दादासाहेब फाल्के की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      ज़बाब देना भी एक कला माना जाता है । जो इंसान ज़बाब नहीं दे सकता है। वह क्या तो मुर्ख है या फिर अनपढ़ भी हो सकता है।‌बाकी तो चुप रहना भी कला माना जाता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
      देखा जाए जीवन में मुहँ  तोड़ जबाव देना और चुप रहना दोनों ही परिस्थियों की कलाएँ के रूप में जानी जाती हैं तो आईये आज इसी चर्चा पर बात करते हैं कि मुँह तोड़ जवाब देना भी एक कला है जबकि चुप रहना  भी एक कला है, मेरा मानना है मुहँ तोड़ जवाब देने का मतलब चिल्लाने और बदतमीजी करने से नहीं है बल्कि सही समय पर सही शब्दों के साथ आत्मविश्वास से अपनी बात रखना है ताकि सामने वाले को उसकी सीमा का एहसास हो जाए क्योंकि यह आत्म सम्मान की रक्षा करता  है, यहाँ तक चुप रहने की बात है चुप रहना कोई कमजोरी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी  ताकत है जब बहस निरर्थक हो और सामने वाला समझने की स्थिति में न हो या आपके चुप रहने से बिगड़ना बंद हो जाए तो तब चुप्पी ही सबसे बड़ा जवाब होती है,  मेरे ख्याल में  मुहँ तोड़ जवाब देने के लिए सामने वाले की बात ध्यान से सुन कर जरूरत हाजिर जवाबी से स्टीक प्रतिक्रिया है और चुप रहना अपनी भावनाओं को नियंत्रण करके अनावश्यक संघर्ष से बचने की एक समझदार रणनिति है,  अन्त में यही कहुँगा कि मुहँ तोड़ जवाब देना पूरी तरह से परिस्थिति पर निर्भर करता है, दोनों के अपने फायदे और नुक्सान हैं कहने का भाव जब सामने वाला सुनने की स्थिति में न हो तब चुप रहने में ही समझदारी है तथा जब कोई आपका अपमान करे या ताने मारे तो आपकी चुप्पी उसे सबसे ज्यादा परेशान करती है क्योंकि चुप रह कर आपकी ऊर्जा बचती है और आप बहस से भी बच  सकते हैं तथा सामने वाले को ताने मारने को मौका कम मिलता है क्योंकि वो पलटवार करना चाहता है,  लेकिन कईबार रिश्ते बचाने के लिए भी चुप रहना पड़ता है जिससे शांति बनी रहती है पर  जब अन्याय और शोषण की बात चल रही हो तो मुँहतोड़ जवाब देना जरूरी हो जाता है, कहने का मतलब मुहँ तोड़ जवाब देना भी अपनी जगह एक कला से कम नहीं और  चुप रहना भी  अपनी जगह स्टीक बैठता है, इसलिए इंसान को दोनों परिस्थितियों को अपनाना पड़ता है ताकि जब जिसकी जरूरत पडे उसे ही अपना लिया जाए जिससे जिंदगी को बेहतर चलाने में कोई अड़चन न  आने पाए।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

       हमारी हिन्दी भाषा मे मुहावरों और कहावतों की अटूट संपदा है  - - वहीं से आज यह विषय विचार बड़ा उत्तम है। मुँह तोड़ जवाब देना सचमुच एक कला है। लेकिन चुप रह कर सब कुछ साध लेना उससे भी कला है। आज की दुनिया में हर पल किसी न किसी समस्या से दो चार होना पड़ता है जिनसे पार पाना भी एक कला है। उन समस्याओं का हल आसानी से नही मिलता। जीवन की कठिन राहों पर सामनेवाले को मात देने के लिये कभी कभी मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी होता है। चुप रहने की कला के चलते समस्याओं को आसानी से सम्हाला जा सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मुंहतोड़ जवाब सुनकर सामने वाला व्यक्ति रुष्ट हो सकता है लेकिन चुप रहकर  उसके ईगो को शांत करके ज्यादा अच्छे रिश्ते बना सकते हैं। शांत रहने से बडे़ से बड़ा दुश्मन भी एकबार सोचने को मजबूर हो सकता है।मुँह तोड़ जवाब देकर व्यर्थ में झगड़े की जड़ खोदना अच्छी बात नहीं होती। अपनी यह कला दिखाकर लोगों पर धाक जमाने के साथ साथ आज के युग मे चुप रहकर बडे़ काम निकालना  का तरीका ज्यादा अच्छा बन चुका है। लेकिन हम सभ्य लोगों के बीच आपसी समन्वय ज्यादा उचित होता है।उचित यही है कि हम चुप रहते हुये माहौल का जायजा लें और मध्य मार्ग खौजकर अपने काम करते रहें।मुँह तोड़ जवाब शराफत के विरुद्ध है सामाजिकता पर धब्बा है वही खामोशी आपको सम्मान दिलाती है।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

      फिल्मी दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान दादासाहेब फाल्के सम्मान है,जो प्रति वर्ष फिल्म से जुड़े लोग को उनकी गुणवत्ता के आधार पर दिया जाता है और दादासाहेब फाल्के सर को याद किया जाता है।विशेष परिस्थितियों में जवाब देना और चुप रहना अपने आप में कला है।इसका पालन इंसान को करना चाहिए।यदि कोई व्यक्ति बिना कारण मुझे तंग करेगा,तो मैं उसे मुंहतोड़ जवाब दूंगा।अगर मुझमें गलती है तो चुप रहना ही श्रेयस्कर है। माने तो समय पर दोनों की उपयोगिता  महत्वपूर्ण हैं।दोनों विशिष्ट कला के अंतर्गत आते हैं। इस प्रकार दोनों श्रेष्ठ हैं।

- दुर्गेश मोहन 

पटना - बिहार

     सही समय पर सही बात कहना , वो अपना पक्ष रखना एक कला भी होती है , व वक्त की पुकार भी !! जो शराफत के कारण , सही समय पर मुंहतोड़ , उचित जवाब नहीं देता , ये सोचकर कि सामनेवाला वक्त के साथ सुधर जायेगा , आजकल की दुनियां में शरीफ नहीं अपितु बेवकूफ कहलाता है !! अनावश्यक यदि नहीं सहना है , तो उचित समय पर मुंहतोड़ जवाब देना , आवश्यक है आज की दुनियां में!! चुप रहना भी एक कला है !! चुप रहकर समस्या का हल नहीं होता , पर विवादास्पद स्थिति मैं चुप रहकर , सही समय का इंतजार कर , जो मंत्रिद जवाब देते है , वो जिंदगी में कामयाब होते हैं !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

      दादासाहेब फाल्के की स्मृति में उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मैं यह हृदय से मानता हूँ कि "मुंहतोड़ जवाब देना एक कला है, परन्तु समय आने पर मौन रह जाना उससे भी बड़ी कला है।" उल्लेखनीय है कि मनुष्य के व्यक्तित्व की वास्तविक परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में ही होती है। प्रत्येक कटु वचन का उत्तर कटुता से देना बुद्धिमत्ता नहीं, अपितु अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना ही सच्ची परिपक्वता है। जहाँ अन्याय, असत्य और अपमान सीमा लांघ जाएँ, वहाँ सशक्त प्रतिकार आवश्यक हो जाता है; किन्तु जहाँ मौन ही सर्वोत्तम उत्तर हो, वहाँ शब्दों का अपव्यय केवल ऊर्जा की हानि है। मौन अनेक बार वह कह देता है, जिसे शब्द कभी व्यक्त नहीं कर सकते। उदाहरणस्वरूप दादासाहेब फाल्के का जीवन भी इसी संतुलन का अद्भुत उदाहरण था। उन्होंने आलोचनाओं का उत्तर वाद-विवाद से नहीं, बल्कि अपनी अनुपम सृजनशीलता और कर्मनिष्ठा से दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि महानता शोर में नहीं, सृजन में निवास करती है। उनका मौन भी बोलता था, और उनका कार्य युगों तक गूंजता रहेगा। अतः जीवन में यह विवेक अत्यंत आवश्यक है कि कब शब्दों को अस्त्र बनाना है और कब मौन को कवच। यही आत्मसंयम, यही धैर्य, और यही जीवन-कला व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाती है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

      चुप रहना समझदारी हो सकती है मगर मौन रहकर अन्याय सहना अपराध है। यह कला भी है और किसी विषय विशेष के प्रति अनदेखी भी। एक कहावत है----एक चुप, सौ सुख। जिसमें मानसिक शान्ति, तनाव में कमी ,बेवजह विवादों से बचना और रिश्तों में मजबूती है लेकिन समय ,परिस्थिति, विषय और प्रतिक्रिया फलस्वरूप उसी आधार पर भूमिका भी निभाई जा सकती है। इसके अलावा जब सामने वाले की बातें अथवा व्यवहार हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाए,नुकसान पहुंचाए, नीचा दिखाने की नियत साफ़ झलकती हो, तब ऐसे समय में मुंहतोड़ जुबाव देना चाहिए। मुंहतोड़ जुबाव का मतलब यह नहीं कि हम हिंसा पर उतारू हो जाएं बल्कि अपनी आत्म-गरिमा की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य बन जाता है। 

- शीला सिंह

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

      दैनिक जीवन में हम सभी का अनेक लोगों से सामना होता है। इस बीच बातचीत भी होती है। कभी वाद-विवाद भी हो जाता है। कभी जबाब-तलब भी होता है। इन सब स्थिति में हम पाते हैं कि कुछ लोग ईंट का जबाब पत्थर से देने की सामर्थ्य रखते हैं यानी मुँह तोड़ जबाब देने में कौशल होते हैं और कुछ लोग चुप रहकर स्थिति को संभाल लेते हैं। देखा जाए तो दोनों ही प्रतिउत्तर की स्थितियों में विशेषता तो है। विशेषता से आशय कौशल...कला...प्रतिभा से है। जो असमान्य भी है। सभी ऐसा नहीं कर पाते। तत्काल किसी बात की हाजिर जबाबी  बुद्धिमता और चुप रहना  समझदार होने की पहचान है। यह कला ही है जो सौभाग्य से और ईश्वर की कृपा से मिलती है। वैसे मेरा मानना है कि चुप रहना अपेक्षाकृत ज्यादा अच्छा है। क्योंकि चुप रहने से बात वहीं ख़त्म हो जाती है। जबकि जबाब में बहस बढ़ने के अवसर बढ़ते जाते हैं जो बढ़कर भयावह भी हो सकते हैं।" चुप रहना "विद्वानों ने भी श्रेष्ठ माना है। ऐसा करके संबंधित विषय पर गंभीरता से चिंतन-मनन करने का समय मिल जाता है और शांतिपूर्ण तरीके से निदान का रास्ता निकल आता है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

        मुँह तोड़ जवाब देना केवल शब्दों से किसी को परास्त करना नहीं है, बल्कि सही समय पर, सटीक और मर्यादित भाषा में अपनी बात रखना है। यह आत्मसम्मान की रक्षा का माध्यम हो सकता है, यदि इसमें संयम और विवेक का संतुलन हो। बिना सोचे-समझे दिया गया कठोर उत्तर स्थिति को बिगाड़ सकता है, जबकि संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्ति की बुद्धिमत्ता को दर्शाती है। वहीं, चुप रहना भी कमजोरी नहीं, बल्कि एक गहरी समझ का प्रतीक है। हर बात का उत्तर देना आवश्यक नहीं होता। कई बार मौन ही सबसे प्रभावी प्रतिक्रिया बन जाता है। यह व्यक्ति की सहनशीलता, धैर्य और आत्मनियंत्रण को दर्शाता है। मौन हमें अनावश्यक विवादों से बचाता है और मानसिक शांति बनाए रखने में सहायक होता है। यह कहना उचित होगा कि कब बोलना है और कब चुप रहना है, यही वास्तविक कला है। जो व्यक्ति इन दोनों के बीच संतुलन बना लेता है, वही जीवन में परिपक्व और सफल बनता है।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

     मुंह तोड़ जवाब देना एक कला है। यह आजकल के जमाने में अधिकतम लोगों के पास है। वर्तमान समय में सोच समझकर गंभीरता पूर्वक विचार करके किसी बात का जवाब देना यह बहुत कम लोगों के पास है। बिना सोचे विचारे तत्काल जवाब देने को मुंहतोड़ जवाब देना कहा गया है। जिसके कभी-कभी गंभीर परिणाम भी देखने को मिलते हैं,कभी-कभी यह शब्द घातक भी हो सकते हैं या यूं कहें कि सामने वाले का मन भी दुखा सकते हैं। इसलिए सोच समझ कर जवाब देना चाहिए। लेकिन कुछ लोग हाजार जवाबी रहते हैं, तत्काल सही निर्णय करने की क्षमता होती है इसीलिए कहा गया है की मुंह तोड़ जवाब देना एक कला है। ठीक इसके विपरीत चुप रहना ज्यादा बेहतर परिणाम देता है। समय देखकर बोलना, कम बोलना, बेहतर बोलना, नापतोल कर बोलना या बोल ना सको तो चुप रह जाना बहुत अच्छे परिणाम की और ले जाता है। इसीलिए कहा गया है कि चुप रहने वाला ज्यादा सुखी जीवन जीता है। 

- रविंद्र जैन रूपम 

 जिला धार‌- मध्य प्रदेश

      मुंह तोड़ जवाब देना भी एक गलत कला है, और हर बात पर चुप रह जाना भी एक गलत कला है। जीवन के अनुभव हमें सिखाते हैं कि अतियों में हमेशा दोष छिपा होता है—चाहे वह शब्दों की अति हो या मौन की।जब व्यक्ति हर बात का मुंह तोड़ जवाब देने लगता है, तो उसके शब्द प्रतिक्रिया बन जाते हैं, संवाद नहीं। ऐसे जवाब अक्सर अहंकार, क्रोध और आवेश से जन्म लेते हैं, जिनमें संवेदनशीलता और समझ का अभाव होता है। परिणामस्वरूप, रिश्ते टूटते हैं, दूरी बढ़ती है और व्यक्ति अपने ही शब्दों के जाल में उलझ जाता है। जवाब देना तब तक सार्थक है जब तक वह विचारपूर्ण और संयमित हो; अन्यथा वह केवल विवाद को जन्म देता है। दूसरी ओर, हर परिस्थिति में चुप रहना भी सामाधान नहीं है। चुप्पी कई बार समझदारी का प्रतीक होती है, परंतु जब यह आदत बन जाए तो यह कमजोरी का रूप ले लेती है। अन्याय, अपमान या गलत के सामने मौन रहना, उस गलत को स्वीकार करने जैसा है। ऐसी चुप्पी न केवल व्यक्ति के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाती है, बल्कि समाज में गलत प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा देती है।वास्तविक कला इन दोनों के बीच संतुलन बनाने में है। यह समझना कि कब शब्दों की आवश्यकता है और कब मौन अधिक प्रभावी होगा—यही परिपक्वता का संकेत है। सही समय पर बोले गए शब्द जहां सम्मान और स्पष्टता लाते हैं, वहीं उचित समय पर धारण किया गया मौन गरिमा और धैर्य का परिचायक बनता है। अतः न तो हर बात का मुंह तोड़ जवाब देना उचित है और न ही हर परिस्थिति में चुप रह जाना। जीवन की सच्ची कला विवेकपूर्ण अभिव्यक्ति और संतुलित मौन में निहित है।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

      जीवन में स्पष्टवादिता अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जो स्पष्ट बोलता है, सुखमय समय व्यतीत होता है। मुँह तोड़ जवाब देना, एक कला है, चुप रहना भी तो एक कला है। वास्तविक पहचान बनती है। कलाकार जिस तरह से मिट्टी पर आकृर्ति बनाकर, अपनी कला को पथ-प्रदर्शित करता है। यही कला स्वभाव से सामने वाले को प्रभावित करती है। उसी प्रकार से चुप रहना भी सार्थक विचार को सुन एक कला है। कभी-कभी हम बिना विचारें, हम कह देते है, सामने वाले को बुरा लगे या अच्छा हमें इससे मतलब नहीं रहता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

         बालाघाट - मध्यप्रदेश

      मुंहतोड़ जवाब देना परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं  किसे क्यों कहाँ - कहाँ बोलना है, कहाँ मौन रह जाना है, ! मानवता और उदण्डता परिभाषित करता है ! वक्त की नब्ज़ को पहचानना भी एक कला है। मानव की पहचान सूरत से नही सीरत से पहचानी जाती है ! उसी आधार पर उसकी उसके कृत हुनर व्यवहार की परख होती हैं मीठा बोल कर छुरा नही भोक सकते नीम शहद की पहचान कर आप आप अपने विचार प्रकट कर सकते है हालाकि दोनों स्वास्थकर है हर बात का हुनर होता है,  गुस्से को पी जाना भी तो एक कि कला है।शब्दों के तीर चलाना बहुत,  आसान है पर शब्दों को चुप रह कर रोक लेना एक कला है।तजुर्बे की स्याही से जब रिश्ते लिखे जाते हैं,  तो सुनना और समझना भी एक कला है।पुरस्कार प्राप्त करना और लौटना भी एक कला है ! प्रबुद्ध विरले ही ऐसे होते है ! जिन्हें आए है तो जाना होगा कड़वा सच तो पीना होगा ! एक मिसाल कायम कर बेमिसाल बना । मुँह तोड़ जबाब दे अपनी हस्ती स्वयं बना चुप रहते है ! सारा काम मीडिया करती है 

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

     मुॅंह तोड़ जबाव देना हो या फिर चुप रहना वास्तव में दोनों ही कला है और उपयोग के यथोचित अवसर को जानने वाला एक बहुत बड़ा कलाकार। इस कला में राजनेता बहुत प्रवीण होते हैं और इसके बल पर हर परिस्थिति को अपने पक्ष में करने का हुनर जानते हैं। अपने देश में, अपनी सरकार में कोई घटना हो तो उस पर  चुप्पी साध लेना विशेष कला होती है जबकि वैसी ही कोई घटना विपक्ष की सरकार में हो तो हाय तिल्ला और विरोध। इस मौन और चुप्पी की कला में संतुलन विशेष मायने रखता है। इनमें से किसी भी कला की अति नहीं होनी चाहिए। यथोचित स्थान पर यथोचित बोलना बहुत जरूरी है वरना अनहोनी हो ही जाती है। जैसे धृतराष्ट्र और भीष्म की चुप्पी का परिणाम महाभारत रहा। इस कला में संत, महात्मा भी सिद्धहस्त होते हैं।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल' 

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     “मुँह तोड़ जवाब देना” और “चुप रहना”—दोनों ही केवल प्रतिक्रियाएँ नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार चुनी गई रणनीतियाँ हैं।मुँह तोड़ जवाब देना, एक कला है— यह आत्मसम्मान की रक्षा का माध्यम बनता है। जब कोई अन्याय, अपमान या असत्य सामने हो, तब उचित शब्दों में दृढ़ता से उत्तर देना आवश्यक होता है। यह व्यक्ति के साहस, आत्मविश्वास और स्पष्टता को दर्शाता है। लेकिन यहाँ “मुँह तोड़” का अर्थ आक्रामकता नहीं, बल्कि तर्कपूर्ण और संयमित प्रतिवाद होना चाहिए।चुप रहना भी तो एक कला है—हर परिस्थिति उत्तर की माँग नहीं करती। कई बार मौन सबसे प्रभावी उत्तर होता है। यह आत्मसंयम, धैर्य और परिपक्वता का प्रतीक है। जहाँ विवाद बढ़ने की आशंका हो या सामने वाला समझने की स्थिति में न हो, वहाँ मौन रहकर स्वयं को बचाना ही बुद्धिमानी है।संतुलन ही वास्तविक कला है।जीवन हमें सिखाता है कि कब बोलना है और कब चुप रहना है। हर स्थिति का मूल्यांकन करके यदि हम उचित निर्णय लेते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में संवाद की कला में निपुण होते हैं निष्कर्षतःबोलना और चुप रहना—दोनों ही शक्तियाँ हैं। इनका सही समय पर, सही मात्रा में प्रयोग ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता है।

-डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

   मुँहतोड़ ज़वाब देना सचमुच में एक कला है,जो सबके बस की बात नहीं. हर कोई मुँहतोड़ ज़वाब नहीं दे सकता है. किस बात का क्या ज़वाब देना है तुरंत किसी के दिमाग में नहीं आता है, वह सोचता ही रह जाता है और बाद में ज़वाब सूझता है. जिसका कोई मतलब नहीं रह जाता है. ठीक उसी तरह चुप रहना भी एक कला है. य़ह भी सबके बस की बात नहीं है. क्योंकि कहा गया है कि सौ वक्ताओं को एक अकेला चुप हरा देता है.अगर कोई किसी के सामने बोलता रहे और सामने वाला चुपचाप रहे तो बोलने वाला अपने आप चुप हो कर चला जाएगा कि इसपर तो बोलने का कुछ असर ही नहीं होता है. जैसे भैंस के आगे बिन बजाय भैंस रही पगुराय. चुप रहने वाले की शक्ति का अंदाजा कोई नहीं लगा सकता है. वह कब क्या करेगा या बोल देगा कोई नहीं जानता. चुप रहना आंतरिक शक्ति को बढ़ावा देता है. मुँहतोड़ ज़वाब और चुप रहना दोनों अलग-अलग कला है. इसमें हर कोई माहिर नहीं होता है. समय के साथ दोनों जरूरी होता है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

" मेरी दृष्टि में " मुॅंहतोड़ जबाब हर कोई नहीं दे सकता है। यह कला अवश्य है। इस के लिए हिम्मत तथा कानून की सीमा का पालन अवश्य है। तभी जबाब सम्भव हो सकता है। कानून का उल्लघंन नहीं होना चाहिए। 

 - बीजेन्द्र जैमिनी 

(संचालन व संपादन)


Comments

  1. कुछ लोग नकारात्मकता से भरे होते हैं इसलिए मुँह तोड़ जबाब देते हैं।इसे कला नहीं फ़्रस्ट्रेशन कहते हैं ।लेकिन जो व्यक्ति चुप रहता है उसकी शान्तिपूर्ण प्रतिक्रिया से माहौल शांत हो जाता है ।
    - सुधा पाण्डेय
    लंदन
    ( WhatsApp से साभार)

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