बहरामजी मालाबारी की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
इंसान बनने के लिए सर्वप्रथम हमें अपने ईगो (मैं ) की भावना का त्याग करना होगा। ईगो के आते ही हम स्वार्थ , ईर्ष्या , क्रोध , असंतोष , लालच इत्यादि से घिर कर दूसरे के प्रति दया, करुणा, सेवा जैसे मानवीय भाव कर्मों से दूर हो जाते हैं और अति होने पर जानवर या फिर राक्षस बन जाते हैं । अतः सत्मार्ग इंसान का है जिसके लिए काम, क्रोध ,लोभ बढ़ाने वाली कामनाओं की उपज स्थली मन को संयमित करते हुए त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करके एक सच्चे इंसान बनते हैं । फिर यही सब कर्मों के केंद्र में ईश्वर को साक्षी कर्ता मानें और स्वयं को केवल माध्यम । गीता में भगवान कृष्ण ने इसी प्रकार के कर्म कर्ता को श्रेष्ठ माना है। इंसान निष्काम कर्मों से भगवान तुल्य माना जाता है ।लोग कहने लगते हैं ,अरे वह इंसान तो भगवान का ही रूप बनाकर अवतरित हुआ है। अतः अहम् का त्याग और 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन' इंसान इन भाव कर्मों में ही ईश्वर का सगुण अवतार है।
- डाॅ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
अगर त्याग और कर्म की बात करें,तो कर्म जीवन का अधार है तो त्याग इसका सार है जबकि सच्चा त्याग कर्म को छोड़ना नहीं बल्कि अंहकार और फल की आसक्ति को छोड़ना है यही नहीं निष्काम कर्म ही वास्तविक में त्याग है जो मनुष्य को बंधन से मुक्त कर परम शांति की और ले जाता है यह सत्य है कि कर्म करना मनुष्य के हाथ में है लेकिन उसके परिणाम पर हमारा नियंत्रण नहीं है इसलिए फल की इच्छा न करते हुए कर्म करना ही असली त्याग है तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि त्याग से इंसान बनता है और कर्म से भगवान बनता है, मेरा मानना है कि जब इंसानअपने स्वार्थ, लालच और बुरी आदतों का त्याग करता है तब वह एक बेहतर इंसान और समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बनता है इसके अतिरिक्त जब इंसान निस्वार्थ भाव से समाज की भलाई, जनकल्याण और अपने कर्तव्यों का पालन पुरी लगन से करता है तब उसके महान कर्म ही उसे भगवान का दर्जा दिलाते हैं वास्तव में त्याग और कर्म ही मनुष्य के चरित्र का निर्माण करते हैं और उसे महानता के शिखर पर ले जाते है यह अटूट सत्य है कि निष्काम भाव से किया गया कर्म ही व्यक्ति को कर्मयोगी बनाता है तथा स्वार्थ, अंहकार और वासना का त्याग ही मनुष्य को पशु प्रवृत्ति से ऊपर उठाकर देवत्व की तरफ ले चलते हैं जब भी कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ से उपर उठकर निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करता है तो वोही सधारण मानव भगवान के समान पूजनिय बन जाता है कहने का भाव त्याग और कर्म का संतुलन ही जीवन को सार्थक बनाता है, आखिरकार यही रहुँगा कि त्याग और कर्म ही मनुष्य को सच्चा योगी और श्रेष्ठ मानव बनाते हैं यह दोनों मिलकर जीवन में संतुलन, आंतरिक शांति और उदेश्य की सार्थकता तय करते हैं अगर देखा जाए कर्म ही मनुष्य का धर्म और कर्तव्य है क्योंकि कर्म के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती तथा त्याग का मतलब घर परिवार को त्यागना नहीं होता बल्कि अपने कर्मों के फल यानि अंहकार, लालच और आसक्ति का त्याग करना है जिसका अर्थ है निष्काम कर्म करना, कहने का भाव त्याग और कर्म मिल कर मनुष्य को एक श्रेष्ठ चरित्रवान और महान व्यक्ति बनाते हैं जबकि कर्म जीवन की आधारशिला है जो हमें कर्त्तव्य का बोध कराता है और त्याग उस कर्म में से स्वार्थ को मिटाकर उसे पवित्र बनाता है इसलिए यह सत्य है कि त्याग से इंसान बनता है और कर्म से भगवान बनता है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
त्याग से इंसान बनता है, कर्म से भगवान बनता है... सुंदर विषय...! यह आध्यात्मिक विचार है जो हमें आध्यात्म की ओर ले जाता है। व्यक्ति की महानता उसके उच्च ओहदे अथवा उसके वैभव से नहीं आंँकी जाती बल्कि उसके त्याग और कर्म से जानी जाती है। त्याग वह भावना है जिसमें व्यक्ति दूसरे का भला पहले सोचता है, बाद में अपनी। जब व्यक्ति अपने अहंकार, स्वार्थ और लालच का त्याग कर दूसरे के सुख, भलाई एवं कल्याण के लिए नि:स्वार्थ सोचता है तब वह इंसान बनता है। हमारे माता-पिता अपने बच्चों के लिए, सैनिक देश के लिए त्याग करते हैं वहीं संत-महात्मा समाज कल्याण के लिए अपना सर्वस्व त्याग देते हैं। त्याग मनुष्य को करूणा से भरता है और सहनशील बनाता है उनके इसी गुणों से वह इंसान बनता है। रही कर्म की बात तो हमारे श्रेष्ठ कर्म ही हमें महान बनाते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने भी कर्म को प्रधानता दी है। जब व्यक्ति किसी के लिए, अथवा समाज के लिए सत्य, सेवा, दया, परोपकार के मार्ग पर चलकर निःस्वार्थ भाव से काम करता हैं तो लोग उसे भगवान की तरह पूजने लगते हैं। उनके हृदय में वह भगवान का स्थान ले लेता है। बड़े बड़े महापुरुष तो ठीक श्रीराम, और कृष्ण भी अपने श्रेष्ठ कर्म की वजह से ही लोगों के हृदय में भगवान के रूप में बस गये। मनुष्य जन्म में (दुनिया के लिए वह ईश्वर का अवतार है यही सत्य है)
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
जीवन यूँ ही जीने-मरने का नाम नहीं है। जीवन खुद भी सुकून से जीने और दूसरों को भी सुकून से जीने में सहायक बनने के लिए भी है। जीवन में जिसने अपने नैतिक दायित्वों और कर्तव्यों को न केवल समझ लिया बल्कि निभा भी लिया, वास्तव में वही सफल है, वही योग्य है और जीवन उसी ने जिया है। जीवन का यही सूत्र है और यही मर्म भी और यह कठिन भी नहीं और न ही असंभव। यह सहज भी है, सरल भी और सरस भी। बस, इच्छा शक्ति दृढ़ होना चाहिए। प्रेम और त्याग आना चाहिए। लोभ,स्वार्थ और घृणा नहीं होना चाहिए यानी कि सकारात्मक सोच से हम इंसानियत की ओर बढ़ते हैं और इनमें कमी होने पर संघर्ष की ओर। इन सब गुण और दुर्गुण में त्याग श्रेष्ठ है। त्याग से हम सहयोग बनते है, हितैषी बनते हैं, सार में कहा जावे तो इंसान बनते हैं और इसके बाद हमारे सत्कर्म हमारा सौभाग्य बनाते हैं। महान बनाते हैं। ऊँचाईयों पर ले जाते हैं, किंवा भगवान का दर्जा भी दिलाने का माजरा रखते हैं।अत: त्यागी बनना और सत्कर्म करना ही हमारा ध्येय होना चाहिए।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
यह विचार—“त्याग से इंसान बनता है, कर्म से भगवान बनता है-”बहुत गहरा हैं।एक विचारधारा कहती है कि मनुष्य जन्म से नहीं अपने आचरण से “मनुष्य” बनता है। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ को थोड़ा पीछे रखकर दूसरों के लिए सोचता है तब उसमें “त्याग” जन्म लेता है। त्याग का अर्थ केवल वस्तु छोड़ना नहीं है अपितु अहंकार, लोभ और केवल “मैं” की भावना को कम करना है। जब इंसान किसी जरूरतमंद के लिए अपनी सुविधा छोड़ देता है, किसी दुखी के लिए अपने सुख को थोड़ा कम कर देता है तब वह सच्चे अर्थों में मानवता के स्तर पर पहुँचता है। इसलिए कहा जा सकता है कि त्याग ही मानवता की नींव है। दूसरी ओर “कर्म से भगवान बनता है” यह कथन कर्म के सर्वोच्च स्वरूप की ओर संकेत करता है। जब व्यक्ति अपने कर्म को केवल कर्तव्य नहीं प्रत्युत सेवा और कल्याण का माध्यम बना देता है तब उसका कर्म साधारण नहीं रहता। वह कर्म लोकहित, सत्य और धर्म से जुड़ जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने कार्यों से दूसरों का जीवन बदल देता है। उसे किसी पद या पहचान की आवश्यकता नहीं रहती, उसके कर्म ही उसे महान बना देते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में भी कहा गया है,“कर्म ही पूजा है।” कुछ लोग इस विचार को आध्यात्मिक दृष्टि से देखते हैं और कहते हैं कि त्याग व्यक्ति को भीतर से शुद्ध करता है, जबकि निष्काम कर्म उसे उच्च चेतना की ओर ले जाते है। त्याग से अहं समाप्त होता है और जब अहं समाप्त होता है तभी कर्म शुद्ध बनते है। शुद्ध कर्म ही व्यक्ति को “देवत्व” की ओर ले जाते है। यहां एक सामाजिक दृष्टिकोण यह भी है कि यदि समाज में लोग त्याग और कर्म दोनों को समझ लें तो रिश्तों में स्वार्थ कम होगा और सेवा की भावना बढ़ेगी। त्याग मानव को संवेदनशील बनाते है और कर्म उसे सक्रिय व जिम्मेदार बनाते है। दोनों मिलकर एक संतुलित और आदर्श समाज की रचना करते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है—क्या केवल त्याग से ही इंसान बनते है? क्या केवल कर्म से ही कोई “भगवान” बन सकता है? इसका उत्तर यह है कि यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। त्याग बिना कर्म के अधूरा है और कर्म बिना त्याग स्वार्थपूर्ण हो सकता है। अंततः निष्कर्ष यही निकलता है कि त्याग हमें “मानवता” सिखाते है और शुद्ध कर्म हमें “देवत्व” की ओर ले जाते है। इसलिए जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल जीना नहीं अपितु ऐसा जीवन जीना जिसमें त्याग भी हो और कर्म भी ताकि मनुष्य केवल जीव न रहकर एक जागरूक, संवेदनशील और ऊँचे स्तर का व्यक्तित्व बन सके।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
त्याग से इंसान बनता है, कर्म से भगवान बनता है. इंसान तो सभी हैं. चाहे त्याग कीजिए या न कीजिए. त्याग से लोग महान बनते हैं. त्याग से लोग भगवान बनते हैं.क्या महर्षि दधीचि त्याग से पहले इंसान नहीं थे. वो पहले इंसान ही थे. त्याग कर महान बने. त्याग तो पेड़-पौधे भी करते हैं. तो क्या वह इंसान कहलाएंगे? नहीं. त्याग से उच्च दर्जा प्राप्त किया जा सकता है. कर्म से भाग्य बनता है. कर्म से भगवान बन सकता है. अच्छे कर्मों के द्वारा इंसान ही भगवान बन सकता है. लेकिन इसमें भाग्य का भी हाथ होता है. पहाड़ के एक ही टुकड़े से काटा गया मार्बल का एक टुकड़ा पूजा घर में लगता है और एक टुकड़ा बाथरूम में लगता है. यहाँ पर कौन बड़ा हुआ. बड़ा तो भाग्य ही हुआ न. पूजा घर में लगने वाला टुकड़ा कौन सा अच्छा काम किया था या बाथरूम में लगानेवाला कौन सा गलत काम किया था. बता सकता है कोई? हाँ हमारे कर्म अच्छे होने चाहिए. बस. लोग भगवान कहने लगेंगे.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
जीवन का आधार सत्कर्म वर्चस्व त्याग की निर्मल धारा से प्रवाहित हो अभिमान होता हैं! इंसान का असली बड़प्पन लेने में नहीं, देने में है। जब आप अपने स्वार्थ, अहंकार, आराम का त्याग करते हैं तभी आप दूसरों के लिए उपयोगी समाज परिवार बनते हैं। वस्तुतः इंसान भाव "कर्म से भगवान बनता है" अच्छे कर्म करने वाले इंसान में ही प्रकट होता है। निस्वार्थ कर्म, सेवा, परोपकार ही मनुष्य को देवत्व तक ले जाता है। धर्म स्थल किसी से अपवित्र नहीं होते । भ्रांतियाँ पाल मानसिकता अपवित्र होती है !जो कर्म से भगवान बनता हैं उससे ही लगाव होता है ,जो सूरत से ज़्यादा सीरत से क़रीब होते हैजिसकी भरपाई दिल के क़रीब होती ज्ञानदीप जला अन्धकार भगा रौशनी होती है बोधि वृक्ष बन शजर झुर्मठ प्रेम स्नेह बढ़ाते है घर धर्मस्थल किसी से अपवित्र नहीं होते है !सच्चाई वेग प्रवाह सत्कर्म का फ़र्ज़ निभाते है ! मद क्रोध त्याग मानवता का कर्ज चुकाते है घर धर्म स्थल की पवित्रता को बरकरार रखत ,शांति की अपील करते है मानवता की अपील कर राहे सुगम बनाते है संस्कार ही मानवता की कुंजी और पूँजी है स्वस्थ समाज व्यवहार मानवता का दर्पण है जीवन दर्शन वो दर्पण होता है स्वस्थ समाज मानवता व्यवहार के। उस दर्पण में दरार ना हो क्योंकि संस्कार ही मानवता की कुंजी और पूँजी है ।कर्म त्याग से देवत्व मिलता है" कर्म से मनुष्य देव बनता है"। पहली में व्यक्तित्व की बात है, दूसरी में उद्देश्य की। । ये पंक्तियाँ उनके सम्मान में भी हैं और युवाओं के लिए प्रेरणा भी।
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
बेहरामजी मलाबारी जी की स्मृति में प्रस्तुत की गई पंक्ति अर्थात “त्याग से इंसान बनता है, कर्म से भगवान बनता है।” संक्षिप्त होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली और दार्शनिक भाव लिए हुए है। इसमें भारतीय जीवन-दर्शन, कर्मयोग और मानवीय आदर्शों का सार निहित दिखाई देता है। “त्याग” को मनुष्यत्व की आधारशिला तथा “कर्म” को ईश्वरतुल्य ऊँचाई तक पहुँचने का माध्यम बताकर उन्होंने जीवन के नैतिक उत्कर्ष को सरल भाषा में व्यक्त किया है। यह पंक्ति विशेष रूप से बेहरामजी मलाबारी जैसे समाज-सुधारक व्यक्तित्व की स्मृति के अनुरूप है, क्योंकि उनका जीवन सामाजिक सुधार, नारी अधिकारों और मानवता के लिए समर्पित कर्म का उदाहरण था। भाषा सरल, स्मरणीय और जनमानस को प्रेरित करने वाली है और यही उन्हें हमारी ओर से श्रद्धांजलि है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
कोई भी व्यक्ति जो अपने लिए जीता है, अपने ही स्वार्थ के लिए कार्य करता है उसे इंसान नहीं कहा जाता।कहते हैं जो दूसरों के हित में कार्य करता है, जो हमेशा त्याग समर्पण भाव से काम करता है उसे ही सही इंसान कहा जाता है। त्याग की भावना सर्वोपरि है। त्याग से ही मनुष्य महान बनता है। जो औरों के लिए जीता है वही सही शब्दों में इंसान है। अपने लिए तो जानवर भी पेट भरते हैं। पशु पक्षी, जीव जंतु , कीट पतंगे सभी अपना पेट भरते हैं लेकिन एक मनुष्य ही ऐसा जीव है जो पहले औरों को दे कर फिर स्वयं खाता है। जो औरों के पेट भरने में औरों की भलाई में, त्याग में और अपने लिए थोड़े में भी जी लेता है वही सही शब्दों में इंसान है क्योंकि त्याग से ही इंसान बनता है। त्याग भाव में जीने का आनंद ही कुछ और है। त्याग भाव औरों को तो प्रसन्न करता ही है उसमें स्वयं को भी प्रसन्नता मिलती है। जब हम किसी चीज़ का त्याग करते हैं तो राजा की तरह जीते हैं। वस्तुओं का त्याग करने में ही प्रसन्नता है। जब व्यक्ति अपनी आवश्यकता अनुसार चीज़ को लेता हैं और त्याग भाव से काम करता है तभी पूरे जगत में उसकी ख्याति फैलती है जो औरों के लिए जीता है अच्छे कर्म करता है जिसमें अच्छे गुण हों, उसी की दुनिया में जय जय कार होती है क्योंकि दुनिया में व्यक्ति की नहीं गुणों की पूजा की होती है कर्मों से ही व्यक्ति छोटा होता है कर्मों से ही व्यक्ति उच्च कोटि की योनि में जन्म लेता है। कर्म ही व्यक्ति की असली पहचान बनते हैं। कर्म ही मनुष्य को इंसान बनाता है कर्म ही भगवान बनाता है। इस धरा पर जितने भी मनुष्यों ने जन्म लिया, जिनकी भी पूजा की गई, जिनका नाम सुनहरी अक्षरों में अंकित हुआ उनके कर्मों के कारण ही हुआ। कर्मों से ही वे भगवान माने गए।
- डॉ. संतोष गर्ग 'तोष'
पंचकूला - हरियाणा
त्याग अतुल्य कर्म है। सच है कि त्याग की भावना ही इंसान को इंसानियत सिखाती है। त्याग की आदत ही इंसान को समाज में मान सम्मान दिलाती है। युगों युगों से त्याग की महिमा सुनते पढते आ रहे हैं। राम के त्याग ने रामायण जैसा ग्रंथ और अलौकिक दिशाएं दीं। हर युग में प्रासंगिक है रामायण और राम। ऐसा ग्रंथ न भूतो न भविष्यति मिला है न मिलेगा। सचमुच त्याग से ही इंसान है अन्यथा कलियुग में हैवानियत का बोलबाला है - -। ये ब्रम्हांड का सबसे बड़ा सच है कि कर्म करने से इंसान भगवान बनने की राह पर चल निकलता है। जरूरत इस बात की है कि कर्म की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा की पहचान हो। आपके कर्म यदि समाजकंटकों को सहारा देने वाले हैं तो वे कभी स्वागत योग्य नहीं हैं। ऐसे कर्म भगवान कौ भी पसंद नहीं आते। यहाँ तक कि प्रकृति भी ऐसे कर्मों का स्वागत नहीं करती। प्राकृतिक आपदाएं शैतानी कर्म करनेवालों को दंड देती हैं लेकिन ये भी सच है कि इसमें गेहूं के साथ घुन भी पिस जाते हैं और निरपराध भी उन कर्मों की सजा पा लेते हैं - - जो उन्होंने नहीं किये होते हैं। खैर आज के दौर में भगवान बनना दूर की बात है - - इंसान इंसान ही बना रहे तो बनने को और कुछ नहीं रहता। त्याग करने के लिये ईश्वरत्व को अपने भीतर धारण करना होता है - - तभी इंसान बने रह सकते हैं। त्याग कर्म, इंसान, इंसानियत - - इतने बड़े बड़े शब्द आज लोगों को डराने लगे हैं। दो जून की रोटी कमाने के चक्कर में हर व्यक्ति परेशान है - - कर्म और कर्तव्य की दौड़ में शामिल है। अतः उचित है कि इस कलियुगी कलयुग में इंसान इंसान ही बना रहे - - बस ।।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
" मेरी दृष्टि में " त्याग वह कर्म है। जो आपको भगवान तक बना सकता है। ऐसा रामायण में राम को देखा जा सकता है। त्याग से ही भगवान कहलायें है। ऐसा हर कोई इंसान नहीं कर सकता है। कर्म ही सब कुछ है। बाकि कुछ भी नहीं है।
सादर धन्यवाद बहुत-बहुत बधाई आदरणीय बीजेंद्र जैमिनी जी 🙏💐😊
ReplyDelete