पाठकों के बीच में प्रो.शरद नारायण खरे की लघुकथाएं

   प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


पद-- प्राचार्य : शासकीय जे.एम.सी.महिला महाविद्यालय,मंडला(म.प्र.)

शिक्षा--एमए(इतिहास),पी-एच.डी.,एल-एल.बी.


साहित्यिक गतिविधियां -


प्रकाशन----(1)गद्य-पद्य में 20 साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन।

(2)1000 से अधिक प्रकाशनों व विशेषांकों में बारह हज़ार से अधिक फुटकर रचनाएं प्रकाशित।

 (3)सहयोगी संकलनों व विशेषांकों में 200 से अधिक रचनाएं प्रकाशित।

(4)100 से अधिक कृतियों की भूमिका का लेखन।

(5)200 से अधिक कृतियों की समीक्षा का लेखन/प्रकाशन।

(6)प्रसारण-----रेडियो से 38 बार ,भोपाल दूरदर्शन से 5 बार। ज़ी-स्माइल,ज़ी टी.वी.,स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से सतत प्रसारण।

(7)संपादन---9 कृतियों व 4 पत्रिकाओं का सम्पादन।

(8)400 से अधिक व्याख्यान व 300 से अधिक संयोजन/संचालन।


सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र :-


1200 से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन।

3000 से अधिक डिजिटल सम्मान पत्र।

सर्वप्रमुख अवार्ड--- म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड(निबंध )/ राशि-51000/=

पता-आज़ाद वार्ड- चौक,मंडला, म.प्र. 481661


      1. असली विकलांग


  वह हट्टा-कट्टा बॉडी बिल्डर-सा दिखने वाला आदमी चलती हुई बस में दो की सीट पर अकेला फैलकर ऐसे बैठा हुआ था मानो पूरी बस का मालिक वही है ! उसे देखकर पिछले स्टॉप पर चढ़ा हुआ एक दुबला -पतला किशोर वय का लड़का अपनी बैशाखी संभालते हुए आगे बढा,और हिम्मत करके उस तगड़े आदमी से डरते-डरते बोला -” भाईसाहब थोड़ा खिसक जाइए न,मैं भी बैठ जाऊंगा !’

इस पर उस पहलवान ने ऐसे घूरा मानो उस लड़के ने कोई अपराध कर दिया हो ! फिर लगभग गुर्राते हुए कहा-” तुम्हें दिख नहीं रहा क्या ? सीट खाली कहां है ?”

  “भाईसाहब जी,दो लोग बैठते हैं !” लड़के ने जवाब देने की हिम्मत जुटा ही ली !

    “ले बैठ जा,ज़िद करता है तो !” कहकर वह आदमी थोड़ा -सा कुछ इस तरह खिसक गया ,मानो बहुत बड़ा अहसान कर रहा हो !

         तभी अगले स्टॉप पर एक बूढ़ी औरत हांफते -हूंपते सिर पर एक पोटली रखे बस में दाखिल हुई,और चारों ओर नज़र घुमाकर भरी हुई बस देखकर निराश होकर,चुपचाप एक ओर खड़ी हो गई !

      यह उस विकलांग लड़के से देखा न गया ,वह बहुत ही विनम्रता से उस औरत की ओर मुख़ातिब होकर बोला-” माताजी ,आप इधर मेरी जगह बैठ जाइए,मैं खड़ा हो जाता हूं !” इस पर उस तगड़े आदमी ने उस लड़के को यूं घूरा,मानो उसने कोई आश्चर्यजनक बात कह दी हो ।

” नहीं बेटा,तुम तो बैठे रहो,तुम तो वैसे भी शरीर से दिक्कत में दिख रहे हो।"

  "पर बिटवा तुम तो भगवान की दया से बिलकुल ठीक हो,हट्टे- कट्टे हो,तुम ही खड़े हो जाओ न !” बूढ़ी मां ने एक साथ उन दोनों से कहा !

” नहीं ,मैं क्यों खड़ा होऊं ? आपको बैठना है तो इस लड़के की जगह पर बैठ जाओ,यह भी तो मेरी ही सीट है,मैंने  ही इसे दी है !” वह आदमी  ऐंठते हुए स्वर में बोला !

  “प्लीज माताजी,आप मेरी जगह पर बैठ जाइए न ।मुझे कोई परेशानी नहीं ।मुझे परेशानी तो तब होगी,जब एक वृध्द मां खड़ी रहेगी ,और बेटा बैठा रहेगा ।”

     यह सुनकर बस के सारे लोग उस शारीरिक विकलांग लड़के की ओर देखने लगे। वे सब अब तक यह भी जान चुके थे कि असली विकलांग वह लड़का नहीं,बल्कि उस हट्टे-कट्टे आदमी सहित बस के सारे लोग हैं । ***


2. जंग और सिंदूर की कीमत



रीना की कल ही शादी हुई,पति से साथ एक ही रात गुज़री कि सैनिक पति राकेश को आर्मी हेड क्वार्टर से छुट्टियां रद्द होने और ड्युटी जोइन करने का बुलावा आ गया।

   इस पर राकेश उदास हो गया,पर नवविवाहिता रीना ने उसका हौसला बढ़ाते हुए उसे उसका फ़र्ज़ याद कराया,और अपने सिंदूर की ताक़त का अहसास कराते हुए निडर होकर लड़ने की बात कही।

      इस पर राकेश को जोश आया और वह पूरी हिम्मत के साथ बार्डर पर चला गया,जहाँ वह मौत की परवाह न करते हुए दुश्मन से भिड़ गया,और अंत में बुरी तरह से घायल होकर दुश्मन द्वारा कैद कर लिया गया।यहां उसके गाँव में उसके शहीद हो जाने की ख़बर आ गई।पर रीना को अपने सिंदूर की ताक़त का अहसास था।वह जानती थी कि उसका पति इस तरह से उसे छोड़कर नहीं जा सकता, इसलिए उसने न अपनी चूड़ियां तोड़ीं,न मंगलसूत्र उतारा और न ही माँग का सिंदूर पौंछा।सब उसे बावला कह रहे थे,पर वह टस से मस नहीं हुई।

     उधर लड़ाई बंद हो गई और एक दिन चतुराई से राकेश दुश्मन की कैद से निकल भागा,और सीधे अपने गाँव आ पहुंचा।सारे गाँव वाले उसे ज़िन्दा देखकर भौंचक्के रह गए,पर रीना को कोई आश्चर्य नहीं हुआ,क्योंकि वह अपने सिंदूर की क़ीमत और जंग दोनों की क़ीमत अच्छी तरह से जानती थी। ***

      

        3. कन्या पूजन

 


"डाक्टर साब! क्या पाँच तारीख के पहले आपरेशन नहीं हो सकता?" 

"नहीं माताजी नहीं! उसके पहले की मेरी सारी डेट्स बुक हैं। पर आपको पाँच तारीख के बाद क्या प्रॉब्लम है?"

"दरअसल डाक्टर साब!पाँच तारीख से नवरात्रि शुरु हो रही है, और मेरे घर में बहुत श्रद्धा से नवरात्रि मनाई जाती है,ऐसे में अपनी बहू के गर्भ में पल रहे कन्या शिशु को आपरेशन द्वारा खत्म करा देना क्या महापाप नहीं माना जाएगा?"

   डाक्टर माताजी का ढोंग देखकर हतप्रभ था। ***


            4. दस्तक



"पापा आपसे कुछ नहीं बनता है ! दवा भी नहीं  पी पा रहे हैं ! और चम्मच में भरी सारी दवा ही फैला दी ! ऐसा कैसे चलेगा?" जवान बेटे ने बिस्तर पर लेटे, सत्तर वर्षीय रिटायर्ड बाप को डंपटते हुए कहा!

"हां बेटा दिक्कत तो है !" बुदबुदाते हुए पिता बोले!

"लगता है कि धीरे-धीरे पापा की याददाश्त जा रही है !" धीरे से बेटे ने अपनी पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए कहा!

       पर यह बेटे का भ्रम था! पिता को गुज़रे वक़्त के सारे वाकया याद थे ! वे बेटे के बचपन के दिनों में  पहुंच गए !बेटा अब नन्हें बालक के रूप में  उनके सामने था,और तीन पहिये की साइकिल चलाने की कोशिश कर रहा था!

       "पापा-पापा,मुझसे नहीं बनेगी यह साइकिल चलाते! मैं तो बार-बार गिर जाता हूँ!" बेटे ने तुतलाते हुए कहा!

     "नहीं बेटा, ज़रूर बनेगी !क्यों नहीं बनेगी ?अरे मेरा स्ट्रोंग बेटा सब कुछ कर सकता है! मेरा बेटा, न केवल एक दिन साइकिल के साथ मोटर साइकिल,कार चलाएगा, बल्कि-बल्कि-बल्कि बड़ा होकर मेरा भी सहारा बनेगा!"

      यादों की परतें खुलते ही पिता की आंखें भर आईं।आज की घटना वे उनके दिमाग और सोच पर दस्तक दी,वे झटके के साथ वर्तमान में वापस लौट आए,और ख़ुद का सहारा ख़ुद बनने का संकल्प लेकर हौसले के साथ आगे का जीवन जीने की तैयारी करने लगे। ***


       5. मुंह पर थप्पड़



       यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया।पहले तो जयंत ने  मानसी का फोन अटैंड नहीं किया,और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा,और जब मानसी ने सीधे सीधे सवाल किया कि,"जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं,तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?"

 "हां! है तो ।"

"क्या,तुम उससे सहमत नहीं ?"

"नहीं।"

"मतलब असहमत हो?'

" नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।"

"मतलब यह ,कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है,तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा।----और फिर इसमें बुराई भी क्या है,आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है।इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।"

"मतलब,यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?"

"हां!ऐसा ही समझो।'

" और हमारे प्यार का क्या ?"

"वह तो हमने तब किया था,जब मैं आय.ए.एस. नहीं था। ''

" ओके!तो मैं इस रिश्ते को अभी ख़त्म करती हूं।मुझे नहीं करना दहेज के लालचियों के घर अपना रिश्ता।"

     और फुंफकारती हुई मानसी चली गई,और जुट गई जी-जान से यू.पी.एस.सी.की तैयारी करने में। ***

        सहज और सरल


शरद नारायण खरे जी जाने-माने वरिष्ठ साहित्यकार हैं और गद्य और पद्य दोनों में अच्छे सृजनकार हैं। उनकी लघुकथाएं आम जीवन में होने वाली विषमताओं और विशेषताओं पर आधारित सहज और सरल शैली में लिखित होती हैं।  


1. असली विकलांग


    रोज़मर्रा की जिंदगी में बस या रेल में ऐसे दृश्य बहुत देखने मिलते हैं। जो दबंग या  हठी स्वभाव के निष्ठुर लोग होते हैं वे अक्सर ऐसा ही संवेदनहीन व्यवहार करते हैं। उनके मन में न कोई दया होती है, न सहानुभूति। प्रस्तुत लघुकथा ऐसे ही वाक्या का सुंदर चित्रण है।


2.जंग और सिंदूर की कीमत


  प्रस्तुत लघुकथा असाधारण है। लघुकथा न होकर सुंदर कहानी है। कहानी का अंत भी सुखद है। आत्मविश्वास और भरोसे पर आधारित सैनिक पत्नियों के लिए प्रेरणास्पद है।


3.कन्या पूजन


    मार्मिक लघुकथा है। कोई बनावट नहीं,कोई असत्यता नहीं। यथार्थ। ऐसा हो रहा है।  कन्या भ्रूण को लेकर संक्षिप्त में लिखी लघुकथा में कथाकार की संवेदनशीलता भी निहित है और आक्रोश भी। छटपटाहट भी।


4.दस्तक


   समाज से ऐसे मार्मिक और  यथार्थ दृश्य जब लघुकथा के माध्यम से समाज को लौटाये जाते हैं तो पल भर को विचलित तो करते ही हैं लेकिन संदेश भी देते ही हैं और पाठकों को अपने कर्तव्य एवं दायित्व का एहसास कराने में सफल भी होते हैं। प्रस्तुत लघुकथा का कथ्य स्पष्ट तो है ही , शिल्प से भी प्रभावी है।


5.मुंह पर थप्पड़


   बहुत ही सुंदर लघुकथा। प्रेरक। सकारात्मक विकल्प के साथ। ऐसी लघुकथाओं की समाज को जरूरत होती है। जो हिम्मत भी देती हैं और हौसला भी।

    कुल मिलाकर लघुकथाकार आदरणीय शरद नारायण खरे  की प्रस्तुत लघुकथाएं समाज के बीच की पारिवारिक हिस्से के यथार्थ दृश्य हैं जो पाठकों के लिए केवल किसी घटना का वर्णन नहीं बल्कि वैकल्पिक निष्कर्ष भी हैं। लघुकथाकार के लेखन कौशल को सिद्ध और सार्थक करती हैं।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गिडरवारा - मध्यप्रदेश 

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      पांचों लघुकथा की समीक्षा 


1.असली विकलांग 


प्रस्तुत लघु कथा असली विकलांग  में प्रोफेसर शरद नारायण खरे जी ने एक बहुत ही तंदुरुस्त खट्टे कटे आदमी जो की मानसिक रूप से विकलांग है और एक शारीरिक विकलांग व्यक्ति की सोच को दर्शाते हुए जब वृद्ध महिला बस में बैठने के लिए आती है को दर्शाया है ।असली विकलांग कौन?? समाज से पूरी बस में बैठे लोगों से।


2. जंग और सिंदूर की कीमत


प्रस्तुत लघु कथा "जंग और सिंदूर की कीमत" में प्रोफेसर शरद नारायण खरे जी ने पतिव्रता रीना के अटूट विश्वास और समाज के विरुद्ध अपने विश्वास पर की उसका पति एक दिन वापस जरूर आएगा और वह आया भी सिद्ध करके दिखाया शक्ति और भक्ति में बहुत दम होता है।


3. कन्या पूजन 


प्रस्तुत लघु कथा कन्या पूजन में प्रोफेसर शरद नारायण खरे जी ने 

  करनी और कथनी में फर्क बताते हुए झूठे आडंबरों का खंडन किया है, की किस तरह एक तरफ तो कन्या पूजन और दूसरी तरफ भ्रूण हत्या।



4. दस्तक 


प्रस्तुत लघु कथा "दस्तक* में प्रोफेसर शरद नारायण खरे जी ने एक पिता और पुत्र के बीमारी के समय हुए संवाद के बारे में बताते हुए अतीत में वहीं घटना को याद करते हुए वर्णन किया है _कि माता-पिता क्या-क्या नहीं करते और बच्चे एक बार वही बात होने पर कैसे जुंझला जाते हैं ।


5. मुंह पर थप्पड़ 


प्रस्तुत लघु कथा में प्रोफेसर शरद नारायण खरे जी ने मानसी व जयंत जो की एक प्रेमी व प्रेमिका भी है। पर तब तक जयंत ने आय. ए. एस. नहीं किया था। के रिश्ते के बारे में हुई। बाद में दहेज के रूप में  मां पिता के सामानों की लिस्ट का  मानसी द्वारा खंडन किया गया। जो की एक बहुत ही अच्छा कदम है।इसी बहादुरी की आवश्यकता है।

- अलका जैन आनंदी 

        दिल्ली


       थप्पड़ का हथोड़ा


      प्रो. शरद नारायण खरे जी की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं, नैतिक विडम्बनाओं तथा मूल्य-संकट को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित करती हैं। कथ्य सरल है, परंतु उसके भीतर छिपा सामाजिक संदेश गहरा और चिंतनशील है। प्रत्येक लघुकथा अपने अंतिम बिंदु पर पाठक को भीतर तक झकझोरने की क्षमता रखती है। मेरी विस्तृत राय में कहना चाहता हूॅं कि लेखकों को साधारण लेखन के साथ साथ याचिका लेखन की कला भी आनी चाहिए, ताकि वह माननीय न्यायालय में सिद्ध भी कर सकें , ताकि वह अन्याय करने वालों के मुंह पर न्यायिक थप्पड़ का हथोड़ा भी मार सकें? इसके बावजूद मेरी साधारण राय निम्न प्रकार है :- 


1. “असली विकलांग” 


यह लघुकथा केवल शारीरिक विकलांगता पर नहीं, बल्कि समाज की मानसिक विकलांगता पर तीखा प्रहार करती है। कथानक अत्यंत स्वाभाविक और जीवन से जुड़ा हुआ है। विकलांग लड़के का संवेदनशील व्यवहार और हट्टे-कट्टे व्यक्ति का अमानवीय रवैया समाज के दो विपरीत चरित्रों को सामने लाता है। अंतिम पंक्तियाँ अत्यंत प्रभावशाली हैं और पूरी कथा का नैतिक शिखर बन जाती हैं। यह लघुकथा मानवीय करुणा, संस्कार और सामाजिक संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। 


2. “जंग और सिंदूर की कीमत” 


यह कथा भारतीय नारी के विश्वास, साहस और समर्पण की प्रतीक बनकर सामने आती है। रीना का चरित्र केवल एक पत्नी का नहीं, बल्कि उस भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने पति के कर्तव्य को निजी सुख से ऊपर रखती है। “सिंदूर की ताक़त” को आपने भावनात्मक और प्रतीकात्मक दोनों स्तरों पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। कथा देशभक्ति, वैवाहिक आस्था और मानसिक दृढ़ता का सुंदर संगम है। अंत पाठक के मन में संतोष और गर्व दोनों उत्पन्न करता है। 


3. “कन्या पूजन” 


यह अत्यंत छोटी किंतु अत्यधिक प्रहारक लघुकथा है। धार्मिक आडंबर और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक विडम्बना पर इससे अधिक तीखा व्यंग्य बहुत कम शब्दों में संभव नहीं था। एक ओर कन्या पूजन की श्रद्धा, दूसरी ओर गर्भ में पल रही कन्या की हत्या — यही विरोधाभास कथा की सबसे बड़ी शक्ति है। डॉक्टर का “हतप्रभ” रह जाना वस्तुतः पूरे समाज की अंतरात्मा पर प्रश्नचिह्न है। यह लघुकथा सामाजिक पाखंड पर करारा तमाचा है। 


4. “दस्तक” 


यह लघुकथा भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत मार्मिक है। वृद्धावस्था, उपेक्षा, पीढ़ियों का बदलता व्यवहार और माता-पिता के त्याग को आपने अत्यंत सहजता से चित्रित किया है। अतीत और वर्तमान के बीच का भावनात्मक आवागमन कथा को जीवंत बना देता है। पिता का अंतिम संकल्प कथा को केवल करुणा तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मबल का संदेश भी देता है। यह रचना पारिवारिक संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है। 


5. “मुंह पर थप्पड़” 


यह कथा दहेज-प्रथा और अवसरवादी प्रेम पर तीखा प्रहार करती है। जयंत का चरित्र उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ प्रेम से अधिक महत्व पद, प्रतिष्ठा और लालच को दिया जाता है। वहीं मानसी का आत्मसम्मान और उसका निर्णायक प्रतिरोध कथा की सबसे बड़ी शक्ति है। अंत में उसका यू.पी.एस.सी. की तैयारी में जुट जाना केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि नारी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की घोषणा प्रतीत होता है। यह लघुकथा प्रेरणात्मक प्रभाव छोड़ती है। 


         समग्र टिप्पणी 


इन पाँचों लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें भाषा सरल, संवाद स्वाभाविक और कथानक संक्षिप्त होते हुए भी प्रभाव अत्यंत व्यापक है। हर कथा समाज की किसी न किसी गहरी विसंगति, नैतिक पतन या मानवीय मूल्य को सामने लाती है। कहीं संवेदना है, कहीं व्यंग्य, कहीं करुणा, कहीं प्रतिरोध और कहीं प्रेरणा। यही सफल लघुकथा की पहचान है कि वह कम शब्दों में बड़ा संदेश दे सके — और आपकी ये रचनाएँ इस कसौटी पर खरी उतरती हैं। विशेष रूप से उपरोक्त कथाओं के अंत प्रभावशाली हैं, जो पाठक के मन में देर तक विचारों की दस्तक बनाए रखते हैं। ये लघुकथाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का कार्य भी करती हैं। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर


 सरल-सहज व स्पष्टता से सबक़


शरद नारायण खरे जी की लघुकथाओं की संक्षिप्त समीक्षा -=


(१) असली विकलांग 


दर्द उसे ही समझ आता है जो दर्द झेल रहा होता है।

यही वजह है कि दिव्यांग के दिल में बुज़ुर्ग के प्रति दया थी। असली विकलांग कौन है इसकी भी स्पष्टता हो गई।विकलांगता शारीरिक कम मानसिक अधिक है। सार्थक संदेश देती लघुकथा। 


(२)  जंग और सिंदूर की कीमत 


आर्मी जवानों के जीवन का महत्व दर्शाती मर्मस्पर्शी लघुकथा। एक रात का साथ जीवन भर का उजास।सिंदूर की ताकत का एक और दैवीय चमत्कार। ईश्वर कृपा से ऐसे अकल्पनीय किन्तु सत्य घटनाओं से भारत देश भरा पड़ा है।कर्म का फल हमेशा मीठा होता है। गीता ज्ञान यही है।


(३)  कन्या पूजन 


हे भगवान ! क्या यह भी सम्भव है ? औरत ही औरत की दुश्मन होती है चरितार्थ हो रहा है इस आधुनिक या प्राचीन विचारधारा वाली माँ पर । हृदय विदारक ! दोहरी मानसिकता।विचित्र किन्तु सत्य ।विधि विधान से कन्या पूजन करने वाले कन्या के आगमन से बेचैन।गागर में सागर भरती बेहतरीन लघुकथा।


(४) दस्तक 


अतीत की “ दस्तक” वर्तमान का सहारा व हौसला बुलंद कर गई।कथ्य,शिल्प,प्रस्तुतिकरण सब सटीक । 


(५)   मुँह पर थप्पड़ 


दहेज विरोध का नायाब तरीक़ा। काश! कि लोग साहित्यकारों के ऐसे विचारों को न केवल पढ़ें वरन् अमल में भी लाएँ। ज़रा भी मुश्किल नहीं है। अपने पर भरोसा हो तो यह भीख मांगने की प्रथा बंद हो और बेटी बोझ न लगे। 


शरद नारायण खरे जी की सशक्त लेखनी से परिचित हूँ। बहुत अच्छा लिखते हैं। सरल-सहज व स्पष्टता से सबक़ सिखाती लघुकथाओं के लिए शरद जी को बहुत-बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ ।

- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘ 

      अमेरिका


           दिशा देने का कार्य 


प्रो. शरद नारायण खरे की इन पाँचों लघुकथाओं में समकालीन समाज की विसंगतियाँ, मानवीय संवेदनाएँ, नैतिक प्रश्न और सामाजिक चेतना अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई हैं। लेखक ने अत्यंत सहज भाषा, संवादात्मक शैली और मार्मिक अंत के माध्यम से पाठक के अंतर्मन को झकझोरने का सफल प्रयास किया है।


“असली विकलांग” 


कथा शारीरिक और मानसिक विकलांगता के बीच का गहरा अंतर उजागर करती है। यहाँ बैसाखी के सहारे चलने वाला किशोर संवेदनशीलता और संस्कारों का प्रतीक बन जाता है जबकि शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति मानवीय मूल्यों से रिक्त दिखाई देता है। कथा का अंत अत्यंत प्रभावी है और पाठक को आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है।


“जंग और सिंदूर की कीमत” 


 देशभक्ति, वैवाहिक विश्वास और भारतीय नारी के अटूट समर्पण का सशक्त चित्रण हुआ है। रीना का अपने सिंदूर पर अडिग विश्वास केवल भावुकता नहीं, भारतीय स्त्री-शक्ति की मानसिक दृढ़ता का प्रतीक बनकर उभरता है। कथा राष्ट्रप्रेम और वैवाहिक निष्ठा का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है।


“कन्या पूजन” 


अत्यंत तीखी सामाजिक विडम्बना पर प्रहार करती है। एक ओर नवरात्रि में कन्या पूजन की आस्था और दूसरी ओर गर्भस्थ कन्या की हत्या—यह दोहरा चरित्र समाज की भयावह मानसिकता को उजागर करता है। लघुकथा का संक्षिप्त किंतु धारदार अंत इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।


“दस्तक” 


वृद्धावस्था की पीड़ा और बदलते पारिवारिक मूल्यों का अत्यंत भावुक चित्र प्रस्तुत करती है। पिता की स्मृतियों के माध्यम से लेखक ने पीढ़ियों के व्यवहारिक परिवर्तन को बड़ी संवेदनशीलता से उकेरा है। कथा का आत्मसंवाद पाठक के मन में गहरी करुणा और आत्मचिंतन उत्पन्न करता है।


“मुँह पर थप्पड़” 


दहेज प्रथा और अवसरवादी प्रेम पर करारा प्रहार है। मानसी का आत्मसम्मान और उसका दृढ़ निर्णय आधुनिक नारी चेतना का प्रतीक बनकर सामने आता है। कथा यह संदेश देती है कि प्रेम यदि स्वार्थ और लालच पर आधारित हो जाए तो उसका अंत होना ही उचित है।


समग्रतः ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। लेखक ने कम शब्दों में गहरी बात कहने की कला का सफल निर्वाह किया है। कथानकों की सादगी, संवादों की स्वाभाविकता और अंत की प्रभावशीलता पाठक को लंबे समय तक सोचने के लिए विवश करती है। ये लघुकथाएँ समाज को दिशा देने का कार्य भी करती हैं।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान



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        लघुकथाओं पर मेरे विचार 


'असली विक्लांग'


एकदम सत्य है। शरीर से विकलांग व्यक्ति यदि सोच से स्वस्थ है तो वह समाज के प्रति अपने दायित्व को बाखूबी निभाएगा। लोगों का मार्गदर्शन  करती बहुत सुंदर  लघुकथा।


'जंग और सिन्दूर की कीमत'


इस लघुकथा में घटना का आभाव दिखाई  देता है।


'कन्या पूजन'


मूर्ति के प्रति गहरी आस्था और कोख में पलती कन्या की हत्या। दोहरी मानसिकता से समाज निजात  नहीं पा रहा है। लिंग भेद गहरी जड़ जमाए हुए है। ऐसी लघुकथाओं से जागरूकता आएगी।


'दस्तक'


  आज-कल बच्चे माता-पिता की सेवा नहीं करना चाहते हैं।एक  पिता पुत्र के व्यवहार  की वजह  से आहत है। खुद  का खुद  ही सहारा बनने का निर्णय  लेता है। हौंसला जीवन  की डोर  है। लेकिन  बच्चों को सही राह पर लाने के लिए कठोर दण्ड  की आवश्यकता है ।


'मुंह पर थप्पड़ '


दहेज  जैसे नासूर  को खत्म  करने के लिए नायिका का सही कदम। नव युवकों के आत्मसम्मान  को झकझोरती अच्छी लघुकथा।

- कमला अग्रवाल 

गाजियाबाद - उत्तर प्रदेश 

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Comments

  1. प्रोफेसर शरद नारायण खरे की शानदार लघुकथाएं वास्तव में पाठकों को अभिभूत करती हुई और समाज की खामियों पर गहरी चोट करती हुई समाज को बदलाव की तरफ ले जाने की नयी आशा जगाने में समक्ष ये लघुकथाएं है।
    - हीरा सिंह कौशल गांव व डाकखाना महादेव तहसील सुंदरनगर जिला मंडी हिमाचल प्रदेश मोबाइल 9418144751
    (WhatsApp से साभार)

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  2. एक विकलांग लड़के और वृद्ध महिला के माध्यम से सीट सहभागी करने का विचार, मानवीयता का संदेश देता है। जबकि स्वस्थ व्यक्ति की उस पर मनाही उसकी अनैतिक प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है। जिसे मानसिक विकलांगता का पर्याय मानते हुए असली विकलांग बताया जाना, बहुत उचित,सटीक शीर्षक के साथ सुंदर संदेश प्रद लघुकथा
    - गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
    नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
    (WhatsApp से साभार)

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