के पी सक्सेना की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

        अशिक्षित इंसान जानवर की तरह होता है। शिक्षा से ग़रीबी दूर होती है। यह शत प्रतिशत सत्य है। प्राचीन काल में वर्तमान में भी ‌सत्य साबित हो रहा है। सिर्फ कामचोर का कोई इलाज नहीं है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        शिक्षा और गरीबी का अन्योन्याश्रित संबंध है जहां जब कोई व्यक्ति परिवार या समाज के लोग पढ़ने- लिखने में, बुनियादी समझ में असमर्थ हों, अंधविश्वास और रूढ़िवादिता में जकड़े हों या बेहद गरीब हों, भरण- पोषण के लिए शारीरिक और मानसिक स्तर पर कमजोर हों तो ऐसी स्थिति से व्यक्ति शिक्षित होने के साधन जुटाने में सर्वथा असमर्थ हो जाता है। तब इस अभावपूर्ण स्थिति में उसे सर्वथा गरीबी से अभिशप्त माना भी जा सकता है क्योंकि वह निरक्षरता की अक्षम स्थिति में जीने को मजबूर है। उसका तर्क और विवेक सब खो जाता है और यह स्थिति उसे आलसी,निकम्मा, कामचोर भी बना देती है वह प्रयास करना ही छोड़ देता है। फलस्वरूप रोजगार की ओर उन्मुख भी नहीं होना चाहता बल्कि यथा कदा 'खाली दिमाग शैतान का घर' की कहावत को सिद्ध कर देता है। पर मनुष्य वही है जो अशिक्षित होने के बाबजूद ईमानदारी  से मेहनत, मजदूरी करके धन कमाकर स्वयं को शिक्षित करें। गरीबी के शाप से मुक्त होकर कर्मठता से कोई भी छोटे से छोटा व्यवसाय करके धन कमा कर गरीबी को दूर करे फिर शिक्षा के महत्व को समझ कर  सुघर  जीवन जी सके।

-  डॉ.  रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     जीवन में अनेकों प्रसंग आते है, जो व्यक्ति अशिक्षित है वहीं ग़रीब है, जो कामचोर है वहीं बेरोजगार है। हकीकत की झलकियां दिखाई देती है। लेकिन अब व्यवस्था बदल चुकी है, जो अशिक्षित है वे ही अमीरचन्द है, जो कामचोर था, वही घर बैठे रोजगार दिला रहा है। उनके पास जरूरत से ज्यादा दिमाग हो गया है, कब कहा से अमीर बन जाए और किस को रोजगार दिला दें। वस्तु स्थिति यही कहती है, अब पढ़ा लिखा होने के बाद भटक रहा है, थक हार कर कामचोर बन गया है, इसलिए बेरोजगार होना स्वाभाविक ही है। व्यवस्थाऐं बिल्कुल बदल चुकी है, सब अपने स्वार्थ के खातिर पलोभन दे रहा है, रोजगार के खातिर बेरोजगार बना रहा है......।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

     बालाघाट - मध्यप्रदेश

       कोई धन के अभाव के कारण गरीब होता है , कोई व्यवहार के कारण गरीब होता है ! धन के अभाव की गरीबी हो आमतौर पर गरीबी कहलाती है , पर वास्तव मैं जिस व्यक्ति में सद्व्यवहार , नैतिकता का अभाव हो , असली गरीब होता है ! केवल अच्छे कपड़े , बड़ी गाड़ी , सुख सुविधाएं ही सज्जन व संपन्न व्यक्ति की प्रभाषा नहीं , अपितु उसका अच्छा व्यवहार , शिक्षा , सद्वचन , आधार सत्कार उसकी महानता की कसौटी हैं ! आज की भागदौड़ मैं हर व्यक्ति अपने श्रम के आधार पर अपनी जीविका हेतु कार्य करता है , व अपना गुजारा करता है !! जो कुछ भी नहीं करता या नहीं करना चाहता , वही आज की तिथि में बेरोजगार  है व कामचोर भी है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

           यह कथन प्रथम दृष्टया आकर्षक अवश्य प्रतीत होता है, किन्तु वस्तुतः यह एक अर्ध-सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं। निस्संदेह शिक्षा व्यक्ति को अवसर प्रदान करती है और परिश्रम उसे आगे बढ़ाता है, परन्तु जीवन की वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। समाज और व्यवस्था में अनेक ऐसे कारक सक्रिय होते हैं जो एक योग्य, शिक्षित और परिश्रमी व्यक्ति को भी संघर्ष, बेरोजगारी और आर्थिक अभाव की स्थिति में धकेल सकते हैं। विशेषतः जब कोई व्यक्ति देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ा होता है, तब वह अक्सर सत्ता और तंत्र के प्रतिरोध का सामना करता है और यहां तक की उसे माननीय उच्च न्यायालय में भी स्वयाचि बनकर अपने मौलिक अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है। उक्त यथार्थ इतिहास रचता है। उल्लेखनीय है कि इतिहास और वर्तमान दोनों इस तथ्य के साक्षी हैं कि व्यवस्था की विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठाने वाले अनेक लोगों को दंडित किया गया—उनकी नौकरियाँ छीनी गईं, उन्हें हाशिये पर डाल दिया गया, और कभी-कभी उन्हें जीविका के लिए अत्यंत साधारण कार्यों तक के लिए विवश होना पड़ा। ऐसे में यह कहना कि केवल अशिक्षा या आलस्य ही गरीबी और बेरोजगारी के कारण हैं, एकपक्षीय और अधूरा दृष्टिकोण है।वास्तविकता यह है कि जब एक ईमानदार और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करता है, तो वह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत चुनौतियों से जूझता है। यदि व्यवस्था न्यायपूर्ण और पारदर्शी न हो, तो योग्य व्यक्ति भी अन्याय का शिकार बन सकता है। इस प्रकार, कई बार परिस्थितियाँ इतनी प्रतिकूल हो जाती हैं कि व्यक्ति को अपने आत्मसम्मान और अस्तित्व के बीच संघर्ष करना पड़ता है, और वह जीवनयापन के लिए किसी भी उपलब्ध साधन—जैसे समाचार पत्र बेचने—तक के लिए बाध्य हो जाता है।अतः आवश्यक है कि हम इस विषय को व्यापक दृष्टिकोण से देखें। गरीबी और बेरोजगारी केवल व्यक्तिगत कमियों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक, प्रशासनिक और नैतिक संरचनाओं की खामियों का भी दुष्परिणाम हैं। एक स्वस्थ राष्ट्र वही है जहाँ सत्य बोलने वाला, भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ा होने वाला और देशहित में कार्य करने वाला व्यक्ति सम्मान और सुरक्षा प्राप्त करे, न कि दंड और उपेक्षा।

इसीलिए यह कहना अधिक समीचीन होगा कि—

“शिक्षा और परिश्रम सफलता के साधन अवश्य हैं,

किन्तु न्यायपूर्ण व्यवस्था ही उनके फल को सुनिश्चित करती है।”

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) – जम्मू और कश्मीर

।      यह कथन अपने भीतर एक गहरी सामाजिक और नैतिक सच्चाई समेटे हुए है, परंतु इसे केवल शब्दशः नहीं, व्यापक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।अशिक्षा वास्तव में व्यक्ति की सबसे बड़ी गरीबी मानी जा सकती है, क्योंकि शिक्षा केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि सोचने, समझने और आगे बढ़ने की शक्ति देती है। अशिक्षित व्यक्ति अवसरों से वंचित रह जाता है, उसके जीवन में सीमाएँ बढ़ जाती हैं, इसलिए उसे “गरीब” कहना एक हद तक उचित प्रतीत होता है। परंतु गरीबी केवल आर्थिक नहीं होती—यह सामाजिक, मानसिक और अवसरों की कमी से भी जुड़ी होती है। कई अशिक्षित व्यक्ति कठिन परिश्रम से अपने जीवन को बेहतर बना लेते हैं, इसलिए अशिक्षा को पूर्णतः गरीबी का पर्याय नहीं माना जा सकता। दूसरे भाग में कहा गया है कि “जो कामचोर है वही बेरोजगार है।” यह कथन कर्म और उत्तरदायित्व की ओर संकेत करता है। वास्तव में जो व्यक्ति परिश्रम से दूर भागता है, उसके लिए रोजगार के अवसर भी सीमित हो जाते हैं। लेकिन बेरोजगारी के पीछे केवल कामचोरी नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति, संसाधनों की कमी और सामाजिक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार होती हैं। अतः निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा और परिश्रम जीवन के दो ऐसे स्तंभ हैं जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाते हैं, परंतु किसी भी समस्या को केवल एक कारण से जोड़कर देखना उचित नहीं। संतुलित दृष्टिकोण यही है कि शिक्षा अवसर देती है और परिश्रम उन्हें साकार करता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

        बात सत्य है जो व्यक्ति अशिक्षित हैं वहीं गरीब होता है क्योंकि वह कुछ कर नहीं पाता है. कुछ करने के लिए कुछ समझ होनी चाहिए. और जो कुछ नहीं करेगा वही गरीब रहता है. शिक्षित व्यक्ति कुछ न कुछ कर ही लेता है. और नहीं होता तो कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपने रोजी-रोटी  चला ही सकता है.कोई व्यक्ति अशिक्षित हो या शिक्षित यदि वह कामचोर है तो वह बेरोजगार ही रहता है. क्योंकि कामचोर को कोई काम अच्छा नहीं लगता है. तो जब कोई  कामचोर होगा तो वह बेकार और बेरोजगार ही  होगा. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

        अशिक्षा अधिकतर इंसानों को आगे बढने नहीं देती। अशिक्षा से मेरा तात्पर्य डिग्रियों की कमी से नहीं है। डिग्री तो महज एक गिनती है - - असली शिक्षा तो ज्ञान है। संसार ऐसे उदाहरणों से भरा है जहां पर स्कूली शिक्षा न पाये हुये व्यक्तियों ने हजारों को रोजगार दिया है। गरीब वही है जिसने काम को पूजा नहीं समझा। कोई भी काम छोटा नहीं होता। "जिसने की शरम उसके फूटे करम" दुनियां में कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता। एक मजदूर महल बनाता है - - धनवान उसमें रहता है तो सोचें ज्यादा लायक कौन है? निःसंदेह मजदूर। लेकिन समाज का ढांचा ऐसा है कि हंस चुगेगा दाना घुन का कौआ मोती खायेगा। जिसके पास डिग्रियों की थाती है वह एसी कमरों में बैठकर सिर्फ हस्ताक्षर करते हैं और जिनके हाथों में हुनय है वे रोज नये ताजमहल गढ़ते हैं। बेरोजगारी देश का समाज का दुर्भाग्य है। हाँ - - अपवाद भी होते हैं। ये सत्य है कि स्वभाव से आलसी लोग काम नही करना चाहते।खैर - - यह लंबी बहस का विषय है।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

      " जो व्यक्ति अशिक्षित है, वही गरीब है " यह अर्धसत्य सा लगता है क्योंकि ऐसे अनेक अशिक्षित लोग भी हैं जो पैसे वाले हैं। राजनीति में हो या व्यापार जगत में या प्रतिभा में अथवा अन्य कोई क्षेत्र हो, सभी में  बहुत उदाहरण होते हैं जो अशिक्षित हैं परंतु गरीब नहीं है बल्कि धनाढ्य की श्रेणी में आते हैं। इसमें उनका भाग्य है, विरासत है, चतुराई है या रंगदारी। कारक जो भी हो। यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है और इस कथन की पुष्टि भी करता है कि जो व्यक्ति अशिक्षित है वही गरीब है। क्योंकि जो शिक्षित होगा वह अपनी योग्यता से जीविकोपार्जन के लिए कोई न कोई ऐसा माध्यम का चयन तो कर ही सकता है कि वह गरीबी में न रहे और शिक्षा का उद्देश्य भी यही है कि अपना जीवन उन्नत और समृद्धशाली बनाने में सक्षम हो। इसी का विपरीत भाव कामचोर है। जो आलसी होते हैं वे लापरवाह होते हैं और जिस हालात में उसी में संतुष्ट रहते हैं। वे आगे बढ़ना ही नहीं चाहते। न मेहनत करना चाहते। इसीलिए ऐसे लोग सामान्यत: बेरोजगार रहकर यहाँ-वहाँ बैठकर बेकार में समय गंवाया करते रहते हैं।अत: यह कहना तनिक भी गलत नहीं कि जो कामचोर हैं, वही बेरोजगार हैं। वर्ना मेहनती लोग जब तक उन्हें मन के अनुसार रोजगार नहीं मिलता, वे कुछ न कुछ रोजगार करने ही लगते हैं।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

          “जो व्यक्ति अशिक्षित है वही गरीब है और जो व्यक्ति कामचोर है वही बेरोजगार है”—‌ तो मुझे लगता है कि यह कथन हमें सोचने पर मजबूर जरूर करता है, परंतु जीवन की सच्चाई इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरी है।मेरे अनुभव में शिक्षा का जीवन में बहुत महत्व है। शिक्षा हमें सही-गलत का ज्ञान देती है, सोचने-समझने की शक्ति देती है और हमें समाज में सम्मानपूर्वक जीने की दिशा दिखाती है। एक शिक्षित व्यक्ति अवसरों को बेहतर ढंग से पहचान सकता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि केवल शिक्षा ही सफलता की गारंटी नहीं है। मैंने अपने आसपास ऐसे अनेक लोगों को देखा है जो अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, फिर भी उन्होंने अपने परिश्रम, लगन और व्यवहारिक बुद्धि के बल पर बड़े-बड़े व्यवसाय खड़े किए और सम्मानजनक जीवन जिया। कई ऐसे लोग भी हैं जो “अंगूठा छाप” कहे जाते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और अनुभव से न केवल स्वयं को समृद्ध बनाया, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि अशिक्षा गरीबी का एक कारण हो सकती है, लेकिन यह उसका एकमात्र कारण नहीं है। यदि व्यक्ति में सीखने की इच्छा, निर्णय लेने की क्षमता और लगातार मेहनत करने का जज़्बा हो, तो वह बिना औपचारिक शिक्षा के भी सफलता प्राप्त कर सकता है।अब यदि हम दूसरे भाग—“कामचोर व्यक्ति ही बेरोजगार होता है”—पर विचार करें, तो इसमें भी आंशिक सच्चाई है। जो व्यक्ति काम से जी चुराता है, जिम्मेदारियों से भागता है और समय का महत्व नहीं समझता, उसके लिए किसी भी कार्य में टिके रहना कठिन हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए बेरोजगारी स्वाभाविक परिणाम बन सकती है।लेकिन हर बेरोजगार व्यक्ति कामचोर नहीं होता। आज के समय में हम देखते हैं कि कई शिक्षित युवक-युवतियाँ पूरी मेहनत और योग्यता के बावजूद भी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अवसरों की कमी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अनुभव की मांग के कारण उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता। इसका अर्थ यह नहीं कि वे आलसी हैं, बल्कि परिस्थितियाँ भी उतनी ही जिम्मेदार हैं।दूसरी ओर, कुछ लोग कम शिक्षित होने के बावजूद काम से जी नहीं चुराते। वे छोटे-छोटे काम से शुरुआत करते हैं, धीरे-धीरे सीखते हैं, जोखिम उठाते हैं और अपने लिए नए रास्ते बनाते हैं। ऐसे लोग बेरोजगार नहीं रहते, क्योंकि वे काम को छोटा-बड़ा नहीं मानते और हर परिस्थिति में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।इस प्रकार, मेरे विचार से यह कहना अधिक उचित होगा कि— अशिक्षा और आलस्य दोनों ही जीवन में बाधा बन सकते हैं, परंतु सफलता और असफलता का निर्णय केवल इन्हीं दो बातों से नहीं होता। सफलता के लिए शिक्षा, परिश्रम, अनुभव, अवसर और सकारात्मक सोच—इन सभी का संतुलन आवश्यक है।

शिक्षा हमें दिशा देती है,

और परिश्रम हमें मंज़िल तक पहुँचाता है।

परंतु संवेदनशीलता, अवसर और आत्मविश्वा

इनके बिना न तो शिक्षा पूर्ण है, 

न ही परिश्रम सफल।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

       आज का विषय पढ़ते ही संस्कृत का एक श्लोक स्मरण हो आया-

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।

अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतः सुखम् ।।

इसका अर्थ है कि आलसी व्यक्ति को विद्या (ज्ञान) नहीं मिल सकती, विद्याहीन को धन नहीं मिलता, निर्धन के मित्र नहीं होते और मित्रहीन को सुख नहीं मिल सकता। यह स्पष्ट है कि अविद्या, अशिक्षा के कारण सुख से वंचित रहना पड़ता है। अब बात कामचोरी की,इसकी वजह आलस्य ही होता है।उसी को कारण आदमी काम नहीं करता और बेरोज़गारी का रोना रोता रहता है। रोजगार की कोई कमी नहीं है बस आलसी और कामचोरी की प्रवृत्ति वालों को काम न करने का बहाना चाहिए होता है।कुल मिलाकर आलस्य ही अविद्या और सभी समस्याओं की जड़ है, इसलिए आलसी नहीं बनना चाहिए।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

" मेरी दृष्टि में " बेरोजगार वहीं है। जो अशिक्षित है या कामचोर है। बाकी तो काम की तलाश में विदेश तक चलें जातें हैं। कामयाब भी होते हैं। पैसा भी कमाते हैं। परन्तु शिक्षा का अपना महत्व है। जो जीवन की रूपरेखा बदल देते हैं। 

         - बीजेन्द्र जैमिनी 

       (संचालन व संपादन)


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