मुल्तानी फिल्म : सज़ा

       अमीर बुर्जुग पिता की कहानी है। जिसके दो बच्चे शादी शुदा है पत्नी मर चुकी है। बच्चों की पत्नी ने आपस में बंटवारा कर लेती है। पिता 15 -15 दिन दोनों बच्चों में बंट जाते हैं। फिर एक कप चाय ने ऐसा विवाद को जन्म दिया। पिता के दिल को बहुत बड़ी ठेस लगती है। अस्ली कहानी यहीं से शुरू होती है। जो कोठी व ओफिस तक बेच दिया जाता है। पिता श्मशान में रहना शुरू कर देता है। पूरा परिवार बिखर जाता है।

         फिल्म परिवारिक अवश्य है। जो घर घर की कहानी का प्रतिनिधि करतीं हैं। लेखक की सोच कोई अलग नहीं है। संवाद के माध्यम से कहानी आगे बढ़ती है। संगीत काफी रोचक व सुंदर है। पानीपत के आसपास के क्षेत्रों का चित्रण को पेश किया गया है। बुजुर्ग पिता (कमल नयन वर्मा) की भूमिका के चारों ओर फिल्म घुमती है। बाकी भूमिका भी बहुत सुंदर है। नरेन्द्र गर्ग की एक्टिंग की भूमिका बहुत ही सराहनीय है। देव वर्मा का निर्देशन से फिल्म में चार चांद लग गए हैं। 

          काफी लम्बे समय के बाद मुझे किसी फिल्म की समीक्षा लिखने का अवसर मिला है। सन् 1990 के आसपास अनेक फिल्मों की समीक्षा लिखीं थीं। फिल्म पत्रकारिता कोर्स में ‌एक पूरा अध्याय फिल्म समीक्षा पर हुआ करता था। मैंने यह कोर्स दिल्ली से किया था। फिलहाल मैं फिल्म बहुत कम देखता हूं।‌ नरेन्द्र गर्ग के आग्रह पर ही, यह फिल्म देखने गया था ।‌ सुना है कि इस फिल्म का‌‌ पार्ट - 2 भी आ रहा है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

               ( फिल्म समीक्षक)

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