पाठकों के बीच में विजय ' विभोर ' की लघुकथाएं
विजय विभोर
जन्म : 22 नवम्बर 1974
कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, अभिनय, निर्देशन एवं एस.बी.आई. लाइफ जीवन बीमा व स्वास्थ्य बीमा
प्रकाशित कृतियाँ -
अहंकार के अंकुर (कहानी संग्रह 2018)
देख कबीरा हँसा (लघु कहानी संग्रह 2019)
फिर वही पहली रात (लघुकथा संग्रह, 2019)
फूस का महल (कहानी संग्रह, 2020)
सम्मान: -
- समग्र सेवा संस्थान, सिरसा द्वारा श्री उदयकरण सुमन स्मृति "साहित्य गौरव सारस्वत सम्मान" 2020,
- आनंद कला मंच, भिवानी द्वारा जयलाल दास साहित्य साधक सम्मान 2021,
- श्रीमद शंकर स्वामी विश्वदेवानंद तीर्थ धर्मार्थ ट्रस्ट, रोहतक द्वारा युवा साहित्यकार सम्मान 2021
विशेष : -
हरियाणा साहित्य अकादमी से कहानी 'मेरा अस्तित्व' को द्वितीय पुरुस्कार
पता : मकान नंबर 51, टाइप 1A, नजदीक श्री गौरीशंकर मंदिर, म.द.वि. कैम्पस, रोहतक - 124001 (हरियाणा)
विजय ' विभोर ' की लघुकथाएं
1. रिंकिया के पापा
"सुनत हो, रिंकिया के पापा! उ देखो उहाँ भीड़ लगल रही। लागत है कोन्हों सेठ खाना-पानी बाटत है।भूख-पीयास के मारे हमरी तो जान निकलबे को है। जाओ तुम भी लाइन में लगके कुछो लेइ आओ।" सिर पर बोरा और बग़ल में दूधमुहे बेटे संकटवा को अपनी चुन्नी से ढके हुए पैदल सरक रही धनिया बोली।
"हाँ.... हाँ!।" कहते हुए मुनेश ने उम्मीद भरी हसरत से साइकल को एक छायादार जगह रोका। धीरे से स्टैंड लगाया कि कहीं साइकल के कैरियर पर बँधे समान पर सो रही नन्हीं रिंकिया की नींद न टूट जाए और भीड़ की तरफ बढ़ा। कुछ देर बाद खाली हाथ लौटा तो धनिया ने सवाल किया, "का भइल? खाली हाथ काहे आ गए? खाना खत्म होई गवा का?"
"अरि पगली! उहाँ खाना-पानी नाही मिलत रही। उहाँ तो कोहनो बड़ा आदमी चिन्दी-सा कपड़ा बाटत रही, अउर कहत रही मासक लगईबे जीबन बचईबे। ससुरा फोटू भी खिंचावत रहिन। अरे पेट मा रोटी न रहीं तो उका मासक जीबन बचा लीबे?"
तभी मुनेश के कानों में एक जोरदार चीख़ सुनाई पड़ी, कोई उसे झकझोर रहा था। उनकी नींद उखड़ गयी। धनिया दहाड़े मार रही थी, "रिंकिया के पापा!
.... रिंकिया तो..... "
मुनेश ने देखा साइकिल के कैरियर से बंधे समान पर सो रही रिंकिया के जिस्म में कोई हरक़त नहीं रही। उधर धनिया की चीख़ सुनकर पास से गुजर रहे कुछ लोग रुककर उनकी वीडियो बनाने में व्यस्त हो गए। ****
2. कल्पना
"अरे कल्पना! तुम यह क्या कर रही हो? यह चारपाई और ये बिस्तर...?"
पत्नी को अपने बेडरूम में अतिरिक्त चारपाई बिछाते हुए देखकर ज्ञानेन्द्र बोला।
"पिता जी के लिए चारपाई बिछा रही हूँ, आज से वह यहीं सोया करेंगे।"
"अरे पागल हो गयी हो क्या। .... हमारी प्राइवेसी का क्या होगा?' ज्ञानेन्द्र झुंझला गया।
"ज्ञानू! पिता जी की तबीयत ज़्यादा खराब रहने लगी है। रात को जाने कब उन्हें किस चीज़ की जरूरत पड़ जाए। वह यहाँ सोएंगे तो हमें आसानी रहेगी उनकी देखरेख करने में।"
"तुम जैसी मॉडर्न लड़की और इस तरह की सोच.....?" ज्ञानेन्द्र हैरान था।
"तुम नहीं जानते, जब मैं छोटी थी तब मम्मी-पापा और हम एक कमरे में और बीमार होते हुए भी मेरी दादी जी अकेली अलग कमरे में सोती थीं। एक सुबह दादी जी नहीं उठी जाने रात को उनके साथ क्या हुआ होगा। यदि हम में से कोई दादी के पास होता तो शायद दादी जी कुछ वर्ष और जी लेती।......" ज्ञानेन्द्र टकटकी लगाए कल्पना की बातें सुन रहा था। ".....सासु माँ के चले जाने के सदमे से अब पिता जी की हालत बहुत ख़राब रहने लगी है। मैं उनकी हर वक़्त देखभाल करना चाहती हूँ। नहीं तो कहीं हमें असमय अनाथ न होना पड़ जाए।"
भीगी पलकों से ज्ञानेन्द्र ने कल्पना को गले लगा लिया, "कल्पना... ओ मेरी कल्पना!......" ****
3. नँगा
रामबीर बहुत दिनों बाद अपने गाँव जा रहा था। वह अपनी चमचमाती मोटरसाइकिल पर सवार, बहुत ही महंगे–महंगे ब्रांडेड कपड़े पहने, महंगा चशमा लगाए, बहुत ही कीमती घड़ी बाँधे हुए था। अप्रोच रोड़ पर बसे उसके गाँव के खेतों में एक रहट था जिसका पानी बहुत ही शीतल एवं मीठा था। जिन मुसाफिरों को उस रहट के बारे में पता था उनको प्यास नहीं भी होती तब भी वह उसका पानी पीने के लिए ओर पाँच–दस मिनट उसके आस–पास लगे फलदार वृक्षों की छाँव में बैठने का लालच कर लेते थे।
जैसे ही रामबीर अपनी मोटरसाइकल पर उस रहट के पास से गुजरा उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब इस रहट पर रहने वाले भरतू चाचा को उनकी टोली परेशान किया करती थी । उसने सोचा अब तो भरतू चाचा भी बहुत बूढे हो गए होंगे। उनसे मिला जाए, कुछ देर पेड़ों की छाँव तले आराम का आनन्द भी ले लूंगा और पानी भी पी लूंगा। ऐसा विचार कर उसने मोटरसाइकल रहट की तरफ मोड़ दी। दूर धान के खेतों से आता हुआ उसे भरतू नज़र आया तो उसने मोटरसाईकल सड़क किनारे ही खड़ी कर दी और पैदल ही खेतों के मेड़ पर चलते हुए भरतू की तरफ बढ़ने लगा| उनके पास पहुँचा तो भरतू चाचा हड्डियों का पिंजर मात्र बचे थे । चाचा को उसने राम–राम की। चाचा ने यादास्त पर थोड़ा जोर लगाकर उसे पहचान लिया।
“अरे तू तो रामबीर है ना? हजारी को छोरा।”
“हाँ चाचा! मैं रामबीर ही हूँ हजारी जी का बेटा।”
“भाई! लगता है तू तो बड़ा आदमी बन गया है। इतने अच्छे कपड़े, घड़ी, आँखों पर फैशन का चश्मा। पर बुरा मत मानना बेटा तू चाहे कितना ही बड़ा आदमी बन गया हो मुझे तो तू नंगा ही दिखाई दे रहा है।"
भरतू की बात सुनकर रामबीर ने अपने आपको ठीक से देखा और बोला, "चाचा तुम्हें ग़लतफ़हमी हो गयी है लगता है आँखों में मोतिया उतर आया है|"
"नहीं बेटा मुझे तो बहुत दूर का दिखाई देता है| तूझे ऐसा बनाने के चक्कर में तेरा बाप बुरी तरह से दुनियाँ के बोझ तले दबा हुआ है।”
भरतू चाचा की बात सुनकर रामबीर उलटे पाँव हो लिया।
भरतू ने पुकारा, “अरे बेटा कहाँ चला? बैठ जा थोड़ा आराम करके चले जाना।”
“नहीं चाचा! अब रुक नहीं सकता। अब तो तभी वापिस आऊंगा जब मेरे पुरे ख़ानदान के बदन पर पुरे कपडे होंगे और कोई हमें नंगा नहीं कह सकेगा" ****
4.फल
पंडित जी अपने आँगन की दीवार के साथ लगे एक फलदार वृक्ष को काट रहे थे। महीने में कभी-कभार पंडित जी की गली से होकर एक छोटे बालक के साथ गुजरने वाले फ़क़ीरी चोले वाले बुज़ुर्ग ने पूछा, "अरे पंडित जी! यह फलदार, छायादार वृक्ष क्यों काट रहे हो?"
"अरे क्या बताऊँ, बड़े जतन से लगाया था यह पेड़। बच्चे की तरह देखभाल की है इसकी। सोचा था बड़ा होकर अच्छे फल देगा। लेकिन सब जतन करने के बाद भी एक फल के दर्शन नहीं हुए। फ़ालतू में जगह घेरे हुए है। इसको काटकर यहाँ एक दुकान निकाल दूँगा। बैठे-बिठाए कुछ किराया तो आएगा।"
"पंडित जी! तुम्हारा पढ़ा-लिखा लड़का भी तो कई वर्षों से खाली बैठा है, कोई काम-धाम नहीं करता।" अपने साथ चल रहे बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए फ़कीरी लिबास ने कहा और आगे निकल लिया। ****
5.अन्नदाता
"अरे रमुआ! ई बार की को वोट दई हो?" खेत की मेड़ पर पेड़ की छाँव तले लगभग झूलती हुई सी टूटी हुई चारपाई पर पसरे हुए जमींदार ने हुक्के का धुँवा आसमान में छोड़ते हुए पूछा।
"माई बाप! हमार वोट तो अन्नदाता को ही जई है।" बिना रुके खेत मे कस्सी चलाते-चलाते रमुआ ने जवाब दिया।
जमींदार का पारा सातवें आसमान पर था, "साले नमक हराम, ईका मतबल तू हमें वोट नाही देईबे।" ****
पांचों लघुकथाएं अपने आप में बेजोड़ हैं
विजय ' विभोर ' जी की पांचों लघुकथाएं अपने आप में बेजोड़ हैं. जो समाज की सच्चाई को व्यक्त करती हैं. पहली लघुकथा समाज की सच्चाई उस सच्चाई को व्यक्त करती है कि कैसे सस्ती प्रसिद्धि पाने के लिए लोग कैसे कैसे हथकंडे अपनाते हैं. कोई भूख से मरता है तो उसे बीमारी से बचाव की क्या जरूरत है. कोई संकट में पड़ा है और कोई उसका वीडियो बना रहा है. आजकल यही हो रहा है. दूसरी लघुकथा इतिहास से सीख लेने और भविष्य में अपने पर आने वाले संकट से बचने का अच्छा दे रही है. शायद पढ़ी लिखी ल़डकियों का दिमाग बदले. तीसरी लघुकथा उन नवजवानों के लिए सीख है जो पढ़ लिख कर आधुनिक बन जाते हैं और अपने अतीत को भूल जाते हैं कि कितने कष्ट सहकर माँ-बाप बच्चों को पढ़ाते हैं और बच्चा बड़ा होने पर उन्हें भूल जाता है. माँ-बाप अधनंगा होकर रहते हैं बच्चा रोज फैशन बदलता है. चौथी लघुकथा बहुत मार्मिक है जब पेड़ फल नहीं देता है तो हम उसे काट देते हैं. पर क्या हम उसी तरह निकम्मे बेटे को काट सकते हैं?नहीं तो फिर क्यों पेड़ काटेंगे. पेड़ का काम है छाया देना वो तो वह दे ही रहा है तो उसके साथ ये अन्याय क्यों. पाँचवी लघुकथा शायद ज़मींदारों की अत्याचार की कहानी कहती है जो अनपढ़ होते हुए भी मालिक बने रहते हैं जो नौकर के बात को सही ढंग से समझ नहीं पाते. नौकर तो मालिक को ही अन्नदाता समझता है.सुन्दर लघुकथा के लिए विभोर जी को बधाई.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
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पांचों लघुकथा की समीक्षा
*1. रिंकिया के पापा – समीक्षा*
यह लघुकथा अत्यंत मार्मिक और यथार्थवादी है। इसमें गरीब मजदूर वर्ग की भूख, बेबसी और व्यवस्था की विडंबना को बहुत प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है। “मास्क बाँटने” वाली घटना आज के समाज की प्राथमिकताओं की विसंगति को उजागर करती है—जहाँ भूख से जूझते लोगों को दिखावे के लिए चीजें दी जाती हैं।
अंत में रिंकिया की मृत्यु और लोगों का वीडियो बनाना समाज की संवेदनहीनता और डिजिटल दिखावे पर तीखा प्रहार है। कथा का अंत बहुत झकझोरने वाला है, जो पाठक को भीतर तक विचलित करता है।
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*2. कल्पना – समीक्षा*
यह कथा परिवारिक मूल्यों और आधुनिकता के बीच संतुलन को बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत करती है। कल्पना का चरित्र संवेदनशील, जिम्मेदार और दूरदर्शी है।कथा में बीते अनुभव (दादी की मृत्यु) को वर्तमान निर्णय से जोड़ना बहुत प्रभावशाली है। ज्ञानेन्द्र का परिवर्तन कहानी को सकारात्मक मोड़ देता है, जो पाठक को मानवीय रिश्तों की गरिमा का एहसास कराता है। शीर्षक कथा के अनुकूल नहीं लगता शीर्षक और बेहतर हो सकता है ।। कुल मिलाकर लघुकथा मानवीय मूल्यों को न्याय दिलाती है ।
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*3. नंगा – समीक्षा*
यह लघुकथा प्रतीकात्मकता और व्यंग्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।“नंगा” शब्द यहाँ भौतिक नहीं, नैतिक और सामाजिक स्थिति का प्रतीक है। भरतू चाचा का संवाद पूरी कथा का सार है, जो बताता है कि बाहरी चमक के पीछे छिपी पारिवारिक सच्चाई क्या है। अंत में रामबीर का आत्मबोध कहानी को सार्थक और प्रेरणादायक बनाता है।
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*4. फल – समीक्षा*
यह लघुकथा बहुत ही सरल लेकिन गहरी सीख देने वाली है।परंतु इसका शीर्षक कुछ अलग होता तो और बेहतर होता ।पेड़ और बेटे के माध्यम से प्रतीकात्मक तुलना अत्यंत प्रभावशाली है।फकीर का एक वाक्य पूरी कथा का मोड़ बन जाता है और पंडित जी को आत्मचिंतन के लिए मजबूर करता है। कथा यह दिखाती है कि धैर्य और परिश्रम का फल तुरंत नहीं मिलता।
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*5. अन्नदाता – समीक्षा*
यह लघुकथा राजनीति और समाज पर तीखा व्यंग्य करती है।“अन्नदाता” शब्द का प्रयोग बहुत अर्थपूर्ण है—जो किसान के लिए होना चाहिए, वह सत्ता के अहंकार में उलट गया है।जमींदार का क्रोध सत्ता की तानाशाही मानसिकता को उजागर करता है। कथा बहुत छोटी है, लेकिन इसका व्यंग्य बहुत प्रभावशाली है।
- अलका पाण्डेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
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ये लघुकथाएँ समाज का आईना हैं
1. “रिंकिया के पापा” – समीक्षा
यह लघुकथा अत्यंत मार्मिक और यथार्थपरक है। इसमें गरीबी, भूख और समाज की दिखावटी संवेदनशीलता को बहुत तीखे ढंग से प्रस्तुत किया गया है। मास्क बाँटने वाले व्यक्ति का दिखावा और भूखे परिवार की असहायता आज के समाज की सच्चाई को उजागर करती है। कथा का अंत बेहद दर्दनाक है, जहाँ बच्ची की मृत्यु के बाद भी लोग मदद करने के बजाय वीडियो बनाने में लगे रहते हैं। यह संवेदनहीनता पर गहरा प्रहार है।
निष्कर्ष: यह एक प्रभावशाली और झकझोर देने वाली लघुकथा है।
2. “कल्पना” – समीक्षा
यह लघुकथा पारिवारिक मूल्यों और बुजुर्गों की सेवा की भावना को दर्शाती है। कल्पना का चरित्र बहुत संवेदनशील और जिम्मेदार है, जो अपने अतीत से सीख लेकर वर्तमान में सही निर्णय लेती है। दादी की घटना के माध्यम से लेखक ने एक गहरा संदेश दिया है कि बुजुर्गों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। ज्ञानेन्द्र का अंत में बदलना कहानी को सकारात्मक दिशा देता है।
कमजोरी: ज्ञानेन्द्र का परिवर्तन थोड़ा जल्दी हो जाता है, उसमें और विस्तार हो सकता था।
निष्कर्ष: यह एक प्रेरणादायक और भावनात्मक लघुकथा है।
3. “नँगा” – समीक्षा
यह कहानी प्रतीकात्मक और गहरे अर्थ वाली है। “नंगा” शब्द यहाँ बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी खालीपन और जिम्मेदारी की कमी को दर्शाता है। रामबीर का बाहरी वैभव और उसके पिता की वास्तविक स्थिति के बीच का विरोध बहुत प्रभावशाली है। भरतू चाचा का संवाद पूरी कहानी का केंद्र है और वही असली संदेश देता है।
कमजोरी: कथा थोड़ी लंबी लगती है, इसे और संक्षिप्त किया जा सकता था।
निष्कर्ष: यह एक गहरी सोच वाली और असरदार लघुकथा है।
4. “फल” – समीक्षा
यह बहुत छोटी लेकिन सटीक और तीखी लघुकथा है। पेड़ और बेटे के बीच की तुलना बहुत सुंदर और अर्थपूर्ण है।फकीर का एक वाक्य ही पूरी कहानी का संदेश दे देता है कि जैसे पेड़ फल नहीं दे रहा, वैसे ही बेटा भी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा।
कमजोरी: पंडित जी की प्रतिक्रिया दिखाई जाती तो कहानी का प्रभाव और बढ़ता।
निष्कर्ष: कम शब्दों में बड़ा संदेश देने वाली उत्कृष्ट लघुकथा।
5. “अन्नदाता” – समीक्षा
यह लघुकथा बहुत छोटी है लेकिन इसमें तीखा व्यंग्य छिपा है। किसान को असली अन्नदाता मानने के बावजूद जमींदार का अहंकार समाज की सच्चाई को दर्शाता है।रमुआ का जवाब और जमींदार की प्रतिक्रिया वर्गभेद और शोषण को उजागर करती है।कमजोरी: कथा बहुत जल्दी समाप्त हो जाती है, इसे थोड़ा और विस्तार मिल सकता था।
निष्कर्ष: यह एक सशक्त व्यंग्यात्मक लघुकथा है।
समग्र मूल्यांकन (Overall Review)
विजय 'विभोर' की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाएँ और तीखा व्यंग्य प्रमुख रूप से दिखाई देता है। उनकी भाषा सरल है, लेकिन संदेश गहरा और प्रभावशाली है। अधिकतर लघुकथाओं का अंत पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
मुख्य विशेषताएँ:
सरल और प्रभावी भाषा
गहरे सामाजिक संदेश
अंत में तीखा प्रभाव
अंतिम निष्कर्ष
ये लघुकथाएँ समाज का आईना हैं और पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। थोड़े और विस्तार और भावनात्मक गहराई के साथ ये रचनाएँ और भी उत्कृष्ट बन सकती हैं।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
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पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं
विजय ‘विभोर’ की लघुकथाएँ केवल कथाएँ नहीं, बल्कि समय की नब्ज पर हाथ रखकर लिखी गई सामाजिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्तियाँ हैं। इन रचनाओं में यथार्थ की करुणा, संवेदना की गहराई, व्यंग्य की तीक्ष्णता और मानवीय मूल्यों की पुकार अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरकर सामने आती है।
1. “रिंकिया के पापा” — संवेदनहीन समाज पर करारा प्रहारयह लघुकथा आज के उस अमानवीय समाज का दर्पण है जहाँ भूख से जूझते गरीबों के लिए रोटी नहीं, बल्कि दिखावे का “मास्क” बाँटा जाता है। अंत में बच्ची की मृत्यु और लोगों का वीडियो बनाना — यह दृश्य भीतर तक झकझोर देता है। लेखक ने बिना किसी भारी-भरकम शब्दों के, समाज की क्रूर संवेदनहीनता को नंगा कर दिया है।
👉 संदेश: मानवता का स्थान प्रदर्शन ने ले लिया है — यह अत्यंत गंभीर चेतावनी है।
2. “कल्पना” — आधुनिकता और संस्कारों का संतुलन। यह कथा आधुनिक जीवनशैली और पारिवारिक दायित्वों के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करती है। “प्राइवेसी” बनाम “सेवा” के द्वंद्व में कल्पना का निर्णय भारतीय संस्कारों की श्रेष्ठता को उजागर करता है। दादी की मृत्यु का स्मरण कथा को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करता है।
👉 संदेश: सच्ची आधुनिकता वही है जिसमें संवेदनाएँ जीवित रहें।
3. “नंगा” — दिखावे के पीछे छुपी वास्तविक गरीबी ।यह लघुकथा बाहरी वैभव और आंतरिक सच्चाई के बीच के विरोधाभास को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। भरतू चाचा का “नंगा” कहना केवल शब्द नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सच्चाई का तीखा व्यंग्य है। अंत में रामबीर का आत्मबोध कथा को प्रेरणादायक बना देता है।
👉 संदेश: असली सम्पन्नता परिवार की गरिमा और संतुलन में है, न कि दिखावे में।
4. “फल” — अपेक्षाओं और वास्तविकता पर सूक्ष्म व्यंग्य। पेड़ और बेटे के माध्यम से लेखक ने अत्यंत गहरी बात को सहज ढंग से कहा है। यह कथा हमें सिखाती है कि धैर्य, समझ और दृष्टिकोण का अभाव हमें गलत निर्णय लेने पर मजबूर कर देता है।
👉 संदेश: हर “फल” समय पर मिलता है, अधीरता विनाश का कारण बनती है।
5. “अन्नदाता” — सत्ता और शोषण पर तीखा व्यंग्य ।यह लघुकथा ग्रामीण राजनीति और सामाजिक संरचना की सच्चाई को उजागर करती है। “अन्नदाता” शब्द का प्रयोग अत्यंत व्यंग्यात्मक है—जो असली अन्नदाता (किसान) है, वही शोषित है। जमींदार की मानसिकता पर यह तीखा प्रहार है।
👉 संदेश: लोकतंत्र में भी शोषण की मानसिकता जीवित है — इसे बदलना होगा।
समग्र मूल्यांकन (Overall Evaluation)
विजय ‘विभोर’ की ये पाँचों लघुकथाएँ—
संक्षिप्त होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली हैं
प्रत्येक कथा एक गहरा सामाजिक संदेश देती है
भाषा सरल, सहज और जनमानस से जुड़ी हुई है
अंत (twist) इतने सशक्त हैं कि पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं
👉 विशेष बात: इन लघुकथाओं में “कम शब्द, गहरी चोट” की कला उत्कृष्ट स्तर पर दिखाई देती है।
मेरी ज्वलंत सकारात्मक राय
ये पाँचों लघुकथाएँ आज के समाज के लिए आईना ही नहीं, बल्कि चेतावनी, प्रेरणा और आत्ममंथन का सशक्त माध्यम हैं।लेखक ने बिना किसी आडंबर के, सीधे हृदय और मस्तिष्क पर प्रहार किया है—और यही सच्चे साहित्य की पहचान है।
निष्कर्ष :-
विजय ‘विभोर’ की ये रचनाएँ भारतीय लघुकथा साहित्य को समृद्ध करने वाली, विचारोत्तेजक और समयानुकूल उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
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पाँचों लघुकथाएँ समकालीन
विजय ‘विभोर’ की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ समकालीन जीवन की विडंबनाओं, सामाजिक विषमताओं और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को अत्यंत सजीव और प्रभावपूर्ण ढंग से सामने लाती हैं। इन रचनाओं का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि लेखक ने जीवन के छोटे-छोटे, दिखने में साधारण किन्तु भीतर से अत्यंत गहरे अनुभवों को कथ्य बनाया है और उन्हें बिना किसी कृत्रिमता के सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचाया है।
“रिंकिया के पापा” में भूख और गरीबी की त्रासदी के साथ-साथ दिखावटी सामाजिक सेवा और डिजिटल युग की संवेदनहीनता का जो चित्र उभरता है, वह अत्यंत मर्मांतक है। मास्क बाँटने की औपचारिकता और रोटी के अभाव का द्वंद्व केवल एक घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाता है। अंत में बच्ची की मृत्यु और लोगों का वीडियो बनाने में व्यस्त होना समाज की उस कठोर मानसिकता को उजागर करता है जहाँ करुणा की जगह प्रदर्शन ने ले ली है।
“कल्पना” लघुकथा आधुनिक जीवनशैली में ‘प्राइवेसी’ और पारिवारिक दायित्व के बीच चल रहे द्वंद्व को बड़ी सहजता से प्रस्तुत करती है। यहाँ स्त्री पात्र केवल संवेदनशील ही नहीं, बल्कि अनुभवजन्य दृष्टि से परिपक्व भी है। दादी के प्रसंग के माध्यम से लेखक ने स्मृति और वर्तमान को जोड़ते हुए यह संकेत दिया है कि उपेक्षा का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। इस कथा का भावनात्मक प्रवाह पाठक को भीतर से छूता है और अंत में पति का परिवर्तन मानवीय रिश्तों की ऊष्मा को पुनर्स्थापित करता है।
“नँगा” लघुकथा में प्रतीकात्मकता का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है। बाहरी वैभव और आंतरिक रिक्तता के बीच का विरोधाभास यहाँ अत्यंत तीखे रूप में उभरता है। भरतू चाचा का चरित्र जैसे समाज की अंतरात्मा का प्रतिनिधित्व करता है, जो बिना लाग-लपेट के सच्चाई सामने रख देता है। ‘नंगा’ शब्द यहाँ केवल शारीरिक स्थिति नहीं, बल्कि नैतिक और पारिवारिक दरिद्रता का प्रतीक बन जाता है। अंत में रामबीर का आत्मबोध कथा को केवल आलोचना तक सीमित नहीं रखता, बल्कि सुधार की दिशा भी इंगित करता है।
“फल” अपनी लघुता में ही गहन व्यंग्य समेटे हुए है। पेड़ और पुत्र के माध्यम से अपेक्षा, निवेश और परिणाम के संबंध को अत्यंत सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया गया है। फकीर का एक वाक्य पूरी कथा का मर्म खोल देता है और पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि हम दूसरों से जो अपेक्षा रखते हैं, क्या वही कसौटी स्वयं पर भी लागू करते हैं। यह लघुकथा अपनी संक्षिप्तता के बावजूद गहरी चोट करने में सफल है।
“अन्नदाता” में ग्रामीण परिवेश, वर्ग-भेद और सत्ता के अहंकार का अत्यंत सटीक चित्रण मिलता है। ‘अन्नदाता’ शब्द का द्विअर्थी प्रयोग कथा को विशेष प्रभाव प्रदान करता है—एक ओर किसान, जो वास्तव में अन्नदाता है, और दूसरी ओर जमींदार, जो स्वयं को यह दर्जा देना चाहता है। रमुआ का सहज उत्तर और जमींदार की प्रतिक्रिया सामाजिक संरचना के भीतर छिपे शोषण और मानसिकता को उजागर करती है। यह लघुकथा कम शब्दों में गहरी राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणी प्रस्तुत करती है।
शिल्प की दृष्टि से ये सभी लघुकथाएँ संवादप्रधान हैं, जिससे कथानक में जीवंतता आती है और पात्र सीधे पाठक से संवाद करते प्रतीत होते हैं। भाषा सरल, सहज और लोकजीवन से जुड़ी हुई है, जिसमें क्षेत्रीय शब्दावली का प्रयोग कथाओं को और अधिक प्रामाणिक बनाता है। लेखक ने अनावश्यक वर्णन से बचते हुए सीधे कथ्य पर ध्यान केंद्रित किया है, जो लघुकथा की मूल विशेषता है। साथ ही, अधिकांश कथाओं के अंत में जो तीव्र मोड़ आता है, वह पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ता है और उसे आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। हालाँकि, कुछ स्थानों पर कथाओं में कसावट की थोड़ी कमी महसूस होती है, विशेषतः “नँगा” जैसी कथा में जहाँ विस्तार लघुकथा की तीक्ष्णता को कुछ कम कर देता है। इसी प्रकार, यदि कुछ पात्रों के मनोवैज्ञानिक पक्ष को थोड़ा और उकेरा जाता, तो कथाओं की प्रभावशीलता और बढ़ सकती थी। फिर भी, ये कमियाँ इतनी बड़ी नहीं हैं कि समग्र प्रभाव को कम कर सकें। समग्र रूप से कहा जाए तो विजय ‘विभोर’ की ये लघुकथाएँ सामाजिक चेतना से परिपूर्ण, विचारोत्तेजक और भावनात्मक रूप से अत्यंत प्रभावी हैं। ये रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठक को समाज के यथार्थ से रूबरू कराते हुए उसे सोचने, समझने और कहीं न कहीं स्वयं को परखने के लिए प्रेरित करती हैं। यही किसी सशक्त लघुकथा की सबसे बड़ी सफलता है।
-डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
सशक्त लघुकथाकार की पहचान
1.रिंकिया के पापा
क्षेत्रीय भाषा में लिखी मार्मिक लघु कथा। संवाद मौलिकता लिए हुए। कथ्य भावपूर्ण। सामाजिक संदेश निहित झकझोरने वाली लघुकथा।
2. कल्पना
कथ्य अच्छा है। लेकिन कल्पना में पैनापन नहीं, पति-पत्नी के कमरे में पिताजी का बिस्तर ... अनुसरण योग्य नहीं, इसके बदले कोई अन्य विकल्प चुनना सार्थक और प्रभावी होगा। शेष कहानी और उदेश्य रोचक हैं।
3.नँगा
मेरे अनुसार नंगा सही शब्द है। ग्रामीण परिवेश का चित्रण भी मौलिकता लिए है। संवाद भी रोचक हैं। कथ्य भी अच्छा है। अच्छी लघुकथा।
4.फल
भाव प्रधान,गंभीरता लिए हुए बेहतरीन लघुकथा। सुंदर कथ्य।
5.अन्नदाता
समाज के वर्गीकरण को सोच, समझ और भाव को अपने-अपने तरीके से प्रदर्शित करती बेहतरीन सामाजिक लघुकथा।
विजय विभोर की प्रस्तुत ये पाँचों लघुकथाओं में बेहतरीन कथ्य, कथ्य के अनुरूप परिवेश ,दृश्य चित्रण, पात्र के अनुरूप संवाद। विविधता लिए ये पांचों लघुकथा सशक्त लघुकथाकार की पहचान है। सामाजिक चिंतन और समाज के उत्कर्ष की छटपटाहट लघुकथा में निहित कथ्य और पात्र- संवाद से स्पष्ट झलकती है और लघुकथा के मूल उद्देश्य को सार्थक करती हैं।
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