हेम बरुआ की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

       सहनशीलता से बड़ा कोई आभूषण नहीं है। जो जीवन में कदम - क़दम पर साथ निभाता है। तथा बड़ी से बड़ी समस्या को हल कर देता है। फिर भी सहनशीलता के रास्ते पर नहीं चलता है। क्रोध किसी समस्या का समाधान नहीं है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है।‌अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
      मैं यह हृदय तल से मानता हूँ कि “सहनशीलता मानवीय आभूषण होती है, परन्तु क्रोध मानवता का शत्रु है”—यह परिस्थितियाँ ही तय करती हैं। यह केवल एक नैतिक वाक्य नहीं, बल्कि उसी जीवन-दर्शन की प्रतिध्वनि है जिसे हेम बरुआ ने अपने कर्म, विचार और सार्वजनिक जीवन से सार्थक किया। वे असम के एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, तेजस्वी वक्ता, लोकसभा के प्रभावशाली सांसद, "प्रजा सोशलिस्ट पार्टी" के प्रमुख नेता तथा संवेदनशील साहित्यकार थे, जिन्होंने लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनाधिकारों की रक्षा को अपने जीवन का ध्येय बनाया था, और इसी कारण उनकी वाणी में संयम था। परन्तु अन्याय के विरुद्ध स्पष्ट और निर्भीक प्रतिरोध भी था। अतः यह सत्य है कि सहनशीलता समाज को संतुलन देती है और मानवता को आभूषित करती है, किन्तु जब किसी पुरुष, नारी अथवा बच्चे के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो, न्याय व्यवस्था मौन हो जाए और अन्याय प्रबल हो जाए, तो अंधी सहनशीलता कायरता का रूप ले लेती है। ऐसी स्थिति में क्रोध करना मौलिक कर्तव्य बन जाता है अर्थात यदि वह संयमित, न्यायोन्मुख और संवैधानिक मर्यादाओं में बंधा हो तो यह एक नैतिक दायित्व बन जाता है कि इस प्रकार सहनशीलता और क्रोध का यह द्वंद्व वास्तव में विरोधाभास नहीं, बल्कि वही संतुलन है जिसे हेम बरुआ जैसे विचारकों ने अपने जीवन से सिद्ध किया था कि शांतिपूर्ण स्वभाव के साथ-साथ अन्याय के विरुद्ध सजग और साहसी प्रतिरोध ही एक जागरूक, उत्तरदायी और न्यायप्रिय समाज की सच्ची पहचान है। क्योंकि अंततः राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्र की सुदृढ़ता तभी संभव है जब उसके नागरिकों के अधिकार सुरक्षित हों और न्याय की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण बनी रहे। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

     मेरी व्यक्तिगत राय में सहनशीलता मानव का आभूषण होता है , पर भारत में, सहनशीलता भारतीय नारी का आभूषण भी होता है , व पर्याय भी ! सहनशीलता के आधार पर , व्यक्ति अपनी समस्त मुश्किलों का , कष्टों का , अड़चनों का , आसानी से सामना कर लेते हैं , व समाधान भी खोज लेते हैं ! सहनशील व्यक्ति , शांत मन से , सोच समझकर कोई कदम उठाता है , व मुश्किल परिस्थिति मैं , ठंडे दिमाग से ,  कठिन समय से जूझता है , व उभरता है !! क्रोध मैं व्यक्ति उत्तेजित होकर , अपने होश खोता है , व विवेकपूर्ण निर्णय भी नहीं ले पाता ! उसकी बुद्धि भी काम नहीं करती , व वह आवेग मैं ऐसे निर्णय लेता है , जिसपर वह उम्र भर पछताने के लिए मजबूर होता है ! अतः क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता है ! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

     सहनशीलता और क्रोध दोनों का कोई सानी नहीं. एक कल्याणकारी एक विनाशकारी. आज की चर्चा में हम यही विश्लेषण करेंगे. मानव जीवन के कई आभूषणों में एक आभूषण सहनशीलता है. ये आभूषण ऐसा है जिसे धारण करने वाले को महान बना देता है. और वह पूजनीय बन जाता है. कुछ लोग कहते हैं जो कमजोर होता है वही सहनशील होता है. पर ऐसी बात नहीं है. कमजोर व्यक्ति सहनशील नहीं हो सकता. शक्तिशाली और मजबूत व्यक्ति ही सहनशील हो सकता है. वर्तमान में सहनशीलता में धरती और नारी सबसे आगे है. इनके जैसा कोई सहनशील नहीं हो सकता. पुराणों के अनुसार महर्षि दधीचि ने जो सहनशीलता की मिशाल पेश की वह मानव कल्याण के लिए कितना जरूरी था हम सबको पता है.क्रोध तो मानवता का दुश्मन है ही. क्रोध करने वाले का अपना ही नुकसान होता है. उसका ही चेहरा विकृत हो जाता है. खून उसी का जलता है. शास्त्रों के अनुसार दुर्वासा ऋषि का क्रोध कितना भयानक था जिसके कारण वह मानव कल्याण का कोई काम नहीं कर सके. उसी तरह बाल्मीकि ऋषि भी अपने क्रोध से चिड़िया को भष्म कर दिए थे और गलत रामायण लिख बैठे थे. उन्हें सीता वनवास की बात नहीं लिखनी थी. जब ये प्रसंग लिख रहे थे तभी वह पक्षी उन पर बिट कर दिया और उन्हें क्रोध आया. वह पक्षी के तरफ क्रोध से देखा और पक्षी जल मरा. और वह गलत भविष्य लिख बैठे. इस तरह हम देखते हैं कि सहनशीलता मानव का आभूषण और क्रोध मानवता का दुश्मन है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद " दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

        सहनशीलता है मानव का आभूषण, क्रोध होता है मानवता का दुश्मन.... शत-प्रतिशत सही है।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण... सम्पूर्ण दुनिया की महिलाएं हैं। नारी पर कितने भी दुखों का पहाड़ टूट पड़े किंतु अपनी सहनशीलता के गुणों की वजह से उसे आसानी से पार कर लेती है। जहां सहनशीलता है वहां धैर्य तो होगा ही। अपने धैर्य और सहनशीलता के आभूषण को धारण कर वह हर मौसम को बर्दाश्त कर अपने परिवार पर कोई आंच नहीं आने देती। केवल महिलाएं ही नहीं, सहनशीलता हर मानव का आभूषण है । सहनशीलता व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार लाती है। सहनशीलता के जरिए हम तनावयुक्त वातावरण को सामान्य बना सकते हैं। ऐसे वातावरण में हमें अपने धैर्य और सहनशीलता का परिचय देना चाहिए, फिर चाहे हम डरपोक अथवा कमजोर की उपाधि से नवाजे जाते हों। सहनशीलता हमारी कमजोरी नहीं हमारी ताकत है। सहनशीलता ही तो हमारे जीवन का मूलमंत्र है। वहीं क्रोध हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। कहावत है ना "क्रोध का अस्त्र चालक को ही घायल करता है"...यह उक्ति बिल्कुल सही है। क्रोध में व्यक्ति अपना विवेक खो बैठता है। उसके सोचने समझने की क्षमता, स्मरण शक्ति सभी धुमिल पड़ जाती है। क्रोध में लिए गए फैसले गलत पड़ जाते है ,और तो और हमारे आत्मीय रिश्तों के टूटने की संभावना बढ़ जाती है अथवा टूट जाते हैं। क्रोध में मानवता खत्म हो जाती है। बड़े -छोटे का लिहाज नहीं होता।  जीवन में गलत फैसलों की वजह से हम स्वयं के दुश्मन बन जाते हैं।अतः जीवन में सफलता और शांति के लिए हमारा क्रोध पर नियंत्रण एवं सहनशील होना अत्यंत आवश्यक है।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

      सहनशीलता,बनाती सबका मीता। इसीलिए सहनशीलता को मानव का आभूषण कहा जाता है क्योंकि इस गुण के कारण  व्यक्तित्व में निखार आता है और मानव कितनी ही अनचाही समस्याओं से बच जाता है। मानवीय गुणों में सहनशीलता को प्रमुख स्थान मिलता है। सहनशीलता के चलते मानव भगवान बन जाता है।बुद्ध और महावीर का जीवन इसका उत्कृष्ट प्रमाण है। जबकि क्रोध मानवता का दुश्मन होता है। क्रोध में मानव, दानव बन जाता है।कहा भी जाता है,क्रोध ,हर लेता बोध। इसकी वजह से कितनी ही घटनाएं यहां तक कि हत्याएं भी हो जाती है। क्रोध के कारण अक्सर ऐसे कृत्य हो जाते हैं जिनके बाद सिर्फ पछतावा और ग्लानि ही शेष रहते है। क्रोधाग्नि दूसरे के साथ साथ स्वयं की भी हानि करती है और सहनशीलता स्वयं के साथ साथ दूसरे का भी भला करती है।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     जैसे गहने शरीर की शोभा बढ़ाती वैसे ही सहनशीलता चरित्र की शोभा बढ़ाती आदत में शामिल हो। रिश्ते आत्मीय संबंधों को बचाती है सहनशीलता ,बल देती हैं जो सह लेता है, वही सबसे ज़्यादा मजबूत होता है। अपने सत्यकर्म से सभी को प्रभावित कर उत्साह एनर्जी देता है ! मय से प्रभावित वातावरण में शांति बनाए रखने की कोशिश करता है!शब्दों की माला मधुर वाणी से जलपान कराता है भजन कीर्तन से साधु महात्मा के गुण गान होते है वही मानस का आभूषण है ! जो अपना सर्वस्य त्याग ने समर्पित हो जाता है । क्रोध होता है मानवता का दुश्मन  । क्योंकि: विवेक हर लेता है: गुस्से में इंसान सही-गलत भूल जाता है।रिश्ते तोड़ देता है: एक पल का क्रोध सालों का प्यार जला देता है। खुद को जलाता है: क्रोध पहले उसी को जलाता है जिसके मन में उपजता है।  गीता में भी श्रीकृष्ण कहते हैं: क्रोधाद्भवति सम्मोहः - क्रोध से बुद्धि भ्रमित होती है। समय बलवान है, कर्म से इंसान भी कम नहीं, और सहनशीलता से वो समय को भी जीत लेता है।

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

     जीवन के परिदृश्य में मानव को सहनशील बन कर चलना चाहिए,  तभी जाकर समस्त काम यथा समय पूर्ण हो जाते है। सहनशीलता है मानव का आभूषण, क्रोध होता है मानवता का दुश्मन। यह व्यापक तौर पर सत्यता की ओर अग्रसर जरुर करता है। सहनशील ही हमारा आभूषण है, क्रोध से बना बनाया होता काम में रुकावटे आ जाती है और यही से ही दुश्मनी पैदा हो जाती है। दुश्मन बनाना हमारे व्यवहार मन भावन पर टीका रहता है, कभी-कभी न चाहकर भी अप्रत्यक्ष रूप से घटना केन्द्रित हो ही जाती है......।

-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

     बालाघाट - मध्यप्रदेश

        सत्य के बहुत करीब है यह बात कि क्रोध मानवता का दुश्मन होता है। क्रोध में इंसान भले  - बुरे का विचार नहीं कर पाता - क्रोध एकदम से सिर पर चढकर बोलता है और रोज नए दुश्मन पैदा कर लेता है। क्रोध की फसल दिन-दूनी रात चौगुनी बढती है। क्रोध सोच पर हावी हो जाता है। मनुज सहनशीलता खो देता है। सत्य है कि सहनशीलता इंसान का आभूषण होती है। सहनशीलता के चलते बड़ी बड़ी समस्यायें हल हो जातीं हैं। काम क्रोध मद मोह लोभ मत्सर इन अवगुणों के चलते इंसान समाज  में तिरस्कार का पात्र बनता है। इसलिये जरूरीयहै कि हम खुद पर काबू पाने की कोशिश करें। अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें। वर्तमानकाल में इंसान की सहनशीलता एकदम खत्म हो रही है। बडे़ बुजुर्ग कह गये हैं कि "जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन" आज खानपान की शैली और वस्तुएं पूरी तरह बदल गई हैं। पिज्जा बर्गर जैसी वस्तुएं और निरामिष अंडा जैसी चीजें युवाओं की पहली पसंद बन गई हैं। पौष्टिकता के अभाव में कमजोर तन और शिथिल मन इंसान को भरमा रहे हैं। जरूरत है कि पुरानी पीढ़ियां नयी पीढ़ी का उचित संगोपन करें। दादा दादी का साथ बच्चों को मिलेगा तो उनकी मानस शक्ति बढेगी क्योंकि दादा दादी की उम्र का खानपान अब भी  वही हैं। शांति पूर्वक बीतनेयवाले घर बच्चों को दें ताकि भोजन के अलावा भी उनकी सोच बदले। पौष्टिक खाने की ओर उनकी रुचि बढे़। वैसे यह विषय इतना विस्तृत और जीवन के निकट है कि अनुभव ही व्यक्ति को बहुत कुछ सिखा देता है और अनेक आदतें वक्त और उम्र के साथ बदल जाती हैं - - निःसंदेह ।

- हेमलता मिश्र मानवी 

     नागपुर - महाराष्ट्र

      जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि इंसान अपने आप पर नियंत्रण नहीं कर पाता। क्रोध के आवेग में कुछ भी बोल देता है या कर लेता है जो उचित नहीं होता। उस समय सहनशीलता आवश्यक है।यदि जरूरी हो तब विरोध किया जाए मगर संयमित भाषा में। थोड़ी सी सहनशक्ति बहुत बड़ी दुर्घटना को बचा सकती है। क्रोध मानव का दुश्मन होता है। क्रोध की स्थिति में वह विवेक शून्य हो जाता है।इसलिए सहनशीलता अत्यंत आवश्यक है। 

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

      यह सत्य है कि सहनशीलता मानव का आभूषण है और क्रोध विनाश क्योंकि यह जीवन के दो विरोधभासी पहलु हैं जो हमारे व्यक्तित्व और भविष्य का निर्धारण  करते  हैं तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढाते हैं कि सहनशीलता है मानव का आभूषण और क्रोध मानवता का है दुश्मन, मेरा मानना है कि सहनशीलता व्यक्ति के चरित्र को निखारती है जैसे आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं तथा सहनशीलता शक्ति का प्रतीक है इससे आत्मबल को  ताकत मिलती है क्योंकि यह विषम परिस्थितियों में भी शांत रहने और सही निर्णय लेने की क्षमता देती है, इसके साथ यह सफलता का कारण भी बनती है क्योंकि सहनशील व्यक्ति कठिन समय में भी नहीं घबराते यहाँ तक क्रोध की बात है , क्रोध तो मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है इससे बुद्धि का विनाश होता है इससे व्यक्ति अपना विवेक  खो देता है और सही गलत का निर्णय नहीं ले पाता जो उसके पतन का कारण बनता है जिस प्रकार लकड़ी में लगी आग उसी लकडी को जला कर राख कर देती है उसी प्रकार शरीर में उतपन्न क्रोध स्वंय का ही विनाश का कारण बनता है आखिरकार यही कहुँगा कि सहनशीलता आत्मनियंत्रण है और क्रोध आत्म विनाश इसलिए हमें क्रोध से  बचना चाहिए और सहनशीलता को अपनाना चाहिए ताकि हम जिंदगी के सही फैसले तय कर सकें जिससे मानवता जागृत हो सके न की क्रोध से बुद्धि का विनाश करके अपना व  दुसरों का सत्यानाश  हो जाए और मानवता का मोल ही लुप्त हो जाये। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

         सहनशीलता मानव का ऐसा आभूषण है, जो उसके व्यक्तित्व को गरिमा और संतुलन प्रदान करता है। यह गुण व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी शांत और विवेकपूर्ण बनाए रखता है। सहनशील व्यक्ति न केवल अपने भावों पर नियंत्रण रखता है, बल्कि दूसरों के विचारों और व्यवहार को भी समझने की क्षमता विकसित करता है। यही कारण है कि सहनशीलता संबंधों को मजबूत बनाती है और समाज में सौहार्द का वातावरण निर्मित करती है।इसके विपरीत, क्रोध मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह एक ऐसा विकार है, जो क्षणभर में बुद्धि को भ्रमित कर देता है और व्यक्ति से ऐसे कार्य करवा देता है, जिनका उसे बाद में पश्चाताप होता है। क्रोध न केवल व्यक्तिगत शांति को भंग करता है, बल्कि रिश्तों में दरार भी पैदा करता है।आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सहनशीलता को अपनाएं और क्रोध पर नियंत्रण रखें। जब हम धैर्य और समझदारी से कार्य करते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में एक श्रेष्ठ और संवेदनशील मानव बन पाते हैं।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

     सहनशीलता और क्रोध एक-दूसरे के विपरीत भाव वाले हैं। सहनशीलता से बिगड़े काम बन सकते हैं वहीं क्रोध से बने काम बिगड़ जाते हैं। सहनशीलता मानव का आभूषण है, यह इसलिए कि सहनशील होना चारित्रिक विशेषताओं में से एक है। सहनशीलता का पर्याय धीरज रखना भी है। इससे विषम परिस्थिति से निपटने और निवारण के लिए समय मिल जाता है। जबकि क्रोध के आवेश में निपटने और निवारण के लिए समय बचता ही नहीं है और जो हिस्सा पक्ष में था वह भी खंड-खंड होकर हाथ से निकल जाता है। यानी रही-सही संभावनाएं भी समाप्त हो जाती हैं। सार यही कि स्थितियाँ कितनी भी विषम हों सहनशीलता रखते हुए  स्थितियों को अनुकूल बनाने का प्रयास और प्रतीक्षा करना चाहिए। क्रोध तो कभी नहीं, कदापि नहीं।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      मानव जीवन भावनाओं का संगम है, जहाँ सहनशीलता और क्रोध दो विपरीत प्रवृत्तियाँ साथ-साथ चलती हैं। सहनशीलता वास्तव में मानव का आभूषण है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुंदर, संतुलित और सम्माननीय बनाती है। यह वह गुण है जो कठिन परिस्थितियों में भी मन को स्थिर रखता है और रिश्तों को टूटने से बचाता है। दूसरी ओर, क्रोध मानवता का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। यह क्षणिक आवेग में लिया गया निर्णय न केवल संबंधों को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। क्रोध में लिया गया हर कदम बाद में पश्चाताप का कारण बन सकता है। यदि मानव जीवन में सहनशीलता का विकास किया जाए, तो समाज में शांति, प्रेम और सहयोग की भावना बढ़ती है। सहनशील व्यक्ति न केवल स्वयं को शांत रखता है, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है।अतः यह स्पष्ट है कि सहनशीलता जीवन को सुंदर बनाती है, जबकि क्रोध उसे जटिल और दुखद बना देता है। इसलिए हमें सहनशीलता को अपनाकर क्रोध पर नियंत्रण करना चाहिए, क्योंकि यही सच्ची मानवता का परिचय है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

     सहनशीलता, धैर्यता, क्षमाशीलता, बर्दाश्त करने की क्षमता, मन का संतोष यह सभी गुण मनुष्य को गुणवान बनाते हैं। अनेक संत महात्माओं ने सहनशीलता पर अपने विचार दिए हैं। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी ने लिखा है- *क्षमावीरस्यभूषणम*अर्थात क्षमा वीरों का आभूषण है।सहनशीलता सिखाती है कि किसी भी कठिन परिस्थितियों में धैर्य व संतोष रखकर अगला कदम उठाना चाहिए। 

- रविंद्र जैन रूपम 

 धार - मध्य प्रदेश

    जी हाँ यह बिल्कुल सत्य है कि सहनशीलता वह आभूषण है जो व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाता है और क्रोध वह दुर्गुण है जो व्यक्ति को पशु तुल्य बना देता है। सहनशीलता मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारने का काम करती है, समाज में माध-सम्मान मिलता है,इसके विपरीत क्रोध विवेक, बुद्धि का नाश कर देता है। सहनशीलता ऐसा गुण है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों से निपटने की हिम्मत पैदा करता है। शान्ति का पक्षधर है और निष्पक्ष भाव से दूसरों के व्यवहार को भी समझने का गुण रखता है। सही गलत का निर्णय लेने में सक्षमता बनी रहती है। परिवार और सगे- सम्बन्धियों के मध्य सही तालमेल और सम्बन्धों में प्रगाड़ता रहती है। व्यक्ति तनाव तथा अन्य कई समस्याओं से भी बचा रहता है। अतः सहनशीलता मनुष्य का मित्र और क्रोध सदैव दुश्मन ही रहा। इसलिए जीवन में सदा सहनशील बनों और क्रोध का त्याग करो। हमारे इतिहास और पौराणिक कथाओं में क्रोध के भयंकर दुष्परिणाम के कई उदाहरण मिलते हैं जो दर्शाते हैं कि क्रोध न केवल व्यक्ति बल्कि पूरे वंश को और समाज का विनाश करता है, दुर्योधन और कौरवों का पांडवों के प्रति अत्यधिक क्रोध और ईर्ष्या सम्पूर्ण महाभारत युध्द का कारण बना। इस क्रोध के परिणामस्वरूप कौरवों के पूरे वंश का नाश हो गया। इसी प्रकार दुर्वासा ऋषि के क्रोध के कारण कई राजाओं और समुदायों को श्राप मिला, जिससे उनका पतन हुआ। इसमें यह भी दर्शाया गया है कि ज्ञानी व्यक्ति भी क्रोध के कारण अपना विवेक खो देते हैं। क्रोध एक भस्मासुर की तरह है जो क्रोध करने वाले को ही जला देता है‌। अतः क्रोध सदैव त्याज्य है और सहनशीलता अपनाने योग्य गुण है। 

- शीला सिंह

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

   सहनशीलता है मानव का आभूषण लेकिन क्रोध हमेशा मानव का दुश्मन नहीं होता। कुछ असम्भव सा लगे, स्वयं को असमर्थ पाएं तब ख़ुद पर क्रोध करें कि क्यों हम कमज़ोर पड़ रहे हैं। क्यों नहीं कर सकते और अपनी शक्ति बढ़ा लें।

“क्रोध करें ख़ुद पर बढ़ाएं निज शक्ति 

सोचें -विचारें क्यों कर न पाते भक्ति 

सुख के संसाधन जुटाते रहे हर पल 

अपने कर्तव्यों से कर लें अनुरक्ति ।।” 

क्रोध का अतिरेक ही दुश्मनों को परास्त कर सकता है। 

- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

         अमेरिका

       जीवन के अनेक उतार-चढ़ावों के बीच मैंने एक बात गहराई से अनुभव की है कि सहनशीलता वास्तव में मनुष्य का सबसे सुंदर आभूषण है। यह ऐसा गुण है जो बिना किसी आडंबर के व्यक्ति को महान बना देता है। इसके विपरीत, क्रोध एक ऐसा दुश्मन है जो धीरे-धीरे मनुष्य की सोच, व्यवहार और रिश्तों को नष्ट कर देता है।मेरे जीवन में भी कई ऐसे क्षण आए जब परिस्थितियाँ मेरे अनुकूल नहीं थीं। कभी अपनों की बातों ने मन को आहत किया, तो कभी समाज के ताने सुनने पड़े। उन पलों में मन में क्रोध की लहर उठना स्वाभाविक था। कई बार ऐसा भी हुआ कि मैं आवेश में आकर तुरंत प्रतिक्रिया देना चाहती थीं परंतु भीतर से एक आवाज़ आई—“रुक जाओ, सोचो, और सहन करो।” जब मैंने उस आवाज़ को सुना और धैर्य रखा, तब पाया कि परिस्थितियाँ अपने आप सुधरने लगीं। सहनशीलता ने मुझे यह सिखाया कि हर बात का उत्तर तुरंत देना आवश्यक नहीं होता। कुछ बातें समय पर छोड़ देना ही बेहतर होता है। जब हम सहन करते हैं, तो हम कमजोर नहीं होते, बल्कि हमारी आंतरिक शक्ति और भी प्रबल होती है। सहनशीलता हमें दूसरों को समझने की दृष्टि देती है, उनके नजरिए को स्वीकार करने की क्षमता देती है।इसके विपरीत, जब-जब मैंने क्रोध को अपने ऊपर हावी होने दिया, तब-तब मुझे नुकसान ही हुआ। क्रोध के कारण कही गई एक कठोर बात कई बार रिश्तों में दरार डाल देती है। उस समय भले ही हमें लगता है कि हम सही हैं, लेकिन बाद में पछतावा ही हाथ आता है। क्रोध हमारे विवेक को ढक देता है और हमें ऐसे निर्णय लेने पर मजबूर करता है, जो हमारे और दूसरों के लिए हानिकारक होते हैं।धीरे-धीरे मैंने यह समझ लिया कि जीवन में शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए सहनशीलता को अपनाना ही सर्वोत्तम मार्ग है। यह कोई एक दिन में विकसित होने वाला गुण नहीं है, बल्कि निरंतर अभ्यास और आत्मसंयम से इसे अपने जीवन में उतारना पड़ता है।आज मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि सहनशीलता ने मुझे बेहतर इंसान बनाया है। इसने मेरे रिश्तों को मजबूत किया, मेरे मन को स्थिर किया और मुझे जीवन की कठिन परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति दी। वहीं, क्रोध से दूरी बनाकर मैंने अपने भीतर शांति और संतोष का अनुभव किया है।अंततः यही कहना चाहूँगी कि यदि हम अपने जीवन को सुंदर, संतुलित और सार्थक बनाना चाहते हैं, तो सहनशीलता को अपना आभूषण बनाना होगा और क्रोध जैसे दुश्मन से दूरी बनाए रखनी होगी। यही सच्चे मानव होने की पहचान है।

- अलका पाण्डेय

 मुम्बई - महाराष्ट्र 

    क्रोध आग के समान है। यह पहले हमें जलाता है फिर किसी दूसरे को कोई नुक़सान पहुँचाता है । क्रोध में किया गया काम, दिया गया जवाब, लिया गया निर्णय कभी भी सही नहीं हो सकता और फिर पश्चाताप के अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प नहीं रह जाता । इससे हमारा मान-सम्मान, गरिमा, प्रतिष्ठा सब नष्ट हो जाती है । वहीं सहनशीलता बड़प्पन प्रदान करती है। नागवार गुज़रने वाली बात/ समस्या भी वार्ता, चर्चा द्वारा हल हो सकती है। क्रोध में रिश्ते, दोस्ती क्षण भर में दुश्मनी में बदल जाते हैं और फिर वापस दोस्ती में नहीं बदले जा सकते। टूटा धागा पहली बात तो जुड़ेगा नहीं, यदि जबरदस्ती जोड़ा भी जाए तो गाँठ लगने के कारण उसकी उपयोगिता कम हो जाती है। सहनशीलता से हम अपनी मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाये रखते हैं । क्रोध के दावानल में फुक कर हम अपनी मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक तीनों शक्तियों का ह्वास कर लेते हैं । इसलिए यह सोलह आने सही है कि सहनशीलता मानव का आभूषण है तथा क्रोध मानवता का दुश्मन।

- रेनू चौहान 

नई दिल्ली

" मेरी दृष्टि में " सहनशीलता तो हर इंसान में होनी चाहिए। तभी इंसान तरक्की करता है। सभी एक जैसे नहीं होते हैं। इसलिए सहनशीलता बहुत कम इंसानों में होती है। उम्र के हिसाब से सहनशीलता आतीं है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसा प्रायः देखा जाता है। फिर भी सहनशीलता बहुत ही महत्वपूर्ण होती है।‌

         - बीजेन्द्र जैमिनी 

        (संचालन व संपादन)



Comments

  1. सहनशीलता के साथ क्रोध पर नियंत्रण आवश्यक है। सहनशीलता एक उत्तम गुण है जबकि क्रोध घातक होता है। मानवता के हित में उसका परित्याग जरूरी है।

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