डॉ. भीमराव अम्बेडकर की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      संघर्ष और ज्ञान ।  दोनों जीवन के मूलभूत आधार है। जो‌ कर्म और सफलता  का मूल आधार  है बाकी तो कर्म यानि भाग्य का खेल है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- 
       यह अटूट सत्य है कि  केवल सोचने से सफलता नहीं मिलती उसके लिए कर्म अनिवार्य है वास्तव में सही दिशा में किया गया निरंतर संघर्ष और ज्ञान  सहित कर्म ही सफलता की कुंजी है मेरे ख्याल में ज्ञान के बिना कर्म दिशाहीन हो सकता है क्योंकि हमारे ज्ञान के अधार पर ही  हमारे कर्म महान बनते हैं तो आईये आज की चर्चा   इसी बात पर करते हैं कि, सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है और कर्म ज्ञान पर निर्भर करता है, मेरा मानना है कि इसमें कोई शक नहीं कि सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है और कर्म ज्ञान पर क्योंकि जीवन में सफलता का मूल मंत्र निरंतर मेहनत और संघर्ष ही है जो हमारे चरित्र को मजबूत बनाता है, ऐसा कोई शार्टकट नहीं है यहाँ से बिना परिश्रम के सफलता मिल सके इसी तरह से ज्ञान तभी लाभदायक है जब उसे कर्म के रूप  से उतारा जाए क्योंकि कर्म ही ज्ञान की परिक्षा है,  देखा जाए सफलता का अर्थ सिर्फ मंजिल पाना नहीं है बल्कि कठिन से कठिन रास्ते को पार करना है जो चुनौतियों से भरा हो इसलिए ज्ञान और कर्म एक दुसरे के पूरक हैं जो मनुष्य के विकास के लिए जरूरी हैं जबकि कर्म ज्ञान पर निर्भर है क्योंकि ज्ञान इन्द्रियों से प्राप्त के आधार पर ही मन और बुद्धि निर्णय लेते हैं और  फिर हमारा कर्म शुरू होता है जबकि सही ज्ञान सही कर्म सिखाता है और गलत ज्ञान गलत कर्म इसलिए कर्म की दिशा या गुणवत्ता ज्ञान द्वारा ही निधार्रित होती है तभी तो ज्ञान को इनपुट और कर्म को आउटपुट का दर्जा दिया गया है क्योंकि कर्म सफलता, विफलता, सुख व दुख का अनुभव कराते हैं तथा कर्म ही ज्ञान की कसौटी हैं और ज्ञान के माध्यम से ही निष्काम कर्म का मार्ग खुलता है जो बंधन से मुक्त करवा  सकता है कहने का भाव ज्ञान  कर्म को सही दिशा देता है और कर्म ज्ञान  को व्यवहार में बदलता है,  अन्त में यही कहुँगा कि  सफलता और कर्म जीवन के दो मुख्य पहलू हैं जबकि कर्म का अर्थ निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य है और सफलता उन्हीं सही दिशा पर किए गए कार्यों का सही परिणाम है  इसलिए मेहनत, अनुशासन और धैर्य के साथ किया गया कार्य ही सफलता के मार्ग को प्रशस्त करता है जबकि सफलता को केवल धन से नहीं आंका जा सकता बल्कि आंतरिक शांति, प्रसन्नता और लक्ष्यों की प्राप्ति को कहा जाता है, इसलिए सफलता और कर्म मुख्य रूप से लगातार मेहनत, सही दिशा में  ईमानदारी से कार्य, धैर्य और साकारात्मक मानसिकता पर निर्भर करते हैं यह सत्य है कि सफलता के लिए संघर्ष और कर्म के लिए ज्ञान अति अनिवार्य  है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा 

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

         सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है,कर्म ज्ञान पर निर्भर करता है.... बिल्कुल सही कहा... किसी भी चीज को पाने के लिए हम एक लक्ष्य बनाते हैं किंतु उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हमें काफी संघर्ष करना पड़ता है तभी हम अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल हो पाते हैं। पक्षी भी जब अपना घोंसला बनाता है तब उसका लक्ष्य केवल घोंसला बनाने पर ही केन्द्रित होता है...तिनका ले उड़ता है, तिनका गिर जाता है पुनः नीचे आ तिनका उठाता है, बार बार वह यही करते जाता है , किंतु काफी संघर्ष करने के बाद वह घोंसला बनाकर रहता है और सफल होता है आखिर संघर्ष और प्रयास ही तो सफलता की कुंजी है। किंतु किसी भी कार्य की सफलता प्राप्त करने के लिए यदि हम  बिना ज्ञान के दिशाहीन होकर केवल परिश्रम पर परिश्रम कर सफलता के लिए संघर्ष करते जा रहे हैं तो हमें सफलता तो मिलने से रही। किसी भी काम को करने से पहले हमें ज्ञान अथवा उस काम की जानकारी होना जरूरी है तभी हमारी मेहनत सफल हो सकती है... चिड़िया भी घोंसला बनाना जानती है उसे घोंसला कैसे बनाते हैं उसका ज्ञान और जानकारी होती है... इसलिए वह अपने संघर्ष और प्रयास से सफल होती है चूंकि वह जानती है कि वह सही दिशा में काम कर रही है  सफलता अवश्य मिलेगी। कार्य की सफलता के लिए संघर्ष के साथ ज्ञान का होना जरूरी है।

  - चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

      सफलता,सहज ही नहीं मिलती इसके लिए संघर्ष करना ही पड़ता है।कहा भी गया है  कि जीवन एक संघर्ष है।जीवन में सफलता की राह संघर्ष से ही होकर गुजरती है।किसी भी महापुरुष,देवी देवता का जीवन चरित उठा लीजिए, उसमें पग पग पर संघर्ष मिलेगा।उस संघर्ष में अपने कर्मों को कितनी कुशलता से किया जाता है यह ज्ञान पर निर्भर करता है।एक ही स्थिति में दो अलग-अलग व्यक्ति अलग अलग व्यवहार करते हैं यह उनके ज्ञान पर आधारित होता है।सफलता, संघर्ष,कर्म, ज्ञान सब एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। इसलिए जीवन में निरंतर संघर्ष के बीच भी ज्ञानार्जन करते हुए कर्मरत रहना चाहिए।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल' 

धामपुर - उत्तर प्रदेश

      निश्चित रूप से व्यक्ति की सफलता व्यक्ति के संघर्ष पर निर्भर करती है !! यदि व्यक्ति का संघर्ष , प्रयास , परिश्रम , उसकी क्षमता के अनुरूप होगा , तो उसकी सफलता निश्चित है ! संघर्ष यदि व्यक्ति का पूर्णरूपेण प्रयास है , तो असफलता का प्रश्न ही नहीं उठता!! यदि प्रयास ही आधे मन व श्रम से किया गया हो , तो व्यक्ति परमात्मा से भी क्या मांग सकता है क्योंकि भगवान भी उनकी सहायता करते हैं , जो स्वयं की सहायता करते हैं !! कर्म , संघर्ष , मेहनत भी व्यक्ति के ज्ञान पर निर्भर करताहै ! जितना ज्ञान व्यक्ति को होगा , वह उसके अनुसार ही कर्म करेगा !! आज की दुनियां मैं जो व्यक्ति दूसरों के ज्ञान का लाभ उठाते हुए , स्वयं ज्ञान को अर्जित करता है , व उस ज्ञान का प्रयोग अपने निज संघर्ष मे लगाता है , अवश्य सफल होता है ! ज्ञान अर्जित करने की कोई शर्त नहीं होती , न ही कोई उम्र निर्धारित होती है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन -हिमाचल प्रदेश

        जीवन के परिदृश्य में सफलता पूर्वक संघर्ष करना महत्वपूर्ण योगदान रहता है। सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है, कर्म ज्ञान पर निर्भर करता है। वास्तविक जीवन पर प्रभाव पड़ता है। जब-तक हम संघर्ष न करे, तब-तक सफलता नहीं मिलती है। जैसे- सुख-दुख एक सिक्के के दो पहलू है। कभी-कभी अति सुख के बाद अचानक दुख आ जाए, हम सहन नहीं कर पाते, अगर बचपन से ही दुख मिला हो, तो सहन करने की शक्ति मिल जाती है। यही जीवन का गम्भीर सत्य है.....

-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

      यह सच है कि जब मनुष्य जन्म लेता है तो उसे आजीवन संघर्षों से सामना करते हुए ही जीवन को जीना पड़ता है।जीवन  से जुड़ा कोई भी कार्य हो , सहजता से नहीं हो सकता । विद्या अध्ययन, जीविकोपार्जन, रोजगार, व्यवसाय ,उच्च पद की प्राप्ति ,भौतिक सुख संपन्नता से युक्त जीवन जीना , सभी में संघर्ष करने के बाद ही सफलता प्राप्त होती है। कभी हानि होती है तो कभी लाभ होता है । कुछ खोकर ही कुछ  पाना होता है । यह सब व्यक्ति के ज्ञान पर निर्भर करता है तदनुरूप वह कर्म भी करता है। गीता में भी कहा गया है कि कर्म योग से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है इसके बाद ही व्यक्ति को उसे सिद्ध करने का शुभ अवसर भी प्राप्त होता है। वह निष्काम कर्म करता हुआ उच्च शिखर पर जो उसे पाना होता है ,प्राप्त कर लेना होता है। चाहें दैहिक जीवन हो, दैविक हो या भौतिक । सब ज्ञान योग से कर्म योग की कहानी है पर सफलता, संघर्ष ,कर्म, ज्ञान की चौकड़ी के चक्र  के बिना जीवन की कल्पना निरर्थक है। यही सफल जीवन  का सत्य  है।

- डाॅ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

       किसी भी सफलता के लिए संघर्ष जरूरी होता है. सफलता संघर्ष पर ही निर्भर करती है. अगर संघर्ष नहीं करेंगे तो सफलता मिलना कठिन हो जाता है. हम जितना संघर्ष करेंगे सफलता उतनी ही प्राप्त होगी. पूर्ण सफलता के लिए पूर्ण संघर्ष जरूरी होता है. कर्म तो ज्ञान पर ही निर्भर करता है. जैसा हमारा ज्ञान है हमारा कर्म भी वैसा ही होगा. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

         यह विचार बहुत गहरा है—“सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है” और “कर्म ज्ञान पर निर्भर करता है”—इन दोनों कथनों में जीवन का पूरा दर्शन समाया है। जीवन में सफलता कभी भी सहज रूप से प्राप्त नहीं होती। यह संघर्ष की तपस्या से ही जन्म लेती है। जितना अधिक व्यक्ति बाधाओं से जूझता है, उतनी ही उसकी क्षमता निखरती है। संघर्ष ही वह कसौटी है, जिस पर सफलता की असली पहचान तय होती है। बिना संघर्ष के मिली उपलब्धि स्थायी नहीं होती।दूसरी ओर, कर्म केवल मेहनत का नाम नहीं है, बल्कि वह ज्ञान से निर्देशित क्रिया है। यदि व्यक्ति के पास ज्ञान नहीं है, तो उसका कर्म दिशाहीन हो सकता है। ज्ञान व्यक्ति को सही और गलत का भेद कराता है, लक्ष्य निर्धारित करता है और कर्म को प्रभावी बनाता है।इस प्रकार कहा जा सकता है कि— संघर्ष सफलता को गढ़ता है, और ज्ञान कर्म को दिशा देता है। जहाँ संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाता है, वहीं ज्ञान उसे सही मार्ग पर ले जाता है।अंततः, जब ज्ञान और संघर्ष दोनों का संतुलन जीवन में स्थापित होता है, तभी वास्तविक सफलता प्राप्त होती है। 

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

      डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की स्मृति में यह विचार अत्यंत सारगर्भित है कि सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है और कर्म ज्ञान पर निर्भर करता है। यह कथन केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि जीवन का व्यावहारिक सत्य है। सफलता कोई स्थिर अवस्था नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष, धैर्य, अनुशासन और आत्मविश्वास की यात्रा है। व्यक्ति जितना अधिक संघर्ष करता है, उतना ही उसके भीतर क्षमता, अनुभव और आत्मनिर्भरता विकसित होती है। संघर्ष ही वह माध्यम है जो असंभव को संभव में बदलता है।इसी प्रकार कर्म का आधार ज्ञान है। ज्ञान केवल पुस्तकीय जानकारी नहीं है, बल्कि वह विवेक है जो सही और गलत में अंतर करना सिखाता है। जब ज्ञान कर्म में परिवर्तित होता है, तभी वह समाज और व्यक्ति दोनों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाता है। बिना ज्ञान के कर्म दिशाहीन हो सकता है, और बिना कर्म के ज्ञान निष्क्रिय रह जाता है। डॉ. अम्बेडकर जी ने भी जीवनभर यह सिद्ध किया कि शिक्षा, ज्ञान और संघर्ष के माध्यम से ही सामाजिक असमानताओं को चुनौती दी जा सकती है और सम्मानजनक जीवन प्राप्त किया जा सकता है। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) के उपरांत भी यह प्रश्न समाज के समक्ष विद्यमान है कि क्या संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श वास्तव में प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से और समय पर पहुँच पा रहे हैं या नहीं।इस परिप्रेक्ष्य में संविधान के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) और मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) दोनों का संतुलित क्रियान्वयन अत्यंत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि अधिकारों की सार्थकता कर्तव्यों के पालन से ही सुनिश्चित होती है। इसी विचारधारा के अनुरूप यह भी अपेक्षा की जाती है कि न्यायिक व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर स्थित संस्थाएँ, अपने संवैधानिक दायित्वों और नैतिक कर्तव्यों के अनुरूप, न्याय तक पहुँच को सुलभ बनाने तथा न्याय की प्रक्रिया में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक प्रभावी न्यायिक प्रयास सुनिश्चित करने की दिशा में निरंतर कार्य करें।अंततः, यह विचार हमें प्रेरित करता है कि सफलता केवल भाग्य नहीं, बल्कि संघर्ष का परिणाम है; और कर्म केवल प्रयास नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रतिबिंब है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

      सफलता के लिए संघर्ष से अधिक कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। हाँ संघर्ष के स्वरूप अलग हो सकते हैं। मानसिक और शारीरिक श्रम का स्वरूप ज्ञान और कर्म पर निर्भर करता है। एकांगी सफलता मन को संतुष्ट संपन्न नहीं करती है। सभी जानते हैं कि सफलता पाने के लिए जी जान लगाकर पूरे तन मन धन से कार्य करना होता है  - - लेकिन क्या इसे ही सफलता का पर्याय मान लें  - - नहीं। सफलता कर्म और ज्ञान के साथ चलती है। हाँ संघर्ष की अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता। आम लोगों के जीवन में निरंतर संघर्ष चलते रहते हैं जबकि मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए लोगों को सब कुछ आसानी से मिल जाता है। हम सामान्य लोग इसे भाग्य की लीला या प्रारब्ध मान कर सब कुछ स्वीकारते चलते हैं लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि हर इंसान जीवन में करम के भरोसे नहीं बल्कि कर्म के भरोसे आगे बढे। सफलता के लिये हर कर्म हर ज्ञान हर मेहनत के लिये तैयार रहें तभी "दुख भरे दिन बीते रे भैय्या अब सुख आयो रे" गाते हुए जीवन को सफल बना पायेंगे। 

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

      सफलता संघर्ष पर निर्भर है और कर्म ज्ञान पर ही निर्भर है यह बात बिल्कुल सही है ।क्योंकि संघर्ष तो जीवन में हर कोई करता है परंतु जो शिक्षित है उसके ज्ञान में अंतर होगा बिना ज्ञान   ...बिना दिशा...बिना विचारे ...कोई काम करने से सफलता प्राप्त नहीं होती । एक मजदूर से ज्यादा संघर्ष कौन करता होगा  ?परंतु शिक्षा से अर्जित ज्ञान हमें बताता है कि कोई काम कब .?कैसे ?और क्या करना है? "बिना ज्ञान के कोई काम करना अंधेरे में तीर चलाने के समान है . "सफलता सिर्फ सोचने विचारने से  नहीं मिलती उसके लिए जी तोड़ प्रयास और मेहनत करनी पड़ती है। पसीना बहाना पड़ता है    कि किस दिशा में हमें कितना काम करना है जो हमें लक्ष्य तक पहुंचा दे । इसलिए कहते हैं कि  अच्छा ज्ञान दिशा देता है संघर्ष गति देता है और कर्म हमें लक्ष्य तक पहुंचा देता है ।  मेरे स्कूल में जब बच्चा छठी में प्रवेश करने आता है तब मैं उन्हें एक यही मंत्र देती हूं कि 6 साल मेहनत से पढ़ोगे(6 से12तक)  तो 66 साल आनंद में जीवन व्यतीत करोगे और अगर 6 साल लापरवाही करोगे ?नहीं पढ़ोगे ? बारहवी तक कुछ ज्ञान अर्जित नहीं कर पाओगे ..  तो 66...साल...तक...संघर्ष   ही करोगे   मेहनत ही करोगे। यह ही भविष्य निर्माण का गोल्डन टाइम होता है जिस तरह से सोने को गर्म भट्टी में तपाए बिना आभूषण नहीं बन सकता उसी प्रकार  शिक्षा के बिना संघर्ष से लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता । ज्ञान के साथ कर्म करने से ही जल्दी सफलता प्राप्त होती है। 

- रंजना हरित 

बिजनौर - उत्तर प्रदेश 

      जीवन एक निरंतर यात्रा है, जिसमें हर व्यक्ति सफलता की मंज़िल तक पहुँचने का सपना देखता है। परंतु यह मंज़िल सहज नहीं होती। यह कथन — “सफलता संघर्ष पर निर्भर करती है, कर्म ज्ञान पर निर्भर करता है” — जीवन के गहरे सत्य को उजागर करता है। इसमें सफलता और कर्म के बीच के संबंध को बहुत ही सटीक ढंग से समझाया गया है।सबसे पहले यदि हम सफलता की बात करें, तो यह केवल भाग्य का खेल नहीं है। सफलता का मूल आधार संघर्ष है। संघर्ष वह प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर प्रयास करता है, कठिनाइयों का सामना करता है और हार न मानने का साहस दिखाता है। जो व्यक्ति संघर्ष से घबराता है, वह कभी भी ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच सकता। इतिहास गवाह है कि जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने कठिन परिस्थितियों में ही अपनी राह बनाई। संघर्ष ही व्यक्ति को मजबूत बनाता है, उसे अनुभव देता है और उसकी क्षमताओं को निखारता है। इसलिए कहा जा सकता है कि सफलता का असली मार्ग संघर्ष से होकर ही गुजरता है। अब यदि हम कर्म की ओर ध्यान दें, तो यह केवल कार्य करना भर नहीं है, बल्कि सही दिशा में, सही सोच के साथ किया गया कार्य ही सच्चा कर्म होता है। और यह सही दिशा हमें ज्ञान से मिलती है। ज्ञान ही वह प्रकाश है, जो हमें यह समझने में मदद करता है कि हमें क्या करना है, कैसे करना है और क्यों करना है। बिना ज्ञान के किया गया कर्म अंधेरे में तीर चलाने जैसा होता है, जिसका परिणाम अनिश्चित होता है।ज्ञान व्यक्ति को विवेक देता है, निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है और उसे सही व गलत के बीच अंतर समझाता है। जब कर्म ज्ञान के आधार पर किया जाता है, तो वह अधिक प्रभावी और फलदायी होता है। यही कारण है कि ज्ञान और कर्म का गहरा संबंध है — ज्ञान कर्म को दिशा देता है और कर्म ज्ञान को सार्थक बनाता है।यदि इन दोनों विचारों को एक साथ देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए संघर्ष आवश्यक है, और उस संघर्ष को सार्थक बनाने के लिए ज्ञान का होना अनिवार्य है। केवल संघर्ष करने से सफलता नहीं मिलती, यदि वह सही दिशा में न हो। और केवल ज्ञान रखने से भी कुछ नहीं होता, जब तक उसे कर्म में न बदला जाए।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

" मेरी दृष्टि में " जीवन में संघर्ष ही सब कुछ है बाकी तो समय का खेल है। फिर भी जीवन चलता अवश्य है। परन्तु संघर्ष की कोई सीमा नहीं होती है। ऐसा जीवन क्या तो मिट जाता है या फिर हीरा बन जाता है। यही संघर्ष का जीवन है। 

              - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)


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