सुमित्रानंदन पंत की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

       अधूरा ज्ञान व‌ अधूरा कर्म कभी भी खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसे में अधूरेपन से बचना चाहिए। तभी सार्थक जीवन की कामना कर सकते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        सुमित्रानंदन पंत की स्मृति में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मनुष्य के जीवन में अधूरा ज्ञान सबसे अधिक घातक सिद्ध होता है, क्योंकि आधी-अधूरी जानकारी व्यक्ति को सत्य से दूर ले जाकर भ्रम, अहंकार और गलत निर्णयों की ओर धकेल सकती है। इतिहास और समाज इस बात के साक्षी हैं कि जब ज्ञान विवेक, अनुभव और पूर्ण अध्ययन से रहित हो जाता है, तब वह निर्माण के स्थान पर विनाश का कारण बनता है। इसी प्रकार अधूरा कार्य भी कभी वास्तविक सफलता तक नहीं पहुंचता, क्योंकि बिना पूर्ण समर्पण, धैर्य और निरंतरता के किया गया प्रयास बीच मार्ग में ही अपनी सार्थकता खो देता है। प्रकृति का प्रत्येक नियम पूर्णता, संतुलन और निरंतर कर्म का संदेश देता है, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह ज्ञान प्राप्ति में गहराई, सत्य और समझ को महत्व दे तथा अपने कार्यों को ईमानदारी और दृढ़ संकल्प के साथ पूर्णता तक पहुंचाए। वास्तव में पूर्ण ज्ञान और पूर्ण कर्म ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का आधार बन सकते हैं। यही मेरी राय और उन्हें मेरी ओर से सादर श्रद्धांजलि भी है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर

      अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है, अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता है....यह विचारोत्तेजक कथन हैं... कहते हैं ना ... 'अधजल गगरी छलकते जाये'  यानी गगरी जो पानी से पूरी भरी हो तो वह शांत रहती है किंतु आधी गगरी उछल उछल कर बताती है कि मैं पानी से भरी हूंँ  अर्थात अहंकार से भरी होती है उसी तरह अधूरा ज्ञान भी हमें भ्रम में रखता है। हमारा आत्मविश्वास कमजोर कर देता है। व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता। आधा ज्ञान हमें गलत दिशा की ओर ले जाता है। पूर्ण ज्ञान के लिए गहरे चिंतन और अनुभव की जरूरत होती है।  यदि एक शिक्षक है वह  स्वयं पूर्ण शिक्षित नहीं है तो विद्यार्थी को क्या ज्ञान दे पाएगा। उसे पूर्ण शिक्षा का ज्ञान होना जरूरी है । उसी तरह किसी भी कार्य का निर्णय लेने से पहले व्यक्ति को उसकी सही जानकारी होनी चाहिए। वर्ना काम अधूरा रह जाता है । धैर्य, विश्वास एवं काम की पूरी जानकारी हो तो वह अपना काम पूर्ण करने में अवश्य सफल होता है। जीवन में ज्ञान और कर्म का विशेष स्थान होता है।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

     अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है और अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता. इसलिए कहा गया है कि नीम हकीम खतरे जान. लिटिल नॉलेज इज़ डेंजरस. इत्यादि इत्यादि. किसी भी चीज़ का कम ज्ञान होना खतरनाक ही होता है. गाड़ी चलाने का ज्ञान अगर कम हो तो वह कहीं जाकर गाड़ी धक्का ही मार देगा. उसी तरह ये बात हर क्षेत्र में लागू होती है. इसलिए ही कहा गया है कि अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है. अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता. यह बात भी पूर्णतया सत्य है. मैं स्वयं इसका भुक्तभोगी हूँ. कई काम है जो अधूरा छुट गया है तो छुटा ही है. काम तो काम है यदि आप कुछ लिखते हैं और वह अधुरा  छुट जाता है तो वह छुटा ही रह जाता है. चाहे वह कविता हो, कहानी हो, कोई लेख हो या कोई विचार हो. उसे संग'संग पूरा करने पर ही पूर्ण होता है. आधा अधुरा छोड़ने पर विचार ही बदल जाते हैं. वह विचार आते ही नहीं है जो आपने पहले शुरू किया था. दूसरा उससे अच्छा हो जाएगा पर वह नहीं हो पाएगा. इसलिए कहा जाता है कि अधूरा काम पूरा नहीं होता है.

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

       अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है क्योंकि आधे ज्ञान के आधार पर लोग अपना दृष्टिकोण तय करके वो धारणाएं बना लेते हैं , जो शायद पूर्ण ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात बदल सकती थी ! पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के पहले प्रतिक्रिया देना , गलत फैसलों को जन्म देता है, व हानिकारक और घातक भी सिद्ध हो सकता है !! अधूरा ज्ञान किसी भी दृष्टि से सही नहीं होता , अतः पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना , अत्यंत अनिवार्य है, किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए ! काम करते करते जब हम किसी भी परिस्थिति वश अधूरा छोड़ देते हैं , तो वह फिर पूरा नहीं होता !! इसलिए प्रारंभ किया हुआ कार्य हमें पूरा कर ही लेना चाहिए , समय रहते !!  ठान लिया तो पूर्ण करो , शुरू किया हुआ काम ! नहीं तो प्रकृति अवश्य लेगी , अपना निश्चित इंतकाम!! अधूरे ज्ञान पर एक पंक्ति ...। अधजल गगरी, छलकत जाए !!

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

       हम नहीं चाहते हुए भी अधूरा काम छोड़कर चले जाते। अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है, अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता है। जीवन प्रसंग में यही होता आ रहा है। इसलिए कहा जाता है, ज्ञान को हमेशा पूर्ण करते जाईए, अन्यथा खतरनाक साबित हो जाता है, हम कोशिश तो बहुत करते है, लक्ष्य निर्धारित करते है, जिसके तहत सोचे हुए हर, जीवन के अंतिम क्षणों तक पूर्ण कर दें। लेकिन होते नहीं, क्योंकि जीवन में अनेकों ऐसी-ऐसी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से घटित होने के परिप्रेक्ष्य में, हम अपने लक्ष्य से भटक जाते है, जब अच्छा समय आता है, तब तक काफी देर हो जाती है.....!

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

     यह पूर्णत सच है कि आज की परिचर्चा का विषय देखा जाए तो सदियों से आज तक प्रभावकारी  हैं जो कि लोगों को प्रेरणा एवम दिशा भी देता है। इस संदर्भ में यह लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है और मायने भी  रखती है कि-- "अधजल गगरी छलकत जाए" यानी आधा भरा घड़ा लेकर चलते समय उसका पानी बहुत छलक छलक कर बाहर गिरता रहता है तथा टप टप की आवाज भी करता है । परंतु जल से पूरा भरा घड़ा छलकेगा नहीं बल्कि शांत रहता है। घड़ा पकड़ने वाले को भी सुकून रहता है। ऐसे ही जिस किसी भी व्यक्ति के पास अधूरा ज्ञान, धन और गुण होते हैं वह अधिकतर खतरनाक परिणाम पर पहुंचते हैं या दूसरे को भी पहुंचा देते हैं क्योंकि अध कचरे ज्ञान से युक्त व्यक्ति स्वयं भ्रमित हो जाता है कभी-कभी तो अपने इस अपूर्ण ज्ञान को समझने की भूल करके कि मैं सर्वज्ञ हूं से स्वयं को ही धोखा देने लगता है। दूसरे के समक्ष ज्ञानी होने का दिखावा करके उसे भी आधी अधूरी जानकारी देकर अपने को बड़ा योग्य सलाहकार मानता है। जबकि इससे उसका स्वयं व दूसरे का भी नुकसान हो जाता है। वर्तमान समय में व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सजग होकर बुद्धिमानी ,विवेक तथा कार्य के परिणाम पर पूरी जानकारी रख लेना उचित है अन्यथा अधूरे ज्ञान से समय श्रम तो नष्ट होगा ही। कोई कार्य पूरी तरह सफल व संपन्न भी नहीं होगा । वह व्यक्ति संदेहास्पद , हास्यास्पद को प्राप्त करेगा।

-  डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     ज्ञान का आधार शिक्षा है। एक-एक पायदान चढ़ते हुए आगे बढ़ते हैं। प्रायमरी, माध्यमिक फिर उच्चतर और फिर महाविद्यालयीन । इस तरह शिक्षा ग्रहण करने का मनोवैज्ञानिक मस्तिष्क क्षमता के तहत क्रम बनाया गया है ताकि हम अपने बौद्धिक स्तर को तदनानुसार  समृद्ध और सामर्थ्यवान बना सकें। हमारी  शिक्षा इस क्रम से होगी तो निश्चित ही अपनी उम्र के समकक्ष शिक्षित होने के साथ-साथ  ज्ञानवान भी होते चलेंगे और बौद्धिक स्तर पर सामर्थ्यवान भी होंगे।कहते हैं ज्ञान का भंडार विशाल है, अनंत है। इसलिए हमारी यह स्वयं के लिए जिम्मेदारी है कि हम जो भी ज्ञान अर्जन करें यानी जिस विषय में ज्ञान अर्जन कर रहे हैं, वह पूरा हो। पूरे होने पर ही उससे संबंधित सभी पहलूओं की हममें समझ होगी। जानकारी होगी।  अधूरेपन में हम किसी महत्वपूर्ण जानकारी और सावधानी से वंचित रह जायेंगे   जिससे हमसे कार्यान्वयन के समय कोई चूक हो सकती है, जिसका खतरनाक अंजाम हो सकता है। इसी तरह हमारे किये जाने वाले कार्य हैं। हम जब कोई काम करना शुरु करते हैं तो हमें उसके पूरा होने के बाद ही दूसरे काम को हाथ में लेना चाहिए। क्योंकि एक से अधिक काम होने से हम पहले वाले काम को पूरा करने में मन को  स्थिर नहीं रख पाते और  काम  पूरे मनोबल से नहीं हो पाता इससे वह काम अधूरा ही रह जाता है।  सार यही कि ज्ञान हो या काम, पूरे मनोबल,रुचि और समर्पित भाव से करें और पूरा करें। तभी सार्थकता होगी।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     अधूरा ज्ञान अक्सर मनुष्य को वहाँ ले जाकर खड़ा कर देता है, जहाँ उसे लगता है कि वह सब जान चुका है, जबकि सच यह होता है कि उसने केवल सतह को छुआ होता है। यही अधूरापन सबसे अधिक खतरनाक होता है।क्योंकि अज्ञान व्यक्ति सीखने का प्रयास करता है, पर आधा ज्ञानी स्वयं को पूर्ण समझने लगता है। जीवन में अनेक भ्रम, विवाद और गलत निर्णयों की जड़ यही अधूरा ज्ञान है। थोड़ी-सी जानकारी मनुष्य के भीतर अहंकार भर देती है और फिर वह बिना गहराई जाने हर विषय पर निर्णय देने लगता है। जैसे आधी पढ़ी हुई पुस्तक कहानी का सत्य नहीं बता सकती, वैसे ही अधूरा ज्ञान जीवन का सही मार्ग नहीं दिखा सकता। इसी प्रकार अधूरा काम भी मनुष्य के व्यक्तित्व की अस्थिरता को प्रकट करता है। जो लोग उत्साह में शुरुआत तो कर देते हैं, पर कठिनाइयों के आते ही रुक जाते हैं, वे मंज़िल तक कभी नहीं पहुँच पाते। बीज यदि आधा मिट्टी में दबे और आधा बाहर रह जाए, तो वह वृक्ष नहीं बन सकता। नदी यदि बीच रास्ते रुक जाए, तो सागर तक नहीं पहुँचती।‌पूर्णता ही जीवन का सौंदर्य है।चाहे ज्ञान हो, संबंध हों या कर्म— हर चीज़ अपनी सम्पूर्णता में ही अर्थ पाती है। अधूरी समझ अक्सर भ्रम पैदा करती है और अधूरा प्रयास केवल पछतावा। इसलिए जीवन में केवल आरंभ करना पर्याप्त नहीं, अंत तक टिके रहना भी आवश्यक है। और केवल सुन लेना ज्ञान नहीं, उसे समझना, परखना और आत्मसात करना ही सच्चा ज्ञान है।

 - अलका पांडेय

 मुंबई - महाराष्ट्र 

         अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता" — बिल्कुल सटीक बात कही आपने।

अधूरा ज्ञान खतरनाक क्यों?

   आधा सच, पूरे झूठ से ज़्यादा भ्रम फैलाता है। डॉक्टर अधूरा ज्ञान रखे तो जान ले ले, ड्राइवर को आधा रास्ता पता हो तो हादसा कर दे। अधूरे ज्ञान वाला इंसान आत्मविश्वास से गलत बात करता है, और वही सबसे बड़ा खतरा है। जैसे किसी ने कहा था — "नीम हकीम खतरा-ए-जान"। ज्ञान का घमंड तभी आता है जब ज्ञान अधूरा हो। पूरा ज्ञान तो विनम्र बना देता है।

अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता

   जो काम बीच में छूट जाए, वो दिमाग में बोझ बनकर बैठ जाता है। आज टाला, कल टाला, फिर वो "कल" कभी नहीं आता। अधूरे काम दरअसल पूरे हुए कामों से ज़्यादा ऊर्जा खाते हैं। एक कहावत है — "जो काम शुरू किया है उसे खत्म करो, वरना वो तुम्हें खत्म कर देगा"। 

दोनों बातें जुड़ी हुई हैं

अधूरे ज्ञान से हम काम शुरू तो कर देते हैं, पर उसे पूरा नहीं कर पाते। और जो काम अधूरा रह जाए, उसका ज्ञान भी अधूरा ही रहता है। ये एक दुष्चक्र है।

समाधान क्या है 

जानने की कोशिश करो कि तुम क्या नहीं जानते — यही पूरे ज्ञान की शुरुआत है। और जो काम हाथ में लो, उसे पूरा करके ही दम लो। बड़ा काम है तो छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर पूरा करो।काम को कभी किसी भी सूरत में अधूरा मत छोडो।

- डा० प्रमोद शर्मा प्रेम 

नजीबाबाद - उत्तर प्रदेश 

     अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता है।। सही है अधूरा ज्ञान जैसे घातक और घटिया होता है वैसे ही अधूरे ज्ञान का प्रदर्शन भी सदैव गलत होता है। हमारी छवि को बिगाडता है। कहते हैं ना "अधजल गगरी छलकत जाये"ठीक उसी तरह अर्धज्ञानी अपने ज्ञान का जितना प्रदर्शन करते हैं वास्तव में उतना होता नहीं है। "ज्ञान तो अथाह सागर सा होता है इसमें जितना गहरे डूबेंगे उतना ही अधिक पार उतरेंगे" लेकिन हाँ एक बात निश्चित है कि ज्ञानी कभी भी अपने ज्ञान का अहंकार नहीं करते। वे जितना अधिक सफल होते हैं उतने अधिक नम्र होते जाते हैं। नदिया न पीये कभी अपना जल वृक्ष न खायें कभी अपने फल उसी तरह सच्चे ज्ञानी और परमार्थी अधूरे ज्ञान के साथ आगे नहीं बढते। अधूरे काम को पूरा करने के लिये पूरे ज्ञान का सद्भावी प्रयास करते हैं - - अपेक्षित है कि हर इंसान अपने आप को परखे - - अपने ज्ञान को परखे - - अपनी सीमाओं को परखे तभी कदम आगे बढाये। 

- हेमलता मिश्रा मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

       रही है।आधा ज्ञान इंसान को भ्रम में डाल देता है। डॉक्टर ,अधूरा ज्ञान लेकर ऑपरेशन करे तो जान जा सकती है।वकील अधूरा ज्ञान लेकर केस लड़े तो हार निश्चित है। काव्य में अधूरा ज्ञान हो तो रचना में रस नहीं आता।अधूरा ज्ञानी खुद को पूरा ज्ञानी समझ बैठता है, सीखना बंद कर देता है। इसलिए बुजुर्ग कहते हैं - "या तो पूरी बात जानो, या चुप रहो"। अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता है"  काम अधूरा छोड़ना सबसे बड़ी आदत खराब करती है।आधा खेत जोतकर छोड़ दो तो फसल नहीं होगी। आधी कविता लिखकर छोड़ दो तो वो कविता नहीं, ख्याल बनकर रह जाएगी। अधूरा काम मन पर बोझ बनता है आत्मविश्वास घटाता है।  इसका समाधान एक ही है - छोटे से शुरू करो, पर पूरा करो। तभी सफल होती है जब कवि अपनी रचना पूरी करके सुनाए।ज्ञान लो तो पूरा, काम करो तो पूरा। आधा-अधूरा न ज्ञान काम आता है, न काम खुद का। खाना भी जब स्वाद मनोयोग से बनाये जाते है तभी स्वादिष्ट बन चेहरे पर मुस्कान ले आता है !पूरा जानो, मानो देखो फिर पूरा करो, यही सफलता की अनुभूति है । इंसान अपने काम सत्कर्मों से जाना पहचान जाता है ! जिसके पास पहुँच कर सुकून महसूस करता है ! कोई काम अधूरा नहीं  होता 

- अनिता शरद झा 

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

     अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है, अधूरा कार्य कभी पूर्णता नहीं दे सकता। अधूरा ज्ञान सदैव हानिकारक सिद्ध हुआ है, क्योंकि आधी-अधूरी जानकारी व्यक्ति को भ्रमित कर सकती है और कई बार विनाश के मार्ग तक पहुँचा देती है। जीवन में जब भी हम किसी कार्य का आरंभ करते हैं, तो उसका समापन भी उतनी ही निष्ठा और जिम्मेदारी से होना चाहिए। अधूरे कार्य मन में बोझ बनकर रह जाते हैं और कई बार अनेक समस्याओं को जन्म देते हैं। मानव जीवन भी इसी सत्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। मनुष्य जन्म लेकर अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन करता है। जीवन की पूर्णता केवल जन्म और मृत्यु के मध्य की यात्रा नहीं, बल्कि अपने उत्तरदायित्वों को संपूर्णता के साथ निभाने में निहित है। यदि किसी कारण जीवन के आवश्यक कार्य अधूरे रह जाएँ, तो वे अपूर्णताएँ केवल परिस्थितियों को ही नहीं, मन और भावनाओं को भी प्रभावित करती हैं। अधूरा ज्ञान विष के समान होता है, जो धीरे-धीरे सोचने और समझने की क्षमता को प्रभावित करता है, वहीं अधूरा कार्य जीवन की प्रगति में बाधा बन जाता है। इसलिए जीवन में ज्ञान हो या कर्म, दोनों को पूर्णता तक पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि पूर्णता ही सफलता, संतोष और सार्थकता का आधार है।

-  नूतन गर्ग 

      दिल्ली

      यह बेहद सटीक और परखी हुई बात है कि अधूरे ज्ञान से व्यक्ति को सब कुछ जानने का भ्रम हो जाता है जो अज्ञानता से भी ज्यादा नुक्सानदेह हो सकता है यही नहीं अज्ञानी  होने से हर कार्य जानकारी न होने की वजह से अधूरा ही रह जाता है जो कभी पूरा नहीं होता तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है तथा  अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता, मेरे ख्याल में अधूरा ज्ञान सही निर्णय लेने की क्षमता को छीन लेता है जिससे गलतियों के साथ बहुत से नुकसान सर पर मंडराने लगते हैं दुसरी तरफ बिना पूरी योजना और लगन के कोई भी कार्य अधूरा ही रह जाता है और मनचाहा परिणाम   कभी भी नहीं मिल  पाता, अक्सर देखा गया है कि गलत आत्मविश्वास के कारण अधूरे ज्ञान में व्यक्ति को सब कुछ जानने का भ्रम हो जाता है जो अज्ञानता से भी ज्यादा नुक्सानदेह साबित होता है यही नहीं अधूरा ज्ञान किसी भी लक्ष्य को पाने में बाधक बनता है जब तक  किसी काम को पूरी लगन और बारीकी से पूरा न किया जाए उसकी सफलता अधूरी ही रहती है अन्त में यही  कहुँगा कि जीवन में किसी भी जोखिम से बचने के लिए किसी भी विषय को गहराई से समझें और अपने कार्यों को हमेशा पूरे तन मन से पूरा करें, क्योंकि अधूरा ज्ञान  किसी भी कार्य में बाधा बनता है तभी तो कहा है अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है तथा अधूरा काम कभी पूरा नहीं होता। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू -  जम्मू व कश्मीर

      कहा जाता है अधजल गगरी छलकत जाए।"अधूरा ज्ञान अक्सर भ्रम पैदा करता है, क्योंकि जब समझ पूरी नहीं होती तो व्यक्ति आधी जानकारी को ही अंतिम सत्य मान लेता है। इससे गलत निर्णय और भटकाव की संभावना बढ़ जाती है। इसी तरह अधूरा काम भी अधूरापन ही छोड़ देता है, क्योंकि किसी भी कार्य की पूर्णता ही उसका वास्तविक फल होती है। आधे-अधूरे प्रयास न तो संतोष देते हैं और न ही परिणाम। इसलिए जीवन में ज्ञान और कर्म—दोनों को पूर्णता की दिशा में ले जाना आवश्यक है, तभी स्पष्टता, सफलता और स्थिरता प्राप्त होती है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर -  राजस्थान

        किसी भी कार्य को करने के लिए उसका सम्यक ज्ञान होना जरूरी है।  अधूरा ज्ञान बहुत खतरनाक होता है वह तकलीफ देह और हानिकारक होता है। उससे कभी किसी का भला नहीं होता। इसलिए किसी भी कार्य को करने से पहले उसकी पूर्ण जानकारी लेना जरूरी है। जो काम अधूरा रह गया,पूर्ण नहीं किया गया तो वह अधूरा ही रहेगा। इसलिए उस काम को पूर्ण करते रहें ताकि वह छूटे नहीं।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

       'अध-जल गगरी छलकत जाए' अर्थात 'अधूरा ज्ञान' जो व्यक्ति को अति आत्मविश्वासी बना देता है,फिर उसके नुकसान भी उठाने पड़ते हैं। अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है। जिसकी वजह से व्यक्ति में गलत अतीव आत्मविश्वास पैदा हो जाता है। अधूरे ज्ञान के कारण लिया गया कोई भी निर्णय हानिकारक ही साबित होता है। इसी प्रकार जब अपने किसी काम पर पूरा ध्यान केन्द्रित कर उसको सही ढंग से पूर्णता प्रदान नहीं कर लेते तब तक वह काम अधूरा ही रहता है। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए उसे बीच में छोड़ने के बजाय सही रणनीति के साथ अंत तक अंजाम तक पहुँचाना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। 

- शीला सिंह 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

      दोनों ही बातें सही हैं। अधूरे ज्ञान में गहराई  नहीं होती वह छिछला होता है। सत्य सदा गहराई में होता है। अभिमन्यु को यदि चक्रव्यूह  तोड़ने  का पूरा ज्ञान  होता तो वह मारा नहीं जाता।  अधूरे काम का कारण विकट परिस्थितियाँ या इच्छा शक्ति की कमी होती है। दोनो का सामन्यजस  बिठाने से काम  अवश्य  पूर्ण  होगा।

- कमला अग्रवाल 

गाजियाबाद - उत्तर प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " अधूरा ज्ञान सबसे ख़तरनाक साबित होता है। यही अधूरा कर्म ही अधूरे जीवन की कहानी है। बाकि जीवन पर निर्भर करता है। अधूरेपन से सभी को बचना चाहिए। यही वास्तविकता है। ऐसी स्थिति कभी अच्छी नहीं होती है। 

              - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)


Comments

Popular posts from this blog

हिन्दी के प्रमुख लघुकथाकार ( ई - लघुकथा संकलन ) - सम्पादक : बीजेन्द्र जैमिनी

हिन्दी की प्रमुख महिला लघुकथाकार ( ई लघुकथा संकलन ) - सम्पादक : बीजेन्द्र जैमिनी

जीवन की प्रथम लघुकथा ( लघुकथा संकलन ) - सम्पादक : बीजेन्द्र जैमिनी