सर्वपल्ली गोपाल की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

        स्वाभिमान तो जीवन शैली होनी चाहिए। तभी जीवन की सार्थकता ‌सफल होती है। जीवन‌ का मार्गदर्शन होता है। अभिमान तो  जीवन को नरक की ओर ले जाता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है।‌अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
       अभिमान की स्थिति आने पर व्यक्ति स्वयं को ही श्रेष्ठ मानते हुए दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हुए अपमानजनक, अमर्यादित, अहंकारपूर्ण व्यवहार करते हुए सामने वाले को नीचा दिखाने में लगे जाता है। इसके चलते वह इतना आत्मकेंद्रित हो जाता है कि वह दूसरों की श्रेष्ठता को, हीनता साबित करने में ही जुट जाता है।बस वह स्वयं पतन की ओर ही बढ़ जाता है।उदाहरण रावण,कंस, दुर्योधन आदि है,इसलिए जीवन में अभिमान का आना कदापि उचित नहीं होता। स्वाभिमान यानि आत्मगौरव का होना आवश्यक है। अपनी श्रेष्ठता से नीचे उतरकर कोई कृत्य न करना, सबके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार करना और अपने मूल्यों कुछ रक्षा हित कोई समझौता न करना। महाराणा प्रताप,वीर शिवाजी, महारानी लक्ष्मीबाई आदि स्वाभिमान के श्रेष्ठ उदाहरण है। अभिमान रहा न  किसी का जग में, इतिहास यही बतलाता है। स्वाभिमानी हर देश-काल में अपनी पहचान बनाता है।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

       अभिमान और स्वाभिमान—ये दोनों शब्द सुनने में समान लगते हैं, लेकिन जीवन पर इनके प्रभाव बिल्कुल विपरीत होते हैं। अभिमान मनुष्य को अहंकार की ओर ले जाता है, जबकि स्वाभिमान उसे आत्मसम्मान और गरिमा के साथ जीना सिखाता है। इसलिए कहा जाता है—“अभिमान को जीवन में न आने दो, स्वाभिमान को जीवन में न खोने दो।”अभिमान व्यक्ति को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की गलत भावना देता है। यह संबंधों में दूरी, कटुता और संघर्ष पैदा करता है। अभिमानी व्यक्ति अक्सर अपने ही विचारों को सर्वोपरि मानकर दूसरों की भावनाओं और अनुभवों को नजरअंदाज कर देता है। परिणामस्वरूप वह अकेलेपन और असफलता की ओर बढ़ जाता है। इसके विपरीत, स्वाभिमान व्यक्ति के आत्मसम्मान का आधार है। यह हमें यह सिखाता है कि हम स्वयं का मूल्य समझें, परंतु दूसरों का भी सम्मान करें। स्वाभिमानी व्यक्ति न तो अन्याय सहता है और न ही किसी को अपमानित करता है। वह विनम्र रहते हुए भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है। जीवन में संतुलन आवश्यक है। स्वाभिमान हमें मजबूत बनाता है, जबकि अभिमान हमें कमजोर करता है। इसलिए हमें अपने व्यवहार में विनम्रता, करुणा और समझदारी को अपनाना चाहिए। निष्कर्षतः, यदि मनुष्य अभिमान से दूर रहकर स्वाभिमान को अपनाए, तो उसका जीवन न केवल सफल होता है, बल्कि समाज में भी सम्मान और प्रेम प्राप्त करता है।

- डाॅ.छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

      अगर अभिमान और स्वाभिमान की बात करें तो इनमें बहुत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण अंतर है  क्योंकि अभिमान का अर्थ घमंडी होना या घमंड करना है जबकि स्वाभिमान का अर्थ है आत्म सम्मान की रक्षा करना  यही नहीं स्वाभिमान सकारात्मक है और खुद की गरिमा बनाये रखने में संबंधित है जबकि अभियान नकरात्मक है और दुसरों को कमस्तर समझकर अपने को बड़प्पन दिखाने से जुड़ा है तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि अभियान को जीवन में  न आने दो और स्वाभिमान को जीवन में खोने न दो, मेरा मानना है  स्वाभिमान विनम्रता के साथ आता है और इंसान को आत्म जागरूक बनाता है जबकि अभियान में मैं का जिक्र ज्यादा होता है कि जो है मैं ही हूँ जिससे अंहकार जन्म लेता है और अंहकार ही पतन का कारण बनता है, यही नहीं अभिमानी व्यक्ति दुसरों का सम्मान नही करता जबकि स्वाभिमानी व्यक्ति दुसरों   के सम्मान की अपेक्षा नही करता बल्कि अपना सम्मान सुरक्षित रखता है कहने का भाव अपनी योग्यता से किसी कार्य को करना स्वाभिमान है लेकिन उस कार्य के लिए दुसरों का उपहास करना अभिमान है,  अन्त में  यही कहुँगा कि अभिमान हमें उठने नहीं देता और स्वाभिमान हमें गिरने नहीं देता जबकि अभिमान बुद्धि और ज्ञान का नाश करता है जिससे मनुष्य विनाश की  और चला जाता हैहै इसलिए विनम्रता और अच्छी नीति ही इंसान को हमेशा  उन्नति की और ले जाते हैं  माना की अपनी योग्यता पर गर्व करना अच्छी बात है लेकिन उसे अंहकार में नहीं बदलना चाहिए  इसलिए अभिमान को जीवन में कभी भी मत  आने दो लेकिन स्वाभिमान को जीवन में कभी खोने मत दो यही इंसानियत की सच्ची और अच्छी नीति है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू -  जम्मू व कश्मीर

      जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास आवश्यक है, परन्तु जब यही आत्मविश्वास अभिमान का रूप ले लेता है, तो व्यक्ति के पतन का कारण बन जाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम अभियान (अभिमान) को अपने जीवन में प्रवेश न करने दें। अभिमान मनुष्य को दूसरों से दूर कर देता है और उसे वास्तविकता से भटका देता है। यह धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी, व्यवहार में कठोरता और सोच में संकीर्णता उत्पन्न करता है।इसके विपरीत, स्वाभिमान मनुष्य की असली पहचान है। यह हमें अपने मूल्य, सम्मान और गरिमा का बोध कराता है। स्वाभिमान हमें झुकना सिखाता है, लेकिन टूटना नहीं; यह हमें विनम्र बनाता है, पर कमजोर नहीं। जो व्यक्ति स्वाभिमानी होता है, वह हर परिस्थिति में अपने सिद्धांतों और मूल्यों के साथ खड़ा रहता है। जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है । अभिमान से दूर रहकर स्वाभिमान को संजोए रखना ही सच्चे और सफल जीवन की कुंजी है।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

    सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए व्यक्ति मैं अभिमान आ जाता है !! जब व्यक्ति अभिमान से अभिभूत होता है , वह और प्रगति , विकास , सुधार , अप्राप्य को प्राप्त करने की लगन , सब खो देता है !! दंभ के कारण उसकी बुद्धि आगे के बारे मैं विचार करना बंद कर देती है , व वह अपने आपमें ही मगन हो जाता है ! जो भी काम व्यक्ति करे, उसको अपने स्वाभिमान के साथ करना चाहिए !! वो विकास भी क्या विकास होगा , या वो उपलब्धि भी क्या उपलब्धि होगी , जो व्यक्ति अपने जमीर को गिराकर, अपने स्वाभिमान की कीमत पर हासिल करे!! ‌स्वाभिमान की रक्षा करते हुए , फायदा शायद कम हो , सफलता शायद कम मिले , पर आत्मिक शांति और संतुष्टि अवश्य मिलेगी !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

     जीवन में अभिमान सर्कस जैसा दिखाई पड़ने लगा, हर कोई स्वाभिमान को जीवन में अवतरित करना चाहता है। अभिमान को जीवन में ना आने दो, स्वाभिमान को जीवन में ना खोने दो। वास्तविक रूप से जीवन में जीना, मुश्किल का सामना करना पड़ता है, जीवन की कला को जिसने सिख लिया उसका जीवन सफल हो जाता है। परंतु जीवन में ऐसे-ऐसे गणमान्य जन देखने को मिलते है,जिन्हें थोड़े से में अभिमान आने लगता है, जिनका पतन शीघ्र ही होने लगता है, इसके साथ ही स्वाभिमान भी दिमक की भांति पनपता है,जिसके परिप्रेक्ष्य में खोने को मजबूर हो जाता है। इसलिए अभिमान और स्वाभिमान जो एक सिक्के के दो पहलू है, इन्हें बराबर-बराबर चलना चाहिए......।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

      मनुष्य का जीवन संतुलन की साधना है। इसी संतुलन के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं—अभिमान और स्वाभिमान। पहली पंक्ति हमें चेताती है कि अभिमान को जीवन में स्थान न दें, जबकि दूसरी पंक्ति प्रेरित करती है कि स्वाभिमान को हर हाल में बनाए रखें। देखने में ये दोनों शब्द समान लगते हैं, पर इनके अर्थ और परिणाम बिल्कुल भिन्न हैं।‌अभिमान वह अवस्था है, जब व्यक्ति अपने ज्ञान, धन, पद या शक्ति के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। यह भाव धीरे-धीरे उसे वास्तविकता से दूर कर देता है। अभिमान इंसान के भीतर अहंकार को जन्म देता है, जिससे संबंधों में दूरी, व्यवहार में कठोरता और सोच में संकीर्णता आ जाती है। इतिहास और समाज दोनों गवाह हैं कि अभिमान ने बड़े-बड़े व्यक्तियों को पतन की ओर धकेला है। अभिमानी व्यक्ति सीखने की क्षमता खो देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह सब कुछ जानता है। इसके विपरीत, स्वाभिमान आत्मसम्मान का प्रतीक है। यह वह भावना है, जो व्यक्ति को अपनी गरिमा, मूल्यों और नैतिकता के प्रति सजग रखती है। स्वाभिमान हमें झुकना नहीं, बल्कि सही के लिए दृढ़ रहना सिखाता है। यह हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाता है और अन्याय के सामने खड़े होने की शक्ति देता है। स्वाभिमानी व्यक्ति कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता, चाहे परिस्थिति कितनी ही कठिन क्यों न हो।जीवन में अक्सर ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, जहाँ अभिमान और स्वाभिमान के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। कई बार व्यक्ति अपने स्वाभिमान की रक्षा के नाम पर अभिमान को पोषित करने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि हम आत्मचिंतन करते रहें और अपने व्यवहार का मूल्यांकन करें। यदि हमारे शब्द या कर्म किसी को आहत कर रहे हैं, तो यह अभिमान का संकेत है। वहीं, यदि हम अपनी गरिमा बनाए रखते हुए विनम्र बने रहते हैं, तो यह स्वाभिमान का परिचायक है।विनम्रता, स्वाभिमान का सबसे सुंदर आभूषण है। यह हमें दूसरों का सम्मान करना सिखाती है और साथ ही स्वयं के सम्मान को भी बनाए रखती है। एक स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी के सामने झुकता नहीं, लेकिन वह दूसरों को झुकाने की कोशिश भी नहीं करता। वह अपने कर्मों से पहचान बनाता है, न कि शब्दों के शोर से।अंततः, यही कहा जा सकता है कि अभिमान हमें भीतर से खोखला करता है, जबकि स्वाभिमान हमें मजबूत बनाता है। जीवन की सफलता इसी में है कि हम अभिमान से दूर रहें और स्वाभिमान को अपना आधार बनाएं। यही संतुलन हमें एक अच्छा इंसान बनाता है और समाज में हमारी सच्ची पहचान स्थापित करता है।

- अलका ‌ पान्डेय

 मुंबई - महाराष्ट्र 

         अभिमान को कभी भी जीवन में नहीं आने देना चाहिए. क्योंकि जिसको अभिमान हो गया उसका पतन शुरू हो गया.अभिमान पतन का मूल होता है. जिसे अभिमान आ गया समझो उसका बेड़ा गर्क हुआ. लेकिन इसके साथ ही स्वाभिमान को बचाकर रखना चाहिए. क्योंकि जिसको अपने स्वाभिमान का ख्याल नहीं उसका कोई मूल्य नहीं. स्वाभिमानी आदमी की इज़्ज़त हर जगह होती है. लोग उसे सम्मान देते हैं. पर अभिमानी को सम्मान नहीं मिलता. रावण अभिमानी था इसलिए उसका न अभिमान रहा न उसका स्वाभिमान. क्योंकि अभिमानी व्यक्ति का अभिमान तो रहता नहीं है. उसका स्वाभिमान भी चला जाता है. इसलिए जीवन में अभिमान को नहीं आने देना चाहिए. और स्वाभिमान को जीवन में खोने देना नहीं चाहिए. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

ये दो शब्द, अभिमान और स्वाभिमान पूरी ज़िंदगी का सार है !अभिमान व्यक्ति को अंधा बना देता है , ! मय दंभ भरना , व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जीवन में सर्वोपरि सफलता अपने कर्मों से प्राप्त करता है !स्वाभिमान होना स्वाभाविक क्रिया पर अपने कर्मक्षेत्र में सहजता वाणी की मधुरता जीवन को सुखमय बनाता है ! धीरे धीरे व्यक्ति को स्वाभिमानी बना देता है ! उसे लगता है मय वो कर सकता हूँ जो दूसरे नही कर सकते और यही सोच जीवन को खोने ना देने का पाठ अभिमान सिखाता है ! इस लिए जीवन में अभिमान ना आने दे ! जहाँ अभिमान आता है, वहाँ सीखना रुक जाता है, रिश्ते टूटते हैं, और इंसान खुद को सबसे ऊपर समझकर गिरने लगता है। अभिमान दूसरों को छोटा दिखाता है।स्वाभिमान को जीवन में ना खोने दो  । क्योंकि स्वाभिमान रीढ़ की हड्डी है। यह बताता है कि तुम क्या सहोगे और क्या नहीं। स्वाभिमान के बिना इंसान हर जगह झुकता है, गलत को भी सही कह देता है। स्वाभिमान खुद को छोटा नहीं होने देता। फ़र्क़ समझना जरूरी है!

कर्म अभिमान -मैं सबसे बड़ा हूँ  

गुण स्वाभिमान -मैं किसी से छोटा नहीं हूँ 

काम ऐसा करो कि सिर झुकाकर चलना न पड़े, और व्यवहार ऐसा रखो कि किसी को सिर झुकाना न पड़े। हितकारी और गुणकारी औषधि दुर्लभ होती हैं बुद्धिमान मानुष साथ मिलना भी दुर्लभ होता हैं 

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

      अभिमान को जीवन में ना आने दो, स्वाभिमान को जीवन में ना खोने दो.... बहुत ही सुंदर विचार है। यह हमारे जीवन की सच्चाई को बताता है...  हम सभी समाज में रहते हैं ।यहां हम सभी एक दूसरे के सहारे  अथवा यूं कहें एक दूसरे की उंगली पकड़ चलते हैं। ऐसे में यदि हम किसी भी तरह से किसी की मदद करते हैं तो हममें अहम् भाव आ जाता है। यह स्वाभाविक है चूंकि मनुष्य कि यह प्रवृत्ति है। किंतु यही अभिमान हमें उठने नहीं देता कारण अभिमान में हम अपनी सहिष्णुता, विनय, सरलता सभी गुण खो देते हैं वहीं स्वाभिमान हमें गिरने नहीं देता चूंकि स्वाभिमानी व्यक्ति में विनय, विवेक, सहनशीलता,वेदना, संवेदना जैसे सभी गुण मौजूद होते हैं। किंतु यह जरूरी नहीं है कि स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी की मदद और अहसान नहीं लेता। समय स्थिति के अनुसार हमारा स्वाभिमान भी झुकता है किंतु वह अपना  उपर्युक्त गुण कभी नहीं खोता।स्वाभिमानी हमेशा विनम्र, सहिष्णु, विनय विवेक के गुणों के साथ रहता है वह कभी अपना सम्मान नहीं खोता। अभिमान का मुकुट  सिर पर बैठने के बाद पतन की ओर ही बढ़ता है। स्वाभिमानी अपनी मेहनत से प्रसस्तता के मार्ग पर ही प्रसस्त होता है। 

 - चंद्रिका व्यास

 मुंबई - महाराष्ट्र 

        व्यक्ति के आचरण में ही संस्कार और अहंकार दोनों प्रतिबिम्बित होते रहते हैं। स्वाभिमान होना संस्कार में आता है तो संस्कारहीन बना जाता है अभिमान होना। बस! स्वाभिमान और अभिमान के बीच में बारीक रेखा है। स्वाभिमान की रेखा पार करते ही अभिमान शुरू हो जाता है। लेकिन अभिमानी व्यक्ति को स्वीकार करना मुश्किल है कि उसमें अभिमान है। वे अपने व्यवहार को स्वाभाविक ही समझते हैं।

- विभा रानी श्रीवास्तव

पटना - बिहार 

       यह विचार केवल एक सामान्य उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की गहराइयों से निकला हुआ एक प्रबुद्ध संदेश है। वे महान दार्शनिक एवं भारत के माननीय महामहिम राष्ट्रपति रहे सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सुपुत्र थे, परंतु उन्होंने कभी भी अपने वंश का अभिमान नहीं किया, बल्कि अपने कर्म, विद्वता और निष्पक्ष दृष्टिकोण से अपनी अलग पहचान बनाई। यही उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश है। अभिमान मनुष्य को भ्रमित करता है। यह उसे यह विश्वास दिलाता है कि वह दूसरों से श्रेष्ठ है, जबकि वास्तविकता में यह सोच व्यक्ति के विवेक को सीमित कर देती है। इतिहास के निष्पक्ष अध्येता होने के नाते गोपाल जी ने यह भली-भांति समझा कि अभिमान अंततः पतन का कारण बनता है। इसके विपरीत, स्वाभिमान वह आंतरिक शक्ति है जो व्यक्ति को सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रखती है। स्वाभिमान का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, मूल्यों और गरिमा की रक्षा करना है। गोपाल जी का जीवन इस संतुलन का जीवंत उदाहरण है कि एक ओर वे उच्चतम पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़े थे और दूसरी ओर उन्होंने अपनी पहचान केवल अपने कर्मों और निष्पक्ष विचारधारा से स्थापित की। यही सच्चे स्वाभिमान का स्वरूप है। आज के समय में यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है कि मनुष्य अपने जीवन में विनम्रता को अपनाए, अभिमान से दूर रहे और स्वाभिमान को कभी न खोए। यही संतुलन व्यक्ति को महान बनाता है और समाज को न्यायपूर्ण दिशा देता है। अंततः यह स्पष्ट होता है कि अभिमान का त्याग ही व्यक्ति को वास्तविक ऊँचाई देता है, जबकि स्वाभिमान का संरक्षण उसे भीतर से सशक्त बनाता है; और जब ये दोनों तत्व संतुलित रूप में जीवन में उपस्थित होते हैं, तभी एक गरिमामय, न्यायपूर्ण और सुदृढ़ समाज की स्थापना संभव हो पाती है।

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू ) – जम्मू और कश्मीर

      बहुत समय पहले एक फिल्म आई थी "अभिमान" - - उसमें पत्नी के स्वाभिमान और पति के अभिमान बड़ा सुंदर विश्लेषण किया गया था। सचमुच स्वाभिमान खोया तो समझ लीजिए सबकुछ खो गया। हाँ यह दुनिया की कटु सच्चाई है कि अभिमान को जीवन में कभी नहीं आने देना चाहिए। अभिनंदनीय होता है स्वाभिमान - - मगर अभिमान कभी भी स्वागत योग्य नहीं होता। श्लाघ्य है स्वाभिमान मगर त्याज्य है  अभिमान। स्वाभिमान से जियें - - मगर अपने रिश्तों की कीमत पर नहीं। रिश्तों में अभिमान बिलकुल न हों मगर स्वाभिमान थोथा घमंड का उथला स्वरूप न हो। बधाई योग्य होते हैं स्वाभिमानी व्यक्तित्व लेकिन घमंड जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है। ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में सबकुछ क्षणभंगुर है। ना अभिमान ना स्वाभिमान। इंसान सारी दुनिया में एक ऐसा अनोखी जीव है जो अकेला नहीं जी सकता। "मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है" - - जिसे हर कदम पर अभिमान और स्वाभिमान के बीच राहें खोजनी होतीं हैं। दोनों के मध्य सामंजस्य बैठा कर चलना पड़ता है। अतः उचित है स्वाभिमान और अभिमान के बीच जो एक महीन सी रेखा है  - - उसे पहचानें और सहज जीवन जियें।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र

“ मान और सम्मान अपना स्वाभिमान है 

‘हम ही हैं महान’सोच अभिमान है 

सबका साथ हो सबका विकास हो 

सब हैं समान सबका ही स्वमान है ।।”

मानव जीवन मिला है इसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करें। श्रेष्ठ योनि में जन्म लेना ईश्वर का वरदान है। हमें अभिमान होना चाहिए कि हमें ईश्वर ने अनमोल शक्तियों से सँवारा है।विश्व के प्राणिमात्र के प्रति हमारा यही विचार होना चाहिए कि जैसे हम हैं वैसे ही सभी विशिष्ट हैं। कोई किसी से बड़ा या छोटा नहीं है। सब समान हैं। जब इस भाव का उदय होगा तब परस्पर भेद-भाव का अन्तर मिट जाएगा और अभिमान की भाव भी नहीं रहेगा। स्वाभिमान जरूरी है अभिमान रहित हो 

- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

फरीदाबाद - हरियाणा 

        अभिमान और स्वाभिमान में बहुत फर्क होता है। अर्श और फर्श सा। अभिमान बहुत बुरी चीज है जबकि स्वाभिमान एक उच्च गुण है। रावण ने अभिमान किया उसी की वजह से वह मारा गया। यही हाल कंस और दुर्योधन का था। किसी भी स्थिति में इंसान को अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहिए। प्राण चले जाएं पर स्वाभिमान ना जाए। इसके विपरीत अभिमान को कभी जिंदगी में आने का अवसर न दें। वह हमेशा बर्बादी की जड़ होता है। व्यक्ति के जीवन एवं स्वास्थ्य दोनों के लिए सदा हानिकारक भी।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर -  मध्य प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " अभिमान जैसी चीजों से बचना चाहिए। तभी बड़ी से बड़ी समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। अभिमान ने तो बड़ों - बड़ों की हवा निकाल दी है। फिर भी स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं है। यही जीवन की पहचान है। बाकी तो सब कुछ चलता रहता है। 

                - बीजेन्द्र जैमिनी 

          ( संचालन व संपादन)


Comments

  1. जीवन जीना है स्वच्छंद ।पक्षी मानव भी जीवन के संग।
    कोई जीता है अभिमान से कोई जीता स्वाभिमान से ।अभिमान मान गिराता स्वाभिमान जीत दिलाता
    कितना भी धन संपत्ति ओहदा हो अभिमान फटकने न देना ।आत्म ज्ञान से स्वाभिमान सम्मान दिलाता।प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाता।स्वाभिमान गिरने न देना ।
    - सुधा पाण्डेय
    लंदन
    ( फेसबुक से साभार)

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