महापंडित राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
बहुत सुंदर विषय है यह। बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥" मनुष्य का जन्म बहुत भाग्यशाली को मिलता है यानी भाग्यवान तो आप जन्मजात हुए। और देखिए, "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करहि सो तस फलु चाखा।।" तो मानिए कर्म प्रधान जग में भाग्यवान जन्म मिलना जीवन की बड़ी उपलब्धि है।अब इस जीवन को चलाने के लिए शिक्षा और रोजगार बहुत जरूरी है दोनों। शिक्षा के बिना सफल जीवन की कल्पना व्यर्थ ही लगती है। यानी भाग्य,कर्म, शिक्षा और रोजगार चारों ही जीवन का निर्माण करते हैं। इनमें से कोई एक पक्ष भी कमजोर होने पर जीवन असफल होना निश्चित होता है, इसलिए कर्म करते हुए,शिक्षा अर्जित कर उच्च रोजगार प्राप्त कर सकें।
- डॉ अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
जीवन का निर्माण कई कारकों से होता है, जिनमें भाग्य और कर्म प्रमुख हैं। भाग्य हमें जन्म, परिवार, स्वास्थ्य और अवसर प्रदान करता है, लेकिन केवल भाग्य पर्याप्त नहीं होता। असली जीवन की दिशा और सफलता कर्म से निर्धारित होती है। मेहनत, लगन और सही निर्णय ही हमें भाग्य द्वारा प्राप्त अवसरों का सही लाभ उठाने में सक्षम बनाते हैं। उदाहरण स्वरूप, कोई व्यक्ति अच्छे परिवार और संसाधनों में जन्म ले सकता है, लेकिन यदि वह मेहनती और अनुशासित नहीं है, तो जीवन में सफलता पाना मुश्किल है। वहीं, साधारण परिस्थितियों वाला व्यक्ति, जो कर्म में निष्ठावान और लगनशील है, वह असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कर सकता है। इसी तरह, शिक्षा और रोजगार जीवन की स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक हैं। शिक्षा न केवल ज्ञान देती है, बल्कि सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करती है। रोजगार या पेशा वह माध्यम है जिससे व्यक्ति अपने जीवन के लिए आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करता है। शिक्षा और रोजगार एक-दूसरे के पूरक हैं; शिक्षा बिना रोजगार के अधूरी है, और रोजगार बिना शिक्षा के स्थायी और संतोषजनक परिणाम नहीं दे सकता। अतः सफलता और सुखी जीवन के लिए भाग्य, कर्म, शिक्षा और रोजगार का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण है। इन सभी का संयोजन व्यक्ति को आत्मनिर्भर, स्थिर और सम्मानित जीवन की ओर ले जाता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
देखा जाए संतुलन जीवन के लिए भाग्य के भरोसे बैठने की बजाय अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म करना ही एकमात्र मार्ग है क्योंकि भाग्य वो नींव है जो पहले बन चुकी है लेकिन उस पर जीवन की इमारत कैसी होगी यह पूरी तरह हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर करता है क्योंकि जो भाग्य में लिखा है वह परिणाम है लेकिन उसे बदलने की शक्ति वर्तमान के कर्मों पर ही निर्भर करता है, तो आईये आज इसी पर चर्चा को आगे बढाने का यत्न करते हैं कि भाग्य और कर्म से बनता है जीवन, शिक्षा और रोजगार से बनता है जीवन, मेरा मानना है कि कर्म के माध्यम से ही भाग्य को बदला या सुधारा जा सकता है कहने का भाव बुरे भाग्य को भी मेहनत और सही कर्मों द्वारा बेहतर बनाया जा सकता है क्योंकि मेहनत और सही दिशा में किए गए कर्म भाग्य को अनुकूल बना सकते हैं केवल भाग्य पर निर्भर रहने से सफलता नहीं मिलती, यहाँ तक शिक्षा और रोजगार का संबंध है इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षा और रोजगार एक बेहतर जीवन की नींव है क्योंकि यहाँ शिक्षा ज्ञान और कौशल प्रदान कर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है वहीं रोजगार उस कौशल को सही उपयोग कर आर्थिक स्थिरता और आत्मविश्वास लाता है, शिक्षित व्यक्ति न केवल नौकरी ढूंढता है बल्कि अपना खुद का व्यवसाय शुरू करके दुसरों को भी रोजगार दे सकता है इसलिए शिक्षा और रोजगार का सही संयोजन व्यक्ति को न केवल करियर में सफलता दिलवाना है बल्कि जीवन में स्थिरता और सम्मान प्रदान करना भी है, आखिरकार यही कहुंगा कि भाग्य, कर्म, शिक्षा और रोजगार जीवन के चार स्तंभ हैं यहाँ कर्म ही भाग्य का निर्माता है और शिक्षा के माध्यम से सही कर्म का चयन होता है, कर्म ही व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा तय करते हैं जबकि शिक्षा ज्ञान प्रदान कर रोजगार के अवसरों को बढाती है तथा कौशल प्रदान करती है जबकि रोजगार उस कौशल को उत्पादकता में बदलता है इसलिए योग्य कर्म से ही सही रोजगार हासिल होता है मनुष्य को चाहिए भाग्य के भरोसे बैठ कर कर्म को नहीं ठुकराना चाहिए, हमें सफल जीवन के लिए शिक्षा के माध्यम से सही कौशल प्राप्त करना और निरंतर कर्म करना ही जीवन के लिए अनिवार्य है ताकि कर्मों से भाग्य और जीवन दोनों संवर कर सही शिक्षा को प्राप्त कर अच्छे रोजगार को अपनाकर अपने जीवन को सफलतापूर्वक गुजार सकें।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू -जम्मू व कश्मीर
यह पंक्तियाँ जीवन के यथार्थ का सार प्रस्तुत करती हैं। Rahul Sankrityayan जैसे महान विचारक के जीवन को देखें तो स्पष्ट होता है कि उन्होंने केवल भाग्य पर नहीं, बल्कि कर्म, ज्ञान और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति पर विश्वास किया। राहुल सांकृत्यायन ने अपने अथक परिश्रम, जिज्ञासा और अध्ययन के बल पर स्वयं को एक साधारण व्यक्ति से असाधारण व्यक्तित्व में परिवर्तित किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसे दिशा देने का माध्यम है। रोजगार, व्यक्ति के आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का आधार बनता है, जबकि कर्म उसे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। वास्तव में, भाग्य केवल अवसर देता है, परंतु कर्म और शिक्षा ही उन अवसरों को सफलता में परिवर्तित करते हैं। राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में यह कहना उचित होगा कि यदि मनुष्य सीखने की ललक और कर्म करने की शक्ति को अपने जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन सार्थक और प्रेरणादायक बन सकता है।
- अर्चना झा
पानीपत - हरियाणा
भाग्य और कर्म, शिक्षा और रोजगार चारों का सम्बंध जीवन से है. इन सबके समन्वय से ही जीवन का निर्माण होता है. भाग्य और कर्म का आपस में गहरा संबंध है. कहा जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है. यानी अपने कर्मों से अपने भाग्य को सँवार सकता है. पर यह भी कहा जाता है कि उसके भाग्य में वैसा ही कर्म था. इसलिए उसका जीवन वैसा ही है. उसी तरह शिक्षा और रोजगार का संबंध है, जो जैसा शिक्षा प्राप्त करेगा उसे वैसा ही रोजगार मिलेगा. उच्च कोटि की शिक्षा उच्च रोजगार. निम्न कोटी की शिक्षा निम्न कोटि का रोजगार. उच्च कोटि का रोजगार अधिक कमाई. अधिक कमाई तो जीवन हाई फाई. आलीशानता,भव्यता पूर्ण जीवन. निम्न रोजगार कम आय. साधारण जीवन. इस प्रकार हम देखते हैं कि भाग्य, कर्म, शिक्षा और रोजगार ये चारों मिलकर जीवन का निर्माण करते हैं. चारों का आपस में संतुलन जरूरी है एक अच्छे जीवन के लिए.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
मनुष्य जब जन्म से हो अपना भाग्य साथ लेकर आता है ! किसी का जीवन सरल होता , किसी का कठिन !! कोई अमीर होता है , व सुविधासंपन्न होता है , तो कोई अभावग्रस्त गरीब ! जन्मजात भाग्य को कर्मों द्वारा बदला जा सकता हैं, व अप्राप्य को भी प्राप्त किया जा सकता है ! शिक्षा से मनुष्य के जीवन में सभ्यता , कौशल का पदार्पण होता है , व शिक्षा के कारण रोजगार भी मिलता है , जिस से जीवन में सकारात्मक होंगे परिवर्तन आता है !
- नंदिता बाली
सोलन -हिमाचल प्रदेश
हमें जीवन में भाग्य के साथ ही साथ कर्म करते हुए चलना चाहिए, तभी राह आसान होते हुए, आगे बढ़ते जाते है। भाग्य और कर्म से बनता जीवन, शिक्षा और रोजगार से बनता है जीवन। वास्तविक पहचान जीवन में मिलती जाती है। भाग्य, कर्म, शिक्षा फिर रोजगार से जीवन चलता है। हम भाग्य के भरोसे कर्म भी नहीं कर सकते, अकर्म से शिक्षा भी हासिल नहीं कर सकते है, जब शिक्षा ही नहीं मिलेगी तो रोजगार कैसा, जब रोजगार ही नहीं मिलेगा तो जीवन प्रसंग कैसा चलेगा, चिंतनीय है......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
जीवन को आकार देने केलिए भाग्य और कर्म दोनों का महत्वपूर्णयोगदान है, ! जो शिक्षा रोजगार को जोड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं! भाग्य हमें अप्रत्याशित अवसर प्रदान करता है, जो हमारे जीवन को बदल सकते हैं।भाग्य हमारे जीवन की परिस्थितियों को प्रभावित करता है, जो हमारे विकास को आकार देते हैं। कर्म का योगदान प्रयास और परिश्रम है कर्म हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत परिश्रम करने के लिए प्रेरित करता है। कर्म करने से हमें आंतरिक शक्ति और आत्मबल मिलता है, जो हमें चुनौतियों का सामना करने में मदद करता है।शिक्षा हमें ज्ञान और कौशल प्रदान करता है लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं। हमारे आंतरिक विकास को बढ़ावा देती है, जो हमें एक बेहतर इंसान बनाती है। रोजगार हमें आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है, जो हमारे जीवन को सुरक्षित और सुखी बनाता है। रोजगार आंतरिक संतुष्टि देता है, जो हमारे आत्म-विश्वास को बढ़ाता है।भाग्य, कर्म, शिक्षा, रोजगार का संयोजन जीवन की सफलता का मार्ग है हमें आंतरिक संतुष्टि देता है और हमारा जीवन सुखी और समृद्ध बनाता है।
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि भाग्य और कर्म परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित हैं। कर्म से भाग्य का चयन होता है और भाग्य से जन्म का। जो फिर हमें कर्म करने का अवसर देगा। यह एक ऐसा चक्र है जो चलता रहता है। पुनर्जन्म की परिकल्पना भी इसी चक्र का आधार है। कर्म का विभाजन यानी अच्छे-बुरे कर्म से भाग्य का सुख-दुख में विभाजन होता है और फिर कर्म करने का अवसर मिलता है। यही जीवन है। इसी परिप्रेक्ष्य में कर्म के लिए या इसे यूँ कहा जाये कि अपने दायित्व का शुचिता से निर्वहन करने के लिए ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए जितने शिक्षित होगें, ज्ञान की सामर्थ्य बढ़ती चलेगी और इसी सामर्थ्य की योग्यता से जीवन जीने के सुअवसर मिलेंगे यानी अच्छे से अच्छे रोजगार प्राप्त होंगे और जीवन को संवारने का माध्यम बनेंगे।सुक्ष्मता से इसे समझने का प्रयत्न करें तो वही भाग्य और कर्म का सिद्धांत मिलेगा और कथित मर्म की पुष्टि होगी।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवाररा - मध्यप्रदेश
भाग्य और कर्म से बनता है जीवन, शिक्षा और रोजगार से बनता है जीवन.....इसमें कोई दो राय नहीं है, यह पूर्णरित से सत्य है। जो व्यक्ति कामचोर और आलसी हैं वहीं भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं किंतु जो परिश्रम करते हैं वे स्वयं भाग्य का निर्माण करते हैं। कर्म से ही हम अपना भाग्य बना अपना जीवन संवारते हैं। वहीं शिक्षा के बिना हमारा जीवन अधूरा है। शिक्षा हमें ज्ञान देती है और हमारी कौशलता को निखारती है। शिक्षा से हमारे नैतिक बोध का ज्ञान करा हमारी नैतिकता का विकाश करती है। शिक्षा के बिना किसी भी व्यक्ति, समाज, अथवा राष्ट्र की उन्नति नामुमकिन है। ज्ञान से अनेक उद्योगों का विकास होता है। अनेक रोजगार के द्वार खुल जाते हैं। जीवन यापन के लिए रोजगार करना जरूरी है। यह हमारे कार्य का व्यवहारिक रूप है जिससे हमारे जीवन में तरक्की होती है एवं हमारा जीवन सुखमय होता है।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
उक्त मूल पंक्तियाँ निस्संदेह अत्यंत श्रेष्ठ, सारगर्भित और जीवन के यथार्थ को सटीक रूप में अभिव्यक्त करती हैं। “भाग्य और कर्म से बनता है जीवन, शिक्षा और रोजगार से बनता है जीवन”—इन पंक्तियों में जीवन का समग्र दर्शन समाहित है। यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य का जीवन केवल भाग्य के भरोसे नहीं चलता, बल्कि उसके कर्म ही उसके भविष्य की वास्तविक नींव रखते हैं। भाग्य अवसर प्रदान कर सकता है, किन्तु उन अवसरों को पहचानना, उन्हें साधना और उन्हें उपलब्धियों में परिवर्तित करना केवल कर्म के माध्यम से ही संभव होता है। यही कारण है कि कर्महीन व्यक्ति भाग्य के होते हुए भी पीछे रह जाता है, जबकि कर्मशील व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना मार्ग स्वयं बना लेता है। इसी प्रकार, शिक्षा जीवन को दिशा, दृष्टि और विवेक प्रदान करती है। शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर जागरूकता, आत्मविश्वास और सही-गलत के निर्णय की क्षमता विकसित करती है। एक शिक्षित व्यक्ति न केवल स्वयं को सशक्त बनाता है, बल्कि समाज को भी सकारात्मक दिशा देने में सक्षम होता है। जब यही शिक्षा रोजगार से जुड़ती है, तब वह व्यक्ति को आत्मनिर्भरता, सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करती है। रोजगार व्यक्ति के जीवन में स्थिरता लाता है, उसे अपने परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाता है तथा उसके आत्मसम्मान को सुदृढ़ करता है।इस प्रकार, जब भाग्य, कर्म, शिक्षा और रोजगार—ये चारों तत्व एक साथ संतुलित रूप में कार्य करते हैं, तब जीवन केवल जीने का माध्यम नहीं रहता, बल्कि एक उद्देश्यपूर्ण, सम्मानजनक और प्रेरणादायक यात्रा बन जाता है। ये पंक्तियाँ न केवल प्रेरणा देती हैं, बल्कि हर व्यक्ति को यह संदेश भी देती हैं कि यदि वह अपने कर्म, शिक्षा और प्रयासों पर विश्वास रखे, तो वह अपने जीवन को स्वयं गढ़ सकता है और उसे उत्कृष्ट बना सकता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर
जीवन जितना सरल है, उतना ही जटिल भी. एक तरफ भाग्य होता है तो दूसरी ओर कर्म. भाग्य अच्छा हो तो जीवन चांदी के चम्मच से ही शुरु होता है. भाग्य में खोट हो तो कितना भी योजनाबद्ध लगन से काम करो जीवन नहीं संवरता. जीवन में शिक्षा और रोजगार का भी बहुत महत्व है. शिक्षा अच्छी मिले, प्रतिभा भी हो तो भी भाग्य के अनुसार ही रोजगार मिलता है और जीवन बनता-संवरता है. कहने का तात्पर्य यह है जब भाग्य, कर्म, शिक्षा और रोजगार का तालमेल हो तभी जीवन सरल और सुखमय हो सकता है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
जीवन एक सरल रेखा नहीं, बल्कि अनेक उतार-चढ़ावों, अवसरों और संघर्षों से बनी एक यात्रा है। इस यात्रा को आकार देने में भाग्य और कर्म दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भाग्य हमें परिस्थितियाँ देता है, लेकिन उन परिस्थितियों का उपयोग कैसे करना है—यह हमारे कर्म पर निर्भर करता है। भाग्य को यदि बीज माना जाए, तो कर्म उस बीज को सींचने वाला जल है। केवल भाग्य के भरोसे बैठकर जीवन में प्रगति नहीं की जा सकती। यदि मनुष्य निकम्मा हो जाए, तो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ भाग्य भी निष्फल हो जाता है। वहीं दूसरी ओर, सीमित संसाधनों में भी जो व्यक्ति निरंतर कर्म करता है, वह अपने भाग्य को स्वयं गढ़ लेता है। यहाँ शिक्षा का महत्व अत्यंत आवश्यक हो जाता है। शिक्षा मनुष्य के भीतर विवेक, समझ और निर्णय क्षमता का विकास करती है। यह उसे केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि जीवन को सही दिशा में ले जाने की दृष्टि प्रदान करती है। एक शिक्षित व्यक्ति अपने कर्म को अधिक प्रभावशाली और सार्थक बना सकता है। रोजगार, शिक्षा का प्रत्यक्ष परिणाम है और जीवन की स्थिरता का आधार भी। यह केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का प्रतीक है। रोजगार से व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन कर पाता है और समाज में अपनी पहचान स्थापित करता है। यदि इन सभी तत्वों को एक सूत्र में पिरोया जाए, तो स्पष्ट होता है कि भाग्य अवसर देता है, कर्म उसे उपलब्धि में बदलता है, शिक्षा दिशा दिखाती है और रोजगार जीवन को आधार प्रदान करता है। अतः विवेकपूर्ण दृष्टि यही कहती है कि जीवन को सफल और सार्थक बनाने के लिए भाग्य पर विश्वास रखते हुए कर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए, शिक्षा को अपनाना चाहिए और रोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनना चाहिए। यही संतुलन एक उज्ज्वल और सशक्त जीवन की नींव है।
- अलका पांडेय
मुंबई - महाराष्ट्र
" मेरी दृष्टि में " शिक्षा से ही जानवर से इंसान बनता है। वैसे प्राकृतिक रूप से तो जानवर से कम नहीं होता है शिक्षा प्राचीन काल से चली आ रही है। समय - समय पर शिक्षा का स्वरुप परिवर्तन होता रहता है। वर्तमान में तो रोजगार का प्रमुख साधन शिक्षा ही है। जो जीवन स्तर में सुधार पैदा करने की क्षमता रखता है।
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