हरिकृष्ण देवसरे स्मृति में चर्चा परिचर्चा

        कर्म से बड़ा कुछ नहीं होता है। कर्म ही जीवन है। जो जीवन की परिभाषा बनता है। अथवा भाग्य बनता है। जिसे जीवन कहते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
         अगर  मानव जीवन की बात करें तो मानव जीवन सीधा - सीधा कर्म पर निधार्रित करता है  कहने का भाव कर्म और जीवन का गहरा संबंध है क्योंकि मानवीय क्रिया ही हमारे वर्तमान और भविष्य को निधार्रित करती है, देखा जाए इंसान शारिरिक, मानसिक या भावात्मक रूप से निरंतर कर्म करता रहता है और उन्हीं कर्मों के कारण फल भोगता है तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि कर्म का सत्य जीवन है और यही भाग्य है यही जीवन है,  मेरे ख्याल में कर्म ही जीवन का आधार, उदेश्य और वास्तविकता है, हमारे द्वारा किए गए कार्य , विचार और शब्द ही हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं, वर्तमान को आकार देकर भविष्य का निर्माण करते हैं इसलिए सच्चा जीवन कर्म करने में ही है न कि कर्महीन रहने में मगर याद रखें नेक कर्म ही जीवन में सुख और सार्थकता लाते हैं और कर्म ही हमें उँचा उठा सकते हैं या नीचा धकेल सकते हैं इसलिए जीवन एक‌ कर्मक्षेत्र है यहाँ कर्म ही भाग्य का निर्माता है,  इसमें कोई दो राय नहीं कि कर्म ही जीवन है क्योंकि जीवन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और बिना कर्म के जीवन अर्थ हीन है, हर पल हम जो कुछ भी करते हैं, सोच, मेहनत या निर्णय वही हमारे जीवन की गुणवत्ता बनती है यहाँ तक भाग्य की बात है, पूर्वजन्म या बीते हुए समय के कार्यों का फल भाग्य के रूप में प्रकट होता है लेकिन आज किए गये अच्छे या बुरे कर्म ही हमारे भविष्य के भाग्य का निर्माण करते हैं, अन्त में यही कहुंगा  जीवन में कर्म ही प्रधान है और कर्म ही वह शक्ति है जो हमारे भाग्य व जीवन का निर्माण करते हैं, इसलिए मनुष्य को कोई भी कर्म करते  समय सोच विचार करना चाहिए कि  हमारे कर्म हमें  सही रास्ते पर ले जाएँगे या गलत पर ताकि हमारा जीवन व हमारा भाग्य हमेशा फलता फूलता नजर आऐ क्योंकि कर्म हमारे हाथ में हैं, कर्म ही एक ऐसा शब्द है जो हमारी जिंदगी के हर पहलू को गहराई से छूता है लेकिन आजकल की भागदौड़ में हम कर्म की  महत्ता को भूल रहे हैं मगर सत्य यही है जैसा बीज हम  बोते  हैं बैसा ही फल हम पाते हैं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

      कर्मों का स्थान सर्वोच्च होता है सबके जीवन में !! सामर्थ्यानुसार सतत प्रयास , परिश्रम , मेहनत सब कर्म के विविध रूप हैं , जिनकी द्वारा जीवन , जीवन कहलाता है !! कर्म का सत्य यह है कि जीने के लिए इन्हें करना पड़ता है , जिस से जिंदगी आगे बढ़ती है ! कर्म के बिना तो जिंदगी आगे बढ़ती ही नहीं !! कर्मों को करके ही मनुष्य अपने सुनहरे भाग्य का निर्माण। स्वयं करता है !! यह बात अलग है कि कभी सफलता मिलती है , कभी विफलता!! विफलताओं से सीखकर , मनुष्य अपने कर्मों में सुधार लाता है , व वांछित फल प्राप्त करता है !!  कर्म ही जीवन हैं , कर्म ही भाग्य निर्माता है , कर्म ही जीवन का आरम्भ है , कर्म ही जीवन का छोर है व कर्म ही जीवन का सार है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

      मनुष्य के जीवन में कर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कर्म ही वह शक्ति है जो जीवन को दिशा और अर्थ प्रदान करती है। केवल सोचने या सपने देखने से जीवन सफल नहीं होता, बल्कि उन्हें कर्म में बदलने से ही सच्ची सफलता मिलती है। इसलिए कहा जाता है कि कर्म का सत्य ही जीवन है। जब मनुष्य अच्छे और सच्चे कर्म करता है, तो वही उसके जीवन का वास्तविक भाग्य बन जाता है। भाग्य कोई अलग से बनने वाली चीज नहीं है, बल्कि हमारे कर्मों का ही परिणाम होता है। मेहनत, ईमानदारी और लगन से किया गया कार्य व्यक्ति के जीवन को उज्ज्वल बनाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि कर्म ही जीवन का आधार है और वही हमारे भाग्य का निर्माण करता है। इसलिए हर व्यक्ति को अपने कर्म को श्रेष्ठ और सच्चा बनाने का प्रयास करना 

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

      जीवन की सार्थकता और सच्चाई हमारे कर्म ही है कर्म ही मानव जीवन की पहचान है। मानव योनि पाकर हमें कर्म करने का प्रयास और अधिकार मिला है। पशुओं में यह गुण नहीं होता। सोचना समझना और किसी विषय पर क्रियात्मक व्यवहार मानव मन की प्रतिक्रिया है। इसीलिए जीवन में कर्म करना परम सत्य है जो कार्य-कारण के वैज्ञानिक सिद्धान्त पर आधारित है। यही कर्म भविष्य की रचना करते हैं। अच्छे कर्म जीवन में उपयोगी बनकर उन्नति मार्ग की ओर अग्रसर होकर यश कीर्ति, सम्मान, सुख वैभव प्रदान कर समाज और राष्ट्र में विशेष पहचान दिलाने का काम करते हैं। वहीं बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप दुख और कष्ट झेलने पड़ते हैं। यह प्रकृति का शाश्वत सत्य है जैसा बीज बोया जाता है वैसा ही फल मिलता है। अतः मनुष्य का अच्छा बुरा समय, सुख- दुःख सब कर्मों का लेखा-जोखा है ।कर्मों के आधार पर भाग्य निर्मित होता है। यही जीवन की सच्चाई है। 

- शीला सिंह 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

          कर्म का सत्य जीवन है, यह भाग्य है, यही जीवन है। एक द्रश्य मैंने देखा कि टाइल्स -पत्थरो  के बीच में से एक छोटा सा नव पौधा उग रहा है । क्या कभी उस बीज को पता था कि मैं एक पौधा बनूगां। वह बीज बस गिरा  ..फूटा और उसने सांस ली, यही कर्म है । कुछ समय बाद उसे मिट्टी ,हवा ,धूप मिली  ,यह उसका भाग्य है  बीज के अंकुरित होने से पौधा बनने तक उसे जीवन मिला यही सत्य है। कर्म हम अपने आप करते हैं फल भाग्य पर निर्भर है सत्य इसलिए, क्योंकि जीवन घटित  हो रहा है। किताबें पढ़कर नोट्स बनाना हमारा कर्म है  रिजल्ट में सफलता प्राप्त करके नौकरी और फिर प्रशंसा पाना। हमारा भाग्य है । जो हम कर रहे हैं जो हमारे हाथ में है वही जीवन है। रोजमर्रा की जिंदगी कोई ड्रामा नहीं बल्कि सच्ची साधना है और यही जीवन  है। 

- रंजना हरित

 बिजनौर - उत्तर प्रदेश 

       जीवन वही सार्थक है जिसमें अच्छे और सार्थक कर्म किये जाएँ। यही कर्म ही व्यक्ति का भाग्य निर्धारित करते हैं। गीता में भी कर्म को ही प्रधानता दी गई है। यदि व्यक्ति कर्म ही न करे, केवल खाता और सोता ही रहे तो उसका जीवन ना तो उसके किसी काम का होगा और ना ही किसी दूसरे के लिए, क्योंकि वहाँ किसी तरह का कोई सार्थक और उपयोगी कर्म है ही नहीं जो उस व्यक्ति का अच्छा भाग्य लिख सके या वह किसी के लिए उपयोगी बन सके। कर्म जीवन का एकमात्र सत्य है उसके बिना जीवन व्यर्थ है। कर्म ही भाग्य बनाते-बिगाड़ते हैं। अब यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि वह इस सत्य को जान कर अपने कर्मों से अपना और दूसरों के भाग्य का निर्माण करता है या निष्क्रिय रह कर पशु की तरह जीवन बिताना चुनता है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

        कर्म का सत्य जीवन है, यही भाग्य है यही जीवन है...यह परम सत्य है कि कर्म ही जीवन का आधार है एवं हमारे भाग्य का निर्माता भी। हम अपने भाग्य की बात करते हैं तो पुनर्जन्म के कर्म का फल कहते हैं( चाहे सुख हो अथवा दुख) यानी यदि हम वर्तमान में कर्म अच्छे करते हैं तो वह हमारे आने वाले जन्म के भाग्य के लिए संचित फल होगा....किंतु कहीं ना कहीं हम समझते हैं कि हमारा वर्तमान कर्म ही हमारा जीवन है । हमारा कर्म ही हमारा भाग्य बनता है।सही और अच्छे कर्म का फल मीठा ही होता है, यदि हम खुश हैं, ऐशो आराम से रहते हैं हमें सभी सुख प्राप्त हैं  मतलब साफ है हमारा कर्म ही हमारा भाग्य है .... यानी यहांँ का फल यहीं मिलता है ..यही जीवन की सच्चाई है...।

  - चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

          मनुष्य का वास्तविक भाग्य किसी अदृश्य शक्ति या संयोग का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह उसके विचारों, संकल्पों, संघर्षों और निरन्तर किए गए कर्मों से निर्मित होता है। जो व्यक्ति कर्म को ही अपना धर्म, कर्तव्य और जीवन का आधार मानता है, वही जीवन की वास्तविक गरिमा और उद्देश्य को समझ पाता है। संसार का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने कठिनाइयों, अन्याय और विपरीत परिस्थितियों के सामने भी सत्य और कर्म का मार्ग नहीं छोड़ा, उन्हीं लोगों ने समाज में परिवर्तन लाने, न्याय की स्थापना करने और मानवता की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कर्मशील व्यक्ति कभी भाग्य के भरोसे निष्क्रिय नहीं बैठता, बल्कि वह अपने साहस, धैर्य, परिश्रम और सकारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से अपनी परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करता है। वास्तव में कर्म ही वह शक्ति है जो मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाती है, उसके आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाती है और उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जब व्यक्ति अपने कर्म को केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रखकर समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्याण से जोड़ देता है, तब उसका जीवन एक व्यापक उद्देश्य से जुड़ जाता है और वह दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति सत्य, न्याय, नैतिकता और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर चलते हुए निरंतर कर्म करता रहे, क्योंकि कर्म ही वह आधार है जो मनुष्य के भाग्य का निर्माण करता है, उसके जीवन को अर्थ प्रदान करता है और उसे सम्मान, आत्मसंतोष तथा समाज में प्रतिष्ठा दिलाता है। इसी कारण यह कहना पूर्णतः सत्य है कि कर्म ही जीवन की वास्तविक शक्ति है, कर्म ही मनुष्य का सच्चा भाग्य है और कर्म ही उसके जीवन की सबसे बड़ी पहचान है। अन्ततः यही तथ्य अब माननीय सर्वोच्च न्यायालय के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री सूर्यकान्त शर्मा जी के समक्ष प्रमाणित करना है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

       कर्म का सत्य ही जीवन है.बिना कर्म के तो मनुष्य मृतक के समान है. जिसमें जीवन रहेगा वह तो कर्म करता ही रहेगा. बिना कर्म के जीवन सम्भव नहीं है. कर्म करने पर ही जीवन को गति मिलती है. कर्म का सत्य जीवन है और जीवन का सत्य कर्म है. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. कर्म के बिना जीवन अधूरा है. और जीवन नहीं रहेगा तो कर्म कैसे करेंगें. इसलिए कर्म का सत्य जीवन है और जीवन का सत्य कर्म है. कहा गया है कि कर्म से ही भाग्य बनता है तो भाग्य ही जीवन है और जीवन ही भाग्य है. क्योंकि जीवन भी बड़े भाग्य से मिलता है. दोनों एक दूसरे से बंधे हुए हैं. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

     कलकत्ता - प. बंगाल 

          निःसंदेह कर्म से ही जीवन है - - कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।। सदैव महनीय अभिनंदनीय है ये पंक्तियाँ।" कर्म करो फल की चिंता मत करो " योगीराज कृष्ण की इन पंक्तियों में जीवन का सार छिपा है। युगप्रवर्तक युगपुरुष मनीषियों ने "जीवन असार है" कह कर जीवन की नश्वरता की ओर घ्यान दिलाया है। लेकिन हम मूढ़मति मानव जाति के लिए अभिशाप हैं। हम कर्म से जी चुराते हैं। हम आसानी से सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं और इसीलिए सदैव दुःख उठाते हैं।

अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम। 

दास मलूका कह गये सब के दाता राम।।

          ऐसे सिद्धांतों पर चलकर हभ क्या पा सकते हैं भला - - क्या कभी सोचते हैं हम? नहीं - - हम लकीर के फकीर बने रहना चाहते हैं। सीखने सिखाने की बात पर हम मुंह छिपा लेते है। अप्राप्य को प्राप्त करने का हुनर हम नहीं सीखना चाहते। इसीलिए कर्म नहीं करम  - - भाग्य के भरोसे बने रहते हैं। जरूरत है कि स्वयं को बदलें  - - अपनी लघु सोच को बदलें और जीवन को जीवन की तरह जियें। जीवन को जिंदादिली से जियें - - कि मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं।

 - हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र

" मेरी दृष्टि में " भाग्य तो कर्म का परिणाम है। जबकि कर्म अपने हाथ में होता है। फिर भी इंसान भाग्य के पीछे भागता है। भाग्य का सीधा संबंध कर्म से है।  कर्म ही कल का भाग्य कहलाता है। कर्म ही सब कुछ है। कर्म से बड़ा कुछ नहीं है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)

Comments

  1. हमारा हर कर्म हमारे जीवन का निर्माण करता है। हम क्या बोलते हैं, क्या सोचते हैं, क्या करते हैं वह तय करता है कि हमारा जीवन किस दिशा में जाएगा। हमारे साथ जो घटित होता है उस पर दी गई हमारी प्रतिक्रिया अर्थात हमारा कर्म ही हमारे भाग्य को अच्छा या फिर बुरा बनाता है।
    - दर्शना जैन
    खंडवा - मध्यप्रदेश
    (WhatsApp से साभार)

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