दण्डपाणि जयकान्तन की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      मंजिल को पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। फिर भी कोई गारंटी नहीं है कि मंज़िल मिल जाएगी। कई बार तो बीच में ही हिम्मत जबाब दे जाती है। मुसाफिर सब कुछ सहन करता है कि मंज़िल मिल जाए। किस्मत वाला ही मंजिल को हासिल करता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है।अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:-
         मंज़िल का मिल जाना कभी आसान नहीं होता जनाब, क्योंकि हर रास्ता अपने साथ एक कीमत लेकर आता है। यह कीमत सिर्फ़ समय या मेहनत की नहीं होती, बल्कि कई बार भावनाओं, रिश्तों और सपनों की भी होती है। बाहर से देखने वाले अक्सर सिर्फ़ सफलता को देखते हैं, लेकिन उस सफलता तक पहुँचने की यात्रा में क्या-क्या खोया गया, यह केवल मुसाफ़िर ही जानता है। जीवन के सफ़र में कई मोड़ आते हैं, जहाँ इंसान को अपने ही मन से समझौता करना पड़ता है। कभी थकान उसे रोकने की कोशिश करती है, तो कभी हालात उसकी राहें कठिन बना देते हैं। ऐसे में हर कदम आगे बढ़ाना एक संघर्ष बन जाता है। कई बार अपने ही पीछे छूट जाते हैं - कुछ रिश्ते, कुछ इच्छाएँ और कभी-कभी अपनी मासूमियत भी। पर यही रास्ते इंसान को मजबूत भी बनाते हैं। जो खोया है, वही उसे सीख देता है कि पाने की असली कीमत क्या होती है। मंज़िल तक पहुँचने का सुख तभी सच्चा लगता है, जब इंसान उस पूरी यात्रा को महसूस करता है- उसके दर्द को भी और उसकी सीख को भी। मंज़िल सिर्फ़ एक ठिकाना नहीं होती, बल्कि वह पूरी यात्रा का सार होती है। इसलिए जरूरी है कि हम रास्तों से डरें नहीं, बल्कि उन्हें समझें, स्वीकारें और उनसे सीखते हुए आगे बढ़ते रहें।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

        मंजिल तक पहुंचने वाले रास्ते वास्तव में बहुत कुछ छीन लेते हैं और मुसाफिर को पता ही नहीं चलता, सही बात है यह। वास्तव में मंजिल की ओर चलते हुए कदम दर कदम बहुत कुछ छूटता है पीछे, छिनता नहीं,और जितना छूटता है उससे अधिक मिलता भी है,संग में जुड़ता भी है। छात्र जीवन में मंजिल होती है कॉलेज तो कितने ही बचपन के मित्र, आदतें, खान-पान आदि छूट जाते हैं,बनते हैं फिर सब नये मित्र, आदतें, खान-पान। फिर कैरियर होता है मंजिल तो यह सब भी कहीं पीछे छूटते ही हैं। इस कड़ी में पारिवारिक रिश्ते और परिवार तक छूट जाता है। वर्तमान में कैरियर को ही मंजिल मानकर कितना कुछ छूट रहा है। मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का छूटना , रिश्तों का टूटना इससे सबको दो चार होना पड़ रहा है।हर आदमी मुसाफिर की तरह अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है इस सफर में वह भीतर से कितना रीता होता है, भौतिक सम्पन्नता भले ही दिखाई दे, लेकिन मानसिक शांति और प्रसन्नता अवश्य प्रभावित हो रही है। फिर भी यह सब तो जीवन की प्रक्रिया है और इससे बचा नहीं जा सकता।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

       मंजिल मिल जाना आसान नही होता है जनाब हम किनारों पर खड़े सहारा ढूँढते रह जाते है और वो मंजिल तक पहुँचाने खड़े होते है वोग़ैर नही अपने होते है ये ज़िन्दगी का खूबसूरत सफ़रनामा है जहाँ नियत नीति सीरत से ज़्यादा खूबसूरत यहाँ होते है! रास्ते क्या क्या छीन लेते है मुसाफ़िर को पता ही नही चलता है बिल्कुल सही कहा जनाब... मंज़िल तक का सफर कभी आसान नहीं होता। रास्ते सिर्फ दूरी नहीं नापते, वो हमसे बहुत कुछ ले भी लेते हैं।और हम मंजिल तक साथ जाने अपना सब कुछ निछावरकर देते है !रास्ते से क्या छीन लेते हैं? वक़्त:सालों कब निकल गए, पता ही नहीं चलता।अपने: कुछ लोग पीछे छूट जाते हैं, कुछ खुद ही दूर हो जाते हैं।  मासूमियत: ठोकरें खाकर इंसान की हँसी में सादगी कम हो जाती है।सुकून: मंज़िल की फ़िक्र में नींद तक उड़ जाती है। पर जनाब, रास्ते सिर्फ छीनते नहीं... कुछ देते भी हैं।रास्ते तजुर्बा दे बड़े प्यार नसीहत के साथ क्या दे जाते हैं?हर ठोकर एक सबक बन जाती है।  हिम्मत: गिरकर उठने से आत्मबल बनता है।पहचान सफर में ही पता चलता है कि हम कितने मजबूत हैं।मंज़िल मिले न मिले, मुसाफ़िर वही नहीं रहता जो सफर शुरू करता है। वो कहीं बेहतर बन जाता है। आप किस मंज़िल के सफर में हैं? अगर मन भारी हो तो बाँट लीजिए, सुनूंगा।

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

          यह अटूट सत्य है कि सफलता या लक्ष्य को  पाना आसान नहीं होता, इस राह को पाने के लिए व्यक्ति को चैन, सुख और कभी कभी अपनों को भी त्यागना पड़ता है इन कुर्बानियों का दर्द सिर्फ वोही मुसाफिर जानता है जो ऐसा सफर तय कर रहा होता  है तो आईये आज इसी पर चर्चा करते हैं कि मंजिल का मिल जाना आसान नहीं होता, रास्ते क्या क्या छीन लेते हैं मुसाफिर को ही पता है, मेरा मानना है कि मंजिल के रास्ते  चुनौतियों और त्याग से भरे होते हैं और इन रास्तों में छिपा हुआ त्याग कभी कभी अनुभव, समय, सुख और कभी कभी खुशियाँ छीन लेता है पता केवल मुसाफिर को होता है,  लेकिन यही सफर अनुभव बनाता है जो अन्त में मंजिल के रूप में सामने आता है,  आखिरकार यही कहुँगा कि मंजिल हासिल करना आसान नहीं क्योंकि रास्ते में बहुत कुछ खोना भी पड़ता है तथा इसके साथ साथ कड़ी मेहनत अटूट धैर्य और लगातार चलते रहने की जरूरत होती है जो एक लम्बी प्रक्रिया है यहाँ पर रूकावटें  और असफलताओं का भी सामना करना पड़ता है लेकिन खुद का भरोसा और हार न मानने का ज्जबा ही  अंत में मुसाफिर को जीत दिलाता है बशर्ते स्पष्ट लक्ष्य तय होना चाहिए इसके साथ मेहनत और समर्पण की सख्त जरूरत होती है ताकि चुनौतियों का सामना किया जा सके इसके लिए लगातार प्रयास तथा छोटी छोटी कोशिशें बड़ी सफलता दे सकती हैं तथा गलतियों से सीख कर आगे बढ़ते रहने की आदत ही हमें सफलता तक पहुँचा सकती है लेकिन याद रखें मंजिल तो सिर्फ एक पड़ाव है असली मजा तो चलते रहने और सीखने में ही है, इसलिए मंजिल पाने के लिए बहुत कुछ खोना भी पड़ता है लेकिन मंजिल पाने का मजा सब कुछ भुला देता है बशर्ते हमारा ज्जबा, हमारी लगन व हमारा त्याग बरकरार रहे तथा हमारी इच्छायें हमारे काबू में रहें जिनको छोड़ना हर किसे के लिए मुमकिन नहीं इनका त्याग वोही मुसाफिर कर सकता है जिसको मंजिल तक पहुँचना होता है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

        इन पंक्तियों में जीवन का गहन सत्य छिपा हुआ है। पहली नज़र में ये केवल एक साधारण अनुभव का बयान लगती हैं, लेकिन जब हम इन्हें भीतर तक महसूस करते हैं, तो यह हमारे संघर्ष, त्याग और धैर्य की पूरी कहानी कह जाती हैं।हर इंसान अपने जीवन में किसी न किसी मंज़िल की तलाश में होता है। कोई सफलता चाहता है, कोई सम्मान, कोई प्रेम, तो कोई आत्मसंतोष। लेकिन इन मंज़िलों तक पहुँचने का रास्ता कभी सीधा और आसान नहीं होता। यह रास्ता ऊबड़-खाबड़, कठिनाइयों से भरा और कई बार निराशा से घिरा होता है। यही रास्ते इंसान की असली परीक्षा लेते हैं।जब कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है, तो उसे केवल बाहरी चुनौतियों का ही सामना नहीं करना पड़ता, बल्कि उसे अपने भीतर भी कई संघर्ष झेलने पड़ते हैं। कभी समय छीन लेता है, कभी रिश्ते पीछे छूट जाते हैं, तो कभी अपनी इच्छाओं और सुखों का त्याग करना पड़ता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि इंसान को अपनी पहचान तक बदलनी पड़ती है। इन रास्तों पर चलते हुए मुसाफ़िर बहुत कुछ खोता है—अपनी मासूमियत, अपनी सहजता, कभी-कभी अपने अपनेपन का अहसास भी। लेकिन यही रास्ते उसे मजबूत भी बनाते हैं, उसे जीवन के असली अर्थ से परिचित कराते हैं। जो व्यक्ति इन कठिनाइयों से गुजरता है, वही मंज़िल की असली कीमत समझ पाता है। मंज़िल तक पहुँचने के बाद लोग केवल उसकी सफलता को देखते हैं, उसकी उपलब्धियों की सराहना करते हैं, लेकिन उस रास्ते की कहानी, उसके संघर्ष और उसके त्याग को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण वह सफर होता है, जो इंसान को तराशता है, उसे एक बेहतर इंसान बनाता है। इसलिए जीवन में यदि हम किसी को उसकी मंज़िल पर खड़ा देखें, तो केवल उसकी सफलता की चमक को ही न देखें, बल्कि उसके पीछे छिपे अंधेरे रास्तों और कठिन संघर्षों को भी समझने की कोशिश करें। क्योंकि हर मुसाफ़िर की एक अनकही कहानी होती है, जिसे केवल वही जानता है। अंततः, यही कहा जा सकता है कि मंज़िल का मिलना भले ही कठिन हो, लेकिन उस तक पहुँचने का सफर ही हमें जीवन का असली पाठ पढ़ाता है। और यही सफर, हमारे अस्तित्व को एक नई दिशा और गहराई देता है।

- अलका पाण्डेय 

मुम्बई - महाराष्ट्र 

         किसी भी तरह का काम आसानी से नहीं मिलता उसके लिए प्रयत्न करना पड़ता है। जमीन स्तर से शुरुआत करनी पड़ती है। तब जाकर हमारी मंजिल मिलती है। घर बैठ कर मंजिल तक पहुंचा नहीं जा सकता है। मंजिल का मिल जाना आसान नहीं होता है जनाब, रास्ते क्या-क्या छीन लेते हैं मुसाफिर को ही पता है। यह कथन जीवन में उल्लेखनीय योगदान रखता है। तभी अपने लक्ष्य की ओर अग्रसरित होता जाता है। रास्ते अनेकों मिलते है, किस रास्ते से जाना अपने मन के ऊपर निर्भर करता है। रास्तों में क्या-क्या छीना जाता है, यह हमें या मुसाफिर को ही पता होता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

          मंजिल तो व्यक्ति के संघर्ष के प्रणाम की चरम सीमा का वो बिंदु है , जिसे पाने के लिए , या जहां तक पहुंचने के लिए व्यक्ति यथासंभव , अथक प्रयास करता है !! वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को वो कठिन संघर्ष रूपी सीढ़ी चढ़नी पड़ती है , जिसके हर पायदान पर व्यक्ति कुछ न कुछ खोता चला जाता है , जैसे सुख , चैन, अपनों के साथ , समय , उम्र  आदि !! मंजिल तक पहुंचनेवाला व्यक्ति ही जानता है कि उसने मंजिल तक पहुंचने में क्या क्या खोया है !! अपना व्यक्तिगत उदाहरण देना चाहूंगी कि मैं डॉक्टरेट करना चाहती थी , पर कर नहीं पाई !! लेखन कार्य जारी रखा , मेहनत करती और एक दिन मुझे डॉक्टरेट प्रदान की गई !! मंजिल तक पहुंचने मैं मैने उम्र , सेहत , स्वर्णिम समय , सब खोया , तब जाकर मंजिल मिली !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

       सच है मंजिलों को छूने की तमन्ना हर किसी के भीतर शिद्दत से हिलोरें लेतीं हैं लेकिन मंजिलें छू लेना  - - - मंजिलें मिल जाना  - - क्या इतना आसान है? मंजिलों को छूने की चाहत में हम क्या क्या पीछे छोड़ आते हैं कभी सोचते हैं? नहीं ये जहमत हम नहीं उठाते जबकि ये बात हमें सबसे पहले सोचना चाहिए बच्चों को इंजीनियर डाॅक्टर प्रोफेसर सी ए बनाने की जिद में हम उनका प्यारा बचपन देखना पाना खो देते हैं। बस हाँकते रहते हैं उन्हे कोल्हू के बैल की तरह।" क्या इस तरह हमें मंजिल मिल जाएगा"? नहीं आज जब बच्चे मंजिल पर पहुंच जाते हैं - - हम सोचते रह जाते हैं कि "हमने क्या खोया क्या पाया"! सर्वसिद्ध है कि क्या-क्या छीन लेतीं हैं ये बड़ी बड़ी चाहतें, सिर्फ हमें ही पता होती हैं । हम मुसाफिरों की डगमगाती नैया कब किनारा पायेगो या बीच में डूब जायेगी सब भविष्य के गर्भ में छिपा होता है। इससे पहले कि हमारी चेतना अंधे कुँये में पटक दे ले जाकर  - - हमें चैतन्य हो जाना चाहिये - -भावी का ऊँट किस करवट बैठेगा पहचान लेना चाहिए और तद्नुसार ही अपने भूत भविष्य और वर्तमान की तैयारियाँ करना चाहिए। 

- हेमलता मिश्र मानवी 

    नागपुर - महाराष्ट्र 

         उद्देश्य से मंजिल तक की यात्रा सहज, सरल और सरस भी नहीं होती। पूरी यात्रा अनेक संभावनाओं और संघर्ष लिए होती हैं।  कभी असफलता, कभी उपेक्षा, कभी निराशा तो कभी हताशा   के दंश भी झेलने पड़ते हैं। इन्हें जिसने निर्भीकता से सामना कर लिया और अपने-आप को टूटने से बचा लिया, फिर तो उसे अपनी मंजिल पाने  से कोई रोक नहीं सकता। असल में ऐसे अवसर ही सच मायने में परीक्षा की घड़ी होते हैं। ये ही यात्रा के नकारात्मक पक्ष होते हैं जो सजग भी करते हैं और  सामर्थ्यवान भी बनाते हैं। कहा भी गया है,

" जितने कष्ट, कंटकों में है, जिनका जीवन-सुमन खिला।

गौरव-गंध उन्हें  उतना ही, यत्र,तत्र, सर्वत्र मिला।"

 ऐसा भी नहीं सब कुछ असमान्य ही होता है। इस यात्रा में आनंद के पल भी होते हैं। हल पल को मेहनत, दृढ़ संकल्प और निश्छलता से , काम से काम का ध्येय रखा जाये तो मंजिल तक की यात्रा का जो क्रम है वह बनी भी रहती है और सरस भी रहती है।अत: सार यही कि निर्भीकता, निश्चल और निश्छलता से मंजिल- यात्रा कीजिए। कोई कठिन समय आए तो हंसकर और डटकर सामना कीजिए। न किसी की यात्रा को बाधित करें और न ही अपनी यात्रा को बाधित होने दें।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       मंज़िल का मिल जाना कभी आसान नहीं होता। बाहर से देखने वालों को केवल सफलता दिखाई देती है, पर उसके पीछे छिपा संघर्ष बहुत कम लोग समझ पाते हैं। हर मुसाफ़िर अपने रास्ते में कुछ न कुछ खोता है—समय, रिश्ते, सुख-सुविधाएँ और कभी-कभी स्वयं पर विश्वास भी। रास्ते हमेशा सीधे नहीं होते। कहीं धूप की तपिश है तो कहीं काँटों की चुभन। कभी असफलता का अंधेरा है तो कभी प्रतीक्षा की लंबी रातें। ये सब अनुभव ही व्यक्ति को गढ़ते हैं, मजबूत बनाते हैं और उसकी पहचान तय करते हैं। सच यही है कि मंज़िल केवल परिणाम नहीं, बल्कि यात्रा का समुच्चय है। जो रास्तों की कठिनाइयों से गुजरकर आगे बढ़ता है, वही वास्तविक अर्थों में विजेता होता है।मोबाइल और आधुनिक सुविधाएँ आज यात्रा को सरल बनाने का दावा करती हैं, परंतु जीवन की वास्तविक यात्रा—परिश्रम, अनुशासन और धैर्य—को कोई तकनीक प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।अक्सर लोग सोचते हैं कि सफलता केवल प्रतिभा से मिल जाती है, परंतु सत्य यह है कि वह धैर्य, त्याग और निरंतर प्रयास का परिणाम होती है। निष्कर्ष:मंज़िल तक पहुँचना उतना कठिन नहीं, जितना उस रास्ते पर टिके रहना है। और यही टिकाव मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

       मंज़िल का मिलना कतई आसान नहीं होता है सर. मंजिल पाना बहुत ही कठिन काम है. बहुत मेहनत करना पड़ता है. बहुत पापड़ बेलना पड़ता है. कभी काटों भरे रास्ते तो कभी कंक्रीट वाले रास्ते, तो कभी संकरी गलियों से गुजरना पड़ता है. कभी-कभी पथरीली जमीन पर चलना पड़ता है तो कभी-कभी कीचड़ से हो कर गुजरना पड़ता है. पैर में छाले, बदन में दर्द,माथा भारी इत्यादि समस्याओं का सामना करना पड़ता है. राह में कभी अपने बिछुड़ जाते हैं तो कुछ नए लोग भी मिल जाते हैं. कभी भले लोगों से सामना होता है तो कभी जानवरों से भी सामना होता रहता है. तब जाकर कहीं मंजिल की प्राप्ति होती है. किसी को बहुत समय लग जाता है तो किसी को जल्दी ही मंजिल की प्राप्ति हो जाती है. 

- दिनेश चन्द्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

      मंजिल पाने की चाहत किसे नहीं होती है प्रत्येक व्यक्ति अपनी तय मंजिल पर पहुँचना ही चाहता है,  अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है। किंतु इतनी सरल भी नहीं होती है मंजिल की यह डगर। कितनी कुर्बानियाँ शामिल होती हैं इसमें, न जाने कितनी ख्वाहिशों का गला घोंटना पड़ता है, कितने ही शौक को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है। मार्ग में कितनी भी बड़ी बाधा आ जाए उन बाधाओं  को पूर्ण कर्मठता और दृढ़ विश्वास के साथ पार करते हुए ही आगे बढ़ना होता है। तब कहीं जाकर मंजिल प्राप्त होती प्रतीत होती है। ऐसा नहीं है कि जिनका लक्ष्य बहुत ऊँचा होता है बस उनकी ही डगर कठिन होती है। हमारी मंजिल पास हो या दूर  वहाँ तक पहुँचने के लिए मन में दृढ़ विश्वास कायम रखना ही होता है। आत्मविश्वास के साथ जब हमारे कदम दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ते हैं तब बड़ी से बड़ी बाधाएँ स्वयमेव हमारी राह से हट जाती हैं। मानो हमारे आत्मविश्वास का सम्मान करने का उनका यही तरीका होता है। जैसा कि सभी जानते हैं जो जितना डरता है, दुनिया उसे उतना ही डराती है। बिल्कुल ऐसा ही होता है जब हम अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते हैं तब राह में आई बाधाओं से डरने के स्थान पर अगर हम उनका डटकर सामना करते हैं तो बाधाएँ दीर्घ से लघु स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं। मंजिल की वो दुर्गम राहें सरल प्रतीत होने लगती हैं। कहा गया है न! "जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ"। तो गहरे पानी में उतरने से जो डरते हैं वह तो अपनी मंजिल से दूर ही रहेंगे इसलिए मंजिल प्राप्त करना है तो हमें उस ओर अपने कदम दृढ़ता पूर्वक बढ़ाते हुए अपनी छोटी-मोटी इच्छाओं की तिलांजलि देते हुए निरंतर आगे बढ़ना होगा। दुर्गम पर्वत सम अवरोध हो अथवा गहरी खाई सम व्यवधान उन्हें धैर्यपूर्वक पार करेंगे, तभी हमारी ये दुर्गम राहें सरल प्रतीत होने लगेंगी और हम अपनी मंजिल को प्राप्त कर गर्वानुभूति  कर सकेंगे।

- रूणा रश्मि 'दीप्त'

राँची - झारखंड

        दण्डपाणि जयकान्तन की स्मृति में यह कहना सर्वथा उपयुक्त है कि—“मंजिल का मिल जाना आसान नहीं होता है जनाब, रास्ते क्या-क्या छीन लेते हैं, मुसाफिर को ही पता है।” यह केवल एक भावपूर्ण पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन के संघर्ष, साधना, त्याग और आत्मविश्वास का गहन दर्शन है। जयकान्तन ने अपने साहित्य और अपने जीवन से सिद्ध किया कि महान उपलब्धियाँ कभी सहज नहीं मिलतीं; वे निरन्तर परिश्रम, असंख्य असफलताओं, सामाजिक प्रतिरोधों और आत्मसंघर्षों की तपिश में तपकर ही आकार लेती हैं। यात्रा केवल मंजिल तक पहुँचने का नाम नहीं, बल्कि स्वयं को गढ़ने, अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचानने और हर चुनौती को अवसर में बदलने की प्रक्रिया है। जीवन के कठिन मार्ग अनेक बार व्यक्ति से उसका आराम, उसका समय, उसकी सहजता, यहाँ तक कि उसके प्रिय संबंध भी छीन लेते हैं, किन्तु बदले में उसे अनुभव, धैर्य, परिपक्वता और आत्मबल प्रदान करते हैं। यही संघर्ष मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाता है। दण्डपाणि जयकान्तन का समूचा साहित्य इसी जिजीविषा, इसी मानवीय संवेदना और इसी अटूट संकल्प का अमर दस्तावेज है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि लक्ष्य ऊँचा हो, संकल्प अडिग हो और हृदय में सत्य के प्रति निष्ठा हो, तो कठिन से कठिन राह भी अंततः सफलता के चरण चूमती है।अतः हमें कभी भी मार्ग की कठिनाइयों से विचलित नहीं होना चाहिए। मंजिल उन्हीं को प्राप्त होती है, जो रास्तों के घावों को अपने गौरव का अलंकार बना लेते हैं। संघर्ष ही सफलता का मूल्य है, और यही मूल्य मनुष्य को कालजयी बनाता है। दण्डपाणि जयकान्तन की स्मृति में उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कहना उचित होगा कि महानता मंजिल पाने में नहीं, बल्कि उस यात्रा को साहस, स्वाभिमान और मानवता के साथ पूर्ण करने में निहित है और यही कर्म और धर्म मैं पिछले 32 वर्षों से कर रहा हूॅं। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

" मेरी दृष्टि में " मंजिल पाने के लिए क्या - क्या सहन करना पड़ता है। यह सिर्फ मुसाफिर ही जानता है। मंजिल पाने के लिए दर - दर की ठोकरें खानी पड़ती है। फिर भी मंज़िल नहीं मिलती है। संघर्ष करते - करते ही मंज़िल का रस्ता मिल सकता है।‌बाकि तो संघर्ष का खेल है। 

          - बीजेन्द्र जैमिनी 

        (संचालन व संपादन)


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  1. किसी भी कार्य की उपलब्धि या सफलता आसान नहीं होती। मंजिल को पाने के लिए कितना प्रयास करना पड़ता है यह मुसाफिर ही जानता है। अनेक प्रकार की परेशानियां, बाधक तत्व रास्ते में रुकावट बनते हैं। लेकिन लक्ष्य सिद्धि के लिए उन सब का सामना करना पड़ता है। दिन रात श्रम और लगन से कार्य करना होता है बिना किसी हीला हवाली के।अगर दिल में चाह है तो निश्चित रूप से सारे कंटकों को पार करता हुआ इंसान अपनी मंजिल पा जाता है।
    - गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
    नरसिंहपुर -मध्य प्रदेश
    (WhatsApp से साभार)

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