सुखदेव थापर की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      दुनियां में कोई ऐसा इंसान नहीं हुआ है। जिसने कभी कोई पाप ना किया हो। ऐसा मैं सोचता हूं। परन्तु सभी को सत्कर्म अवश्य करनें चाहिए। जो इंसान सत्कर्म से दूर रहता है। वह अवश्य नरक का भागीदार होता है। यह सिर्फ धार्मिक हीं नहीं है। बल्कि प्राकृतिक नियम भी है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:-
      मनुष्य का जीवन उसके कर्मों की सबसे बड़ी पहचान है। वाणी क्या कहती है, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, जितना यह कि हमारे कर्म क्या कहते हैं। क्योंकि समय शब्दों को नहीं, कर्मों को याद रखता है। पाप का मार्ग आरंभ में भले ही आसान और आकर्षक लगे, पर उसका अंत हमेशा अंधकार में होता है। झूठ, छल, अहंकार, ईर्ष्या, अन्याय और किसी का दिल दुखाना—ये सब ऐसे पाप हैं जो धीरे-धीरे मनुष्य की आत्मा को खोखला कर देते हैं। पाप केवल मृत्यु के बाद मिलने वाला नर्क नहीं है, बल्कि वह अशांति भी है जो जीवित रहते हुए मनुष्य को भीतर से जलाती रहती है। जिस व्यक्ति के मन में अपराध, स्वार्थ और दूसरों के लिए कटुता भरी होती है, वह बाहर से कितना भी सुखी दिखाई दे, भीतर से कभी शांत नहीं रह सकता। इसके विपरीत सत्कर्म वह प्रकाश है, जो मनुष्य के भाग्य तक को बदल देता है। किसी दुखी को सहारा देना, भूखे को भोजन देना, किसी निराश व्यक्ति को आशा देना, सत्य का साथ देना और अपने व्यवहार से किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना—ये छोटे-छोटे सत्कर्म जीवन में बड़ा परिवर्तन लाते हैं।सत्कर्म का फल तुरंत मिले, यह आवश्यक नहीं; पर उसका प्रभाव अवश्य मिलता है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर समय के साथ वृक्ष बनता है, वैसे ही अच्छे कर्म धीरे-धीरे जीवन को नई दिशा देते हैं। कई बार मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी इसलिए बच जाता है क्योंकि उसके पूर्व के सत्कर्म उसके साथ खड़े होते हैं। इतिहास और धर्मग्रंथ भी यही बताते हैं कि पाप का अंत पतन है और पुण्य का अंत उत्थान। रावण अत्यंत विद्वान था, पर उसके अहंकार और अधर्म ने उसे विनाश तक पहुँचा दिया। वहीं राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा, इसलिए आज भी उनका नाम आदर से लिया जाता है। सच्चाई यही है कि भाग्य आकाश से नहीं उतरता, वह हमारे कर्मों से निर्मित होता है। मनुष्य अपने सत्कर्मों से न केवल अपना जीवन बदल सकता है, बल्कि दूसरों के जीवन में भी उजाला भर सकता है। इसलिए जीवन में ऐसा कुछ अवश्य करें कि किसी की दुआ मिले, आह नहीं।क्योंकि पाप केवल नर्क का द्वार खोलता है, पर सत्कर्म भाग्य के बंद दरवाज़े भी खोल देते हैं।

 - अलका  पांडेय

 मुंबई - महाराष्ट्र 

         कर्म के सिद्धांत के अनुसार पाप से नरक और सत्कर्म से भाग्य बदलता है   बिलकुल सत्य है   क्योंकि पाप में दुसरों को कष्ट पहुँचाना, चोरी करना , ठगी करना, झूठ बोलना व अनैतिक कार्य करना इत्यादि आता है जिससे दुसरों को हानि और कष्ट के  अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता जिससे उनकी बद्दुआओं का असर पापी पर पड़ता है और वो घोर नरक  में ही कुढ़ता रहता है, दुसरी तरफ सत्कर्म  जैसे, दान, दया, प्रेम, मदद करना, इत्यादि शुभ कर्मों में आते हैं और जो मनुष्य इन कर्मों को अपनाते हैं और करते हैं वो अपने भाग्य को अवश्य चमकाते हैं क्योंकि उनके द्वारा किए गए शुद्ध कर्म ही उनकी  भाग्य की रेखा को तब्दील करके ही ऱख देते हैं तो आईये आज की चर्चा को आगे बढ़ाने  का प्रयास करते हैं कि पाप से सिर्फ नरक मिलता है और सत्कर्म से भाग्य बदलता है मेरा मानना है कि अशुभ कर्म या पाप मन की मलिनता का प्रतीक है क्योंकि पाप में हिंसा, झूठ, चोरी इत्यादि वाले कार्य ही मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट व मलीन कर देते हैं जिससे वो बुरे कर्मों में फंस कर अपना ही नहीं बल्कि अपने परिवार को भी ले डूबता है दुसरी तरफ परोपकारी, आज्ञाकारी,  महाज्ञानी व  सदाचारी मनुष्य अपने कर्मों को शुद्ध रखते हुए हमेशा नेक कार्य करने में लगा रहता है और कभी किसी को कष्ट नहीं देना  चाहता, ऐसे मनुष्य के लिए आगे भी स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं और वो जिंदगी भर सुख  भोगता है तथा उसके कर्म ही उसे नेक रास्ता व नेक सलाह के साथ उच्च भाग्य की तरफ ले जाते हैं,  जबकि वर्तमान में किए जा रहे बुरे कर्म व्यक्ति के पुण्य को भी समाप्त कर देते हैं जिससे व्यक्ति के भाग्य पर भी ठेस पहुँचती है अन्त में यही कहुँगा कि मनुष्य अपने वर्तमान कर्मों से अपने भाग्य को बदलने में पूरी तरह स्वतंत्र है इसलिए मनुष्य को अपने बुरे कर्मों को त्याग कर अच्छे कर्मों द्वारा दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल सकता है इसलिए मनुष्य को पाप का त्याग करना अति   अनिवार्य है तथा सत्कर्म को अपना कर नेक कामों में रूची रखते हुए अपने भाग्य को खुद बदलना आना चाहिए ताकि हम सत्कर्म  को अपना कर दुसरों का भला करते करते अपना भी भला कर सकें ताकि उनके भाग्य की रेखा भी चमक उठे। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

     जीवन के परिदृश्य में पाप और पुण्य एक सिक्के के दो पहलू है। जिसके आधार पर हमें पग-पग चलना पड़ता है। पाप से सिर्फ नरक मिलता है, सत्कर्म से तो भाग्य बदलता है। कथनानुसार सत्यता की ओर अग्रसर होता है। हम कोशिश तो बहुत करते है, किन्तु कहीं न कहीं, कभी भी पुण्य और सत्कर्म करते हुए, भी पाप करने की स्थिति निर्मित हो ही जाती है, जिसके परिप्रेक्ष्य में हमें नरक मिलता, जरूरी नहीं सत्कर्म से भाग्य बदल जाए।  हमारे विचार चंचलित है, जिसे रोक पाना असंभव सा प्रतीत होता है। मन इन्द्रियों को एकाग्र करने की आवश्यक प्रतीत होता है। तभी हम नरक से बचा जा सकता है और सत्कर्म से भाग्य बदल सकते है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

      बढिय़ा विषय। सर्वप्रथम प्रश्न उठता है कि "पाप" क्या है। पुराणों में वर्णित स्वर्ग नर्क की विवेचना में पापी को रौरव नरक भोगना पड़ता है। किसी का दिल दुखाना सबसे बड़ा पाप है। आत्महत्या दूसरे की हत्या से भी बड़ा पाप है। पाप पुण्य की विचित्र सी परिभाषा परिकल्पना ने इंसानों को बहुत-बहुत डराया है, लेकिन समाधान नहीं दिया। अनेकानेक बार अनजाने ही अनचाहे पाप घटित हो जाते हैं हमारे हाथों। फिर क्या ऐसे अवसर पर भी पापी कहलाते है? मौन हैं शास्र - - चुप हैं पुराण - - और - - चुप हैं पंडित मौलवी पादरी। हाँ ये सच है कि सत्कर्म पुण्य है इसलिये इससे भाग्य बदलता है। गूढ़ प्रश्न वहीं का वहीं है कि वह कौन सी अनमोल, अद्भुत, अद्वितीय, अभिनंदनीय, अनजानी सत्ता है जो हमारे पाप-पुण्य पर फैसला लेती है?  पाप-पुण्य का निर्धारण करती है? बहुत कठिन हैं इन प्रश्नों के उत्तर! आसमान पर बैठे उस जादूगर की उंगलियों के इशारे पर ही सब कर्म होते हैं। "तूच करता आणी करवता शरण तुला भगवंता" अर्थात "तू ही करनेवाला है और तू ही करवानेवाला है  - - हम तेरी शरण में हैं" बताईये कितनी गहराई है इस मराठी भजन में। तात्पर्य यही कि हमारे हाथ में बस "कर्मण्येवाधिकारस्ते" है "मा फलेषु कदाचन" फल देने वाला वह आसमानी बादशाह है  - - फिर हम क्यों चिंता करें।" जियो और जीने दो"! बस

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

         पाप से सिर्फ नरक ही मिलता है. और सत्कर्म से भाग्य बदलता है.बात तो सत्य है. लेकिन नर्क है कहाँ ये दुनिया ही तो नर्क के समान है स्वर्ग के जैसा है. गलत काम करने से परिणाम गलत ही मिलते हैं  जो नर्क के समान है. अपराध करने पर जेल जाना पड़ता है जो नर्क के समान ही है. इस तरह से किसी को दुःख देंगे तो हमें भी दुःख मिलेगा. जो कि नर्क के समान लगेगा. गंदी जगह ही नर्क समान है. ऊपर कोई नर्क नहीं होता है.रहा सत्कर्मों से भाग्य बदलने का तो  अच्छे पढ़ाई से अच्छी नौकरी मिल सकती है जिससे हमारा जीवन सुचारू रूप से चलता है. अच्छे विचारों से हमें सम्मान मिलता है. अच्छे व्यावहार से समाज में इज़्ज़त मिलती है. यानी अच्छे कर्म से भाग्य बदल सकता है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

      किसी ने सच ही कहा है कि पुण्य कर्म करते हैं तो स्वर्ग मिलता है और पाप करते हैं तो नर्क मिलता है। सही शब्दों में पाप पुण्य का फल इसी धरा पर इसी देह में मिलता है। हम अक्सर देखते हैं जब हमसे कोई गलत कार्य हो जाए, किसी का मन दुखाया जाए, जानबूझ कर कोई ऐसा काम हो जाए जो किसी दूसरे को ठीक ना लगे तो उसका फल अगले जन्म तो बाद की बात है इसी जन्म में बुरे काम का बुरा फल मिलता है और इसके विपरीत जब हम अच्छा काम करते हैं कोई भी सत्कर्म करते हैं तो उससे मन को शांति मिलती है और उसका फल भी अच्छा होता है और अच्छे काम से हमारे बुरे कर्म कट जाते हैं और भाग्य भी बदल जाता है क्योंकि जैसे पाप का फल मिलता हैं ऐसे ही सत्कर्मों का भी वातावरण अलग बनता है, निश्चित ही सत्कर्म से भाग्य बदलता है और मानसिक व आंतरिक शांति मिलती है। तभी कहा गया है पाप से सिर्फ नरक मिलता है सत्कर्म से तो भाग्य बदल जाता है। इसीलिए जीवन में हमेशा हमें पाप से बचना चाहिए और पग- पग अच्छे कार्य करते रहना चाहिए, जिससे दूसरों को सुख शांति मिले। औरों को शांति देकर, सुख देकर हमें भी शांति मिलती है। हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल लौट कर आता है। 

- डॉ. संतोष गर्ग 'तोष' 

  पंचकूला - हरियाणा 

         भारत के अमर स्वतंत्रता सेनानी सुखदेव थापर (Sukhdev Thapar) जी की पावन स्मृति में प्रस्तुत आपकी पंक्तियाँ मानव जीवन के गहन सत्य को अत्यंत सरल किन्तु प्रभावशाली शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं। “पाप से सिर्फ नरक मिलता है” पंक्ति यह संदेश देती है कि बुरे कर्म मनुष्य को अंततः दुःख, अशांति, अपमान और पतन की ओर ले जाते हैं। वहीं “सत्कर्म से तो भाग्य बदलता है” यह प्रेरणा देती है कि सच्चाई, परिश्रम, ईमानदारी और मानवता के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अपने जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकता है। वे भगतसिंह राजगुरु के साथ फॉंसी का फंदा चूमने वाले क्रांतिकारी थे। यह रचना भारतीय संस्कृति की उस महान भावना को उजागर करती है जहाँ कर्म को ही मनुष्य की वास्तविक पहचान और भविष्य का निर्माता माना गया है। धन, पद और शक्ति क्षणभंगुर हो सकते हैं, किन्तु अच्छे कर्म सदैव अमर रहते हैं। यही कारण है कि महान क्रांतिकारियों और महापुरुषों का स्मरण आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है, क्योंकि उनका जीवन त्याग, सत्य, साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक होता है। इन पंक्तियों में केवल नैतिक शिक्षा ही नहीं बल्कि समाज को सही मार्ग दिखाने वाली चेतना भी निहित है। यह रचना युवाओं को बुराइयों से दूर रहकर अच्छे कर्म करने, मानवता को अपनाने तथा राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने की प्रेरणा प्रदान करती है। वास्तव में आपकी यह प्रस्तुति एक चेतावनी भी है और एक उज्ज्वल संदेश भी कि मनुष्य अपने कर्मों से ही महान बनता है। उन्हें नमन करते हुए मैं गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूॅं।

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

    इंसान अपने जीवनकाल में जितना भी पाप किया रहता है अंत काल में अपने कर्मों का फल भोगता है ! अच्छे फल की प्राप्ति के लिए सच्चाई से किया गया कर्म है !मनुष्य जानते हुए भी नकारा बन शांति चाहता है ! क्योंकि इंसान जब जानते हुए भी स्वार्थ के वशीभूत हो जब ग़लतियाँ करता है ! होशियार बनने की कोशिश करता रहता है इंसान ही इंसान को खीज कर बदुआ दे कहता है तुझे नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी ! अच्छे को अच्छे कर्म और उसके फल का सीधा सिद्धांत बताती हैं । पाप से सिर्फ नरकं मिलता है  मतलब अगर हम बेईमानी, झूठ, छल-कपट, दूसरों को नुकसान पहुँचाने जैसे बुरे कर्म करेंगे, तो उसका अंजाम भी बुरा ही होगा। सुसंकृति धर्म पर आधारित होते है ! धर्म की आड़ में किए गए कृत का नाम नरक है सामाजिक जीवन में मिलने वाली बदनामी, पश्चाताप, मानसिक अशांति, और लोगों का विश्वास खो देना भी नरक ही है। सुसंकृति धर्म पर आधारित होते है ! जो सत्कर्म से भाग्य मिलता है  मतलब: अगर हम सच्चाई, मेहनत, दया, मदद और नेक काम करेंगे, तो धीरे-धीरे वही हमारे लिए अच्छा समय और सौभाग्य बनाता है।  भाग्य कोई जादू नहीं है - अच्छे कर्मों का जमा हुआ फल है ! जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।  बुरे काम का नतीजा दुख है, और अच्छे काम का नतीजा सुख और सम्मान है। जीवन भर जिन्होंने जो कर्म किए हैं, वही उनका आज का सम्मान और प्यार बना है।

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

        पाप से सिर्फ नरक मिलता है।नरक यानि उन पाप कर्मों का वह परिणाम जहां जीवात्मा को भयंकर यातनाएं सहनी होती है। लगभग हर धर्म में ऐसे नरक का जिक्र मिलता है। गरुड़ पुराण में अनेक प्रकार के नरकों का वर्णन मिलता है जो पाप कर्मों के अनुसार भोगने पड़ते हैं। सत्कर्म यानि अच्छे कर्मो भक्ति,नाम जप आदि से भाग्य बदलने की कथाएं भी मिलती है। वाल्मीकि की कथा, अंगुलि माल की कथा सत्कर्म से भाग्य बदलने के उत्कृष्ट उदाहरण है। जाने अनजाने पाप कर्मों का फल तो मिलना ही है लेकिन सत्कर्म हमें बल प्रदान करते हैं जो हमें उनको सहने की क्षमता प्रदान करते हुए हमारे भाग्य को बदलने की क्षमता भी रखते हैं।अतः सत्कर्म अवश्य करते रहने चाहिए।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

 धामपुर -  उत्तर प्रदेश

       पाप से सिर्फ नरक मिलता है, सत्कर्म से तो भाग्य बदलता है.....यह उक्ति बिल्कुल सही है....  कर्मों का सिद्धांत  ही हमारे जीवन को व्यक्ति के कर्म के हिसाब से ही फल देता है जिसमें पाप और पुण्य शामिल हैं। हमारी नकारात्मक सोच हमें अशांति देती है। हमारा चित्त किसी भी तरह से स्थिर नहीं होता। हमारी गलत सोच, गलत विचार के चलते व्यक्ति गलत कर्मों की तरफ प्रेरित हो जधन्य अपराध कर  पाप की राह ले बैठता है। जिसका भुगतान उसे यहीं करना पड़ता है। चोरी, नारी को उत्पीड़ित करना, खून करना, दूसरों को दुखित कर उसे जेल ही होती है। यह भी एक नर्क ही है ना!  वहीं सत्कर्म हमारे वर्तमान को तो बदलता है साथ ही हमारे भाग्य का स्वामी भी बन जाता है जिससे हमारा भविष्य भी सुधर जाता है। हमारी सकारात्मक सोच, सुंदर विचार और विनयशीलता, शांति से कर्म करते हैं तो मीठा फल तो मिलना ही है। मनुष्य अपने कर्म से स्वयं अपना भाग्य बनाता है। ऊँची सकारात्मक सोच एवं मेहनत ,मन की शांति ही  व्यक्ति को सत्कर्म करने को प्रेरित करता है जिससे व्यक्ति अपने भाग्य को बदलने की हिम्मत रखता है।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

        कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।जो जस करहिं  सो तस फल चाखा।। रामचरितमानस में यह महत्वपूर्ण चौपाई है जिसमें कर्म को प्रधानता देते हुए स्पष्ट किया है कि कर्म के अनुसार प्रतिफल मिलता है। ऐसा सर्वमान्य है कि कर्म के दो रूप होते हैं । एक अच्छा और दूसरा बुरा। जिसे धर्म के दृष्टि में पुण्य और  पाप में बांटा गया है। बुरे कर्मो को पाप और अच्छे कर्मो को पुण्य की श्रेणी में रखा गया है। जिनके प्रतिफल में बुरे कर्म यानी पाप कर्म करने वालों को नर्क और अच्छे कर्म  यानी पुण्य कर्म करने वालों को स्वर्ग मिलने का स्थान सुनिश्चित माना गया है। सार यही कि हमें सदैव अच्छे कर्म यानी सत्कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

" मेरी दृष्टि में "  सत्कर्म से ही दुनिया चलती है। सत्कर्म से भगवान राम बना जा सकता है या भगवान श्रीकृष्ण बना जा सकता है। यह सब सत्कर्म के बल से भगवान का दर्जा प्राप्त किया जाता है। यह वास्तव में कर्म का खेल है। बाकी सब कुछ भाग्य की देन है। 

      - बीजेन्द्र जैमिनी 

     (संचालन व संपादन)


Comments

  1. आदरणीय डॉ. बीजेन्द्र जैमिनी द्वारा आयोजित
    परिचर्चा में प्रकाशित सभी सम्मानित रचनाकारों को हार्दिक बधाई शुभकामनाएं।

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  2. भारतीय स्वतंत्रता संग्रामके प्रमुख क्रांतिकारी परम आदरणीय वंदनीय श्री सुखदेव थापर जी की स्मृति में डॉ बीजेंद्र जैमिनी द्वारा संचालित परिचर्चा में मेरे विचारों को सम्मानित संपादित किया गया। आप सभी का सादर धन्यवाद आभार व्यक्त करती हूं। वन्दे मातरम् 🙏🇮🇳🙏🙇

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