नसीब से परिवार मिलता है ... जिनका परिवार नहीं होता , या जिनकी परवर मैं किसी भी निजी कारण से , परवर के सदस्य एकसाथ नहीं रहते , उनसे जाकर पूछो परिवार का महत्व ! किस्मत वाले हैं वो व्यक्ति , जो अच्छे परिवार मैं रहते हैं , व पतवार मैं सामंजस्य भी बना होता है !! निजी स्वार्थों के कारण लोग परिवार त्याग तो देते हैं , पर एक ऐसा मुकाम आता है , जब वे परिवार के लिए तरसते हैं , अपनों के लिए तरसते हैं !! खुशियों की खोज मैं परिवार छोड़ रो देते हैं , पर जब खुशियां मिलती हैं , टो खुशी बांटनेवाला कोई नहीं होता !! परिवार मैं साथ भी होता है , और मतभेद भी! विवाद से , बहस से, तू तू मैं मैं से स्थिति शोचनीय व विकट बन जाती है , व समस्या सुलझने के बजाए, उलझ जाती है ! इस स्थिति का सुरक्षित उपाय है , मौन!! जब विवाद ही नहीं होगा , तो समस्याएं स्वयं सुलझ जाएंगी ! बड़े बुजुर्ग कह गये हैं ..... । एक चुप , सौ सुख !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
जीवन के परिदृश्य में नसीब का अत्यधिक महत्व रहता है, उसी के परिप्रेक्ष्य में परिवार की वंशानुगत आधार सिला रहती है। नसीब से परिवार मिलता है, मौन से परिवार चलता है। यही जीवन प्रसंग का सत्यता है। नसीब अच्छा रहता है तो परिवार में सुखद संयोग से चलता है, शांतिपूर्ण वातावरण से परिवार में एकता, सामंजस्यपूर्ण व्यवहार, समाज में संदेश अच्छा जाता है। परिवार की अखण्डता सदस्यों पर निर्भर करती है, किस तरह से प्रभावित करना अपने विचारों पर प्रकाश डालता है। एक कहावत है, पांच उंगलिया बराबर नहीं है, एक हाथ से ताली बजाना। यह गंभीरतापूर्वक विचारनी प्रश्न है। कभी-कभी न चाहते हुए भी अप्रत्यक्ष रूप से घटनाचक्र घटेश्वर हो ही जाता है। उस समय मौन रहकर भी परिवार को चलाना महत्वपूर्ण अंग प्रदर्शन करना पड़ता है। हम देखते ही वर्तमान परिवेश में परिवार एक ही शहर में विभाजित होकर रहता है, इसमें शांति कम मनमुटाव की झलक दिखाई देती है। वे ही परिवार नसीब और मौन वाले है, जो संयुक्त परिवार अब एक-दो प्रतिशत ही रह गए होगें। सब स्वतंत्र रूप से रहना पसन्द करते है, रबी-खरीब,गरीब-अमीर, मान-मर्यादा,मान-सम्मान, मान-अपमान सब औपचारिक सा हो गया। मौन, बोल में बदलाव हो गया है.....।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट-मध्यप्रदेश
परिवार जीवन सुचारू रूप से चलने से मिलता है। सुचारू जीवन स्वयं में एक बड़ी उपलब्धि है। परिवार दो प्रकार के होते हैं। एकल और संयुक्त। एकल में केवल माता-पिता और बच्चे रहते हैं संयुक्त में कई पीढ़ी एक साथ रहती है।सत्य कथन है नसीब से परिवार मिलता है। आज के युग में परिवार चलाना भी आसान नहीं है। इसके लिए मौन रहना सर्वोत्तम उपाय है। विवाद बढ़ने न दें। मौन हो जाएं।
- कमला अग्रवाल
गाजियाबाद - उत्तर प्रदेश
अगर परिवार की बात करें तो अच्छा और प्यारा परिवार भी हमें अपने अच्छे कर्मों या भाग्य से मिलता है मगर उस परिवार में मिठास, एकता, प्यार मुहब्बत बनाए रखने के लिए धैर्य समझदारी तथा कईबार मौन रहने यानि के चुप रहने की भी जरूरतपड़ती है, तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि नसीब से परिवार मिलता है और मौन से परिवार चलता है, मेरा मानना है कि जीवन में सुखद परिवार मिलना ईश्वर की देन तथा हमारा सौभाग्य होता है लेकिन रिश्ते और भी गहरे चलें उनमें मिठास, अपनापन बना रहे उसके लिए कईबार मौन या चुप रहने की आवश्यकता होती है क्योंकि परिवार में छोटी, मोटी बहस, मन मुटाब होने भी लगे तो हर बात पर प्रतिक्रिया देने या बहस करने के बजाय कभी कभी चुप रहना ही ज्यादा समझदारी होती है चूंकि खामोशी कई रिश्तों को टूटने से बचा लेती है तथा दुसरों की बात को गहराई में समझने में मदद मिलती है जिससे परिवार के सदस्यों को महसूस होता है कि हमारी बात को ध्यान से सुना जा रहा है और उनकी बात को महत्व भी मिल रहा है यही नहीं मौन से हमें अपने व्यवहार और शब्दों पर विचार करने का मौका देता है जिससे शब्दों के चुनाव वें सुधार होता है जिससे दुसरों को ठेस पहुँचाने की संभावना वें कमी आती है तथा एक साथ बैठ कर बिन कुछ कहे एक दुसरे के साथ समय बिताने से प्रेम भाव बढ़ता है जिससे परिवार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि जब माता पिता धैर्य और संयम रखते हैं तो बच्चे भी उस आचरण को सीख ले कर चलते हैं जिससे घर का वातावरण शांत रहता है जो बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए बहुत जरूरी है, अन्त में यही कहुँगा कि मौन रहने का मतलब चुप रहने से ही नहीं होता बल्कि सही समय पर सोच समझ कर प्रतिक्रिया देना है जिससे परिवार बिखरने से बच सकता है तथा परिवार में प्रेम और भाईचारा बढ़ता है इसलिए जो परिवार हमें पूरी कर्मों के नसीब से मिला है उसको संभा़ल कर रखना व आगे तक चलाना भी हमारा ही दायित्व बनता है ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी अच्छे संस्कार परिवार को मिलते रहें जिससे हरेक का आदर भाव बना रहे और हम सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें ।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
नसीब से परिवार मिलता है मौन से परिवार चलता है। बिलकुल सटीक हैं ये पंक्तियाँ। "मौनं सर्वस्व साधनम्" - - भूली हुई कहानी बन जाते हैं अनेक हादसे जिनमें आप अपने परिवार से मतभेद रखते हैं लेकिन सहज सरल सच्चाई है कि परिवार के लिये मतभेदों को भूलकर मौन साध लेना पड़ता है। आज तो एकल परिवार आग के ढेर पर बैठे हुए हैं। कोई किसी का नहीं सुनना पसंद करते हैं - - निःसंदेह वहां मौन ही उचित है। सम्मिलित परिवार में "मरघट की शांति" प्रतीत होता है मौन - - लेकिन आज के युग में परमात्मा भी बहरे हो गए हैं शायद। खैर तक़दीर से लडना हरेक के बस में नहीं होता। इंसान परिस्थितियों का गुलाम होता है। अच्छा मार्ग हमेशा कठिन होता है - - मौन की धारणा और मौन को धारण करना भी इतना ही कठिन काम है। खैर कोई बात नहीं हम इंसानों की दुनिया में रहते हैं पत्थर के वार शब्दों में सह लेने के आदी हो जाते हैं और मौन धारण कर लेते हैं। पलायन नहीं मगर शांति से जीवन व्यतीत करने के लिये यदि सामनेवाले की बातों को शुभाशीष की तरह स्वीकारें तभी सामाजिक और मानसिक शांति पा सकते हैं। हमें अपनी पीढ़ियों को भी यही मार्गदर्शन करना होगा कि "मौनं सर्वस्व साधनम्" - - इसे कायरता नहीं बुद्धिमत्ता मानें और सफल सहज सरल जीवन जियें।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
यह सच है नसीब से परिवार मिलता है क्योंकि "जन्म- मरण, यश- अपयश, लाभ- हानि सब विधि के हाथ"। यदि हमारे पूर्व जन्म के कर्म अच्छे रहे हैं तो हमारे कर्मों से बने भाग्यानुसार हमें एक अच्छे परिवार में ही जन्म मिलता है। जहां हमें अच्छे दादा-दादी, नाना- नानी, माता- पिता, भाई- बहन मिलते हैं यह सब पारिवारिक लोग एक दूसरे की मन: स्थिति समझने , सेवा करने, प्यार देना और पाना सिखाते हैं और सबके साथ सुख मय आदर्श परिवार के गुणों को कर्तव्य के रूप में पालन करते हुए कुशल सुखमय जीवन बिताते हैं। समाज में एक अच्छे नागरिक भी साबित होते हैं। इस संदर्भ में विद्वानों ने भी माना है कि "परिवार नागरिकता की प्रथम पाठशाला है" । जो कि पूर्णतः सटीक भी है ।यह व्यक्ति की खुशकिस्मत ही है जो उसे गुण, कर्म , धर्म से जुड़ा परिवार मिला है। तो परिवार की उन्नति में सहयोग बनाए रखने के लिए मुखिया, पति- पत्नी या दादा- दादी को परिवार के सर्वतोन्मुखी विकास में स्थिति- समय के हिसाब से आवश्यकता अनुसार अपनी वाणी पर नियंत्रण करके चलना आवश्यक होगा। यह न माने कि हम जैसा चाहेंगे वैसा ही सब करें । इससे मनमुटाव उपेक्षित स्थितियां परिवार का वातावरण दूषित कर देती हैं अतः समय विकास की गति ,बदलते परिवेश की अनुकूलताएं , अनिवार्यताएं इत्यादि पर सोच विचार कर परिवार चलाना श्रेयस्कर कर होता है।
- डाॅ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
नसीब से परिवार मिलता है. बात एक दम सही है. मेरे विचार से परिवार ही क्यों सबकुछ नसीब से ही मिलता है. जिसे प्रभु का देन कहा जाता है. आज के दिन में ल़डकियों के लिए कहा जाता है कि नसीब से ही अच्छा परिवार मिलता है जिसे उसकी शादीशुदा जिंदगी स्वर्ग समान होती है या नर्क के समान. परिवार कभी-कभी मौन से चलता है कभी-कभी कड़ाई से भी चलता है. परिवार में कुछ बातेँ नजरअंदाज करनी पड़ती है यानी देखकर भी नहीं देखना. कभी-कभी कुछ बातों के लिए कड़ा भी होना पड़ता है. कभी-कभी मौन भी रहना पड़ता है. तभी परिवार चलता है.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
नसीब से परिवार मिलता है और मौन से परिवार चलता हैमनुष्य जीवन में यदि कोई सबसे बड़ा सुख है, तो वह है — परिवार का सुख। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि भावनाओं, विश्वास, त्याग और अपनत्व का वह वृक्ष है जिसकी छाया में जीवन की हर तपन शीतल हो जाती है। सच ही कहा गया है — “नसीब से परिवार मिलता है और मौन से परिवार चलता है।” परिवार का मिलना हर किसी के भाग्य में नहीं होता। कुछ लोग संसार की भीड़ में भी अकेले होते हैं, जबकि कुछ छोटे से घर में अपार प्रेम पाकर धन्य हो जाते हैं। माता-पिता का स्नेह, भाई-बहनों का साथ, जीवनसाथी का विश्वास और बच्चों की मुस्कान — यह सब ईश्वर का अनमोल उपहार है। इसलिए परिवार केवल संबंध नहीं, सौभाग्य है। किन्तु केवल परिवार मिल जाने से ही जीवन सुखमय नहीं हो जाता। उसे सहेजने के लिए धैर्य, समझ और सबसे अधिक — मौन की आवश्यकता होती है। यह मौन कमजोरी नहीं, बल्कि संबंधों को बचाने की बुद्धिमत्ता है। हर बात का उत्तर शब्दों से नहीं दिया जाता; कई बार चुप रह जाना ही सबसे बड़ा उत्तर होता है। घर तब टूटते हैं जब अहंकार बोलने लगता है, और घर तब जुड़ते हैं जब संवेदनाएँ मौन रहकर भी एक-दूसरे को समझ लेती हैं। परिवार में विचारों का मतभेद होना स्वाभाविक है। जहाँ अनेक मन होंगे, वहाँ अलग-अलग भाव भी होंगे। परंतु हर छोटी बात पर तर्क, कटु वचन और आरोप यदि बढ़ जाएँ, तो प्रेम की नींव कमजोर होने लगती है। ऐसे समय में मौन वह सेतु बन जाता है जो टूटते संबंधों को फिर जोड़ देता है। मौन का अर्थ यह नहीं कि मन में दूरी हो जाए, बल्कि इसका अर्थ है — “मैं रिश्ते को अपनी जिद से बड़ा मानता हूँ।”
माँ का मौन त्याग होता है,
पिता का मौन जिम्मेदारी होता है,
पति-पत्नी का मौन समझदारी होता है,
और बुजुर्गों का मौन अनुभव की गहराई होता है।
आज के समय में लोग सुनने से अधिक बोलने लगे हैं। हर व्यक्ति स्वयं को सही सिद्ध करना चाहता है। इसी कारण परिवारों में संवाद तो बहुत है, पर समझ कम होती जा रही है। यदि हम थोड़ी सहनशीलता, थोड़ा धैर्य और थोड़ा मौन अपने व्यवहार में ले आएँ, तो अनेक विवाद जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो जाएँ। परिवार प्रेम से बनता है,
विश्वास से बढ़ता है,
त्याग से सँवरता है,
और मौन से टिकता है।
अतः हमें अपने परिवार को केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं से सींचना चाहिए। रिश्तों में शब्दों की मर्यादा और मौन की गरिमा बनाए रखना ही परिवार को स्थायी सुख देता है।अंततः यही कहा जा सकता है कि — भाग्य हमें परिवार देता है,पर हमारी विनम्रता, धैर्य और मौन ही उसे जीवनभर साथ बनाए रखते हैं।
- अलका पांडेय
मुंबई - महाराष्ट्र
यह पंक्ति रिश्तों की गहराई और गृहस्थी की बारीकी को सटीक शब्दों में समेटती है।
1. नसीब से परिवार मिलता है
परिवार चुनकर नहीं मिलता, ये ईश्वर का दिया हुआ तोहफ़ा है।
- रिश्ते ईश्वरीय देन : माँ-बाप, भाई-बहन, खून के रिश्ते हम चुनते नहीं। नसीब से ही कोई बेटा बनकर आता है, कोई बेटी बनकर। जैसा तुलसीदास जी ने कहा — "होइहि सोइ जो राम रचि राखा"।
- परिवार = पहली पाठशाला : यहीं हम बोलना, चलना, लड़ना और मानना सीखते हैं। संघर्ष की पहली तपिश यहीं मिलती है। "हर घड़ी पल हादशो का अनवरत है सिलसिला" — परिवार ही वो छतरी है जो इन हादसों में हमें ढकती है।
- नसीब का सम्मान : जिसे परिवार मिला, उसे समझना चाहिए कि वो खुशनसीब है। दुनिया में कई लोग इस नसीब को तरसते हैं।
2. मौन से परिवार चलता है
अगर नसीब से मिलना शुरूआत है, तो मौन से निभाना साधना है।
- मौन = सहनशीलता : हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं। कभी-कभी चुप रह जाना ही सबसे बड़ा जवाब होता है। सास-बहू, पति-पत्नी, भाई-भाई के बीच 100 बातों में से 90 बातें सिर्फ़ मौन से सुलझ जाती हैं।
- मौन = सम्मान : बड़ों के आगे जुबान रोक लेना, छोटों की गलती पर आँख मूंद लेना — यही मौन परिवार को जोड़ता है। जो हर बात पर "मैं सही" का झंडा लेकर खड़ा हो जाए, उसके घर में दीवारें उठ जाती हैं।
- मौन ≠ कमजोरी : ये वो मौन नहीं जो अन्याय सहे। ये वो मौन है जो "घर अंधेरी भट्टीया" न बने, इसलिए खिड़कियाँ बंद रखता है। आग को हवा नहीं देता।
3. नसीब और मौन का संतुलन
नसीब ने परिवार दे दिया, अब उसे चलाना हमारी ज़िम्मेदारी है।
- नसीब से मिले रिश्ते को अगर अहंकार की कैंची से काटते रहेंगे, तो एक दिन अकेले रह जाएँगे। तब समझ आएगा कि "संघर्ष में इंसान अकेला होता है"।
- मौन का मतलब घुटन नहीं। "है घुटन हर ओर सच में" — ऐसा मौन घर तोड़ देता है। मौन वो जो तूफ़ान रोक दे, पर संवाद की खिड़की खुली रखे।
- परिवार तब स्वर्ग बनता है जब नसीब का शुक्र हो और मौन में समझदारी हो।
निष्कर्ष
परिवार किराये का मकान नहीं जो पसंद न आए तो बदल लें। ये नसीब से मिली जायदाद है। और हर जायदाद की देखभाल करनी पड़ती है। वो देखभाल मौन, त्याग और प्रेम से होती है। _"प्रेम के पांवों में छाले पर कहीं रुकना नहीं"_ — परिवार की राह में भी छाले पड़ते हैं। पर जो मौन की मरहम लगाकर चलता रहता है, उसी का घर मंदिर बनता है।
- डा० प्रमोद शर्मा 'प्रेम'
नजीबाबाद - उत्तर प्रदेश
नसीब से परिवार मिलता है मौन से परिवार चलता है किस घर में जन्म लेते हैं, वो हमारे हाथ में नहीं होता। खून का रिश्ता नसीब से संस्कार संस्कृति के साथ मिलता है। उसके खानदान परिवार की पहचान आचार विचार उसके साहसिक कदम से होती है! वो मौन स्वीकृति होती है ! जिसे आँखों की भाषा हरकतों को देख कर पारिवारिक रिश्ते निभते है !समझदारी, संयम से। हर बात पर बहस न करना, वक्त पर चुप रह जाना, यही घर को जोड़े रखता है। जीवन का पूरा सच कह देती हैं - शुरुआत नसीब तय करता है, लेकिन अंत हमारा बर्ताव तय करता है। शब्द सरल, घर-घर में समझ आने वाला हो जो घर चलाते हैं, वो जानते हैं कि जीतना नहीं झुकना है ! मौन रह कर्म कर मिल का पत्थर बन इंसान परिवार ,अँधेरे में प्रकाशित प्रतिबिम्ब देखता महसूस करता है निरन्तर कोशिश हौसला अफ़्जाई वजूद है मानवता जीवंत बनाने कोशिश में जुटा होता है ! नसीब से परिवार मिले, मौन से घर चले, शब्द कम हों प्यार अधिक, रिश्ते सदा पले।भाव गहरा, भाषा सहज, और संदेश परिवार के लिए भाग्य से मिलता है ! सहेज रखना मौन रहना फ़ितरत हो !
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
नसीब से परिवार मिलता है।मौन से परिवार चलता है। यह बात बिल्कुल सत्य है। माँ-बाप का सुख , संतान सुख, बुजुर्गों का सुख या अनुभव का सुख हर किसी के भाग्य में नहीं।जीवन संघर्षशील व परिवर्तनशील दोनों ही है।यहाँ क्षण में कहानी बदल जाती है। जिस तरह से जहाँ चार बर्तन होते हैं,वो शोर करते ही हैं। ठीक उसी तरह से एक परिवार में अलग-अलग विचारों के व्यक्ति होते हैं, आपसी मतभेद होते ही हैं, किंतु इस मत भेद को मन के भेद में बदल लेना बुद्धिमानी नहीं है। सुंदरता तो तब है जब हम मौन रहना भी सीख लें।आधी समस्या तो मौन धारण कर लेने से खत्म हो जाती है, साथ ही एक दूसरे के प्रति आदर भाव भी बढ़ जाता है।अक्सर इंसान का ज्यादा बोल देना उसे बौना बना देता है।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
राजा राममोहन राय की स्मृति में प्रस्तुत पंक्तियाँ — “नसीब से परिवार मिलता है, मौन से परिवार चलता है” — भारतीय समाज, पारिवारिक संस्कृति और मानवीय संबंधों के गहन सत्य को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। परिवार केवल रक्त संबंधों का नाम नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य, सहनशीलता, संवेदनशीलता और आपसी सम्मान की सतत साधना है। अनेक बार कटु शब्द संबंधों को तोड़ देते हैं, जबकि संयमित मौन टूटते हुए परिवार को भी संभाल लेता है। यहाँ मौन का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसंयम, विवेक और संबंधों को बचाने की परिपक्वता है। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा जैसी अमानवीय कुरीति के विरुद्ध संघर्ष कर भारतीय समाज को नई चेतना प्रदान की और यह सिद्ध किया कि समाज तथा परिवार की वास्तविक शक्ति मानवता, शिक्षा, समानता और संवेदनशीलता में निहित होती है। उनके सामाजिक सुधारों, विचारों और साहित्यिक योगदान पर आधारित अनेक पुस्तकें आज भी आईएसबीएन (ISBN) सहित प्रकाशित होकर समाज को जागरूक कर रही हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी शाश्वत सत्य को स्थापित करती हैं कि परिवार भाग्य से प्राप्त होता है, किन्तु उसे एकजुट बनाए रखने के लिए धैर्यपूर्ण मौन, समझदारी और परस्पर सम्मान अत्यंत आवश्यक हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
नसीब से परिवार मिलता है,मौन से परिवार चलता है....सुंदर विषय! काफी गहरी सच्चाई है इसमें। जन्म के समय हम अनभिज्ञ रहते हैं कि हमें कैसा परिवार मिलेगा। ( पूर्व जन्म के कर्म ही हमारा नसीब तय करते हैं।) हां! अच्छा परिवार नसीब से मिल भी गया तो उसे समझदारी से निभाना भी पड़ता है। इसके लिए परिवार में प्रेम, धैर्य और शांति होनी चाहिए। कभी कभी छोटी छोटी बात पर परिवार में कलह होने लगती है तब जरूरी नहीं कि उसका जवाब उसी समय दें...उसकी जगह मौन रहकर हमें अपने क्रोध पर काबू पाना चाहिए, दूसरों की भावनाओं को समझना चाहिए। ऐसा करने से हम रिश्तों को टूटने से बचा सकते हैं। मौन हमारी कमजोरी नहीं है और ना ही मौन रहकर हम हारते हैं, बल्कि मौन हमारे संयम और परिपक्वता का ध्योतक है या प्रतीक है। अगर परिवार में सभी अपनी तुति चलाने लगे तो कलह बढ़ता है किंतु वहीं परिवार का एक समझदार व्यक्ति धैर्य और संयम रखता है तो वह परिवार को जोड़ने की ताकत बनता है। मौन का अर्थ अन्याय सहना नहीं है बल्कि मौन तो धैर्य, शांति और संयम का खजाना है। जहाँ मौन से प्रेम का झरना बहता हो, वहाँ रिश्तों में हमेशा शांति और अपनापन रहता है....।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
संबंध समझदारी से चलता है।जहाँ सलाह माँगी जाए दीजिए नहीं तो आजकल सभी समझदार हैं। जो मौन रहते हैं ।कभी मजबूरी होती है और कभी सामने वाले की मनमानी। प्रेम को बनाए रखने के लिए मौन रहना ज़्यादा अच्छा है।
ReplyDelete- सुधा पाण्डेय
लंदन
(WhatsApp से साभार)