पद्मश्री शरद जोशी की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      संघर्ष जीवन की महत्वपूर्ण क्रिया प्रतिक्रिया है। जो अकेला रहता है। वहीं जीवन का सत्य है। बाकि सफलता के सभी साझेदार यानि मित्र कहलाते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
      यह पंक्ति जीवन का एक कड़वा लेकिन शाश्वत सत्य बयान करती है। यह मनुष्य के स्वभाव, रिश्तों की परख और सफलता के मायने को एक ही झटके में उजागर कर देती है।

1. संघर्ष का एकांत: 

असली परीक्षा की घड़ी

संघर्ष वो तपती भट्टी है जहाँ इंसान का चरित्र गढ़ा जाता है। यहाँ कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं:-

परख का समय : 

जब जेब खाली हो, राह कठिन हो और भविष्य धुंधला हो, तब भीड़ छंट जाती है। जो रिश्ते स्वार्थ पर टिके होते हैं, वो पहले टूटते हैं। "हर तरफ हर एक मंजर तल्खियों की जद में है" वाली स्थिति में सिर्फ़ अपने ही साथ खड़े दिखते हैं।

आत्म-निर्भरता का पाठ : 

अकेलापन हमें अपनी ताक़त से मिलवाता है। गीता में श्रीकृष्ण भी कहते हैं "उद्धरेदात्मनात्मानं" - अपना उद्धार स्वयं करो। संघर्ष के एकांत में ही इंसान अपने भीतर छुपे साहस, धैर्य और जुनून को पहचानता है।

झूठे हमदर्दों से मुक्ति: 

भीड़ में अक्सर सलाह देने वाले बहुत मिलते हैं, पर हाथ बंटाने वाले कम। अकेले चलने पर ही पता चलता है कि कौन वाक़ई "हमदर्द" है और कौन सिर्फ़ तमाशबीन।


2. सफलता की भीड़: चेहरे पर मुखौटे

जैसे ही सफलता का सूरज चढ़ता है, परिदृश्य बदल जाता है:

स्वार्थ का गणित‌: 

सफलता एक चुम्बक है। यह उन लोगों को भी खींच लाती है जो संघर्ष में पीठ दिखा गए थे। "दुश्मन भी मित्र" इसलिए हो जाता है क्योंकि आपकी सफलता से उनका कोई न कोई हित जुड़ जाता है।

परिचय का दायरा : 

 अचानक रिश्तेदार बढ़ जाते हैं, पुराने दोस्त याद आ जाते हैं। कल तक जो आपकी राह की आलोचना करते थे, आज वही आपकी मिसाल देने लगते हैं। यह मानव मनोविज्ञान है — लोग सूरज को सलाम करते हैं।

नया संघर्ष :

 विडम्बना यह है कि सफलता के बाद असली दोस्त और मतलबी लोगों में फ़र्क करना एक नया संघर्ष बन जाता है। चाणक्य ने कहा था — "संकट के समय काम आने वाला ही सच्चा मित्र है"।

3. इतिहास और वर्तमान से सबक

कर्ण : 

- महाभारत का कर्ण आजीवन संघर्ष करता रहा। दुर्योधन के अलावा सबने उसका तिरस्कार किया। पर युद्ध में उसकी शक्ति देखकर कई राजा मित्र बनने को तैयार थे।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम: 

- अख़बार बेचने वाले लड़के से मिसाइल मैन तक का सफर उन्होंने अकेले तय किया। "मिसाइल मैन" बनने के बाद पूरी दुनिया उनकी मित्र थी।

उद्यमी : 

 हर स्टार्टअप फाउंडर की कहानी यही है। आइडिया स्टेज पर लोग हँसते हैं, फंडिंग नहीं मिलती। यूनिकॉर्न बनते ही वही इन्वेस्टर लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं।

4. तो क्या करें? इस सत्य के साथ कैसे जिएँ

संघर्ष का सम्मान करें: 

अकेलेपन से डरें नहीं। यही वो समय है जब आप तराशे जा रहे हैं। "प्रेम के पांवों में छाले पर कहीं रुकना नहीं" — डॉ. प्रमोद शर्मा प्रेम की ये पंक्ति याद रखें।

रिश्तों की पहचान :

  जो संघर्ष में साथ दे, उसे सफलता में सबसे ऊँचा स्थान दें। जो सिर्फ़ सफलता में दिखे, उससे औपचारिक रिश्ता रखें पर दिल न लगाएँ।

विनम्रता न छोड़ें : 

सफलता मिलने पर अहंकार न पालें। याद रखें कि कल आप भी संघर्ष में थे। तुलसीदास जी ने कहा है — "तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग"।

दुश्मन को भी माफ़ करें :

 अगर कल का दुश्मन आज मित्र बनकर आ रहा है, तो उसे एक मौका दें। हो सकता है आपकी सफलता ने उसकी सोच बदल दी हो। पर आँखें खुली रखें।

निष्कर्ष

यह पंक्ति हमें निराश करने के लिए नहीं, बल्कि जागरूक करने के लिए है। संघर्ष का अकेलापन आपको मजबूत बनाता है और सफलता की भीड़ आपको समझदार। असली जीत तब है जब आप संघर्ष में टूटें नहीं और सफलता में बिकें नहीं। क्योंकि अंत में आपके साथ सिर्फ़ आपका चरित्र चलता है — न दुश्मन, न मित्र।

"हर सफर हर एक मंजिल हादशो की जद में है" पर जो बिना रुके चलता है, वही एक दिन मंजिल पर तालियाँ बटोरता है। और तब फर्क नहीं पड़ता कि ताली बजाने वाले कल दुश्मन थे या दोस्त।यही सच है।

- डा० प्रमोद शर्मा प्रेम 

नजीबाबाद - उत्तर प्रदेश 

      संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है, सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है.... इसमें कोई दो राय नहीं है, शत प्रतिशत सच है चूंकि...संघर्ष और सफलता जीवन में आने वाला वह पड़ाव या समय कह सकते हैं जब हमें अपने और पराये की परख होती है। संघर्ष के समय व्यक्ति अकेला पड़ जाता है चूंकि उसके पास कोई धन नहीं होता, किसी की मदद नहीं होती। दुनिया का दस्तूर है लोग सफल व्यक्ति के साथ खड़े रहना पसंद करते हैं ना कि संघर्षरत व्यक्ति के साथ। उस समय संघर्षरत व्यक्ति के साथ केवल उसका आत्मबल, उसकी लगन, जोश, धैर्य, एवं परिश्रम उसका अपना होता है जो उसके साथ रहता है। सफलता इंसान को मजबूत बनाता है वहीं संघर्ष उसकी परीक्षा ले उसे कसौटी पर खरा उतारता है। सफलता के समय दुश्मन भी मित्र होता है, तो कभी कभी उसी सफलता से ईर्ष्या वश होकर दुश्मन भी बन जाते हैं। जहाँ संघर्ष हमें मजबूत बनाता है,धैर्यता देता है वहीं सफलता हमें विनम्रता देती है। इंसान को दोनों समय पर संतुलन बनाए रखना चाहिए।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

     शरद जोशी की स्मृति में प्रस्तुत यह पंक्तियाँ जीवन के कठोर यथार्थ और मानवीय स्वभाव की गहरी पड़ताल करती हैं। संघर्ष का मार्ग प्रायः अकेलेपन, उपेक्षा और विरोध से भरा होता है, क्योंकि कठिन समय में व्यक्ति की वास्तविक परीक्षा होती है और अधिकांश लोग दूरी बना लेते हैं। किन्तु जब वही व्यक्ति अपने धैर्य, परिश्रम और आत्मविश्वास से सफलता प्राप्त कर लेता है, तब समाज का व्यवहार बदल जाता है; विरोधी भी निकट आने लगते हैं और स्वयं को मित्र सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यह कथन केवल सामाजिक व्यवहार का चित्रण नहीं करता, बल्कि यह भी संदेश देता है कि मनुष्य को संघर्ष के समय निराश हुए बिना अपने लक्ष्य पर अडिग रहना चाहिए, क्योंकि समय और परिस्थितियाँ प्रायः स्थायी नहीं होती हैं। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू)-जम्मू और कश्मीर

      यह सच है संघर्ष में इंसान अकेला ही आगे बढ़ता है क्योंकि हर इंसान जीवन पथ पर बढ़ने के लिए अपने अलग लक्ष्य रखता है। यथा परिवार की व्यवस्था, उन्नति हो। स्वयं मुखिया की अपनी सोच उसकी ही व्यक्तिगत परिस्थितियां तदनुरुप वह सपनों को यथार्थ धरातल पर पूरा कर रहा होता है; तब वह उस संघर्ष में नितांत अकेला ही होता है। ऐसे ही व्यक्तिगत करियर, राजनीतिक पद की प्राप्ति,कोई नई वैज्ञानिक खोज या बहुत बड़ा सर्वमान्य धार्मिक संत बनना यह सब क्षेत्र ऐसे हैं जहां इंसान को प्रथमतः स्वयं ही आगे बढ़ना होता है। इतिहास  से लेकर  अब तक सैकड़ो उदाहरण हैं जीवन का हर क्षेत्र लग्न, परिश्रम, बुद्धि ,विवेक, जटिल परिस्थितियों में भी अपना संयम रखते हुए जुझारू व्यक्तित्व सफलता पा ही लेता है। उसकी इस सफलता में सैकड़ो हजारों लाखों की भीड़ उसकी कार्य प्रणाली और सफलता का यशोगान करने लगते हैं क्योंकि उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं यह कहावत सही है; जो उसे संघर्षशील व्यक्ति की सफलता के बाद होता है पर संघर्षों से पाई सफलता वाले व्यक्ति को सदैव चापलूस लोगों पर नजर रखना आवश्यक है। ऐसे ही उसका दुश्मन यदि भविष्य में मित्र बन भी जाए तो सावधान रहना अनिवार्य है क्योंकि आपने मानसिक शारीरिक रूप से चौकन्ना रहकर संघर्षों से लड़ते हुए सफलता का विजयपथ पाया है।

 - डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     एक नारा होता है, संघर्ष करों हम तुम्हारें साथ है। संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है, सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है। वास्तविक हकीकत यही है। जब इंसान हर कदम पर संघर्ष करता चला जाता है, तो साथ वाले भी साथ छोड़ते चले जाते है, उन्हें मालूम रहता है, इसके पास कुछ बचा नहीं है, साथ रहने में फायदा नहीं है, वे सिर्फ उगते सूर्य को ही नमस्कार करते है। जैसे किस्मत का दरवाजा खुलता है, छोड़े हुए साथी फिर से चिपकना  प्रारंभ कर देते है। जो सफलता देख मित्र बनना चाहते है, उन्हें शीघ्र भगा देना चाहिए, उन्हें अपने पास रखने से कोई मतलब नहीं रहता, क्योंकि ये बौराए हुए, अस्तिन के खिलाड़ी रहते है। ऐसे मित्रों का इतिहास भी साक्षी है। हमनें तो ऐसे स्वार्थियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा है।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

    बिल्कुल सत्यवचन..... संघर्ष मैं व्यक्ति हमेशा अकेला होता है , और जब सफलता मिलती है , तो दुश्मन भी मित्र बन जाता है ! ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संघर्ष की राह , काँटों  भरी होती है , तमाम मुश्किलों से भरी होती हैं ! जब समस्त संघर्ष की राह पर चलकर सफलता मिलती है , तब विरोधियों और दुश्मनों की स्थिति बिन पेंदी के लौटे कि तरह हो जाती है क्योंकि वे पाला  बदलकर सफल व्यक्ति के साथ खड़े मिलते है !! यही दुनियां की सच्चाई है , अपवादों को छोड़कर !! 

ठीक ही कहा गया है ..... 

सुख के सब साथी , 

दुख मैं न कोय!! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

      संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता  है. उसको कोई मदद करने वाला नहीं होता है. गैर तो गैर अपने भी संघर्ष में साथ नहीं देते हैं. सभी कहते हैं क्या ये बेकार का काम करते हो. सब पिछे से टांग खींचने वाले ही होते हैं. सभी हतोत्साहित करने वाले ही रहते हैं. सब कहते हैं तुमसे य़ह नहीं होगा, क्यों बेकार की कोशिश कर रहे हों. ये प्रॉब्लम आएगा तो वो प्रॉब्लम आएगा इत्यादि कह कर उसका उत्साह कम करने की कोशिश करते हैं. लेकिन जब वही व्यक्ति सफल हो जाता है तो सभी उसके साथ होने लगते हैं. सभी कहने लगते हैं मैंने कहा था कि तुम कर लोगे. सब उससे संपर्क बनाने में लगा जाते. यहाँ तक उसके दुश्मन भी उसे अपना मित्र मानने लग जाते हैं. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होताहैसफलता में हमेशा दुश्मन भी मित्र होता जीवन का कड़वा-मीठा सच पकड़ती हैसंघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है जब आप कुछ बड़ा करने निकलते हो, मुश्किलों से लड़ते हो, रात-रात जागते हो - तब अक्सर साथ देने वाला कोई नहीं मिलता।  लोग सलाह तो देते हैं, पर हाथ बँटाने नहीं आते। परिजन आत्मीयजन भी यही कहते संभल के, पर रास्ता आपको ही चलना पड़ता है।  क्योंकि संघर्ष में साथ देने का मतलब है खुद का समय, पैसा, जोखिम लगाना। वो कम लोग करते हैं। इसीलिए बुजुर्ग कहते हैं - "संघर्ष में ईश्वर और खुद का भरोसा ही काम आता है"। सफलता में हमेशा दुश्मन भी मित्र होता है"  जब आप सफल हो जाते हो, तो जिन लोगों ने पहले मुंह मोड़ लिया था, वही सबसे पहले बधाई देने आते हैं।कल तक जो आलोचना कर रहे थे, आज तारीफ करते नहीं थकते।दुश्मन भी दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, क्योंकि अब आपके साथ जुड़ने में उसका फायदा है। ये दुनिया की रीत है। सफलता के साथ चमक आती है, और चमक के पास आना चाहते हैं।कुल मिलाकर संदेश:  संघर्ष का समय आपको परखता है - कौन अपना है, कौन पराया।  सफलता का समय आपको सिखाता है - हर मुस्कुराते चेहरे पर भरोसा मत करना।  इसीलिए बुजुर्ग कहते हैं: "संघर्ष में धीरज रखो, सफलता में घमंड मत करना"। अकेला लड़ता है जब इंसान हर अंधियारे से,‌सफल हुआ तो दुनिया झुके, दुश्मन भी प्यारे से।

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

      संघर्ष में इंसान अकेला होता है क्योंकि तब वह अपनी परिस्थितियों के कारण ऐसी मानसिक स्थिति में होता है जिसमें वह अकेलापन महसूस करता है। वास्तव में तनाव, चिंता, शंकाओं और संघर्ष के कारण ऐसा महसूस हो  रहा होता है।और वह अपने सच्चे मित्रों हिम्मत,ताकत आदि को भूल जाता है। जबकि वास्तविकता में उसके साथ सबकी सद्भावना और शुभकामनाएं रहती है।अब दूसरी बात कि सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है क्योंकि उनके हित साधने के लिए मित्रता करना आवश्यक होता है। इसे दूसरे नजरिए से यूं भी कहा जा  सकता है कि दुश्मनों की दुश्मनी ऐसे प्रेरक का कार्य करती है जो सफलता दिलाने में सहायक होती है। जब सफलता के द्वार खुलते हैं तब सबकुछ अनुकूल हो जाता है इसीलिए दुश।मन भी मित्र की भूमिका में नजर आते हैं।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल' 

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है, सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है जीवन एक लंबी यात्रा है, जिसमें सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव, हार-जीत सब साथ चलते हैं। इस यात्रा का सबसे कठोर सत्य यह है कि जब मनुष्य संघर्ष करता है, तब वह अक्सर अकेला पड़ जाता है। उसके पास न भीड़ होती है, न प्रशंसा, न तालियाँ। लोग दूर खड़े होकर केवल उसकी असफलताओं को देखते हैं। लेकिन जैसे ही वही व्यक्ति सफलता की ऊँचाइयों को छू लेता है, संसार का व्यवहार अचानक बदल जाता है। जो लोग कभी आलोचक थे, वही मित्रता का हाथ बढ़ाने लगते हैं। इसी सत्य को यह पंक्ति अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है—“संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है, सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है।”संघर्ष मनुष्य के व्यक्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा है। जब कोई व्यक्ति अपने सपनों को साकार करने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, तब उसके साथ केवल उसका आत्मविश्वास और धैर्य होता है। लोग उसकी कोशिशों का उपहास उड़ाते हैं, उसकी राह में बाधाएँ खड़ी करते हैं, और कई बार अपने भी साथ छोड़ देते हैं। क्योंकि दुनिया परिणामों की पूजा करती है, प्रयासों की नहीं। संघर्ष के दिनों में व्यक्ति को तानों, उपेक्षा और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। परंतु यही अकेलापन उसे भीतर से मजबूत बनाता है। इतिहास इस सत्य का साक्षी है। महापुरुषों का जीवन देखें तो पाएँगे कि सफलता प्राप्त करने से पहले उन्होंने अपार संघर्ष सहा। जब वे कठिनाइयों से जूझ रहे थे, तब उनके साथ बहुत कम लोग थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने सफलता प्राप्त की, पूरा समाज उनका प्रशंसक बन गया। यह मानव स्वभाव की विडंबना है कि लोग उगते सूरज को प्रणाम करते हैं।सफलता केवल धन या प्रसिद्धि का नाम नहीं है; यह उस आत्मबल का परिणाम है जो संघर्ष की अग्नि में तपकर निखरता है। संघर्ष व्यक्ति को धैर्य, आत्मनिर्भरता और जीवन का वास्तविक ज्ञान देता है। जो व्यक्ति अकेले संघर्ष करना सीख लेता है, वह जीवन की किसी भी परिस्थिति में टूटता नहीं। सफलता के बाद मिलने वाली भीड़ क्षणिक हो सकती है, पर संघर्ष में प्राप्त अनुभव और आत्मविश्वास जीवनभर साथ रहते हैं।यह भी सत्य है कि सफलता के बाद लोग व्यक्ति के पास अपने स्वार्थवश आते हैं। कई बार वे लोग भी मित्रता दिखाते हैं जिन्होंने कभी विरोध किया था। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी विनम्र बना रहे और संघर्ष के दिनों को कभी न भूले। वही संघर्ष उसकी असली पूँजी है। अंततः कहा जा सकता है कि संघर्ष जीवन की वह तपस्या है जो मनुष्य को महान बनाती है। अकेलापन यदि धैर्य और विश्वास के साथ जिया जाए, तो वही आगे चलकर सफलता का आधार बनता है। इसलिए मनुष्य को संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि अँधेरी रात के बाद ही सुनहरी सुबह आती है।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

      कहा जाता है, "उगते सूरज को सभी प्रणाम करते हैं।" इसी तरह जीवन में सफलता मिलने पर , खुशी के दौर में सभी साथ देने आ जाते हैं। क्योंकि सभी यह समझते हैं कि आज जो सफलता मिली है, इससे कल उपलब्धियां भी हासिल होंगी, उपलब्धियों से  समृद्धि होगी, समृद्धि से यश और सम्मान मिलेगा, परिचितों का दायरा बढ़ेगा, जिससे प्रभावी लोगों मिलना-जुलना बढ़ायेगा। इससे हम यदि आज सफल होने वाले के साथ होंगे तो कल वह हमारी जरूरत पर जरूर काम आएगा। इसी सोच और मानसिकता को लेकर ही लोग सफल इंसान के साथ हो जाते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में कहा जावे तो "संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है," वह इसलिए क्योंकि संघर्षरत इंसान का भविष्य अनिश्चिताओं से भरा होता है।  सफल होगा कि नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता और दूसरा यह भी कि संघर्षरत इंसान को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहायता की जरूरत होती है। सामने वाला  सहायता देने से बचना चाहता है।अत: यह कहना और समझना सच्चाई  है कि संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है। सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है। सार यह कि संघर्ष से घबराना नहीं बल्कि डटकर सामना करना चाहिए क्योंकि सफल होने पर यही आपके जीवन में गुल खिलाने वाला साबित होने वाला है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      संघर्ष मे इंसान हमेशा अकेला होता है।  सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है।। जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है कि आज का विश्व   प्रतिस्पर्धा का है। एकदूसरे से जलन और आगे निकलने की होड़ मची है। बहुत पहले एक एड आती थी "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे" - - वह स्वस्थ प्रतियोगिता का दौर था लेकिन आज के विज्ञापन - - राम बचायें। आज किसी को भी दूसरे प्रगति पचती नहीं। येनकेन प्रकारेण हर एक दूसरे को गिराने के लिए प्रयासरत रहता है हाँ आपकी सफलता में खुश होनू का दिखावा अनेक दोस्त भाई करते है लेकिन भीतर की सच्चाई छिपी रहती है चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कान के पीछे। हर इंसान अकेला है अपने भीतर की गुत्थियों के साथ। अपने भीतर और बाहर के संघर्ष में इंसान सदैव अकेला होता है लेकिन आपकी सफलता के अनेक भागीदार हो जाते हैं। सगे रिश्ते अपनपन का दावा करने लगते हैं   - - जिन्होंने कभी कोई दायित्व नहीं निभाया आपके प्रति कठिन दौर में। सच कहूँ तो यमेरे हिसाब से इंसान हर दौर में - - हर दौड़ में अकेला है। आज की स्वाथी दुनियां मे नियति और नीयत ने इंसानों को एकदूसरे से अलग कर दिया है"उपकार फिल्म का एक गाना" कोई किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं नातों का क्या "आज के दौर की सबसे बड़ी सच्चाई है शेष सब छलना हैं। 

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

      अगर संघर्ष और सफलता की सच्चाई की बात करें तो यह अटूट सत्य है कि मुश्किल समय में लोग  तो क्या अपने तक दूर हो जाते हैं और व्यक्ति अपनी लड़ाई लड़ने में बिलकुल अकेला होता है लेकिन उसका अकेलापन ही  उसके  धैर्य, हौंसले और असली क्षमताओं की परीक्षा लेता है लेकिन बात जब सफलता की हो तो इसके मिलते ही दूनिया का नजरिया बदल जाता है क्योंकि दूर रहने वाले या ईर्ष्या करने वाले लोग भी प्रशंसा करने और साथ निभाने के लिए आगे आने लगते हैं मगर यह भी सत्य है कि जीवन में संघर्ष का अकेलापन ही वह मजबूत नींव है जो सफलता की भव्य ईमारत को खड़ा करता है तो आज की चर्चा  को बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि संघर्ष में इंसान अकेला होता है जबकि सफलता में दुश्मन भी मित्र होता है, मेरे ख्याल में यह जीवन की बहुत गहरी और कठोर सच्चाई है कि जब कोई भी इंसान अपने लक्ष्यों के लिए लड़ता है तो उसको अपने लक्ष्यों की लड़ाई  खुद ही लड़ कर जीतनी होती है लेकिन सफल होते ही दूनिया उसके साथ हो जाती है  मगर सच्चाई तो  यह है कि सही मायने में हमारा अकेलापन ही हमें मजबूत बनाता है क्योंकि हम खुद की कमियों से लड़ते हैं जिससे हमारा वास्तविक व्यक्तित्व निखरने लगता है दुसरी तरफ जब कोई भी व्यक्ति शिखर पर पहुँच जाता है तो गैर भी अपने बन जाते हैं मानो उन्होंने आपकी सफलता में  भरपूर योगदान दिया हो, यही जीवन  का कठोर सत्य है और इस कठोर सत्य में हमें हमेशा अपने सिद्धांतों पर टिके रहना चाहिए और निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करते रहना चाहिए, यह सफलता और संघर्ष की कड़वी सच्चाई है कि जब  इंसान मुश्किलों, असफलताओं या संघर्ष के दौर से गुजरता है तो कोई भी उसके साथ खड़ा नहीं होता, इंसान को अपने आंसू तक खुद पोंछने पड़ते हैं और अपनी हिम्मत खुद जुटानी पड़ती है लेकिन सफल होते ही अचानक कई दोस्त, रिस्तेदार और शुभचिंतक दिखने लगते हैं  अन्त में यही कहुँगा  कि जीवन का यह एक कड़वा लेकिन बहुत ही व्यावाहरिक सत्य है जब आप अपने जीवन के मुश्किल दौर में होते हैं तो अक्सर कोई मददगार आगे नहीं आता लेकिन सफलता के बाद दूनिया आपके साथ चलने को तैयार रहती है, इस बात की सार्थकता यही है कि जो लोग आपके बुरे समय में आपके साथ थे वही आपके असली शुभ चिंतक थे लेकिन बाकि वाले तो सफलता का स्वाद चखने आते हैं और अपनी वाहवाही और पहचान दिखाकर अपनी तरफ आकर्षित करने के वाद अपना पन दिखाने में माहिर हो जाते हैं जबकि असली साथ निभाने वाले एक आद जो होते हैं पीछे रह जाते हैं लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघर्ष में इंसान हमेशा अकेला होता है और सफलता में दुश्मन भी मित्रता दिखाते नजर आते हैं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू -  जम्मू व कश्मीर

      जीवन का यह कथन मानव स्वभाव और समाज की वास्तविकता को बहुत सरल शब्दों में प्रकट करता है। जब व्यक्ति संघर्ष के दौर से गुजरता है, तब उसके साथ बहुत कम लोग खड़े दिखाई देते हैं। कठिन समय में हर कोई दूरी बना लेता है, क्योंकि संघर्ष में त्याग, धैर्य और सहयोग की आवश्यकता होती है। उस समय व्यक्ति को अपने आत्मबल, विश्वास और परिश्रम के सहारे आगे बढ़ना पड़ता है।संघर्ष मनुष्य की परीक्षा लेता है। यही वह समय होता है जब अपने और पराए की पहचान होती है। अनेक लोग केवल सफलता के साथी बनना चाहते हैं, परंतु कठिनाइयों का भार उठाने से बचते हैं। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े व्यक्तित्वों ने अकेलेपन और उपेक्षा का सामना किया। चाहे वह वैज्ञानिक हों, साहित्यकार हों या स्वतंत्रता सेनानी—उनकी राह में आरंभ में बाधाएँ ही अधिक थीं। किन्तु जैसे ही सफलता व्यक्ति के कदम चूमती है, वही समाज उसका सम्मान करने लगता है। जो लोग कभी आलोचना करते थे, वे भी प्रशंसा करने लगते हैं। सफलता एक ऐसा प्रकाश है, जिसकी चमक में पुराने विरोध भी धुंधले पड़ जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि “सफलता के अनेक साथी होते हैं, पर संघर्ष का साथी प्रायः स्वयं मनुष्य ही होता है।”परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति निराश हो जाए। संघर्ष ही सफलता की नींव है। यदि बीज मिट्टी में दबने का संघर्ष न करे, तो वह वृक्ष नहीं बन सकता। सोना अग्नि में तपकर ही कुंदन बनता है। उसी प्रकार मनुष्य भी कठिनाइयों से गुजरकर मजबूत बनता है। हमें ऐसे लोगों का सम्मान करना चाहिए जो किसी के संघर्ष के समय उसके साथ खड़े रहते हैं, क्योंकि वही सच्चे मित्र होते हैं। सफलता के समय मिलने वाली प्रशंसा से अधिक मूल्यवान संघर्ष के समय मिला एक सच्चा साथ होता है।अंततः यही कहा जा सकता है कि संघर्ष मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाता है और सफलता संसार को उसकी ओर आकर्षित करती है। इसलिए परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनुष्य को अपने लक्ष्य और कर्म पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

" मेरी दृष्टि में " इस दुनिया में कोई दुश्मन नहीं है। सब कुछ कर्म का खेल है। यही सत्य है यही अटल है। बाकि तो कुछ भी नहीं है। संघर्ष ही सबसे बड़ा कर्म है।जो परिणाम देता है। जिस से संसार चलता है।  संघर्ष और कर्म एक दूसरे के पूरक हैं। 

             - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)


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