राम गणेश गडकरी स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      दोस्तों ! आप ने कभी सोचा है कि मैं कौन हूं ? शायद आज से पहले कभी नहीं सोचा है। सिर्फ कर्म का खेल है। जो जन्म दर जन्म चलता रहता है यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
      यह अटूट सत्य है कि हमारे कर्म ही हमारे विचारों और इरादों का दर्पण होते हैं जिनसे पता चलता है कि हम इस दूनिया में क्या भूमिका निभा रहे हैं जबकि हमारी आत्मा वह शुद्ध चेतना है जो हमारे कर्मों का अनुभव करती है तो आईये आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं कि मैं कौन हूँ पूछो अपने कर्म से, मैं आत्मा हूँ पूछो अपने आप से, मेरा मानना है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य और कर्तव्य व अच्छे कर्म से ही उस व्यक्ति का स्वभाव व चरित्र बनता है इसलिए स्वयं को पहचानने के लिए हमें अपने भीतर झाँकने की जरूरत है जबकि जीवन का सच्चा मार्ग हमारे कर्मों से तय होता है कहने का भाव निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्य का पालन करना ही हमारा सच्चा धर्म है,वास्तविक में हमारे द्वारा किए गए कर्म ही हमारा असली रूप दिखाते हैं यदि हमारे कर्म समाज के लिए कल्याणकारी, परोपकारी और सत्यनिष्ठा से परिपूर्ण हों तो हमारी पहचान एक अच्छे और महान व्यक्ति के रूप में बनती है जबकि नकारात्मक व ैस्वार्थी कर्म व्यक्ति के चरित्र को गिरा देते हैं कहने का मतलब कर्म वह माध्यम है जो अदृश्य विचारों और आंतरिक भावनाओं को दृश्यमान रूप देता है, यही नहीं कर्म और आत्मा का गहरा संबंध है क्योंकि शुद्ध आत्मा से प्रेरित कर्म हमेशा निस्वार्थ और धर्म समस्त होते हैं जब कोई व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज सुनकर कार्य करता है तो उसके कर्मों में पवित्रता और स्पष्टता झलकने लगती है तभी तो कहा है मैं कौन हूँ हमारा कर्म दिखाता है, मैं आत्मा हूँ अपना आप दिखाता है कहने का मतलब मनुष्य की पहचान उसके शब्दों  या दिखावे से नहीं, बल्कि उसके कर्मों और उसके आंतरिक स्वभाव यानि के आत्मा से होती है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

       मैं कौन हूं अपने कर्म से पूछो, मैं आत्मा हूं अपने आप से पूछो.... बहुत सुंदर विषय है, जो व्यक्ति को (इंसान को)आध्यात्म की गहराई में खींच ले जाता है। "मैं कौन हूं" यह केवल पहचान नहीं अपितु हमारे आत्मबोध का प्रश्न है, जिसका उत्तर व्यक्ति के कर्म और चेतना में ही छिपा होता है। जब व्यक्ति अपने नाम, पद, वैभव एवं रिश्तों से उपर उठकर स्वयं को देखता है, तब उसे लगता है कि उसकी असली पहचान तो उसके कर्म से है। व्यक्ति अपने व्यवहार,त्याग, प्रेम और मानवता से ही पहचाना जाता है। जैसे पेड़ की पहचान हमें फल, छाँव, प्राणवायु देने से होती है, उसी तरह मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है...। उसी तरह "मैं आत्मा हूँ... इसमें हमारे भीतर से आवाज आती है, अर्थात अंदर से, आत्मा से आवाज आती है, हमें अंदर से ज्ञान प्राप्त होता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत है। जब व्यक्ति अपने भीतर की आवाज सुनता है तो उसे अहंकार नहीं बल्कि शांति और सत्य दिखाई देता है। अतःआत्मा ही हमें गलत और सही का भेद बताती है। जो स्वयं को जान जाता है ,वहीं जीवन का सच्चा अर्थ समझ जाता है....।

- चंद्रिका व्यास 

  मुंबई - महाराष्ट्र 

     जीवन में मैं शब्द का अत्यधिक महत्व होता है याने जिसे अंहकार कहा जाता है। मैं कौन हूँ पूछों अपने कर्म से, मैं आत्मा हूँ पूछों अपने आप से। वास्तविक रूप में ऐसा हो ही रहा है। मैं और कौन हूँ के चक्कर में, पीछे अपने कर्म को भूल जाते है,जब बाद में याद आता है, तब तक काफी समय व्यतीत हो जाता है। इसी तरह हम अपनी आत्मा की आवाज से नहीं पूछते है, दूसरों से पूछ-पूछ कर हर कार्य करते चले जाते है और अन्तत: पछताना पड़ता है....

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट -  मध्यप्रदेश

        मनुष्य के जीवन का सबसे गहरा प्रश्न शायद यही है—“मैं कौन हूँ?”यह प्रश्न जितना सरल लगता है उसका उत्तर उतना ही व्यापक और गहन है।अक्सर हम अपनी पहचान नाम, परिवार, पद, धन या समाज में मिले सम्मान से जोड़ लेते हैं। कोई डॉक्टर है, कोई शिक्षक, कोई लेखक, कोई व्यापारी। लेकिन क्या यही हमारी पूरी पहचान है? नहीं। ये हमारे जीवन के परिचय हो सकते हैं हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं। “मैं कौन हूँ? पूछो अपने कर्म से” यह पंक्ति बताती है कि व्यक्ति का सच्चा परिचय उसके कर्मों से होता है। हम जो करते हैं, जैसे व्यवहार करते हैं, दूसरों के सुख-दुख में जैसे साथ खड़े होते हैं वही हमारी पहचान बनते हैं। एक व्यक्ति ऊँचे पद पर होकर भी छोटा हो सकता है और साधारण जीवन जीकर भी महान क्योंकि पहचान वस्त्रों या शब्दों से नहीं कर्मों की छाप से बनती है दूसरी पंक्ति—

“मैं आत्मा हूँ—पूछो अपने-आप से”

हमें भीतर की ओर ले जाती है।

भारतीय दर्शन में आत्मा को शाश्वत माना गया है। शरीर बदलता है, समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। जब मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है—अपने मन, अपनी अंतरात्मा से तभी उसे अपने वास्तविक स्वरूप की झलक मिलती है।बाहरी दुनिया हमें बहुत-सी पहचान देती है लेकिन भीतर की शांति और आत्मबोध ही हमें यह समझाते हैं कि हम केवल शरीर या नाम नहीं हैं। जब कर्म अच्छे होते हैं तो आत्मा संतोष महसूस करती है और जब मन सच्चा होता है तो कर्म भी उजले हो जाते हैं।इसलिए इन दोनों पंक्तियों में जीवन का सुंदर संतुलन छिपा है। बाहर कर्म की पहचान,और भीतर आत्मा की सच्चाई। मनुष्य को स्वयं को जानने के लिए दर्पण की नहीं अपने कर्मों और अपनी अंतरात्मा की जरूरत होती है। क्योंकि “नाम से नहीं कर्म से पहचान बनती है और आत्मा से ही जीवन को सही अर्थ मिलता है।”

- डाॅ.छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

       यह एक पंक्ति नहीं, जीवन का पूरा दर्शन है। "संघर्ष में इंसान अकेला होता है" से लेकर "नसीब से परिवार मिलता है" तक — सबका सार इसी में छुपा है।

1. मैं कौन हूं? पूछो अपने कर्म से

"कौन हूं" यानी मेरी पहचान, मेरा परिचय, दुनिया मुझे किस नाम से जाने। इसका जवाब मेरी डिग्री, जाति, पद या बैंक बैलेंस नहीं देता।  

कर्म ही पहचान है :  

- कर्ण दानवीर इसलिए कहलाया क्योंकि उसने कवच-कुंडल तक दान कर दिए। उसका कर्म बोला।

- कलाम साहब 'मिसाइल मैन' इसलिए बने क्योंकि उन्होंने अख़बार बेचने से लेकर अग्नि बनाने तक का सफर कर्म से तय किया।  

- संघर्ष में जब इंसान अकेला होता है, तब भी जो रुकता नहीं — "प्रेम के पांवों में छाले पर कहीं रुकना नहीं" — दुनिया उसे 'योद्धा' कहती है।गीता भी यही कहती है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते"। आप सफलता में दुश्मन को मित्र बनाते देखोगे, पर लोग आपको याद आपके कर्म से करेंगे। पद चला जाएगा, पैसा चला जाएगा, कर्म का यश रह जाएगा।

इसलिए : 

अपना नाम खुद मत बताओ। अपना काम इतना बोलने दो कि लोग पूछें — "ये कौन है?"

2. मैं क्या हूं? पूछो अपने आप से

"क्या हूं" यानी मेरा चरित्र, मेरी नीयत, मेरा सार। ये दुनिया को नहीं दिखता, ये सिर्फ़ मुझे दिखता है।  

अंतरात्मा ही आईना है :  

- बाहर से आप CEO हो सकते हो, पर अंदर से डरे हुए हो तो "क्या हो"? सिर्फ़ पद।  

- परिवार नसीब से मिलता है, पर उसे 'मौन' से चलाते वक्त आप त्याग कर रहे हो या घुट रहे हो? ये सिर्फ़ आप जानते हो। 

- रात को जब सब सो जाते हैं, तब अपने आप से पूछो — "आज मैंने किसी का दिल दुखाया? अपने उसूल बेचे? या किसी की चुपचाप मदद की?"  यही "क्या हूं" का जवाब है। दुनिया आपके 'कौन' पर ताली बजाएगी, पर आपका 'क्या' ही आपको सुकून या बेचैनी देगा। चाणक्य ने कहा — "आदमी अपने कर्मों से पहचाना जाता है, पर अपने चरित्र से जिया जाता है"।

3. दोनों का संतुलन ही जीवन है

1. कर्म बिना चरित्र खोखला है :

 अगर आप बहुत सफल हो पर अंदर से बेईमान हो, तो "सफलता में दुश्मन भी मित्र" तो बनेंगे, पर आईने से नज़र नहीं मिला पाओगे।

2. चरित्र बिना कर्म निष्क्रिय है : 

आप बहुत नेक हो पर कर्म नहीं करते, तो "संघर्ष का एकांत" कभी खत्म ही नहीं होगा। सिर्फ़ सोचने से मंजिल नहीं मिलती।

_"हर सफर हर एक मंजिल हादशो की जद में है"_ — उस हादसे में आपका 'कर्म' तय करता है कि दुनिया आपको 'कौन' कहेगी, और आपका 'चरित्र' तय करता है कि आप खुद को 'क्या' कहोगे।

निष्कर्ष

तो अगली बार जब कोई पूछे "आप कौन हैं", तो अपना विजिटिंग कार्ड मत निकालना। अपने किए काम गिनाना।  और जब रात को नींद न आए, तो दुनिया को मत कोसना। अपने आप से पूछना — "मैं क्या हूं?"  क्योंकि अंत में — "असली जीत तब है जब आप संघर्ष में टूटें नहीं और सफलता में बिकें नहीं"। और ये तभी होगा जब आपका 'कौन' और 'क्या' एक हो जाए।  कर्म आपकी परछाई है, चरित्र आपकी असलियत। परछाई लंबी हो सकती है, पर असलियत के बिना उसका कोई वजूद नहीं।  यही सच है।

 - डा० प्रमोद शर्मा प्रेम

 नजीबाबाद- उत्तर प्रदेश 

ये व्यक्ति सज्जन है..... ये व्यक्ति पापी है... ये व्यक्ति अच्छा है ... ये व्यक्ति खराब है .... व्यक्ति के कर्म ही तय करते हैं !! व्यक्ति के कर्म ही व्यक्ति के गुण , या छवि का निर्माण करते हैं !अगर दुनिया मैं अच्छे व्यक्ति का नाम चाहते हो तो अच्छे कर्म करने होंगे , धन वितरित करने से अच्छा नाम नहीं कमाया जाता , कर्म अच्छे करने पड़ते हैं ! जितनी मर्जी हम तरक्की कर लें ,भागदौड़ कर लें ,शरीर तो नश्वर है !आत्मा ही अजर , अमर है !हम सशरीर जब जन्म लेते हैं , तो हम अपनी कर्तव्यपूर्ति करते हैं , व माटी में मिल जाते हैं !रह जाती है तो आत्मा ! ये गीता का ज्ञान है किंतु ये बात अलग है कि कोई मानता है , कोई नहीं !

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

       मैं कौन हूं? यही वो वह प्रश्न है जिसने संसार भर के आध्यात्मिक जगत को सक्रिय रखा है और जिसने विभिन्न पंथ मजहबों को जन्म दिया। मैं कौन हूं,पूछो अपने कर्म से।जब यह बात सामने आती है तो स्वत: ही इस प्रश्न का उत्तर मिलने की ओर हम कदम बढ़ा देते हैं। हमारे कर्म ही इस बात को प्रमाणित करते हैं कि मैं कौन? इसीलिए कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, कहा गया।जाति,धर्म,पंत,मजहब इन सबसे ऊपर उठकर हमारे कर्म ही हमारे होने को प्रमाणित करते हैं। हर जीव एक आत्मा है और आत्मा का स्वरूप हमेशा शुद्ध स्वरूप होता है।जब हम वाह्य आवरण यानी शरीर तक ही देख,समझ पाते हैं तो आत्मा के दर्शन नहीं कर पाते और जब आत्म तत्व को देखते हैं तो एकात्म भाव सहज ही आ जाता है। सबके भीतर उस परमात्मा का अंश आत्मा विद्यमान है और एक ही तत्व होने का कारण हमारे यहां अहं ब्रह्मास्मि का दर्शन भाव विकसित हुआ।इसी से अद्वैतवाद का प्रादुर्भाव हुआ। इतना निश्चित है कि मैं,हम सब जीव आत्मा है जो कि परमात्मा का अंश है।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     मनुष्य का सबसे बड़ा प्रश्न यही है— “मैं कौन हूं?” यह प्रश्न केवल शरीर, नाम, पद या संबंधों तक सीमित नहीं है। जब मनुष्य अपने कर्मों को देखता है, तब उसे अपने वास्तविक स्वरूप की झलक मिलती है। इसी भाव को ये पंक्तियाँ अत्यंत सरल किन्तु गहन रूप में व्यक्त करती हैं—

“मैं कौन हूं पूछो अपने कर्म से,

मैं आत्मा हूं पूछो अपने आप से।”

मनुष्य के कर्म ही उसके व्यक्तित्व का दर्पण होते हैं। शब्दों से नहीं, बल्कि आचरण से मनुष्य की पहचान बनती है। यदि उसके कर्म दया, सत्य, करुणा और परोपकार से भरे हैं, तो वही उसके भीतर की श्रेष्ठता का प्रमाण हैं। कर्म यह बताते हैं कि मनुष्य केवल सांस लेने वाला प्राणी नहीं, बल्कि चेतना और उत्तरदायित्व से युक्त आत्मा है। दूसरी पंक्ति आत्मचिंतन की ओर ले जाती है। बाहरी संसार में भटकता हुआ मनुष्य जब स्वयं से प्रश्न करता है, तब उसे अनुभव होता है कि वह केवल शरीर नहीं है। शरीर नश्वर है, पर आत्मा शाश्वत है। आत्मा ही मनुष्य को विवेक, संवेदना और सत्य का बोध कराती है।वास्तव में, जीवन का सार बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मबोध और श्रेष्ठ कर्मों में छिपा है। जो मनुष्य अपने कर्मों को पवित्र रखता है और आत्मा की आवाज सुनता है, वही सच्चे अर्थों में स्वयं को पहचान पाता है।

- अलका पांडेय 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

      स्वयं को स्वयं ही भलीभांति जानता है कि उसमें कौन-कौन से गुण हैं और कौन-कौन से अवगुण। दूसरे के पास केवल अनुमान होता है या अनुभव।जीवन की यही विचित्रता है। अत: जब स्वयं की समीक्षा की बात हो या निष्कर्ष की तब तय स्वयं को ही करना उचित होगा। जीवन का सफर उम्र तय करती है और इसमें क्या-क्या घटित होता है,इसकी जानकारी स्वयं को ही होती है। यानी स्वयं के किये गये कर्मों के मुल्यांकन से स्वयं आकलन  कर सकते हैं कि आप किस लाभ या हानि यानी कितने पाप और पुण्य के हकदार हैं और परिणाम में क्या मिल सकने की संभावना है। असल में स्वयं के भी दो हिस्से होते हैं  एक आत्मा और दूसरा शरीर।  इसके बावजूद भी कर्ता-धर्ता शरीर ही है और वही जबाबदार भी है और जिम्मेदार भी। आत्मा तो केवल मूक दर्शक है। अच्छा कर्म किया तो  खुश, बुरा कर्म किया तो दुखी। ईश्वर के द्वारा रचित  यह आत्मा और शरीर और देय जन्म अनुपम उपहार है। जिसका संरक्षण हमारे ही पास है। इसे संवार भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं। 

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

          कर्म ही जीवन है कर्म ही जीवन आधार है कर्म से ही जीवन चलायमान है, कर्म से ही हमारा जीवन सार्थक है। कर्म बिना मानव की पहचान नहीं। अच्छे कर्मों से मनुष्य समाज में मान,सम्मान, इज्जत, खुशी और तरक्की, प्रगति प्राप्त करता है। हमारे कर्मों का लेखा-जोखा हमारी वास्तविक पहचान तय करता है। हमारे कर्मों का हिसाब रखने वाली सबसे बड़ी लेखाकार हमारी आत्मा है। जो हमारे वास्तविक और शाश्वत रूप की पहचान का एहसास कराती है। यह संसार, यह शरीर नश्वर है। मन अहंकार से परे शुद्ध और अमर चेतना है। हमारी आत्मा का परम उदेश्य शान्ति, प्रेम और सत्य की तलाश करना है। आत्मा भौतिकवाद के साथ- साथ आध्यात्मिकता का भी साक्षात्कार कराती है। मूल रूप से आत्मा शरीर की संचालक है जो न तो स्वयं जन्म लेती है और न ही कभी मरती है,तथा कभी खण्डित नही होती, समान रूप से सबमें विद्यमान रहती है। यह अगोचर, बिना रूप, रंग और बिना आकृति के है। किसी भी जीव में सुख दुख का एहसास ही आत्मा है। 

- शीला सिंह 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

     राम गणेश गडकरी जी की स्मृति में दी गई उक्त अनमोल पंक्तियाँ आत्मपहचान, कर्म और आंतरिक चेतना के सम्बन्ध को बहुत संक्षेप में लेकिन गहराई से व्यक्त करती हैं। “मैं कौन हूॅं पूछो अपने कर्म से” यह विचार सामने रखती है कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके कथनों या सामाजिक परिचय से नहीं, बल्कि उसके किए गए कार्यों, उसके आचरण और उसके व्यवहार के प्रभाव से तय होती है। यह दृष्टि भारतीय चिंतन परंपरा में कर्म-प्रधान जीवन-दर्शन के बहुत निकट है, जहाँ मनुष्य को उसके कर्म ही महान या तुच्छ बनाते हैं। दूसरी पंक्ति “मैं आत्मा हूॅं पूछो अपने आप से” व्यक्ति को बाह्य मूल्यांकन से हटाकर आत्मविश्लेषण की ओर ले जाती है। यह संकेत करती है कि वास्तविक पहचान केवल सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि भीतर एक ऐसी चेतना है जो स्वयं को जानने और समझने की प्रक्रिया से जुड़ी है। यहाँ “अपने आप से पूछो” एक दार्शनिक आग्रह है, जो आत्मचिंतन, विवेक और अंतर्मन की आवाज़ को महत्व देता है। समग्र रूप से यह रचना यह संदेश देती है कि मनुष्य को अपने मूल्यांकन के लिए बाहरी मानकों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने कर्मों की शुद्धता और अपनी आंतरिक चेतना की सच्चाई को आधार बनाना चाहिए। यही संतुलन जीवन को अर्थपूर्ण और गरिमामय बनाता है। इन्हीं सम्भावनाओं के अन्तर्गत मैं मानता हूॅं कि अन्ततः मेरी ही विजय होगी, लेकिन कब होगी यह कर्मों पर ही आधारित है। 

- डॉ इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू)-जम्मू और कश्मीर

         आपके कर्म ही आपकी पहचान है अच्छे कर्म ,गुण ,व्यवहार ,त्याग समर्पण सवेंदन शीलता भावों की अभिव्यक्ति व्यक्तित्व के निखार से अमुक व्यक्ति में ये -ये गुण दिखाई देतें है ! जिससे उसके रूप गुण की व्याखा हो जाती है ! मक्कार झूठा धोखेबाज चालक कंजूस व्यक्ति कृपालु ,दयालु ,दिलेर हो ही नही सकता है ! अपने स्वभाव व्यक्तित्व कर्म से किए जाने जाते है ! तुलना अच्छे व्यक्ति से की जाती है और अच्छा होता है बुरे व्यक्ति से की जाती है बुराई - मैं कौन हूँ पूछो अपने कर्म की आपके कर्म की पहचान आत्मा ये पंक्तियाँ वेदांत और गीता के दर्शन को बहुत सरल भाषा में कह देती हैं।  आपकी पहचान आपके कर्म तय करते हैं, नाम या से जाति नहीं । एक जब आप खुद में झाँकेंगे तो पाएंगे कि आप शरीर नहीं, शरीर अविनाशी आत्मबोध आत्मा हैं।  कर्म और आत्मबोध है ! यही आत्मबोध अच्छे बुरे की पहचान होती है

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

       मैं कौन हूं पूछो अपने कर्म से। शास्त्रों में ऐसा बताया गया है कि व्यक्ति अपने कर्म अनुसार जीवन योनि प्राप्त करता है। इसलिए जिस भी योनि में आपको जन्म मिला है, वह आपके कर्म अनुसार ही दी गई है, उसके लिए पूर्ण रूप से व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होता है। श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि आत्मा अजर है, अमर है, वह कभी नष्ट नहीं हो सकती। केवल रूप बदलता है, योनि बदलती है। आत्मा एक शरीर से निकलकर अन्य शरीर में प्रवेश कर जाती है। अतः जिस भी रूप में हमको या किसी को भी तन मिला है ,उसमें आत्मा निश्चित रूप से है।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

      कोई भी मनुष्य किसी भी श्रेणी का हो, उसके कर्म भी उसे विभिन्न उपाधियों से मंडित करते हैं। चाहे कोई भी युग का व्यक्ति हो ,अपने कर्म से ही सत्यवादी हरिश्चंद्र , मानव सेवा में रत फ्लोरेंस नाइटिंगेल, दीनदुखी की सहायता में अग्रणी दीनबंधु एंड्रूज और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी सब के सब कर्मों से ही महान माने गए । अपने आप से तो थे ही मानवता के अग्रदूत। बल्कि समाज और राष्ट्र ने भी उनको विशिष्ट पहचान से नामांकित किया। जब हम अच्छे काम करते हैं ,अपने बारे में एक बारगी स्वयं विचार करें तो सकारात्मक ,सत्य सनातनी, ईश्वर के करीब पाते हैं। इसी प्रकार दुष्कर्म करने वाला कभी-कभी भटक कर या परिस्थितिवश गलत काम कर जाता है तो कभी तो वह स्वयं को अपने कर्मों का उत्तरदायी ही नहीं मानता बल्कि दूसरे के द्वारा शिक्षा और आत्मज्ञान की ओर उन्मुख कराने से जीवन में मोड आ जाता है। यथा --डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बनना। परिवार के पोषण के लिए लूटपाट फिर आत्मज्ञान होने पर कि बुरे कर्मों का मैं ही उत्तरदायी होऊँगा और स्वयं ही भोगूंगा ;परिवार नहीं । यह आत्मा से किया गया संवाद ने जीवन की दिशा और दशा ही बदल दी। जो कि महाकाव्य रामायण की रचना कर डाली। हर गलत और अच्छे कर्म में आत्मा धिक्कारती है और कहीं-कहीं प्रायश्चित करके सुधार भी कर देती है । हमेशा सकारात्मक रहें और सोचें कि मैं एक अच्छी आत्मा हूं; बस अच्छा ही रहूँ।

- डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " आत्मा अमर है। जो प्राकृतिक का हिस्सा है। जो ना पैदा होती है ना नष्ट होती है। यही आत्मा का विस्तार है। जो‌ संसार की अपेक्षा करता है। वहीं दुःखी रहता है। बाकी संसार में सब अपनी अपनी भूमिका निभाते हैं। यह कर्म का परिणाम है।

      - बीजेन्द्र जैमिनी 

     (संचालन व संपादन)


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