इसमें न तो रुचि रखते हैं और न ही रखना चाहते हैं। असल में सभी सामान्य जीवन जीने के आदी हैं और इसी से वास्ता रखते हैं। अत: संक्षेप में कहा जावे तो जो असंभव और कठिन दिखता है वह संभव और सरल है, पर वह रास्ता योग,तप,साधना का है जो ज्ञान और मार्गदर्शन से ही मिल सकता है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
अशांति मन पर बोझ है, विचारों से ही उपचार है । मनुष्य का मन अत्यंत संवेदनशील होता है। जब जीवन में समस्याएँ,असफलताएँ या अनिश्चितताएँ बढ़ती हैं, तब मन अशांत हो जाता है। यह अशांति धीरे-धीरे एक भारी बोझ का रूप ले लेती है, जो न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। व्यक्ति निराशा, चिंता और भय के चक्र में फँस जाता है। किन्तु इस अशांति का समाधान बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि हमारे अपने विचारों में छिपा होता है। सकारात्मक और संतुलित विचार ही मन को शांति प्रदान कर सकते हैं। जब हम अपने दृष्टिकोण को बदलते हैं, समस्याओं को अवसर की तरह देखने लगते हैं, तब मन हल्का होने लगता है। ध्यान, आत्मचिंतन और अच्छे विचारों का अभ्यास मन को स्थिर करता है। यह हमें सिखाता है कि हर परिस्थिति स्थायी नहीं होती और हर कठिनाई के पीछे एक सीख छिपी होती है। यह सत्य है कि अशांति मन पर बोझ अवश्य बनती है, परंतु सही विचारों के माध्यम से ही उसका उपचार संभव है।
- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'
मुंबई - महाराष्ट्र
अशान्ति एक प्रकार की बीमारी , रोग, है और ये आज कल तो हर जगह है , घर में गली में , ऑफिस में बाजार में यहाँ तक के आपके शयन कक्ष में भी , इसका बहुत बुरा प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क और आत्मा पर पड़ता है ये ऐसा जहर है जो धीरे धीरे आपके हमारे शरीर में घुन के समान भेदन , छेदन , और ग्रहण लगा देता है । इसका कोई उपाय नहीं मात्र अप दोबारा शहर से निकल कर बाबा जी बन जाओ प्रवचन अर्थात सात्विक विचारों की दुनिया में चले जाओ या झेलते रहो जब तक हिम्मत है , विचारों से आप काल्पनिक उपाय तो पा सकते हो लेकिन स्थाई छुटकारा नहीं । जीवन शैली ही ऐसी बन गई है युवा पीड़ी को जिसमे आनन्द आता है प्रौढ़ पीड़ी उससे कष्ट पाती है , स्वाध्याय , चिंतन मनन , ध्यान मौन , योग इत्यादि सब लाभकारी है अपितु स्थाई नहीं ।
- डॉ अरुण कुमार शास्त्री
दिल्ली
मन सबका आधार
जग से चाहे भाग ले कोई
मन से भाग न पाये
तोरा मन दर्पण कहरलाये।।
बड़ी ही सुंदर है ये पंक्तियाँ एकदम दिल को छू लेने वाली और मन को सही और सार्थक सटीक प्रतीत होने वाली। दुनिया यह असार संसार की वाहक है और इस संसार को चलाने वाला मन है - - परंतु सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि मन की अशांति इंसान को विवश करती है। विचार करने के पूर्व ही मन घेर लेता है पंचेन्द्रियों को और अशांति सोचने विचारने की शक्ति छीन लेती है। जरूरत इस बात की होती है कि इंसान अपने व्यक्तित्व में इतनी दृढ़ता और समरसता लाये कि कोई शक्ति उसे विचार-पथ से डिगा न सके। आज की अभिनंदनीय दुनिया में भी अनेकानेक विचारवंत हैं जो अपने विचारों से दुनिया में क्रांति की शुरुआत कर सकते हैं लेकिन हमारे मन की अशांति स्वयं से ही नहीं जुड़ने देती है - - व्यष्टि की ही बात नहीं समझ पाते हैं हम तो समष्टि की कहानी क्या समझेंगे भला? लेकिन हम यदि दृढ़ हैं अपने विचारों को लेकर तो निश्चय ही समाज की औय मन की अशांति से लड सकते हैं और अपने आत्मिक और सामाजिक दायित्व का निर्वहन कर सकते हैं।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
अगर अशांति की बात करें तो यह मन, समाज या वातावरण में स्थिरता या व्यवस्था के अभाव का नाम है तथा यह मन की बेचैनी, असंतोष की स्थिति मानी जाती है तथा इसके मुख्य कारण अज्ञानता, स्वार्थ, अन्याय तथा अपेक्षाओं का पूरा न होना माना गया है लेकिन यह सब वातें मन पर बोझ डालती हैंं जिससे मन का अशांत रहना लगभग संभव हो जाता है तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि अशान्ति मन का बोझ है और विचारों से ही उपचार है, मेरे ख्याल में जब तक परिस्थितियां हमारी इच्छा अनुसार नहीं होती तब तक हमारे मन पर बोझ की स्थिति बनी रहती है, क्योंकि अशान्त मन वास्तव में एक भारी बोझ है जो न केवल मानसिक थकान, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी थकान बन जाता है तथा यह बोझ नकारात्मक विचारों, गलतियों को पकड़ कर बैठे रहने के कारण तथा अन्य अधिक अपेक्षाओं के कारण होता है और इसे संतोष से तथा वर्तमान में जीने, क्षमा करने और ध्यान करने जैसे उपायों से दूर किया जा सकता है, इसके साथ अपने विचारों को शुद्ध रखने से व जो हमारे पास है उस पर संतोष करने से मन स्थिर और हल्का हो सकता है इसलिए हमें फिजूल में ऐसी बातों में नहीं उलझना चाहिए जिनसे मन पर बोझ पड़े और हमें ऐसे विचारों को अपनाना चाहिए जिनसे मन का बोझ हल्का हो और मन में सुख व शातिं का ही निवास रहे यह तभी मुमकिन हो सकता है जब हमारे विचारों में शुद्धिकरण होगा, हमरा मेलजोल सही होगा और हमारा ध्यान शुभ कामों व भक्ति में लुप्त रहेगा ताकि हमारा वातावरण शांत रहे।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
अशांति मन पर बोझ है विचारों से ही उपचार है मन को शांत करने के लिए नकारात्मक सोच को दूर कर सकारात्मक विचारों को अपनाना है जो हमे प्रेरित करते है ! मन की अशांति तन से नही दिल से उपजती हैं किर क्या करे दिल है की मानता नही । नकारात्मक विचार अशांति का एक प्रमुख कारण हैं। असंतुष्टि का भय , चाटुकारिता का होना अपेक्षाएं अफ़वाहों के साथ अशांति को बढ़ावा देती हैं।विचारों से उपचार सकारात्मक विचारों को अपनाना और नकारात्मक विचारों को दूर करना।ध्यान और योग ध्यान और योग से मन को शांतकरना। सकारात्मक लोगों के साथ समय बिताना और उनकी बातें सुनना। स्वयं से प्यार करना और अपने आप को स्वीकार करना। क्या आप अपने मन को शांत करने के लिए कुछ विशिष्ट बातों को जाने जो आपके व्यवहार आचरण को प्रभावित करते उन्हें दूर करगे आप अशांति के कारणों के बारे में जानजाएँगे !
- अनीता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
हमारे जीवन की आधे से अधिक समस्याओं व अस्वस्थता का कारण अशांति व बेकार की भागदौड़ है। विचारों के उथल-पुथल, नकारात्मक सोच और नकारात्मक व्यवहार ही हमें अशांति देता है। हम सोचते हैं कि हमारे जीवन की समस्याओं के मूल में अन्य लोग व परिस्थितियाँ हैं । यह सच नहीं है। जब हम शांत होते हैं तो ईश्वर के पास अथॉर्त दैविक शक्ति से ओत-प्रोत होते हैं। अशांत मन, तन और दिमाग़ को भी अशांत करता है जिससे तनाव, चिंता और अवसाद पैदा होता है। यह ही शारीरिक व मानसिक रोगों को जन्म देता है। सच्चाई यही है कि अस्वस्थ होना कोई भी पसंद नहीं करता। फिर उपाय क्या है। उपाय है अपने विचारों पर कड़ी नज़र रखना। लोभ, मोह, अहंकार, क्रोध, काम, ईर्ष्या, द्वेष आदि से बचना। यदि वो आते भी हैं तो उन्हें अपने जीवन से धीरे-धीरे बाहर निकाल जीवन को पॉलिश करते रहना। क्या यह इतना ही आसान है। नहीं।कठिन है लेकिन असंभव नहीं। अपने विचारों व सोचों पर लगाम लगाने का एक ही रास्ता है वह है अपनी साँसों पर ध्यान देना। लंबी गहरी साँसें हमारे विचारों को नियंत्रित करती हैं। विचार हमारे मन-मस्तिष्क को नियंत्रित करते हैं और उन्हें शांत रखते हैं। यह है शांत जीवन जीने का मूलमंत्र जो हमें अपने ऋषि-मुनियों से विरासत में मिला है।
- रेनू चौहान
नई दिल्ली
अशांति यह मन की एक अवस्था जो त्वरित कारणों कभी भी उत्पन्न हो सकती है। अशांत मन को शांत सकारात्मक सोच वाले विचारों से किसी हद तक कम किया जा सकता है। ज्यादा समय मन का अशांति नकारात्मक ऊर्जा को सक्रिय कर देती जो की कभी कभी खतरनाक साबित होती है।मन में उत्पन्न विचारों द्वारा ही मन के बोझ को कम किया जा सकता है।
ReplyDelete- अर्विना गहलोत
नागपुर - महाराष्ट्र
(WhatsApp से साभार)