किशोरी अमोनकर की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
भगवान से बड़ा नहीं है इंसान, इंसान से बड़ी नहीं है दौलत.... यह एक आस्था का विषय है... आज इस विज्ञान के युग में कहते हैं आज इंसान स्वयं ईश्वर और स्वयं दानव है चूंकि जन्म और मृत्यु का श्रेय भी वह अपने हाथों में ले रहा है। किंतु इंसान कितना भी करें वह भगवान से बड़ा कभी नहीं बन सकता। इंसान की इंसानियत उसे भगवान का दर्जा तो दिलाती है किंतु वह भगवान कभी नहीं बन सकता....ठीक उसी तरह दौलत इंसान स्वयं अपनी मेहनत, परिश्रम कर अपने कर्म द्वारा कमाता है किंतु वहीं दौलत इंसान के जीवन के आगे कुछ नहीं है। मरण-शैय्या में पड़े इंसान अपनों को बचाने खातिर वह अपनी पूरी दौलत फूंक देता है चूंकि उसके अपनों के जान के आगे दौलत, धन बड़ा हो ही नहीं सकता ।अगर इंसान जिंदा है तो दौलत फिर आ जाएगी किंतु इंसान नहीं। यही हकीकत है इंसान से बड़ी दौलत हो ही नहीं सकती। इंसान में जहां प्यार, अपनापन, इंसानियत है वहां दौलत क्या चीज़ है।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
इस कथन को जीवन का सर्वोच्च सत्य माना गया है कि भगवान इंसान से बड़ा है और इंसान दौलत से बड़ा है क्योंकि धन केवल साधन है जबकि इंसानियत और ईश्वर पर विश्वास ही जीवन का असली सार है, तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि भगवान से बड़ा नहीं है इंसान और इंसान बड़ी नहीं है दौलत, मेरा मानना है कि ईश्वर को सृष्टिकर्त्ता और सर्वशक्तिमान माना जाता है जो जीवन का मार्गदर्शन करते हैं तथा इंसान के विचार, संस्कार और कर्म ही उसकी सबसे बड़ी दौलत है न कि भौतिक पैसा क्योंकि पैसा आता जाता रहता है लेकिन मानवता और अच्छे कर्म ही स्थायी रूप से याद रखे जाते हैं इसके साथ धन की भूख इंसान को भटका सकती है लेकिन इंसानियत और ईश्वर में आस्था ही इंसान को सही राह दिखाती है, इंसान का स्वभाव और दुसरों के दिलों की जीत नोटों से ज्यादा कीमती है क्योंकि धन दौलत सुख चैन और शांति नहीं खरीद सकती जबकि सच्चा सुख मानसिक शांति और संतोष में है जो संस्कारों और नेक कर्मों से आता है इसलिए जीवन की सबसे बड़ी दौलत लोगों का भरोसा और आपसी प्रेम है जो सत्ता या धन के ऊपर है यह भी सत्य है कि मृत्यु तो अटल है और इसके साथ दौलत तो जायेगी नहीं केवल हमारे कर्म और व्यवहार का लेखा जोखा ही जायेगा, इसलिए यह सत्य है कि इंसान दौलत से बड़ा है सच्चा धन पैसा नहीं बल्कि इंसानियत, अच्छे विचार, चरित्र और स्वास्थ्य है जबकि दौलत अस्थायी है और साथ नहीं जाती साथ जाते हैं नेक कर्म और व्यवहार यादों में रह जाते हैं इसलिए असली दौलत प्यार, सेवा और सुमिरन है जो मन को सच्चा सुख देती है, यही नहीं जीवन स्वयं ही सबसे बड़ी दौलत और रचना है जिसे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता, हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि भगवान से बड़ा कोई नहीं लेकिन ईश्वर हमेशा अपने भक्त के अधीन होते हैं वो तो अपने भक्त की प्रेम भक्ति के सामने झुक जाते हैं बशर्ते हम समझें की हर इंसान में भगवान का वास होता है इसलिए मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है क्योंकि इंसान अपने कर्मों से महान बनता है जबकि परोपकारी व मानवता की रक्षा करना ही व्यक्ति का परम धर्म है तथा भगवान की भक्ति को भगवान से भी बड़ा माना गया है जो मानवता की सेवा, अच्छे कर्मों व अच्छे व्यवहार को ही भक्ति का रूप दिया गया है, अन्त में यही कहुँगा कि, भगवान से बड़ा नहीं इंसान मगर इंसानियत इंसान को महान बना देती है जब मनुष्य निस्वार्थ सेवा, प्रेम और करूणा से कर्म करता है तो वह देवतुल्य हो जाता है , दुसरी तरफ दौलत इंसान की तुलना में कुछ नहीं है क्योंकि असली खजाना नेक कर्म, प्रेम और मानसिक सुकून है न कि धन संपत्ति देखा जाए सच्चा सम्मान इंसानियत और चरित्र से मिलता है न कि दौलत से तभी तो कहा है, चार पैसे क्या मिले खुद को समझ बैठे खुदा, वो खुदा ही जाने अब होगा तेरा अंजाम क्या, काहे पैसे पे इतना गरूर करे है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
यह कथन मानव जीवन, मूल्य-व्यवस्था और आधुनिक समाज की मानसिकता पर एक गहरा प्रश्न खड़ा करता है। इसमें तीन स्तरों की तुलना निहित है—भगवान, इंसान और दौलत। किंतु वास्तविकता यह है कि इन तीनों का संबंध तुलना से अधिक संतुलन और प्राथमिकता का है। भगवान से बड़ा इंसान नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर को सृष्टि का नियंता, सर्वशक्तिमान और जीवन का आधार माना गया है। मनुष्य चाहे कितना भी बुद्धिमान, शक्तिशाली या उन्नत क्यों न हो जाए, वह प्रकृति और जीवन के मूल स्रोत से ऊपर नहीं जा सकता। यह स्वीकार्यता ही विनम्रता और आस्था की नींव है। इसी प्रकार इंसान से बड़ी दौलत नहीं हो सकती, क्योंकि धन केवल एक साधन है, साध्य नहीं। जब मनुष्य धन को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बना लेता है, तब नैतिकता, रिश्ते और संवेदनाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं। दौलत सुविधा दे सकती है, परंतु वह प्रेम, करुणा और आत्मिक शांति नहीं दे सकती।आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि मनुष्य साधन और साध्य का अंतर भूलता जा रहा है। भगवान, इंसान और दौलत—तीनों के बीच संतुलन आवश्यक है। भगवान आस्था का प्रतीक हैं, इंसान मानवता का, और दौलत जीवन-यापन का साधन। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तब समाज में असंतोष, संघर्ष और नैतिक पतन बढ़ता है। इसलिए सही दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि भगवान में श्रद्धा हो, इंसान में सम्मान हो और दौलत को केवल आवश्यकता तक सीमित रखा जाए। यही जीवन की सच्ची समरसता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
भगवान से बड़ा इंसान नहीं ये एक यूनिवर्सल सच्चाई है. भगवान से बड़ा कोई हो ही नहीं सकता. इंसान को कौन कहे देवी देवता भी भगवान से बड़ा नहीं हो सकते हैं. इंसान का किया कुछ नहीं होता. करन करावन हार एक भगवान ही हैं. इंसान का सोचा हुआ कभी होता नहीं है. अगर हो जाए तो अपने आप को भगवान से बड़ा समझने लगे. और इंसान से बड़ी दौलत नहीं है. दुनिया की सारी दौलत एक तरफ रख दीजिए फिर भी वह एक इंसान की बराबरी नहीं कर सकती है. दुनिया की सारी दौलत एक गुजरे इंसान को वापस नहीं ला सकती हैं. इसलिए दौलत इंसान से बड़ी नहीं है.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
भगवान ही हैं जिन्होने इंसान को बनाया है , अतः भगवान ही संसार में सबसे बड़े हैं ! भगवान ही सृष्टि रचयिता है , व संपूर्ण जगत का संचालन करते है !! लाख छुपाने की कोशिश कर लो , भगवान की दृष्टि से कुछ नहीं बचता !! दौलत की अहमियत है दुनियां में , पर दौलत एक ऐसी भौतिक वस्तु है , जो न इंसान को बचा सकती है , न बना सकती है ! दौलत केवल कुछ क्षणों का सुख प्रदान कर सकती है !! जो कुछ संसार में घटता है , सब भगवान की मर्जी से होता है !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
भगवान से बड़ा नहीं होता इंसान, क्योंकि भगवान ने सृष्टि बनाई, वह पालन करता है और संहार भी।जबकि इंसान, भगवान का अंश तो है, लेकिन इंसानियत से दूर होने के कारण वह अभी इंसान भी नहीं बन पा रहा।अब रही बात दौलत की तो, इसका इतना बोलबाला है जीवन में कि इंसान इसके लिए कुछ भी कर गुजरने में नहीं हिचक रहा। सारे अपराध और अव्यवस्था की जड़ दौलत ही तो है।दौलत यानि धन,पैसा,जेवर,भूमि आदि।बस इसी को सबकुछ मान बैठा इंसान भूल गया है वह चिंतन, जिसमें कहा गया - गौ धन,गजधन,वाजि धन और रतन धन खान,जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान। बस संतोष ही नहीं अब तो, धन की इतनी भूख बढ़ गयी है कि इंसान खुद को ही भगवान मानने लगा है।जबकि वास्तविकता यह कि दौलत से बड़ा है इंसान और इंसान से बड़ा है भगवान। वह भगवान जिसने दुनिया बनाई जो सबसे बड़ा है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
यह एक अत्यंत गहन और सत्य कथन है कि ईश्वर सर्वोपरि है। ईश्वर को जीवन, सत्य और प्रकाश माना जाता है, जिनके आगे इंसान की ताकत तुच्छ है। साथ ही भ्गवान के द्वारा बनाया गया इंसान या उसकी संचित दौलत कभी भी उनसे बड़ी नहीं हो सकती। व्यक्ति की असली दौलत उसके अच्छे विचार और संस्कार हैं, न कि बैंक बैलेंस। दौलत इंसान को अहंकार या गलत राह पर ले जा सकती है, लेकिन यह ईश्वर से बढ़कर नहीं है। सही इंसानियत का पालन करना ही ईश्वर की सच्ची उपासना है। धन-दौलत और ताकत नश्वर हैं, लेकिन मानवता और ईश्वर के प्रति समर्पण ही सबसे बड़ा और शाश्वत सत्य है।
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
इंसान, भगवान से बड़ा न है और न ही हो सकता। ऐसे ही दौलत, न कभी इंसान से बड़ी है और न ही हो सकती।परंतु कुछ लोगों को जाने क्या हो जाता है या उनके दिमाग में सनक पैदा हो जाती है कि वे स्वयं को सबसे बड़ा समझ लेते हैं और फिर किसी को कुछ नहीं समझते। अंत में जो हश्र होता है वह सब देखते हैं और उनकी अक्ल भी ठिकाने लग जाती है। इसलिए कभी भी गुरूर में चूर नहीं होना चाहिए। समय या सौभाग्य से कभी-कभी दौलत और शोहरत मिल जाती है तो उसमें मगरूर होने से बचना चाहिए। बड़प्पन दिखलाने से, अपने-आप को संयत रखने से यह भूख एवं समृद्धि का दौर ज्यादा टिकेगा भी और सभी आपको पसंद भी करेंगे। इज्जत देंगे। अत: इंसान बनकर इंसानियत के साथ रहना ही सबसे बड़ा धर्म है। इससे भगवान भी आपसे खुश रहेंगे और ये दुनिया वाले भी।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
भगवान से बड़ा नहीं है इंसान जो इंसान की महत्वता और दौलत की असारता समझाता है। उसमें कर्मठता दयालुता धीरता कृपा करुणा सहयोग सृजनता ,सहानुभूति, प्रेम का गुण हो,जिसका उपयोगसमयानुकूल हो ! आंतरिक मन इंसान का चारों और अंधकार हताशा अपने से अपने को खोने का डर होता है !तब इंसानी डाक्टर से इंसान कहता है आप ही मेरे ईश्वर है आप जो कहेंगे मंदिर देवालय पूजा पाठ वो सब कुछ करने तैयार हूँ जहाँ ईश्वर है !तब इंसान कहता है ईश्वर तो आपके अंदर है जिसकी परख आपको ही करनी होगी !इंसान का आंतरिक मूल्य उसकी दौलत या पद से नही,इंसानियत । इंसान में सहानुभूति, प्रेम और दया जैसे गुण होते हैं !जो उसे विशेष बनाते हैं।इंसान सृजन और विकास की क्षमता रखता है, जो उसे भगवान की रचना में सबसे श्रेष्ठ बनाता है।दौलत की असारता से अस्थायी सुख मिल सकता है, लेकिन स्थायी सुख नहीं।दौलत की लालसा कभी पूरी नहीं होती, जिससे असंतुष्टि बढ़ती है। और इंसान पैसे को ईश्वर मान दौलत का गलत उपयोग सकता है, भ्रष्टाचार और अपराध की ओर अग्रसर होता है ! संतुलन की आवश्यकता होती है ! बेईमानी से कमाई दौलतलत इंसान को बुद्धिहीन मर्यादा से वंचित कर देती है इंसानों की गिनती हौवानों में होती हैं! और पद की महत्वता का सही दिशा में दौलत का उपयोग करना चाहिए, जैसे कि समाज सेवा और शिक्षा में। इंसानियत का सम्मान करना चाहिए और दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम रखना चाहिए।
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
भगवान के परिदृश्य में हम जी रहे है, जिसे हम सब कुछ समझते है। भगवान से बड़ा नहीं है इंसान, इंसान से बड़ी नहीं है दौलत। यह हम हकीकत समझते है। उसके उपरान्त भी इंसान अपने आपको भगवान और दौलत से ऊंचा समझने लग जाता है। उसके उपरान्त वास्तविक जीवन के अंत में परिणाम सामने आता है, तब दौलत हाथ से निकल जाती है, तब-तक बहुत समय व्यतीत हो जाता है......।
-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
" मेरी दृष्टि में " भगवान की किसी से तुलना नहीं होनी चाहिए। जिसे भगवान कह दिया। आपके लिए वह सर्वोच्च है। बाकी दौलत सभी को चाहिए। दुनियां में आयें है तो दौलत के लिए सब कुछ करना पड़ता है। यह एक सच्चाई है।
Comments
Post a Comment