पाठकों के बीच में सुशीला जोशी की लघुकथाएं

              परिचय 

जन्म : 5सिम्बर 1941

पिता : स्व०काशीनाथ शर्मा 

माता : स्व०रामकली देवी 

पति : डॉ०  आर०  डी०  जोशी


शिक्षा :- 

MA -हिंदी ,अंग्रेजी। BEd।  संगीतप्रभाकर -सितार ,तबला , कथक ,गायन 

(प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद)


व्यवसाय : -

Engilsh Medium Residancial Public  Schools 

सैनिक स्कूल कुंजपुरा करनाल,

पंजाब पब्लिक स्कूल नाभा ,

 यादवेंद्र पब्लिक स्कूल पटियाला ,

 एपीजे पब्लिक स्कूल फरीदाबाद , 

मोतीलाल नेहरू स्पोर्ट्स स्कूल राई , 

दयावती मोदी पब्लिक स्कूल मोदीनगर  में अध्यापन व प्रिंसिपल ।


प्रकाशन -

9पुस्तकें प्रकाशित 

2 ईबुक -अमेजोन ,किल्डल पर उपलब्ध 

 68 साझा संकलन 

                             

सम्मान :-


अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन संस्था के दूसरे अधिवेशन बंगलौर में कर्नाटक के महामहिम श्री डी०,एन० तिवारी द्वारा सम्मानित 2006 ।

 कृषि औद्योगिक प्रदर्शनी में जनपद मुजफ्फरनगर के जिलाध्यक्ष द्वारा सम्मानित 

 उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान लखनऊ द्वारा अज्ञेय पुस्कार 

 जनपद प्रशासन द्वारा *मलाला* सम्मान के लिये चयनित । 

  आगमन संस्था हापुड़ द्वारा विशिष्ट अतिथि सम्मान 

   नेहरू युवा केन्द्र द्वारा विशिष्ट अतिथि सम्मान 

अर्णव कलश द्वारा प्रदत्त सम्मान: -

  डॉ कमलेश भट्ट " कमल" सम्मान --,हाइकु 

  रामचरन गुप्त सम्मान -लघुकथा 

  मुंशी प्रेमचंद कहानीकार सम्मन -कहानी 

  श्रीमती महादेवी वर्मा सम्मान -संस्मरण 

  राहुल सांकृत्यायन सम्मान-   यात्रा वृतांत 

  जयशंकर प्रसाद सम्मान -एकांकी 

  काका हाथरसी सम्मान -व्यंग 

  प्रताप नारायण मिश्र सम्मान-निबन्ध 

  बलकृष्ण भट्ट सम्मान -,साक्षत्कार 

  गिरधर कविराय सम्मान-कुंडलिया 

  रोला शतकवीर सम्मान -रोला लेखन 

   मुक्तक शतकवीर कलम की सुगंध सम्मान -मुक्तक 

  मनहर शतकवीर कलम की सुगंध सम्मान -घनाक्षरी 

   श्रेठ हाइकुकार सम्मान -,हाइकु 

  स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू वार्षिक साहित्य सम्मान 

  मात्सुओ "बासो"कलम की सुगन्ध सम्मान -,हाइकु

   

अन्य संस्थाओं द्वारा  सम्मान:-


काव्य रंगोली हिंदी साहित्यिक पत्रिका द्वारा -- काव्य रंगोली दादी माँ सम्मान 

 अखिल भारतीय साहित्यिक कला मंच मुरादाबाद द्वारा - साहित्य श्री

 राष्ट्रीय कवि चैपाल द्वारा -*रामेश्वर दयाल दुबे* साहित्य सम्मान 

 जनचेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा प्रदत्त - *वागेश्वरी -पुंज अलंकरणज़*  

 नव सृजन कला साहित्य एवं संस्कृति न्यास द्वारा - *नवसृजन हिंदी रत्न* सम्मान 

  के० बी०हिंदी साहित्य समिति द्वारा साहित्यकार सम्मान के अंतर्गत - *गौरा पन्त शिवानी स्मृति* सम्मान 

मधुशाला साहित्यक परिवार द्वारा - *साहित्य रत्न 2018सम्मान*

 शिवेत रक्षिति साहित्य मंच द्वारा- *सहित्य सृजक* 

  मधुशाला साहित्यिक परिवार द्वारा -- *काव्य दिग्गज अलंकरण* सम्मान 


अन्य गतिविधियां :-


अखिल भरतीय कविसम्मेलनों में काव्य पाठ 

1961 में दिल्ली आकशवाणी से ध्वन्यात्मक नाटको में ध्वनि प्रसारण 

नजीबाबाद आकाशवाणी केंद्र से कवितापाठ 19 65 

1969 व  2009 में रंगमंच अभिनय 

मंच पर शास्त्रीय गायन व कथक की प्रस्तुती 1968 से 2000 तक 


पैदल पर्वतीय भ्रमण : -


काठगोदाम से नैनीताल 

 नैनीताल से रानीखेत 

 रानीखेत से काठगोदाम 

चकरौता से व्यास शिला ,वापसी 35किलोमीटर 

चकरौता से मसूरी 90 किलोमीटर

कुल्लू से मनाली 

मनाली से रोहतांक पास 

रोहतांक पास से कुल्लू 



पता : -

948/ 3 योगेंद्र पुरी ,रामपुरम गेट

मुजफ्फरनगर -251001 उत्तर प्रदेश


सुशीला जोशी की लघुकथाएं :- 


              1.दबंग  

   

          सुनीला घर से जैसे ही दरवाजा बंद कर सड़क पर आई  बाईं ओर से आता एक साइकिल सवार उसके सामने आ उसकी साइकिल के कैरियर से बंधे कुछ पुराने जंग लगे सरिये , एंगिल , टूटे खुरपे , फूटे तवे और लोहे का अन्य सामान सुनीला को जांघ छूता हुआ निकल गया ।।वह अपनी मस्ती में था । सुनीला ने लपक कर उसका हाथ पकड़ा तो उसका हैंडिल डगमगा गया और वह  नीचे गिर पड़ा । सुनीला ने उसे उठाया और तड़ातड़ तड़ातड़ उसके गालों पर कई थप्पड़ जड़ दिए । उस कांड को देख भीड़ इकट्ठी हो गयी । वह जैसे तैसे सबकुछ छोड़ बीस पच्चीस कदम पर कॉलोनी के गेट की ओर भागा की भीड़ के एक आदमी ने पूछा -" क्या हुआ बहु जी " ?

" इसने मुझे टक्कर मारी  "

इतना सुनते ही भीड़ उसकी तरफ दौड़ी और पिल पड़ी । किसी तरह जान बचा कर सड़क पर आ सरपट भाग खड़ा हुआ । गेट की तरफ से आते हुए रेड़ेवाले को देख सुनला पचास कदम दूर लोहेवाले की दुकान दिखाते हुए बोली -

" भैया क्या यह बिखरा हुआ  लोहा उस दुकान तक पहुंचा दोगे "और जाते जाते सामने साइकिल पंक्चर के दुकानदार गफ्फार से बोली -

" गफ्फार भाई ! इसकी साइकिल उठा कर अपनी दुकान के सामने खड़ी कर ले । वापस आ कर इसका हिसाब भी देखूँगी "।

" क्यों नही बहु जी "-- कहते हुए लोहा समेट रेड़ें में रख कबाड़ी की दुकान की ओर चल दिया । पीछे पीछे सुनीला भी लम्बे डग भरती हुई दुकान पर पहुँच लोहा तुलवाया और पैसे ले कर दस रुपये रेड़ें वाले की ओर बढ़ा कर  चल दी । घर मे घुसने से पहले वह गफ्फार से बोली -

" क्या वह अपनी साइकिल ले गया "?

" नही ,यह खड़ी "।

" ठीक है तीन दिन तक देख लेना । अगर न आये तो इसे बेच लेना 1000₹ में । 500₹ तुम रख लेना "।कहा और अंदर चली गयी और गफ्फार मुस्कुराता रह गया ।। ****


              2. नेग

            

         आज मिथलेश प्रसव पीड़ा में है । वह चौथी बार यह जंग लड़ रही है । पूरी उम्मीद है कि इस बार बेटा ही आएगा । घर के बाहर बैन्ड सूचना सुनने को तैयार खड़ा है । और आँगन में किन्नर बैठे हैं । अचानक बच्चे की रोने की आवाज आई तो सब अंदर दौड़ पड़े । लेकिन सबको पीछे धकेल सुमन किन्नर अंदर घुसा और बच्चे को डॉक्टर के हाथ से ले आँगन में नाचने लगा । उसके साथी ढोलक बजा बजा कर गीत गाने लगे । नाचने वाला किन्नर बच्चे को ले कर आधे घण्टे तक नाचता रहा । घर के बाहर बैंड बज रहा था अचानक बच्चे की दादी ने बढ़ कर किन्नर को पकड़ कर रोका और पूछा ।किन्नर ने बाँह झटकी और नाचते नाचते बोला --"  बच्चा है बच्चा । किन्नर नही है "" 

"अरे , यह तो बता कि लड़का है या लड़की ?""

 "खुश हो जाओ अम्मा । ढेर सारा नेग लूँगी । देवी आई है देवी तुम्हारे घर ।" कह कर जोर जोर से नाचने लगा ।

 " परे को गेर । हमें क्या करनी देवी । हमारे पास पहले ही तीन तीन देवियाँ है । ""

" पर घर मे तो यही नया मेहमान है । इसका तो नेग  मैं लेके ही जाऊँगी "।  

"तू इसे ही ले जा  नेग में । मुझे त दिखा भी मत " --कहा और दादी बाहर निकल गई । 

दरवाजे पर पहुँच बैंडवालो से बोली -" बन्द करो इसे और जाओ वापस । लौंडियों के होने में बैंड नही बजते "।बैंड बन्द हो गया तो मुखिया ने बढ़ कर कहा - "हमारा मेहनताना और समय की कीमत तो दो "" "कैसी कीमत ?  लौंडिया हुई है ,उसे ही ले जाओ"-कहा और दरवाजा बंद करके अंदर चली गयी । ****


        3.ये कैसा  प्यार 

    

       " इला  मुझे तुम मुक्त कर दो '" पेपर बढ़ाते हुए आलोक ने कहा 

 तो इला बोली " क्यों ?"

"क्योकि अब मेरी जिम्मेदारी यहाँ से अधिक कहीं और हैं " 

" ये जिम्मेदारी कब आयी तुम्हारे ऊपर ?" 

"जब तुम न्यूयॉर्क गयी थी "

 "लेकिन उस समय तो मैं तुम्हारे बीज को अपने भीतर छुपाये उसकी रक्षा कर रही थी जिसे तीन महीने बात तुम्हे सुरक्षित तुम्हारे हाथों में सौप दिया '".

" लेकिन उस समय मैं कहीं और बीज रोपण कर रहा था ।अब उसकी भी देखभाल करनी है ""

" ठीक है ।तुम अपने बीज को बड़ा करो ,फल में बदलो और उसके भविष्य की चिंता करो " 

 पेपर्स ले उन पर हस्ताक्षर कर आलोक के हाथ मे थमाती हुई बोली -

" तुमने भी क्या मांगा -मुक्ति ? जान भी मांगते तो उसे भी दे देते ।" 

"तो अब दे दो "

आलोक की बात सुन कर वह उसके चेहरे की तरफ पांच मिनट तक उसके चेहरे की तरफ देखती रही । फिर अचानक उसने खिड़की खोली और  नीचे कूद गई । सड़क पर उसका लहूलुहान शरीर पड़ा था जिसे लोगों की भीड़ घेरे खड़ी थी ।। ****


            4. सिला 

    

          पिछले दो महीने से बस का माहौल ऐसा हो चला था कि उसमें बैठ कर सफर करना विवाहित महिलाओं के लिए शर्मनाक था । लेकिन उसी बस में पूरे स्टाफ का आना विवशता थी । स्कूल शहर से 27 किलोमीटर दूर था कभी विवाहितों के चेहरे की रौनक पर ,कभी उम्र के बीच के पड़ाव में बरकरार शोखी व सज संवर कर रहने की चाह पर , कभी उनकी जीवन शैली पर ,कभी शरीर के कटावों पर तो कभी कुँआरियो के हुस्न ,अदाएं व पुरुष स्टाफ के प्रति रुझान की खूब चर्चाएं होती ,फब्तियां कसी जाती और स्कूल में मौका मिलते हो गुदगुदाती शैली में इजहार भी कर दिया जाता । मौका पाते ही अलका श्रीवास्तव ने मैनेजर के कमरे में घुसते ही कहा -

" आपकी बस का माहौल बिगड़ रहा है ।कृपया इसे सम्हलिए "

"क्या हुआ कुछ बताइये तो "

" सर , ये चांडाल चौकड़ी बहुत शोख और वल्गर होती जा रही है । बस में बैठी कुँआरी लड़कियों से आँखे सकते रहते है और वे ..... । हमसे तो देखा भी नही जाता "।

" क्या कम्प्यूटर वाला भी इन्ही में से एक है ?"

"  जी सर । वह तो पूरा भँवरा है "।

" ठीक है ,मैं देख लूँगा "।

अगले दिन मैनेजर ने अलका बुलाया और ऑफिस में दो घण्टे चार अध्यापक व दो ड्राइवर के सामने खूब खिंचाई की और अंत  नोटिस हाथ मे थमा कर हुआ जिसमें लिखा था -

" अलका जी ,आप स्कूल के लिए एक कलंक है । हमेशा किसी न किसी अफवाह फैलाने में सक्रिय रहती है ।भविष्य के लिए आपको हिदायत दी जाती है कि आप अपने काम से काम रखें और विद्यालय को अफवाहों से दूर रखें । आदेश न मानने पर आपको भविष्य में सेवाओ से मुक्त भी किया जा सकता है । कल से आपसे स्कूल की बस सुविधा वापस ली जाती है ।"                         

                                  स्कूल मैनेजर

                                         ****


            5.मायका     

   

         पति की नौकरी छूटने के बाद सरोज को अपने दो बच्चों के साथ मायके में रहते डेढ़ साल हो चला था । मायके में वह सिर पर छत और पेट भरने के लिए रह रही थी ।छुट्टियों में जब उसकी बहनें अपने अपने बच्चों के साथ आती तो खाने के अतिरिक्त कुछ और भी खाने पीने की चीजें आती तो वह अक्सर अपने बच्चों को छत पर ले जा कर खेलने लगती  । 

             यह दूसरा समय था जब चारो बहनों के बच्चे एक साथ छुट्टियां बिता रहे थे । सब मिल कर बैठते और कभी चौपड़ तो कभी ताश खेलते और खाते पीते अपना समय बिताते । धीरे धीरे समय बीत गया और बच्चों के स्कूल खुलने का समय आ गया । बहने अपने अपने घर चली गयी और सरोज बच्चो को लिए वहीं रह गयी । 

         तीनो बहनों के जाने के बाद माँ अपना सन्दूक खोले एक घण्टे से कुछ ढूंढ रही थी की सरोज ने पूछ लिया -" क्या ढूंढ रही हो अम्मा ?"

" ढूंढ रही हूँ कुछ । तू मेरी चीजो को उलट- पुलट क्यो करती है ? चाहती क्या है तू ?" -अम्मा झुंझला कर बोली ।

" अम्मा चाबी तो तेरे ही पास रहती है । मैं कैसे उलट -पुलट करूँगी ?" -हैरान होते हए सरोज ने कहा ।

" बस चुप रह । मैं जानूँ तुझे । चालक लोमड़ी है तू ।दाँव देखती रहती है । खबरदार ! जो मेरी चीजो को हाथ लगाया "-अम्मा ने घुड़क कर कहा ।

सरोज रुआँसी हो गयी और ऊपर छत पर जा मुंडेर पर बैठ खूब मन की भड़ास निकाली । 

     बहनों के जाने के बाद लगभग एक हफ्ते बाद उससे छोटी बहन का पत्र आया जिसमे लिखा था -

" अम्मा सोनू तुम्हारा गोल बटुआ ले आयी है लेकिन वह खाली है । उसमें तुम्हारा कुछ था तो नही ?"

सरोज ने पढ़ते पढ़ते अम्मा की तरफ विवशता ,हैरानी ,जीत और आँखों मे सच्चाई लाते हुए  देखा तो अम्मा ने मुँह फेर लिया ।लेकिन सरोज की आँखे बरसने लगी । ****

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      अपने आप में बेजोड़ 


       आज की सच्चाई को बयान करती सुशीला जोशी जी की पांचों लघुकथाएं अपने आप में बेजोड़ हैं. पढ़ने पर ऐसा लगता है कि घटनायें एक दम साक्षात अपने आंखों के सामने घटित होते देखी गई हैं. एक तरफ महिला की दबंगई तो दूसरी तरफ महिला के आने पर घर में उत्सव का मातम में बदलना औरत के प्रति औरत की मानसिकता साफ झलकती है. तीसरी लघुकथा में पति पत्नी के बीच झगड़े में यही होता है कि दोनों एक दूसरे से मुक्ति चाहते हैं और कभी-कभी सच मुच की मुक्ति हो जाती है. चौथी लघुकथा में ऑफिशल बसों में ऐसे होता रहता है. सभी मस्ती और आनंद लेना चाहते हैं. जहां सभी आनंद और मस्ती ले रहे हो वहां एक को अच्छा लगे न लगे चुप रहना ही अच्छा होता है. जब व्यवस्था ऊपर से नीचे तक ऐसी वहां ऐसे ही होता है. बहुत सुन्दर ढंग से सुशीला जी ने सच्चाई को दर्शाया है. पाँचवी लघुकथा की जैसी ही घटनाएं मेरे जान पहचान में घट चुकी आजकल ऐसे ही हो रहा है. कुल मिलाकर सुशीला जी की पांचों लघुकथाएं बेह्तरीन है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद ''दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 


    लघुकथाओं की समीक्षा


1. दबंग — समीक्षा


यह लघुकथा स्त्री के आत्मसम्मान और त्वरित निर्णय क्षमता का सशक्त चित्र प्रस्तुत करती है। सुनीला का चरित्र यहाँ पारंपरिक ‘अबला’ छवि को तोड़कर एक जागरूक, निर्भीक और व्यावहारिक स्त्री के रूप में उभरता है। लघुकथा का सबसे प्रभावी पक्ष यह है कि वह केवल प्रतिक्रिया नहीं देती, बल्कि परिस्थिति को अपने पक्ष में मोड़ देती है—भीड़ का मनोविज्ञान, तत्काल निर्णय और अंत में लोहे को बेचकर आर्थिक लाभ उठाना—ये सब उसकी सूझबूझ को दर्शाते हैं। भाषा सीधी और घटनाक्रम तेज़ है, जो लघुकथा की विशेषता को बनाए रखता है। अंत में गफ्फार की मुस्कान पाठक के मन में भी संतोष और आश्चर्य का भाव छोड़ती है।


2. नेग — समीक्षा


यह लघुकथा भारतीय समाज में व्याप्त पुत्र-प्राथमिकता और कन्या-विमुखता पर करारा प्रहार करती है। मिथलेश के चौथे प्रसव और परिवार की बेटे की उम्मीद के बीच जन्मी ‘देवी’ के प्रति दादी का व्यवहार समाज की गहरी जड़ें जमाए मानसिकता को उजागर करता है। किन्नर का ‘देवी आई है’ कहना एक सकारात्मक और उत्सवधर्मी दृष्टिकोण को सामने लाता है, जबकि दादी का तिरस्कार इस विडंबना को और तीखा बना देता है।लघुकथा का अंत—बैंड बंद होना और मेहनताना तक न देना—समाज के उस क्रूर चेहरे को सामने लाता है जहाँ बेटी का जन्म खुशी नहीं, बोझ माना जाता है।


3.ये कैसा प्यार - समीक्षा


यह लघुकथा आधुनिक संबंधों की निष्ठुरता और भावनात्मक विघटन का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। प्रेम, विश्वास और समर्पण के बीच विश्वासघात की यह कहानी पाठक को भीतर तक झकझोर देती है। इला का चरित्र अत्यंत संवेदनशील और समर्पित है, जबकि आलोक का व्यवहार स्वार्थ और असंवेदनशीलता का प्रतीक बन जाता है। संवाद कम हैं, पर अत्यंत प्रभावशाली हैं—विशेषतः “जान भी मांगते…” वाला संवाद। अंत अचानक और अत्यंत तीखा है—जो लघुकथा की शक्ति को बढ़ाता है। यह पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि प्रेम में असंतुलन कितना विनाशकारी हो सकता है।


4. सिला — समीक्षा


यह लघुकथा कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले शोषण और अन्याय को उजागर करती है। बस का वातावरण केवल एक स्थान नहीं, बल्कि समाज के उस हिस्से का प्रतीक है जहाँ स्त्रियों को वस्तु की तरह देखा जाता है।अलका का साहस—आवाज़ उठाना—कहानी का सकारात्मक पक्ष है, लेकिन उसका परिणाम—उसे ही दोषी ठहराया जाना—समाज की विडंबना को उजागर करता है।“सिला” शीर्षक अत्यंत सार्थक है, क्योंकि यहाँ सच बोलने का पुरस्कार दंड के रूप में मिलता है।मुख्य बिंदु: कार्यस्थल पर लैंगिक असमानता, आवाज़ दबाना, व्यवस्था की विफलता।

              

5 मायका - समीक्षा


यह लघुकथा रिश्तों के बदलते स्वरूप और आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। मायका, जो एक स्त्री के लिए सुरक्षा और अपनत्व का प्रतीक होता है, यहाँ केवल ‘आश्रय’ बनकर रह जाता है।सरोज का चरित्र अत्यंत संवेदनशील है—वह अपनी परिस्थितियों को समझते हुए भी आत्मसम्मान बनाए रखने की कोशिश करती है। माँ का व्यवहार और अंत में पत्र के माध्यम से सच्चाई का खुलना—यह सब कहानी को गहराई देता है। अंत में माँ का नज़रें फेर लेना—यह मौन ही लघुकथा का सबसे प्रभावशाली संवाद बन जाता है।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 


 सामाजिक प्रश्न छिपाए हुए


सुशीला जोशी की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ समाज की विसंगतियों, स्त्री जीवन की पीड़ा, पारिवारिक रिश्तों की सच्चाई और मानवीय संवेदनाओं को तीखे तथा प्रभावशाली ढंग से सामने लाती हैं। लेखिका ने सरल भाषा, तीखे संवाद और यथार्थपरक घटनाओं के माध्यम से पाठक को सोचने पर विवश किया है। हर कथा अपने भीतर एक सामाजिक प्रश्न छिपाए हुए है।


1. दबंग


यह लघुकथा नारी शक्ति, साहस और सूझबूझ का सशक्त उदाहरण है। सुनीला का चरित्र एक निर्भीक महिला के रूप में उभरता है, जो अन्याय सहने के बजाय तुरंत उसका जवाब देती है। लेखिका ने यह संदेश दिया है कि स्त्री यदि चाहे तो स्वयं अपनी रक्षा कर सकती है। कथा में रोचकता, व्यंग्य और अंत में चतुराई का सुंदर मिश्रण है। नारी सशक्तिकरण का सजीव चित्रण । तेज गति और रोचक घटनाक्रम । प्रभावी संवाद ।


2. नेग


यह कथा समाज में बेटी और बेटे के बीच भेदभाव पर तीखा प्रहार करती है। घर में चौथी संतान के रूप में बेटी होने पर दादी का व्यवहार समाज की संकीर्ण मानसिकता को उजागर करता है। वहीं किन्नर का “देवी आई है” कहना कथा का सबसे मार्मिक और व्यंग्यपूर्ण पक्ष है। लेखिका ने दिखाया कि जहाँ समाज बेटी को बोझ समझता है, वहीं पराया व्यक्ति उसे सम्मान देता है।

कन्या भ्रूण हत्या और लिंगभेद पर करारा प्रहार । व्यंग्य और संवेदना का संतुलन । अंत अत्यंत मार्मिक।


3. ये कैसा प्यार


यह लघुकथा आधुनिक रिश्तों में स्वार्थ, छल और प्रेम के खोखलेपन को उजागर करती है। आलोक का विश्वासघात और इला की पीड़ा पाठक को झकझोर देती है। अंत अत्यंत दुखद और हृदयस्पर्शी है। लेखिका ने दिखाया कि जब प्रेम में सच्चाई नहीं रहती, तो उसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है। आधुनिक संबंधों की कटु सच्चाई । भावनात्मक गहराई । मार्मिक और चौंकाने वाला अंत


4. सिला


यह कथा कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति अभद्र व्यवहार, चरित्रहीन मानसिकता और शिकायत करने वाली स्त्री को ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य है। अलका द्वारा आवाज उठाने पर उसे ही दंडित किया जाना समाज और संस्थाओं की दोहरी मानसिकता को उजागर करता है।स्त्री शोषण और अन्याय का यथार्थ चित्रण। व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न।कथानक में तीखापन


5. मायका


यह कथा सबसे अधिक संवेदनशील और हृदयस्पर्शी है। मायका, जो हर बेटी के लिए आश्रय माना जाता है, वहीं सरोज के लिए अपमान और संदेह का स्थान बन जाता है। माँ का व्यवहार और अंत में सत्य सामने आने पर भी मौन रह जाना रिश्तों की विडंबना को उजागर करता है।पारिवारिक संबंधों की कटु सच्चाई।भावनात्मक गहराई । अंत अत्यंत मार्मिक


समग्र समीक्षा


सुशीला जोशी की लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ का दर्पण हैं। वे स्त्री जीवन के विविध रूप—संघर्ष, अपमान, साहस, संवेदना और आत्मसम्मान—को प्रमुखता से प्रस्तुत करती हैं। लेखिका की भाषा सहज, संवाद प्रभावी और कथ्य प्रखर है। हर कथा अंत में गहरी चोट करती है और पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।

सुशीला जोशी जी की ये पाँचों लघुकथाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को आईना दिखाती हैं। इनमें नारी विमर्श, सामाजिक विडंबना और मानवीय संवेदना का उत्कृष्ट संगम है। वे समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में दिखाई देती हैं।

- सुनीता गुप्ता

कानपुर - उत्तर प्रदेश 


 मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण


सुशीला जोशी की पाँचों लघुकथाएँ समकालीन समाज की विविध विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण करती हैं। “दबंग” में लेखिका ने एक साहसी और सजग स्त्री का चित्र प्रस्तुत किया है, जो अन्याय का डटकर सामना करती है और अपनी सूझबूझ से स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ देती है। “नेग” लघुकथा समाज में व्याप्त पुत्र-प्राथमिकता और कन्या जन्म के प्रति उपेक्षा को मार्मिक रूप से उजागर करती है, जहाँ एक नवजात बेटी के स्वागत में खुशी के बजाय निराशा दिखाई देती है। “ये कैसा प्यार” आधुनिक संबंधों की स्वार्थपरकता और संवेदनहीनता को दर्शाती है, जिसमें प्रेम के नाम पर विश्वासघात और अंततः एक स्त्री की त्रासदी सामने आती है। “सिला” कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत अन्याय को उजागर करती है, जहाँ सच बोलने वाली स्त्री को ही दंडित किया जाता है। वहीं “मायका” लघुकथा अत्यंत भावनात्मक ढंग से यह दिखाती है कि परिस्थितियाँ कैसे एक स्त्री के अपने ही घर को पराया बना देती हैं और उसे अपमान तथा उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इन सभी लघुकथाओं की भाषा सरल, संवादप्रधान और प्रभावी है, जो पाठक को सीधे कथा से जोड़ती है। लेखिका ने कम शब्दों में गहरे सामाजिक प्रश्न उठाते हुए पाठक को सोचने और आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया है, जो इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है।

- डाॅ.छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

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