पाठकों के बीच में प्रो.शरद नारायण खरे की लघुकथाएं
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
पद-- प्राचार्य : शासकीय जे.एम.सी.महिला महाविद्यालय,मंडला(म.प्र.)
शिक्षा--एमए(इतिहास),पी-एच.डी.,एल-एल.बी.
साहित्यिक गतिविधियां -
प्रकाशन----(1)गद्य-पद्य में 20 साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन।
(2)1000 से अधिक प्रकाशनों व विशेषांकों में बारह हज़ार से अधिक फुटकर रचनाएं प्रकाशित।
(3)सहयोगी संकलनों व विशेषांकों में 200 से अधिक रचनाएं प्रकाशित।
(4)100 से अधिक कृतियों की भूमिका का लेखन।
(5)200 से अधिक कृतियों की समीक्षा का लेखन/प्रकाशन।
(6)प्रसारण-----रेडियो से 38 बार ,भोपाल दूरदर्शन से 5 बार। ज़ी-स्माइल,ज़ी टी.वी.,स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से सतत प्रसारण।
(7)संपादन---9 कृतियों व 4 पत्रिकाओं का सम्पादन।
(8)400 से अधिक व्याख्यान व 300 से अधिक संयोजन/संचालन।
सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र :-
1200 से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन।
3000 से अधिक डिजिटल सम्मान पत्र।
सर्वप्रमुख अवार्ड--- म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड(निबंध )/ राशि-51000/=
पता-आज़ाद वार्ड- चौक,मंडला, म.प्र. 481661
1. असली विकलांग
वह हट्टा-कट्टा बॉडी बिल्डर-सा दिखने वाला आदमी चलती हुई बस में दो की सीट पर अकेला फैलकर ऐसे बैठा हुआ था मानो पूरी बस का मालिक वही है ! उसे देखकर पिछले स्टॉप पर चढ़ा हुआ एक दुबला -पतला किशोर वय का लड़का अपनी बैशाखी संभालते हुए आगे बढा,और हिम्मत करके उस तगड़े आदमी से डरते-डरते बोला -” भाईसाहब थोड़ा खिसक जाइए न,मैं भी बैठ जाऊंगा !’
इस पर उस पहलवान ने ऐसे घूरा मानो उस लड़के ने कोई अपराध कर दिया हो ! फिर लगभग गुर्राते हुए कहा-” तुम्हें दिख नहीं रहा क्या ? सीट खाली कहां है ?”
“भाईसाहब जी,दो लोग बैठते हैं !” लड़के ने जवाब देने की हिम्मत जुटा ही ली !
“ले बैठ जा,ज़िद करता है तो !” कहकर वह आदमी थोड़ा -सा कुछ इस तरह खिसक गया ,मानो बहुत बड़ा अहसान कर रहा हो !
तभी अगले स्टॉप पर एक बूढ़ी औरत हांफते -हूंपते सिर पर एक पोटली रखे बस में दाखिल हुई,और चारों ओर नज़र घुमाकर भरी हुई बस देखकर निराश होकर,चुपचाप एक ओर खड़ी हो गई !
यह उस विकलांग लड़के से देखा न गया ,वह बहुत ही विनम्रता से उस औरत की ओर मुख़ातिब होकर बोला-” माताजी ,आप इधर मेरी जगह बैठ जाइए,मैं खड़ा हो जाता हूं !” इस पर उस तगड़े आदमी ने उस लड़के को यूं घूरा,मानो उसने कोई आश्चर्यजनक बात कह दी हो ।
” नहीं बेटा,तुम तो बैठे रहो,तुम तो वैसे भी शरीर से दिक्कत में दिख रहे हो।"
"पर बिटवा तुम तो भगवान की दया से बिलकुल ठीक हो,हट्टे- कट्टे हो,तुम ही खड़े हो जाओ न !” बूढ़ी मां ने एक साथ उन दोनों से कहा !
” नहीं ,मैं क्यों खड़ा होऊं ? आपको बैठना है तो इस लड़के की जगह पर बैठ जाओ,यह भी तो मेरी ही सीट है,मैंने ही इसे दी है !” वह आदमी ऐंठते हुए स्वर में बोला !
“प्लीज माताजी,आप मेरी जगह पर बैठ जाइए न ।मुझे कोई परेशानी नहीं ।मुझे परेशानी तो तब होगी,जब एक वृध्द मां खड़ी रहेगी ,और बेटा बैठा रहेगा ।”
यह सुनकर बस के सारे लोग उस शारीरिक विकलांग लड़के की ओर देखने लगे। वे सब अब तक यह भी जान चुके थे कि असली विकलांग वह लड़का नहीं,बल्कि उस हट्टे-कट्टे आदमी सहित बस के सारे लोग हैं । ***
2. जंग और सिंदूर की कीमत
रीना की कल ही शादी हुई,पति से साथ एक ही रात गुज़री कि सैनिक पति राकेश को आर्मी हेड क्वार्टर से छुट्टियां रद्द होने और ड्युटी जोइन करने का बुलावा आ गया।
इस पर राकेश उदास हो गया,पर नवविवाहिता रीना ने उसका हौसला बढ़ाते हुए उसे उसका फ़र्ज़ याद कराया,और अपने सिंदूर की ताक़त का अहसास कराते हुए निडर होकर लड़ने की बात कही।
इस पर राकेश को जोश आया और वह पूरी हिम्मत के साथ बार्डर पर चला गया,जहाँ वह मौत की परवाह न करते हुए दुश्मन से भिड़ गया,और अंत में बुरी तरह से घायल होकर दुश्मन द्वारा कैद कर लिया गया।यहां उसके गाँव में उसके शहीद हो जाने की ख़बर आ गई।पर रीना को अपने सिंदूर की ताक़त का अहसास था।वह जानती थी कि उसका पति इस तरह से उसे छोड़कर नहीं जा सकता, इसलिए उसने न अपनी चूड़ियां तोड़ीं,न मंगलसूत्र उतारा और न ही माँग का सिंदूर पौंछा।सब उसे बावला कह रहे थे,पर वह टस से मस नहीं हुई।
उधर लड़ाई बंद हो गई और एक दिन चतुराई से राकेश दुश्मन की कैद से निकल भागा,और सीधे अपने गाँव आ पहुंचा।सारे गाँव वाले उसे ज़िन्दा देखकर भौंचक्के रह गए,पर रीना को कोई आश्चर्य नहीं हुआ,क्योंकि वह अपने सिंदूर की क़ीमत और जंग दोनों की क़ीमत अच्छी तरह से जानती थी। ***
3. कन्या पूजन
"डाक्टर साब! क्या पाँच तारीख के पहले आपरेशन नहीं हो सकता?"
"नहीं माताजी नहीं! उसके पहले की मेरी सारी डेट्स बुक हैं। पर आपको पाँच तारीख के बाद क्या प्रॉब्लम है?"
"दरअसल डाक्टर साब!पाँच तारीख से नवरात्रि शुरु हो रही है, और मेरे घर में बहुत श्रद्धा से नवरात्रि मनाई जाती है,ऐसे में अपनी बहू के गर्भ में पल रहे कन्या शिशु को आपरेशन द्वारा खत्म करा देना क्या महापाप नहीं माना जाएगा?"
डाक्टर माताजी का ढोंग देखकर हतप्रभ था। ***
4. दस्तक
"पापा आपसे कुछ नहीं बनता है ! दवा भी नहीं पी पा रहे हैं ! और चम्मच में भरी सारी दवा ही फैला दी ! ऐसा कैसे चलेगा?" जवान बेटे ने बिस्तर पर लेटे, सत्तर वर्षीय रिटायर्ड बाप को डंपटते हुए कहा!
"हां बेटा दिक्कत तो है !" बुदबुदाते हुए पिता बोले!
"लगता है कि धीरे-धीरे पापा की याददाश्त जा रही है !" धीरे से बेटे ने अपनी पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए कहा!
पर यह बेटे का भ्रम था! पिता को गुज़रे वक़्त के सारे वाकया याद थे ! वे बेटे के बचपन के दिनों में पहुंच गए !बेटा अब नन्हें बालक के रूप में उनके सामने था,और तीन पहिये की साइकिल चलाने की कोशिश कर रहा था!
"पापा-पापा,मुझसे नहीं बनेगी यह साइकिल चलाते! मैं तो बार-बार गिर जाता हूँ!" बेटे ने तुतलाते हुए कहा!
"नहीं बेटा, ज़रूर बनेगी !क्यों नहीं बनेगी ?अरे मेरा स्ट्रोंग बेटा सब कुछ कर सकता है! मेरा बेटा, न केवल एक दिन साइकिल के साथ मोटर साइकिल,कार चलाएगा, बल्कि-बल्कि-बल्कि बड़ा होकर मेरा भी सहारा बनेगा!"
यादों की परतें खुलते ही पिता की आंखें भर आईं।आज की घटना वे उनके दिमाग और सोच पर दस्तक दी,वे झटके के साथ वर्तमान में वापस लौट आए,और ख़ुद का सहारा ख़ुद बनने का संकल्प लेकर हौसले के साथ आगे का जीवन जीने की तैयारी करने लगे। ***
5. मुंह पर थप्पड़
यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया।पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया,और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा,और जब मानसी ने सीधे सीधे सवाल किया कि,"जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं,तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?"
"हां! है तो ।"
"क्या,तुम उससे सहमत नहीं ?"
"नहीं।"
"मतलब असहमत हो?'
" नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।"
"मतलब यह ,कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है,तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा।----और फिर इसमें बुराई भी क्या है,आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है।इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।"
"मतलब,यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?"
"हां!ऐसा ही समझो।'
" और हमारे प्यार का क्या ?"
"वह तो हमने तब किया था,जब मैं आय.ए.एस. नहीं था। ''
" ओके!तो मैं इस रिश्ते को अभी ख़त्म करती हूं।मुझे नहीं करना दहेज के लालचियों के घर अपना रिश्ता।"
और फुंफकारती हुई मानसी चली गई,और जुट गई जी-जान से यू.पी.एस.सी.की तैयारी करने में। ***
सहज और सरल
शरद नारायण खरे जी जाने-माने वरिष्ठ साहित्यकार हैं और गद्य और पद्य दोनों में अच्छे सृजनकार हैं। उनकी लघुकथाएं आम जीवन में होने वाली विषमताओं और विशेषताओं पर आधारित सहज और सरल शैली में लिखित होती हैं।
1. असली विकलांग
रोज़मर्रा की जिंदगी में बस या रेल में ऐसे दृश्य बहुत देखने मिलते हैं। जो दबंग या हठी स्वभाव के निष्ठुर लोग होते हैं वे अक्सर ऐसा ही संवेदनहीन व्यवहार करते हैं। उनके मन में न कोई दया होती है, न सहानुभूति। प्रस्तुत लघुकथा ऐसे ही वाक्या का सुंदर चित्रण है।
2.जंग और सिंदूर की कीमत
प्रस्तुत लघुकथा असाधारण है। लघुकथा न होकर सुंदर कहानी है। कहानी का अंत भी सुखद है। आत्मविश्वास और भरोसे पर आधारित सैनिक पत्नियों के लिए प्रेरणास्पद है।
3.कन्या पूजन
मार्मिक लघुकथा है। कोई बनावट नहीं,कोई असत्यता नहीं। यथार्थ। ऐसा हो रहा है। कन्या भ्रूण को लेकर संक्षिप्त में लिखी लघुकथा में कथाकार की संवेदनशीलता भी निहित है और आक्रोश भी। छटपटाहट भी।
4.दस्तक
समाज से ऐसे मार्मिक और यथार्थ दृश्य जब लघुकथा के माध्यम से समाज को लौटाये जाते हैं तो पल भर को विचलित तो करते ही हैं लेकिन संदेश भी देते ही हैं और पाठकों को अपने कर्तव्य एवं दायित्व का एहसास कराने में सफल भी होते हैं। प्रस्तुत लघुकथा का कथ्य स्पष्ट तो है ही , शिल्प से भी प्रभावी है।
5.मुंह पर थप्पड़
बहुत ही सुंदर लघुकथा। प्रेरक। सकारात्मक विकल्प के साथ। ऐसी लघुकथाओं की समाज को जरूरत होती है। जो हिम्मत भी देती हैं और हौसला भी।
कुल मिलाकर लघुकथाकार आदरणीय शरद नारायण खरे की प्रस्तुत लघुकथाएं समाज के बीच की पारिवारिक हिस्से के यथार्थ दृश्य हैं जो पाठकों के लिए केवल किसी घटना का वर्णन नहीं बल्कि वैकल्पिक निष्कर्ष भी हैं। लघुकथाकार के लेखन कौशल को सिद्ध और सार्थक करती हैं।
प्रोफेसर शरद नारायण खरे की शानदार लघुकथाएं वास्तव में पाठकों को अभिभूत करती हुई और समाज की खामियों पर गहरी चोट करती हुई समाज को बदलाव की तरफ ले जाने की नयी आशा जगाने में समक्ष ये लघुकथाएं है।
ReplyDelete- हीरा सिंह कौशल गांव व डाकखाना महादेव तहसील सुंदरनगर जिला मंडी हिमाचल प्रदेश मोबाइल 9418144751
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