कश्मीरी लाल ज़ाकिर की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

             जीवन की सफलता बहुत महत्व रखतीं है।‌तभी उत्सव मनाने की तैयारी की जाती है।‌ और पहचान भी बढ़ती है । यही सफलता का राज़ है। यह सफलता से उत्सव की यात्रा कहां जाता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        हमें सफलता के महत्व को समझाता सफलता का महत्व पहचान और सम्मान आत्म विश्वास को बढ़ाता है :उत्सव और आनंद का अवसर मिलता है, जो हमारे जीवन को सुखी और समृद्ध बनाता है।नई अवसर सफलता से हमें नए अवसर मिलते हैंसफलता के लिए कड़ी मेहनत करें और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रयास करें आपको किसी विशेष क्षेत्र में मदद चाहिए? पर इसके लिए चापलूसी तिमारदारी की जरूरत नहीं होती व्यक्ति स्वयं से स्वयं मूल्यांकन कर सफलता प्राप्त करता हैं  जिसमें नैतिक जिम्मेदारियों का एहसास हो जिसे देख परिजन उसी मानसिकता  आगे बढ़ प्रगति का राह परिणाम है असफलता अनुभव देती है इंसानियत से क़रो प्यार । कही सफलता कही विफलता । इंसानियत से प्यार करो विचार का सामंजस्य बिठाओ गांधी के सिद्धान्तों से प्यार करो आज से बेहतर कल बनाओ  सत्कर्म सिद्धान्तों विचार बनाओं कलियों फूल सुगंध फल से प्रकृति जीवन मधुर मुस्कानबनाओ। नाकामियाँ कमियों को नज़र अन्दाज़ कर पारदर्शी जीवन दर्पण दिखाओं। सज्ञान लेकर देकर जीवन सवारों ।जीवन अपना को सफल बनाओ अपने विचारो की मौलिकता का सम्मान करना चाहिए! 

- अनीता  शरद झा 

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

      उत्सव होता ही खुशी में है और असफलता खुशी नहीं देती, इसलिए निश्चित मानिए कि सफलता का ही उत्सव होता है। भारतीय तो होते ही उत्सवधर्मी हैं। यहां हर दिन उत्सव ही रहता है। इसके लिए बहाने मिल ही जाते हैं। अब रही बात यह कि पहचान के बिना सफलता नहीं है,तो इसमें अलग अलग स्थिति बनती है। व्यापार, समाज में सफलता के लिए जान पहचान बहुत जरूरी होती है लेकिन किसी प्रतियोगी परीक्षा या नौकरी में जान पहचान की जगह योग्यता ही महत्त्वपूर्ण होती है। सफलता निरंतर अभ्यास,श्रम और लक्ष्य के  प्रति समर्पण भाव से ही मिलती है। इसके साथ मिली सफलता स्थायी और वास्तविक आनन्ददायक होती है जो जीवन के सर पर को उत्सव बना देती है।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

        यह विचार जीवन की मूल सच्चाइयों को सरल रूप में प्रस्तुत करता है। सफलता के बिना उत्सव नहीं है – यह पंक्ति बताती है कि मनुष्य जीवन में केवल प्रयास करना पर्याप्त नहीं है; जब तक प्रयास का परिणाम—सफलता—प्राप्त नहीं होती, तब तक उपलब्धि का आनंद या उत्सव असम्भव है। सफलता वह पल है जो मेहनत और संघर्ष का सार्थक अनुभव कराता है। पहचान के बिना सफलता नहीं है – सफलता चाहे प्राप्त हो जाए, यदि समाज, समाज के लोग या स्वयं का आत्मबोध उस सफलता को मान्यता न दें, तो उसका महत्व अधूरा रह जाता है। पहचान ही सफलता को सार्थक बनाती है; यह मानवीय संतुष्टि और आत्मविश्वास का मूल है। इस प्रकार जीवन में कर्म, प्रयास, सफलता और मान्यता सभी एक दूसरे से जुड़े हैं। केवल मेहनत करना पर्याप्त नहीं, परिणामों का अनुभव और समाजिक या व्यक्तिगत मान्यता से ही जीवन में उत्सव, खुशी और प्रेरणा का जन्म होता है। यही कारण है कि प्रयास के साथ धैर्य और सम्मान दोनों आवश्यक हैं। उदाहरण: किसी खेल खिलाड़ी ने कठिन परिश्रम से खेल में जीत हासिल की। उसकी मेहनत को परिवार, कोच और प्रशंसक मान्यता देते हैं। तभी उसका उत्सव पूरा होता है; न केवल वह स्वयं खुश होता है, बल्कि समाज में उसकी उपलब्धि का महत्व भी बढ़ता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

      कोई भी उत्सव सफलता होने पर ही होता है. बिना सफलता के कोई उत्सव होता नहीं है. बिना सफलता के उत्सव बेमानी लगेगा. विद्यार्थी परीक्षा पास करने पर ही उत्सव मनाता है. किसान फसल तैयार होने और पकने पर ही उत्सव मानता है. नेता चुनाव जीतने पर ही उत्सव मना सकता है. इस तरह हम देखते हैं कि सफलता मिलने पर ही उत्सव मनाया जाता है या मनाना चाहिए. रही बात सफलता और पहचान की तो पहचान होने पर सफलता मिलने में आसानी होती है.  वर्ना परिश्रम करने पर तो सफलता मिलनी चाहिए या मिलती भी है. लेकिन आजकल जो देश की स्थिति ऐसी हो गई है कि बिना पहचान के सफलता मिलने में बहुत सारी कठिनाइयां पैदा होने लगी हैं. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

      उत्सव मनाना अर्थात खुशियाँ मनाना, हर्षोल्लास का वातावरण उत्पन्न होना। यह हर्षोल्लास का वातावरण तभी उत्पन्न होता है जब कुछ ऐसी घटना घटित हो जो मन को आनंदित करे। जीवन में सफलता ही एक ऐसी चीज है जो किसी के भी मन को सर्वाधिक आनंदित करती है। सफलता सिर्फ एक व्यक्ति को ही नहीं आनंदित करती है बल्कि एक व्यक्ति की सफलता से उसके घर-परिवार, सगे-संबंधी, मित्रों की टोली सभी लोग आनंदित होते हैं और फिर इस सामूहिक आनंद के वातावरण में एक उत्सव का माहौल बनता है। सभी मिलकर खुशियाँ मनाते हैं। एक दूसरे को मिष्ठान्न वितरित करना, उपहार देना यह सभी उसी उत्सव का ही एक रूप होता है। अब सवाल यह उठता है की सफलता किसे मिलती है? सफलता उसे ही मिलती है जो इसके लिए अथक परिश्रम करता है, दिन-रात उसके लिए प्रयासरत रहता है तथा श्रेष्ठ जनों और गुरुजनों के आशीर्वाद के साथ, उनके मार्गदर्शन में सही दिशा में अपने कदम बढ़ाता है। हाँ! एक बात है कि अगर जिस दिशा में भी हमें सफलता अर्जित करनी है उस ओर यदि हमारी पहचान के कुछ लोग होते हैं तो हमें सफलता अवश्य मिलती है। हमारा मार्गदर्शन भी अपेक्षाकृत अधिक उचित व सशक्त होता है। क्योंकि सामने एक अनुभवी व्यक्ति है जो हमारे परिचित हैं और हमें सही दिशा दर्शाने के पूर्णतया योग्य हैं। किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि जिसकी पहचान होती है सफलता मात्र उसे ही प्राप्त होती है। हर वह व्यक्ति जो पूर्ण ईमानदारी के साथ, अपनी योग्यता के अनुसार ही अपने लक्ष्य का निर्धारण करता है तथा दृढ़ निश्चय के साथ उस मंजिल की तरफ अपने कदम बढ़ाता है, सफलता प्राप्ति हेतु दिन-रात प्रयासरत रहता है उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है। फिर तो उसके जीवन में उत्सव ही उत्सव है।

- रूणा रश्मि 'दीप्त'

राँची - झारखंड

     जब हम सफल हो जाते है, तो एक उत्सव और उत्साहित होकर सम्मिलित होते है। सफलता के बिना उत्सव नहीं है, पहचान के बिना सफलता नहीं है। यही हमारा लक्ष्य केन्द्रित हो जाता है। हम अति उत्साहित हो जाते है। जरूरी नहीं पहचान होगी तभी सफल होगे। मन में धीरजता ही शिखर तक पहुंचाता है। एक राह चलते हुए भी पहचान अपने आप मिलती चले जाती है। हम घर में बैठें रहे,तो पहचान कहा हो सकती है.....।

-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

    बालाघाट - मध्यप्रदेश

        हो सकता है यह कथन किसी परिस्थिति विशेष या व्यक्ति विशेष के संदर्भ में सही उतरता हो लेकिन हमेशा ही सत्य हो यह मान लेना उचित नहीं है। इस पर सचमुच लंबी बात और सोच-विचार की आवश्यकता है। उत्सव मन की भावना है और सफलता विशुद्ध दुनियांवी बात। सफलता हरेक की व्यक्तिगत खुशी होती है जिसे पाने पर उतसवी मन खुश होता है।हमारी पहचान व्यक्तिगत होते हुए भी उसमें दूसरे पक्ष की दखलअंदाजी होती है  - - दूसरे का हमारे प्रति दृष्टिकोण हमारे प्रति भाव विभाव अनुभाव होता है। सफलता नितांत निजी होती है - - अपने लिये होती है - - अपनों के लिए होती है! इसलिये सफलता मन का उत्सव होती है। लेकिन पहचान द्विपक्षीय होती है। पहचान किसी चीज की हो इंसान की हो या भावनाओं को साथ लेकर हो  - - उसमें सफलता या असफलता की कोई दरकार नहीं होती। इसलिये मेरा मानना है कि सफलता हमारी अपनी होती है - - एक पक्षीय होती है जबकि पहचान के बल पर पाई सफलता मात्र एक क्रिया होती है क्रियेटिविटी नहीं। उचित है कि अपने आप को जाने  - - अपने आप को पहचानें और अपनी सफलताओं का जश्न मनायें। पहचान के बल पर पाई सफलता आंशिक होती है आशीष नहीं।

- हेमलता मिश्र "मानवी"

नागपुर - महाराष्ट्र 

     अगर सफलता की बात करें तो सफलता का अर्थ केवल पैसा कमाना नहीं है बल्कि अपने मूल  मूल्यों, आत्म संतोष और उद्देश्य को पाना है , जब कोई भी  अनुशासित  और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ व लगन से मेहनत करके लक्ष्यों को प्राप्त कर लेता है तभी उसकी सच्ची पहचान बनती है, और जब कड़ी मेहनत करने के बाद कुछ हासिल होता है तो उत्सव मनाने को भी मन करता है तो आईये आज इसी चर्चा  को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि सफलता के बिना उत्सव नहीं और पहचान के बिना सफलता नहीं,  मेरे ख्याल में पहचान मेहनत, अनुशासन और धैर्य से बनती है जब हम अपने काम पर फोकस करते हैं तो नाम और पहचान बनना संभव है वास्तव में सफल होने के लिएअपनी मेहनत पर भरोसा रखना जरूरी है ताकि हम अपने काम से अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो सकें रही उत्सव की बात तो सफलता एक सार्वजनिक उत्सव है जो मेहनत से हासिल होता है, सफलता न केवल लक्ष्यों को पूरा करती है बल्कि अपनों के साथ खुशियाँ बाँटने और भविष्य के लिए प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर भी देती है यही नहीं सफलता का सही अर्थ आन्तरिक शान्ति, अटूट मेहनत और लगातार आगे बढ़ने का नाम है इसलिए सफलता एक ऐसा उत्सव है जिसे समाज के साथ मिलकर मनाया जाना चाहिए यही नहीं सफलता का जश्न मनाते समय करूणा, गर्व  व अभार  इत्यादि की भावना होनी चाहिए यह सत्य है कि सफलता एक पड़ाव है न कि मंजिल इसलिए इसके लिए खुशियाँ मनाएं और अगली मंजिल के लिए तैयार हो जाएं, क्योंकि सफलता ही सही पहचान बनाती है और उत्सव का कारण बनती है  इसलिए की जब सपने पूरे होने लगते हैं तो खुशियाँ अपने आप छलकती हैं  जिसके कारण सफलता का जश्न केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि एक समाजिक उत्सव बन जाता है, अन्त में यही कहुंगा कि  सफलता मिलने से खुशी व आत्मविश्वास  दोनों बढ़ने लगते हैं जिससे नई ऊंचाइयों को पाने का हौंसला मिलता है तथा प्रेरणा विकसित होती है जो आसपास के माहौल को भी प्रेरित करती है जिससे पहचान बढ़ती है जिससे कढ़ी मेहनत, प्रतिभा और लक्ष्य को भी मान्यता मिलती है, इसलिए पहचान और उत्सव मनुष्य द्वारा विकसित की गई जीवन शैली , विश्वास और समाजिक जुड़ाव की देन है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

     सफलता जीवन की वह अवस्था है, जहाँ हमारे प्रयासों को सार्थकता मिलती है। बिना सफलता के उत्सव का कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता, क्योंकि उत्सव उसी उपलब्धि का प्रतीक होता है जिसे पाने के लिए हमने परिश्रम किया होता है। जब लक्ष्य प्राप्त होता है, तभी मन में सच्ची खुशी और उत्सव का भाव जन्म लेता है। परंतु सफलता भी तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी पहचान बनाए। पहचान केवल नाम या रूप से नहीं, बल्कि अपने कर्म, गुण और व्यक्तित्व से बनती है। जब तक समाज हमें हमारे कार्यों के आधार पर नहीं पहचानता, तब तक सफलता अधूरी लगती है। पहचान ही सफलता को स्थायित्व और सम्मान प्रदान करती है।इस प्रकार, पहचान से सफलता और सफलता से उत्सव का संबंध गहरा है। यदि हम अपने कर्मों से सच्ची पहचान बनाएं, तो सफलता निश्चित है, और सफलता के साथ जीवन में उत्सव स्वतः ही आ जाता है।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

     यह सच है जब हम रात दिन कड़ी से कड़ी मेहनत करके जो हमारे जीवन का लक्ष्य था उसे प्राप्त कर लेते हैं। तब वास्तव में वह लक्ष्य प्राप्ति की सफलता किसी उत्सव से कम नहीं होती । हम शारीरिक मानसिक रूप से प्राप्त उपलब्धियों का जश्न मनाने लगते हैं । हमारा दिल दिमाग बाग बाग होता है ।परिवार समाज के साथ इस उत्सव को मनाना चाहते हैं। क्योंकि अटूट परिश्रम संघर्षों की तप्त धूप में अनुशासन और धैर्य के साथ तप तप कर हासिल की गई सफलता त्यौहार की खुशी से भी बढ़कर होती है। जिसे हम सबके साथ शेयर भी करते हैं। लोग हमसे प्रेरणा भी पाते हैं। हमें यह सफलता कर्मठता और जीवन जीने के ढंग पर प्राप्त हुई है । जिससे यह एक पहचान बन जाती है कि अमुक व्यक्ति अपने गुणों के कारण इतना महान बना है उसकी इस पहचान को भविष्य में पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखने के लिए सार्वजनिक तौर पर पारिवारिक  सामाजिक, राष्ट्रीय ही क्या, कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जश्न मनाना जारी रखते हैं। बड़ी-बड़ी महान हस्तियों के जन्म दिवस को उत्सव के रूप में मनाये जाने से हम सब परिचित हैं। समाज, साहित्य ,विज्ञान, राजनीति, धर्म, जीवन का कोई भी क्षेत्र हो सब में कर्मठता और लग्न से विशेष अटूट पहचान बनती है जो व्यक्ति को सफलता के शिखर तक पहुंचाती  है ;जिसका यशोगान सार्वजनिक उत्सव के रूप में ही होता है।

 - डाॅ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     ये पंक्तियाँ जीवन के उस गूढ़ सत्य को उद्घाटित करती हैं, जहाँ उपलब्धि मात्र बाहरी तामझाम नहीं, बल्कि आत्म-स्वीकृति और सामाजिक मान्यता का समन्वित परिणाम होती है।उत्सव केवल दीपों, सजावटों और शब्दों का विस्तार नहीं, बल्कि वह क्षण है जब परिश्रम अपनी परिणति को स्पर्श करता है। सफलता के अभाव में उत्सव की आभा खोखली प्रतीत होती है, मानो बिना सुर का संगीत। वहीं सफलता भी तब तक अधूरी है, जब तक उसे पहचान का आलोक प्राप्त न हो। पहचान वह दर्पण है, जिसमें सफलता अपनी वास्तविक छवि को देखती है और समाज में अपना स्थान सुनिश्चित करती है।अतः सफलता और पहचान, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं—एक के बिना दूसरा अपूर्ण। जब ये दोनों संगमित होते हैं, तभी जीवन में सच्चे उत्सव का सृजन होता है, जो न केवल क्षणिक उल्लास देता है, बल्कि आत्मा को स्थायी संतोष से भी परिपूर्ण करता है।

- अर्चना झा 

पानीपत - हरियाणा 

         सफलता के बिना उत्सव नहीं और पहचान के बिना सफलता नहीं..यह बात एकदम सही है लेकिन पहचान इतनी आसानी से नहीं मिलती और ना ही बनती है। अपनी पहचान बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करनी होती है, अपेक्षित परिणाम ना मिलने पर भी आशावन बने रहते हुए निरंतर कर्म पथ पर डटे रह कर कर्म करना होता है। कर्मशील व्यक्ति ही अपनी असफलता को सफलता में बदलने की और अपना भाग्य लिखने की शक्ति रखता है। बस शर्त इतनी ही होती है की अपने काम में अपेक्षित परिणाम ना मिलने पर निराशा के अंधेरे के अंधेरे को चीर कर अपेक्षित परिणाम पाने के लिए अपने काम में जुटा रहे और दूसरी स्थिति..मनचाहा होते ही अहंकार में डूबे नहीं। जो व्यक्ति ऐसा कर पाता है वह अपने काम में मनचाहा परिणाम प्राप्त कर अपनी पहचान बनाता है, अपने काम में सफलता प्राप्त करता है और उस सफलता का उत्सव भी मनाने का अवसर प्राप्त करता है। इसीलिए यह कहा जाता है की पहचान के बिना सफलता नहीं और सफलता के बिना उत्सव नहीं है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

       मूल पंक्तियाँ स्वयं में अत्यंत प्रभावशाली हैं, परंतु उनके भाव को और अधिक ऊँचाई देते हुए यह कहा जा सकता है कि यह कथन केवल प्रेरणा नहीं है, बल्कि जीवन का नैतिक विधान प्रतीत होता है। इसमें संघर्ष की तपिश, आत्मबोध की रोशनी और समाज के प्रति उत्तरदायित्व जैसे तीनों का अद्भुत समन्वय है। अर्थात “सफलता के बिना उत्सव नहीं है” उक्त शब्दावली सफलता को केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि साधना का परिणाम बताया गया है। यह पंक्ति उस कृत्रिम चमक-दमक पर प्रहार करती है जो बिना श्रम के उत्सव मनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। सच्चा उत्सव वही है, जो पसीने की बूंदों से सींचा गया हो, जो असफलताओं की राख से उठकर खड़ा हुआ हो। ऐसा उत्सव क्षणिक नहीं, बल्कि आत्मा में स्थायी आनन्द का स्रोत बनता है। उसी प्रकार “पहचान के बिना सफलता नहीं है” ऐसा विचार सफलता को एक व्यापक सामाजिक आयाम देता है। केवल स्वयं के लिए प्राप्त की गई उपलब्धि अधूरी है, जब तक वह समाज के लिए उपयोगी न हो, जब तक वह जनमानस में प्रेरणा न जगाए, तब तक वह सफलता अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकती। पहचान यहाँ अहंकार नहीं, बल्कि कर्तव्य की स्वीकृति है, यह वह दर्पण है जिसमें समाज व्यक्ति विशेष के योगदान को देखता है और स्वीकार भी करता है। इन पंक्तियों में एक गूढ़ संदेश छिपा है कि सफलता का लक्ष्य केवल ऊँचाई पाना नहीं, बल्कि उस ऊँचाई को समाज के कल्याण से जोड़ना है।और जब यह जुड़ाव होता है, तभी उत्सव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक हो जाता है। अन्ततः यह विचार हमें एक उच्चतर जीवन-दृष्टि की ओर ले जाता है। जहाँ व्यक्ति अपने संघर्ष से सफलता अर्जित करता है, अपनी सफलता से पहचान बनाता है, और अपनी पहचान से समाज को दिशा देता है। यही वह चक्र है, जहाँ जीवन केवल जीया नहीं जाता बल्कि प्रेरणा बनकर जिया जाता है। 

- डॉ इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर

       जीवन में उत्सव तभी सार्थक है जब आपने कुछ हासिल किया हो। वही उपलब्धि पहचान बनती है। उपलब्धि हासिल करने यानि सफलता के लिए मेहनत और पहचान का होना अनिवार्य है। मेहनत, उपलब्धि और सफलता का अन्योन्याश्रित संबंध है और ये एक दूसरे के पूरक हैं।

- लीला तिवानी 

सम्प्रति -ऑस्ट्रेलिया

         “सफलता के बिना उत्सव नहीं, पहचान के बिना सफलता नहीं”—यह मात्र दो पंक्तियाँ नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सत्य को उजागर करने वाला दर्शन है। यह हमें बताता है कि जीवन में उपलब्धियाँ तभी सार्थक हैं, जब वे हमारी पहचान से जुड़ी हों, और उनका उत्सव तभी सच्चा होता है, जब वह सफलता के श्रम से उपजा हो। सबसे पहले “पहचान” की बात करें। पहचान केवल नाम या चेहरे की नहीं होती, बल्कि हमारे कर्म, विचार, संघर्ष और मूल्यों की होती है। जब व्यक्ति अपनी पहचान स्वयं गढ़ता है—अपने सिद्धांतों, अपने प्रयासों और अपनी ईमानदारी से—तभी वह सफलता की ओर बढ़ता है। बिना पहचान के मिली सफलता अक्सर क्षणिक होती है, क्योंकि उसमें न तो आत्मविश्वास होता है और न ही स्थायित्व। पहचान वह नींव है, जिस पर सफलता की इमारत खड़ी होती है। अब “सफलता” का अर्थ समझना आवश्यक है। सफलता केवल धन, पद या प्रसिद्धि नहीं है, बल्कि अपने लक्ष्य को ईमानदारी से प्राप्त करना है। यह वह संतोष है जो भीतर से जन्म लेता है। जब सफलता हमारी सच्ची पहचान के अनुरूप होती है, तब वह स्थायी और प्रेरणादायक बनती है। और फिर आता है “उत्सव”। उत्सव केवल बाहरी खुशी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर की संतुष्टि और गर्व का उत्सर्जन है। जब हम सफलता प्राप्त करते हैं, तब उस पल का उत्सव मनाना स्वाभाविक है। परंतु यदि सफलता ही नहीं मिली, तो उत्सव केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है। इसलिए कहा गया है—सफलता के बिना उत्सव नहीं। लेकिन एक और गहरा पक्ष यह है कि यदि सफलता हमारी पहचान से जुड़ी नहीं है, तो उसका उत्सव भी अधूरा होता है। जैसे कोई व्यक्ति बिना मेहनत के या गलत तरीके से कुछ प्राप्त कर ले, तो वह क्षणिक खुशी तो दे सकता है, परंतु आत्मसंतोष नहीं। सच्चा उत्सव वही है, जो हमारी सच्ची पहचान और परिश्रम की कमाई से उपजता है। आज के दौर में लोग अक्सर दिखावे के उत्सव में उलझ जाते हैं, बिना यह समझे कि सफलता की असली जड़ पहचान में है। सोशल मीडिया की चमक-दमक में लोग बिना वास्तविक उपलब्धि के भी उत्सव मनाते दिखाई देते हैं, परंतु यह क्षणिक है। असली आनंद तब मिलता है, जब हमारी पहचान हमारे कर्मों से बनती है, और सफलता हमारे प्रयासों का परिणाम होती है। अतः हमें चाहिए कि हम पहले अपनी पहचान को मजबूत करें—अपने मूल्यों, अपने कार्यों और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदारी से। जब पहचान सशक्त होगी, तो सफलता स्वतः हमारे कदम चूमेगी। और जब सफलता मिलेगी, तब उसका उत्सव भी सच्चा, गहरा और यादगार होगा।

- अलका पांडेय

 मुंबई - महाराष्ट्र 

" मेरी दृष्टि में " उत्सव के लिए सफलता आवश्यक है । जिससे पहचान बनती है। सफलता ,उत्सव, और पहचान। एक दूसरे के पीछे दौड़ते नज़र आता है। यही जीवन चक्र है। जो चलता रहता है। जिसे समय की गति भी कहते हैं। 

              - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)



Comments


  1. सफलता जब मिलती है तो आनंदमय खुशियां मिलती है। जिससे उत्सव भी होते हैं।और पहचान भी दूर-दूर तक बनती है। जिससे सफलता और भी मिलती है पर यदि अपने कर्तव्य अच्छे हैं तो कहीं ज्यादा बेहतर सफलता हमें मिलती है।
    -सुनील कुमार अवधिया मुक्तानिल 'गाड़ासरई जिला डिंडौरी मध्यप्रदेश
    ( फेसबुक से साभार)

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