पाठकों के बीच में महेश राजा की लघुकथाएं
महेश राजा की लघुकथाएं : -
1. सांँपो के होते हुए
बारिश हो रही थी।तालाब मे पानी भरने लगा था।शाम होते ही मेंढ़कों ने टर्राना शुरु कर दिया था।
मेंढ़की ने अपने मेंढ़क से कहा,क्यों जी।यदि अपने तालाब में चुनाव होने लगे तो क्या तुम चुनाव लडोगे?
मेंढ़क संयत स्वर मे बोला-डियर?साँपों के रहते हुए मुझे कौन टिकट देगा?.***
2.याददाश्त
भाई साहब कह रहे थे,-"क्या बात है,आजकल कुछ याद नहीं रहता..बात करते-करते भूल जाता हूंँ....किसी को बहुत दिनों बाद देखता हूं या मिलता हूं तो पहचानने में मुश्किल होती है।"
मैने उन्हें समझाया कि ऐसा थकान या बेवजह तनाव के कारण होता है।साथ ही वह बात जो दिल पर घाव या चुभन नहीं छोड जाती,हमारी याददाश्त से बाहर हो जाती है।
भाई साहब उम्र मे मुझसे काफी बड़े है।76 वर्ष पार कर चुके है लेकिन मुझसे मित्र वत व्यवहार करते है।
मैंने कहा-"सुबह शाम दूध के साथ बादाम लिजिए.... याददाश्त के लिये फायदेमंद होगा।"
भाई साहब दार्शनिक अंदाज मे हंसे,फिर बोले,-"दूध बादाम से कुछ नहीं होने वाला।मैं तो यह सोच रहा था कि ईंसान की पूरी याददाश्त ही खो जाये तो कितना अच्छा हो....जिन्दगी की सारी कटुता इस याददाश्त की वजह से ही तो हैं।" ****
3. मौन
-"क्या बात है,आज बिल्कुल चुप हो।"
-"कुछ नहीं।बस ऐसे ही।"
-"नहीं. नहीं. कोई बात तो है।मुझे नहीं बताओगी।"
-"कुछ बात हो तो बताऊं न।"
-"नहीं, मुझे तुम्हारा मौन रहना खल रहा है।"
*कभी कभी मौन रहना भी जरूरी है जीवन में*
*अठखेलियाँ बातों की हर वक्त जरूरी तो नहीं*।
-"तुम टाल रही हो?क्या मेरी किसी बात से खफा हो?"
-"नहीं..।"
-"देखो,मैं तुम्हारी खामोशी सहन नहीं कर सकता।"
-"पुरूष हो इसलिये न।क्या नारी अपनी मरजी से चुप भी नहीं रह सकती।"
-"यह मैं नहीं जानता।पर,तुम मौन रहो यह मंजूर नहीं मुझे।"
-"अनादि काल से यह होते आ रहा है।नारी जब छोटी होती है तो माँ चुप रहने को कहती है,फिर शिक्षक और विवाह के बाद पति।उसके बाद बेटा-बहू।यह नारी की नियति है।"पुरूष नारी पर अपना अधिकार समझता है।उसके मौन के मनोविज्ञान को वह क्या समझेगा?क्योंकि मौन होता ही बड़ा विकट है।जिस दिन पुरूष मौन रहने का अर्थ या मौन रहना सीख जायेगी;उस दिन से समाज में क्रांति आ जायेगी और कभी न कभी यह दिन अवश्य आयेगा।"
-"परंतु आज मुझे मौन रहकर अपने नारी होने का अर्थ समझना है,तो कृपा कर आज मुझे अकेला छोड़ दो।" ****
4. ईमानदार नागरिक
प्रायः मुझे हर दूसरे दिन बस से शहर जाना होता था।
बहुत पहले की बात है,तब किराया होता था,तीन रूपये चालीस पैसे।परिवाहन निगम की टिकीट खिडकी पर जो आदमी बैठता था,वह मुझे साठ पैसे कभी नहीं लौटाता था।वह हर बार कहता,चिल्हर नहीं है।या झल्लाता चिल्हर लेकर आओ।मेरी तरह दूसरे यात्रियों से भी वह इसी तरह से व्यवहार करता।इस तरह शाम तक वह पंद्रह बीस रूपये बना देता।उन दिनो इतने पैसे का भी बडा महत्व था।तब वेतन 260रुपये हुआ करता था।
मैं जानता था कि उसका यह कार्य अनुचित है,लेकिन मैंनै कभी चिल्हर पैसे नहीं मांगे।मैं अक्सर दस रूपये की नोट देता और वह मुझे छह रूपये लौटाता।
यह क्रम बना रहा।आज मैने संयोग से उसे पांच रूपये का नोट दिया।उसने मुझे टिकीट दिया औरक्षछह रूपये वापस किये।मै विन्डो पर ही खडा रहा।उसने मेरी तरफ देखा और आदतन झल्ला कर कहा,छुट्टे पैसे नहीं है।आपको पैसों का इतना ही मोह है तो खुले पैसे लाया करे...।चलिए भीड मत बढाईये।आगे बढिये।
मैंने कहा ,बाबूसाहब सुन तो लिजिये,मैंनै पांच रूपये का नोट दिया था ....आपने मुझे ज्यादा लौटा दिये..।
वह बोला,ज्यादा लौटा दिये है तो देश के ईमानदार नागरिक की तरह वापस कर दिजिये....दूसरोँ के पैसे पर नियत खराब करना अच्छी बात नहीं है।
मैंनै पांच रूपये वापस कर दिये।उसने उसे मेज की दराज मे डाला और दूसरे यात्री का टिकीट काटने लगा। ****
5.टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता
एक टेढ़ी पूंँछ वाले कुत्ते ने सीधी पूंँछ वाले कुत्ते से पूछा,"क्यों पार्टनर!तुम्हारी दूम सीधी कैसे हो गयी?क्या तुम्हारे मालिक ने इसे पोंगली मे डाल दिया था"?
सीधी पूंँछ वाला कुत्ता पहले हीन भावना से ग्रसित हुआ फिर साहस बटोर कर उसने कहा,"बात दरअसल यह है कि मैं अपनी पूंँछ सीधी करने की प्रेक्टिस कर रहा हूं।"
टेढ़ी पूंँछ वाला कुत्ता बोला," कुत्ते की पहचान को क्यों संकट में डाल रहे हो।अभी हम कुत्ते इतने स्थापित नहीं हुए है कि चुनाव मे खडे हो सके।जब तक हमारी पूंँछ टेढ़ीरहेगी,आदमी हमेंशा हम कुत्तों से डरेगा।" ****
सोचने के लिए विवश करती
महेश राजा की ये पाँचों लघुकथाएँ अपने लघु आकार में गहन सामाजिक, व्यंग्यात्मक और मनोवैज्ञानिक संकेत समेटे हुए हैं। लेखक ने सरल भाषा और संवाद शैली के माध्यम से जटिल यथार्थ को सहज रूप में प्रस्तुत किया है। “साँपों के होते हुए” में राजनीति की विडंबना को प्रतीकात्मक ढंग से उकेरा गया है, जहाँ योग्य व्यक्ति व्यवस्था के ‘साँपों’ के बीच अवसर से वंचित रह जाता है। “याददाश्त” जीवन के दार्शनिक पक्ष को स्पर्श करती है और यह विचार प्रस्तुत करती है कि मनुष्य की पीड़ा का मूल उसकी कटु स्मृतियाँ ही होती हैं। “मौन” में नारी मन की गहराइयों और समाज द्वारा उस पर थोपे गए मौन की विवशता का सशक्त चित्रण है, जो नारी-विमर्श को मुखर करता है। “ईमानदार नागरिक” लघुकथा व्यंग्य के माध्यम से छोटे-छोटे भ्रष्टाचार और उसे सहन करने वाली मानसिकता दोनों पर चोट करती है, जहाँ अंत में उलटबाँसी विशेष प्रभाव छोड़ती है। वहीं “टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता” प्रतीकात्मक शैली में यह दर्शाती है कि समाज में परिवर्तन के प्रयासों को भी अक्सर परंपरा और पहचान के नाम पर रोका जाता है। समग्र रूप से ये लघुकथाएँ समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते हुए पाठक को सोचने के लिए विवश करती हैं। कम शब्दों में गहरी बात कह देना इनकी सबसे बड़ी विशेषता है, जो इन्हें प्रभावशाली और सार्थक बनाती है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
लघुकथा के कथ्य गंभीर
आदरणीय महेश राजा जी जाने-माने लघुकथाकार हैं। सामाजिक विशेषताओं और विषमताओं पर उनकी पैनी दृष्टि होती है। जिसे वे अपनी लेखनी के सामर्थ्य से सशक्त और बेहतरीन रचना सृजित कर पाठकों तक पहुंचाकर रचनाधर्मिता के दायित्व को कुशलता से निभाने में सफल रहते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उनकी प्रस्तुत पांचो लघुकथाएं वर्तमान में सामाजिक परिवेश में व्याप्त विषमताओं को व्यंजना भाव शैली से उकेरने और पाठकों को उद्वेलित करने में सफल हुई हैं।
1.सांपों के होते हुए
वर्तमान में राजनीतिक परिवेश को उजागर करती अच्छी लघुकथा।
2.याददाश्त
सामाजिक परिवेश में संबंधों और सोच को लेकर अंतर्द्वंद के मनोविज्ञान के आधार पर लिखी अच्छी लघुकथा।
3.मौन
नारी पर अनेक कहानियां और लघुकथा लिखी गईं हैं। महेश राजा एक कदम आगे निकल गये। उन्होंने नारी के मौन को भी अपनी दिव्य नजरों से नारी की व्यथा को अनुभूत कर लिया। कथाकार की यही संवेदनशीलता सृजन को परिपक्वता प्रदर्शित करती है।
4.ईमानदार नागरिक
कई बार बुरी लत दिलो-दिमाग में ऐसी रच-बस जाती है कि वह आदत बन जाती है। यह लघुकथा दिमाग की ऐसी ही उपज वाले आम आदमी की जीवन से ली गई लघुकथा है।
5.टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता
पहचान और स्वभाव के बदलाव में टकराव के संघर्ष के मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण।
उपरोक्त पाँचो लघुकथा के कथ्य गंभीर हैं लेकिन उनका शिल्प इतना सजीव है कि आम पाठक के लिए सुंदर लघुकथाएं है तो चिंतनशील पाठकों के लिए वर्तमान सामाजिक ताने-बाने और मर्म का हिस्सा भी।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
हर कथा में एक स्पष्ट संदेश
महेश राजा की ये पाँचों लघुकथाएँ आकार में छोटी होते हुए भी समकालीन समाज, राजनीति, मानवीय संवेदना और स्त्री-विमर्श जैसे महत्वपूर्ण विषयों को स्पर्श करती हैं। इनकी विशेषता है कि लेखक प्रतीक, संवाद और व्यंग्य के माध्यम से गहरी बात सरलता से कह देते हैं।
1. साँपों के होते हुए
यह लघुकथा स्पष्ट रूप से राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य करती है।
मेंढ़क और साँप के माध्यम से लेखक ने यह दिखाया है कि सत्ता के “साँप” योग्य और साधारण लोगों को अवसर नहीं देते।
साहित्यिक पक्ष:
प्रतीकात्मकता अत्यंत प्रभावी है।
अंतिम पंक्ति में तीखा व्यंग्य निहित है।
सार:
यह कथा बताती है कि राजनीति में योग्यता से अधिक सत्ता और भय का वर्चस्व है।
2. याददाश्त
यह कहानी एक साधारण वार्तालाप से शुरू होकर गहरे जीवन-दर्शन तक पहुँचती है।
लेखक ने याददाश्त को केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनात्मक बोझ के रूप में प्रस्तुत किया है।
साहित्यिक पक्ष:
संवाद शैली स्वाभाविक और प्रभावशाली है।
अंत में दार्शनिक मोड़ कथा को ऊँचाई देता है।
सार:
यह कथा संकेत देती है कि इंसान की पीड़ा का मूल उसकी स्मृतियाँ भी हो सकती हैं।
3. मौन
यह लघुकथा नारी के अस्तित्व और उसके अधिकार पर केंद्रित है।
संवादों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि नारी का “मौन” भी उसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति है, जिसे समाज अक्सर समझ नहीं पाता।
साहित्यिक पक्ष:
संवादों के माध्यम से विचारों का प्रवाह।
नारी-विमर्श की स्पष्ट और सशक्त प्रस्तुति।
सार:
यह कथा बताती है कि समाज ने नारी के बोलने ही नहीं, बल्कि चुप रहने के अधिकार को भी सीमित कर दिया है।
4. ईमानदार नागरिक
यह कहानी व्यवस्था में व्याप्त छोटी-छोटी बेईमानियों पर तीखा व्यंग्य करती है।
एक साधारण घटना के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कैसे भ्रष्टाचार सामान्य व्यवहार बन चुका है।
साहित्यिक पक्ष:
यथार्थपरक चित्रण।
व्यंग्य का सूक्ष्म और प्रभावी प्रयोग।
सार:
यह कथा बताती है कि समाज में ईमानदारी की परिभाषा ही विडंबनापूर्ण हो गई है।
5. टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता
यह लघुकथा प्रतीकात्मक शैली में मानव स्वभाव और सामाजिक ढांचे पर कटाक्ष करती है।
“टेढ़ी पूँछ” यहाँ आदतों और मूल प्रवृत्तियों का प्रतीक है, जिन्हें बदलना कठिन होता है।
साहित्यिक पक्ष:-
प्रतीकात्मकता और व्यंग्य का संतुलन।अंत में गूढ़ संदेश।
सार:-
यह कथा दर्शाती है कि समाज में परिवर्तन लाना उतना आसान नहीं जितना हम सोचते है।
समग्र मूल्यांकन :-
महेश राजा की ये लघुकथाएँ ।सरल भाषा में लिखी गई हैं, जिससे पाठक आसानी से जुड़ता है।हर कथा में एक स्पष्ट संदेश और व्यंग्य की धार मौजूद है।लेखक ने कम शब्दों में गहरी बात कहने की कला का सफल प्रयोग किया है।कहीं-कहीं संवाद थोड़े लंबे हो जाते हैं। कुछ कथाओं में अंत को और अधिक धारदार बनाया जा सकता था। ये पाँचों लघुकथाएँ समाज का यथार्थ उजागर करती हैं और पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं। महेश राजा की लेखनी में संवेदनशीलता, व्यंग्य और सामाजिक चेतना का संतुलित समावेश है, जो उन्हें एक प्रभावशाली लघुकथाकार बनाता है।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
परिवर्तन लाने की प्रेरणा
भारतीय लघुकथा परंपरा में व्यंग्य, यथार्थ और मानवीय मनोविज्ञान का जो सशक्त संगम दिखाई देता है, उसी परंपरा को लेखक महेश राजा की प्रस्तुत पाँच लघुकथाएँ अत्यंत प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाती हैं। भारतीय लघुकथा विकास मंच के तत्वावधान में प्रस्तुत ये रचनाएँ न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि समाज के गहरे अंतर्विरोधों और सच्चाइयों को तीखे किन्तु सरल ढंग से उजागर भी करती हैं।
“साँपों के होते हुए” लघुकथा राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है। मेंढक और साँप के प्रतीक के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि सत्ता के खेल में योग्य व्यक्ति की नहीं, बल्कि भय और शक्ति की भूमिका निर्णायक होती है। यह लघुकथा लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं पर करारा प्रहार करती है।
“याददाश्त” एक दार्शनिक गहराई लिए हुए कथा है, जो मानव मन की पीड़ा और स्मृतियों के बोझ को उजागर करती है। लेखक ने बड़े सहज तरीके से यह संदेश दिया है कि जीवन की कटुताएँ हमारी स्मृति में ही बसती हैं, और कभी-कभी भूल जाना ही मानसिक शांति का मार्ग बन सकता है।
“मौन” नारी मन की गहराइयों को स्पर्श करने वाली अत्यंत प्रभावशाली रचना है। इसमें स्त्री के मौन के पीछे छिपे दर्द, सामाजिक बंधनों और उसकी आत्म-अभिव्यक्ति के संघर्ष को बड़ी संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया है। यह लघुकथा केवल संवाद नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का संकेत देती प्रतीत होती है।
“ईमानदार नागरिक” में व्यंग्य का अद्भुत प्रयोग है। यहाँ ईमानदारी की परिभाषा ही उलट दी गई है, जहाँ भ्रष्ट व्यवस्था के बीच सच्चाई भी उपहास का विषय बन जाती है। यह कथा पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है कि वास्तव में ईमानदारी किसकी है—व्यवस्था की या व्यक्ति की?
अंतिम लघुकथा “टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता” प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ पर गहरा कटाक्ष करती है। कुत्तों की पूँछ के बहाने लेखक ने यह दर्शाया है कि पहचान और स्वभाव को बदलने का प्रयास अक्सर व्यर्थ होता है, और समाज में स्थापित धारणाएँ कितनी गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं।
समग्र रूप से, महेश राजा की ये पाँचों लघुकथाएँ संक्षिप्त होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। इनमें व्यंग्य की धार, विचारों की गहराई और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय है। लेखक ने सरल भाषा में जटिल यथार्थ को प्रस्तुत कर पाठकों के मन-मस्तिष्क को झकझोरने का सफल प्रयास किया है।
निष्कर्षतः, ये लघुकथाएँ केवल साहित्यिक कृतियाँ नहीं, बल्कि समाज का दर्पण हैं—जो हमें सोचने, समझने और स्वयं में परिवर्तन लाने की प्रेरणा देती हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
सादर नमन महेश राजा जी को
स्व. श्रद्धेय महेश राजा जी छत्तीसगढ़ के ख्याति प्राप्त लघुकथाकार थे ! इनकी सारगर्भित लेखनी के सभी कायल , विनम्र स्वभाव भाषा बोली में चुटकियों लघुकथा के माध्यम से राजनैतिक सामाजिक धार्मिक बातों लघुकथा समाज राज्य जन तक पहुँचाने का भरसक प्रयास किया हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत थे ! मेरी को हरदम सहारा दे कई बार समीक्षा कर गलतियों को बताया करते थे कभी उन्होंने किसी को भी उपहास नही उत्साह का मार्ग दिखाया
“साँपो के होते हुए “कथा व्यंग बाण राजनीति चलाया
“याददास्ता “ बादाम खाने के ऊपर
मैंने भी लघुकथा लिखी
“आटोवाला “ पति पत्नी आटो से अपने नए घर से पुराने घर जा रहे थे ! आधे रास्ते पर पर पहुँचे पत्नी ने कहा चाबी रखें होना , पति ने गुस्से में कहा - तुम्हें मुझे याद दिलाना चाहिए था ना , पत्नी ने कहा - हम बादाम खाते है “ इतना सुनते आटो वाले ने कहा - साहब आप भी बादाम खाया करो ?
मुझे तो रोज पत्नी भिगो कर देती है !
ऐसा नही किसी सवारी से पैसा लेना भूल जाओ ! पति ने कहा- अब मोड़ ऑटो अब मुझे तुझसे ही ज्ञान लेना बच गया था !
महेश भाई ने लिखी ज़िन्दगी की सारी कटुता याददास्त की वजह से ही तो होती है
मौन कथा कितनी सार्थक बात लिखो परंतु आज मुझे मौन रहकर अपने नारी होने का अर्थ समझना है
तो कृपा कर आज मुझे अकेला छोड़ दो कितनी गहरी बात लिखी !
ईमानदार नागरिक जो ख़ुद को बेईमान नही साबित करना चाहता ,
पर अपनी बात इस तरह रखा आप तो देश के ईमानदार नागरिक है ! मतलब देश में ईमानदारी नहीं चलती आप ही लौटा दीजिए !बन जाइए ईमानदार नागरिक !
टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता बेहतरीन कथा
कहावत है जब किसी व्यक्ति कोई काम सही ढंग से करना ही नहीं होता उसे तो हर मतलब के पैसे चाहिए या मन माफिक काम चाहिए होता है !
ये तो वही कुत्ते की पूँछ टेढ़ी की टेढ़ी जैसी बाते करते हो ! नेताओ का भी यही हाल है चाहे वो किसी भी स्तर के नेता हो उन्हें जनता के ओट के आगे कुछ नहीं दिखाई देता है!
लघुकथा का अंत एक ही पंक्ति में बिना अधिक शब्द कहे बहुत कुछ समझा रहा है। लघुकथा का उद्देश्य, सन्देश एवं सार्थकता भी इस पंक्ति में निहित हैं। सादर नमन महेश राजा जी को 💐🙏
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
पांचों लघुकथा की समीक्षा
1. साँपों के होते हुए
महेश जी की यह लघुकथा व्यंग्यात्मक है...यहांँ उन्होंने एक मेंढक से बुलवाकर बताने की कोशिश की है कि (राजनीति में) चुनाव में दबंगों का ही बोलबाला है।
२.याददाश्त....
लघुकथा में बहुत ही गहरी बात कह दी है... उम्र के अनुसार हमारी याददाश्त कम होने लगती है।छोटे भाई ने दूध, बादाम खाने का सुझाव दिया किंतु साथ ही एक बात धीरे से कह दी जिस बात से हमें चुभन नहीं होती अर्थात सुखद होती है हम भूल जाते हैं। किंतु बड़े भाई ने गंभीर होते हुए कहा..."काश याददाश्त पूरी ही खो जाए चूंकि जीवन की सारी कटुता इस याददाश्त की वजह है" अर्थात हमारे जीवन में आई कड़वी बातें,कठिनाईयां, दुश्मनी, अपनी हार हम भुल ही नहीं पाते और जीवन भर दुख ढोते रहते हैं। उनके अनुसार थोड़ा थोड़ा भूलने की जगह सब भुल जायें जो जीवन को सुखद बनाता है।
३. मौन
दो लोगों के बीच संवाद लिये है लेखक ने नारी की विवशता को उजागर किया है साथ ही यह बताया है कि आज भी पुरुष स्त्री के छोटी छोटी हलचल पर भी अपने अधिकार की मोहर लगाने की कोशिश करता है।पति.."तुम चुप क्यों हो?
पत्नी क्यों चुप नहीं रह सकती.."
पति नहीं... तुम्हारा चुप रहना मुझे मंजूर नहीं " नारी पिता ,मां भाई के सामने भी मौन रही उनके हिसाब से चली ...आज भी मौन है किंतु जिस दिन नारी का मौन टूटा दुर्गा बनते देर ना लगेगी। नारी सरल, सहज, सहनशील, धैर्यता का गुण लिए रहती है किंतु जब सहन से बाहर होता है तब अपने मान सम्मान की खातिर वह चण्डी भी बन सकती है। अतः उसे मौन रहने दो...!
४. ईमानदार नागरिक
परिवाहन निगम की टिकिट खिड़की पर टिकिट देने वाला स्वयं तो कभी किसी को छुट्टे ना होने का बहाना कर पूरे पैसे नहीं देता था किंतु टिकिट लेने वाले को पाँच की जगह छै रूपये मिलने पर उसने अधिक पैसे देने की बात करता है, तो कहता है ईमानदार नागरिक की तरह लौटा दें... यानी स्वयं तो ईमानदार नहीं होते किंतु दूसरों को ईमानदार होने का पाठ पढ़ाते हैं... पहले स्वयं को बदलें फिर दूसरे को कहें...।
५. टेढ़ी पूंछ वाला कुत्ता
कुत्ते के माध्यम से बताया है आज सीधे का जमाना नहीं है। आजकल दबंग और टेढें का ही जमाना है। जब तक धाक रहेगी हमारा डर हमेशा लोगों पर बना रहेगा...।
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