भोपाल के पांडुरंग नामदेव केवाले

भोपाल - इंसान की असली पहचान उसके काम से होती है, खासकर तब जब वो किसी के सबसे कठिन समय में साथ खड़ा हो।” यह कहानी है भोपाल के पांडुरंग नामदेव केवाले की है जो पिछले कई वर्षों से जरूरतमंद लोगों के अंतिम संस्कार में मदद कर रहे हैं। न्यू मार्केट में पूजा सामग्री की छोटी-सी दुकान चलाने वाले पांडुरंग अब तक करीब चार हजार लोगों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं। एक दिन उनकी दुकान पर एक गरीब लड़का आया और अपनी मां के अंतिम संस्कार के लिए मदद मांगी। शुरुआत में पांडुरंग को उस पर शक हुआ, लेकिन जब वे उसके घर पहुंचे तो सच्चाई ने उन्हें अंदर तक झ'कझो'र दिया। झुग्गी में रहने वाले उस परिवार के पास न पैसे थे, न सहारा। पांडुरंग ने न सिर्फ अंतिम संस्कार का पूरा इंतजाम किया, बल्कि खुद कंधा देकर उस महिला को अंतिम विदाई दी। इस घटना ने उन्हें अपने पुराने दिनों की याद दिला दी। साल 1978 में, जब वे खुद आर्थिक तंगी से जू'झ रहे थे, एक छोटी बच्ची अपनी मां के अंतिम संस्कार के लिए मदद मांगने आई थी। जब उन्होंने दूसरों से मदद मांगी, तो एक दुकानदार ने उन्हें “भिखारी” कह दिया। उस अ'पमान ने उनके दिल को चो'ट पहुंचाई, लेकिन उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि अब वे खुद अपने पैसों से जरूरतमंदों की मदद करेंगे। तब से वे हर महीने लगभग पंद्रह लोगों की सहायता करते हैं। एक अंतिम संस्कार में करीब सात हजार रुपये खर्च होते हैं, लेकिन पांडुरंग कभी हिसाब नहीं लगाते है । उनके लिए सबसे जरूरी है कि हर व्यक्ति को सम्मान के साथ विदाई मिले।हालांकि कई बार लोग उनकी सरलता का फायदा भी उठा लेते हैं, लेकिन इससे उनका हौसला नहीं टूटता। वे मानते हैं कि मदद करने की भावना ही सबसे बड़ी पूंजी है। उनके इस नेक काम में उनके परिवार का भी पूरा सहयोग है। आज उनके बच्चे अपने-अपने क्षेत्र में सफल हैं और उनका घर खुशहाल है। पांडुरंग कहते हैं कि जब तक वे जीवित हैं इसी सेवा में लगे रहेंगे। क्योंकि किसी के दुख में साथ देना ही सच्ची इंसानियत है।


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